Saturday, September 24, 2016

लड़ रहे हैं..!!

सुबह दूध के लिए लाइन में लड़ रहे हैं
दोपहर बिल जमा करने के लिए लड़ रहे हैं
बच्चे के एडमिशन के लिए स्कूल में लड़ रहे हैं
कूड़ा फेकने के लिए पडोसी से लड़ रहे हैं
रिपोर्ट लिखाने के लिए थाने में लड़ रहे हैं
डिग्री का ढेर लिए नौकरी पाने के लिए लड़ रहे हैं
सीमा पर देश बचाने के लिए लड़ रहे हैं
कुलचे के ठेले पर गरीब बच्चे जूठन खाने के लिए लड़ रहे हैं
कुछ बकरे की कुर्बानी पर आमादा कुछ बचाने को लड़ रहे हैं
मूर्ती न फेको गंगा में, तो कुछ नहाने के लिए लड़ रहे हैं
मीडिया डाल रहा पर्दा तो लड़के सच बताने के लिए लड़ रहे हैं
ठेके पे बोतल पाने के लिए लड़ रहे हैं
गणेश को दूध पिलाने को लड़ रहे हैं
कुछ जंगल तो कुछ गाय बचाने को लड़ रहे हैं
कुछ पानी बचा रहे हैं तो कुछ बहाने को लड़ रहे हैं
बहुतों ने छोड़ दिया कुछ देश में आने को लड़ रहे हैं
राम बड़ा या अल्लाह कुछ ये आज़माने को लड़ रहे हैं
अपनी नफ़्स से हम जमाने से लड़ रहे हैं।

लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं

राजनीति एक पपड़ी है और देश की हालत उसके नीचे का गहरा घाव, कभी कभी पपड़ी उखाड़ फेकने से घाव जल्दी भर जाता है....!!

Monday, August 29, 2016

ज्यामिति

मैं केंद्र में,
जड़वत खड़ा होता हूं....!

समर्पण के सम्बन्ध के,
एक सिरे को पकडे हुए.....!

जिसका दूसरा सिरा,
पकड़...!
तुम चलती हो,
पूरी परिधि पर...!

तभी तो पाती हो तुम,
अपना इच्छित,
पूर्ण विस्थापन..!

ये समर्पण की त्रिज्या,
कभी अतीत,
तो कभी भविष्य में,
बढ़ कर व्यास हो जाती है...!

केंद्र में, मुझ पर,
भविष्यगत शंकाओं का.
जब कभी,
एक लम्ब, अवतरित होता है..!

तो समेट लेता है तुम्हे भी...!

आच्छादित,
अस्तित्व हमारे,
शंकु बन जाते हैं...!

न होता वृत्त यदि आधार..!
तुम्हारे प्रेम और विश्वास का,
तो यह शंकु....

अपने ही,
शीर्ष पर टिका होता....!

हाँ.....तब भी
विस्थापन तो होता ही....!

परंतु तब,
केंद्र में एक नुकीला,
सिरा होता...!!!

जो हमारी
सारी ज्यामिति पर
खूंटे सा गड़ा होता..!!!

Wednesday, August 24, 2016

सुरसा उलझने

किसी नशेड़ी बनिए सा
मैं ख्यालों का तराज़ू लिए
अपना मन तोलता हूँ..!

उलझने हैं,
प्रेम करू तो किस से?
प्रेयसी या देश??

पथ चुनूं तो कौन सा?
जो घर जाता है?
या जो घर से बाहर?

संदेह करूँ तो किस पर?
रूढ़ियों पर या
रूढ़ियों के संदेह पर?

अर्थ को महत्त्व दूं?
या महत्त्व के अर्थ को?

प्रेम में घुल कर
कृष्ण वर्ण हो जाऊं?
या निष्काम का अनुचर?

उलझने ही तो हैं

उलझनों का गोला
सुबह निकलता है
और शुबहों का चाँद, रात..!

मैं इस चाँद को
उस सूरज से तोलता हूँ
आरज़ूओं से खेलता हूँ

फिर समय थप्पड़ मार
मुझे सच पर पटक देता है..!

उलझने फिर
सुरसा हो जाती हैं...!

Wednesday, June 29, 2016

आधी लकीर

होता है दिल में दर्द
बताना ही चाहें सब,
जरूरी तो नहीं....?

प्यार, प्यार ही होता है
पर निभाना जरूरी तो नहीं...?

दिलों में खलिश
यूं भी हो सकती है
दूरी ही हो जरूरी तो नहीं...!

ख्वाहिश, ख्वाहिश है
आधी है तो भी सही
पूरी हो जरूरी तो नहीं...!

तुमको उम्मीदें,
तो तुम्हारी ही होगी,
शिकन, किसी और के,
माथे पे हो जरूरी तो नहीं...!

मिला भी और नहीं भी
लकीर आधी भी थी
मेरी हथेली में पूरी तो नहीं....!

तू ही वजह हो जीने की
जरूरी तो नहीं...?

मुहब्बत....मुहब्बत है,
मजबूरी तो नहीं....!

NGO's और उन पर उठे प्रश्न

कई संस्थाओं में काम कर चुका हूँ और अब उनकी प्रवृत्ति भी समझ में आने लगी हैं। कार्यप्रणाली का आन्तरिक विश्लेषण अब उतना जटिल और असहज नहीं लगता। कई वर्ष इन संस्थाओं में कार्य करने के पश्चात गैरसरकारी संस्थाओं के बारे में मेरे जो विचार बने हैं, वो संभवतः संचालकों को स्वीकार्य नहीं होंगे.....
इनमे से कुछ मैं सब के साथ बांटना चाहता हूँ.......

१- अस्थिरता : अस्थिरता एक ऐसा कारक है जो संभवतः भारतवर्ष के हर गैरसरकारी संस्था का अंग बन चुका है खास तौर से वो जिन्हें हम NGO कहते हैं। मेरे दृष्टिकोण से इस समस्या का सबसे बड़ा कारण उस समझ का अभाव है जो NGO के कार्यकारी सदस्यों और प्रशासनिक सदस्यों के मध्य होनी चाहिए। जिन पाश्चात्य देशों में इस संस्कृति का जन्म हुआ उन्होंने न सिर्फ जन्म दिया बल्कि इसका समुचित विकास भी किया...यही कारण है की अमेरिका जैसे देश में कुल NGO की संख्या भारतवर्ष से कही कम है। इतनी अधिक संख्या होने के बावजूद लोग आज भी NGO में कार्य करने से कतराते हैं। मैंने जब इसका कारण जानने की कोशिश की तो परिणाम अपेक्षित ही थे। लोगो के अनुसार न तो इनका स्तर होता है न ही समय पर समुचित वेतन दिया जाता है। मेरे दृष्टिकोण से ये अस्थिरता सिर्फ इस लिए है क्योंकि NGO भारतीय संस्कृति नहीं है, भारत को इस संस्कृति की समझ भी नहीं है, और अगर है भी तो १०-२०% से अधिक गैरसरकारी संस्थाएं अपने प्रपोगंडा के अनुसार कार्य भी नहीं करती।

२- अनियंत्रित पंजीकरण एव कार्यप्रणाली : भारत में प्रतिदिन 800 से अधिक NGO पंजीकृत होते हैं, और ये प्रक्रिया कई दशकों से चल रही है...पंजीकरण की प्रक्रिया पर कोई नियंत्रण नहीं है। केवल एक संस्था के सदस्य ही जितनी चाहे उतनी संस्थाए पंजीकृत करा सकते हैं। मैंने जिन संस्थाओं में कार्य किया दुर्भाग्य से वो सभी समाजसेवा के हित में समाजसेवा करने के नाम पर बनाई गयी थी। इन सभी संस्थाओ के प्रशासन का ध्यान केवल धनोपार्जन पर ही रहा। न सिर्फ इतना ही बल्कि प्रत्येक संस्थाजनित कार्य में उस सुविधा अथवा मौके की तलाश की गई जिसमे अधिकाधिक धन बचाया जा सकता था, वह धन जो बच्चो, वृधो, सामाजिक अथवा राष्ट्रीय विकास के लिए था। धन को NGO में किस प्रकार खर्च किया गया है इसके लिए कोई जांच अगर होती भी है तो वो भारतीय बाबुशाही की भेंट चढ़ जाती है। भारतवर्ष में NGO के पंजीकरण की प्रक्रिया भी एक हास्यास्पद घटना है। किसी भी प्रकार बना हुआ एक दस्तावेज जो पंजीकरण के लिए आवश्यक है, एक समुचित नाम, कुछ जाली दस्तावेज जो सदस्यों के नाम, स्थायी पते के लिए आवशयक हैं के अतिरिक्त ५-६ हज़ार रुपये। इस सभी सामग्री के साथ NGO संस्कृति को भारत में होम कर दिया जाता है। पंजीकृत होने वाले NGO'S के अधिकाँश सदस्यों के नाम या तो जाली, मित्रों के या रिश्तेदारों के होते हैं। पंजीकरण की प्रक्रिया के दौरान ही हर उस बाधा का तोड़ उस दस्तावेज में ड़ाल दिया जाता है जो बाद में आ सकती हैं। भारत की न्यायिक व्यवस्था और कर व्यवस्था की पेचीदगी भी उन संस्थाओं की मदद ही करती हैं जो सिर्फ धनोपार्जन के लिए बने जाती हैं। कर मुक्ति एक सबसे बड़ा उपाय हैं NGO के माध्यम से धनोपार्जन करने का। न ही पंजीकरण के दौरान और न ही सक्रीय कार्यकाल में इस पर भारतीय प्रशासन ध्यान देता हैं। पंजीकरण कार्यालय से संपर्क करने पर पता चला की सरकारी अमला इस लिए इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप इस लिए नहीं करता क्यों की पंजीकरण से लाखों रुपये की प्रतिमाह आमदनी होती हैं। परन्तु पंजीकरण के बाद इन संस्थाओं को दिए गए और निजी स्वार्थ में खर्च होने वाले करोड़ों सरकारी रुपयों के बारे में कार्यालय अधिकारी के पास कोई कोई जवाब नहीं मिला। मुझे अधिकारी की समझ के बारे में आश्चय हुआ जिसने लाखों के राजस्व को तो ध्यान में रखा पर करोड़ों के अपव्यय पर उसका ध्यान नहीं गया। 

३- अनुचित लोग, अनुचित कार्य: मेरे एक निकट मित्र ने कई NGO पंजीकृत करा रखे हैं, जिनके माध्यम से उन्हें प्रतिवर्ष लाखों रूपये की आमदनी होती हैं वो भी सरकार से। उनके द्वारा किये गए किसी भी कार्य का मुझे ज्ञान नहीं हैं। एक बार बात बात में मैंने जब यह पूछ लिया की बिना काम के आप को पैसा कैसे दे दिया जाता हैं तो उनका जवाब था.....साहब काम तो हम भी करते हैं, सारा दिन फ़ाइल ही तो तैयार करते हैं.....यह एक मजाक तो था ही पर कटु सत्य भी था। मैंने पुछा की आप के NGO में कार्य करने वाले लोगो को तो आप को वेतन देना ही पड़ता हैं...तो उनका उत्तर था......एक लड़का और एक लड़की ऑफिस में गुटरगूं करने के लिए काफी हैं दोनों को ४-४ हज़ार रुपये आशिकी करने के देता हूँ, बाकी फाइल में रहते हैं। मैंने जब उनसे कर्मचारियों के योग्यता के बारे में पुछा तो जवाब था की साहब NGO में काम करने के लिए ग्रेजुएट होना काफी हैं।

इतने सत्य बोलना भी बुराई करना ही हैं, ख़ास तौर से जब मैंने खुद ऐसी संस्थाओं में काम किया हैं। मुझे लगता हैं इतना काफी हैं........!

भारत और पाक

अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के मुद्दे पर आज मैँ एक परिचर्चा सुन रहा था जिसमे अफगानिस्तान पाकिस्तान ओर भारत के प्रतिनिधि शामिल हुए।
परिचर्चा के दौरान ही यह साबित हो गया की क्षेत्रीयआतंकवाद की जड़ पाकिस्तान के एसे कट्टरवादी लोगोँ हे जो ना खुद चैन से रहते हे न दूसरोँ को रहने देते हैँ अफगानिस्तान के प्रतिनिधियो ने भारत की इस बात का समर्थन किया।
मैं इस तरह के वाद विवाद सुनने का अभ्यस्त हूँ लेकिन आज ये देख कर दंग रह गया कि पाकिस्तान के प्रतिनिधियो ने आर एस एस, बजरंग दल, मुक्ति वाहिनी और विश्व हिंदू परिषद का नाम लेकर हिंदुओं को भी उसी कट्टरवादी श्रेणी मेँ रख दिया इसके ठीक बाद भारत और अफगानिस्तान के प्रतिनिधि विचलित दिखाई देने लगे।
यह अफसोसजनक है की कुछ कट्टरवादी हिंदू संगठनोँ के कारण सभी हिंदुओं की कई हजार साल पुरानी अहिंसक प्रकृति पर प्रश्नचिंह लग रहे हैं।
कुछ ओर हो ना हो पर आर एस एस और बजरंग दल की कट्टरवादिता के कारण हिंदुओं को भी मुसलमानोँ की तरह कट्टरवादी और हिंसक समझा जाने लगेगा।