Thursday, November 23, 2017

सम्पूर्ण हूँ मैं

भूख नही है, प्रेम पाश है तुम्हारा,
जो हर दोपहर, कढ़ी की सोंधी खुशबू बन,
खींच लेता है मुझे घर के जानिब,
मैं सम्मोहित सा, खिंचा आता हूँ..!!!

माया हो कर खुद भी,
तुमने जन्मी है एक और माया,
में विरक्त रह भी कैसे पाता,
तो अब माया पाश में बंधा हूँ तुम्हारे...!!

अनमना था, निष्पक्ष था मैं,
पर प्रेम इतना भारी होगा
ये पता न था।
झुक गया अस्तित्व पूरा
तुम्हारी ओर, और तब मैंने जाना
सन्यास बेमानी है।

कदाचित ये विचित्र है,
की माया के आसक्त मैं,
प्रवाह में बहता हूँ,
तुम्हारे प्रभाव में
रहता हूँ

ये संयोग सुखद है
मेरा इच्छित है,
अब और कोई आकांक्षा नही
सम्पूर्ण हूँ मैं।


Monday, November 20, 2017

तुम पर आशार लिखने हैं

तुम ये जो सब्ज़ियों पे ज़ुल्म करती हो,
मुझे पता है,
मेरी हर गंद नफ़्स को,
यूँ ही काट देना चाहती हो...!!!

तुम जब धो देती हो एक तौलिए को,
बेपनाह रगड़ कर,
मैं समझ जाता हूँ..!!!
एक नाराज़गी धोने की,
कोशिश है ये..!!!!

बार बार चखती हो जो,
दाल में नमक,
तुम जांचती हो मेरे प्यार के तेवर..!!

क़रीने से कपड़े नहीं लगाए मेरे,
ज़िंदगी को सहूलियत का,
भरपूर अन्दाज़ दिया है..!!!!

संवरना कोई जरूरत नहीं,
पर हाँ तुम्हारी ख़्वाहिश भर है,
मेरे दिल की गहराइयी,
नापनी होगी आज तुमको..!!!

रोशनी की परिभाषा,
कोई तुमसे पूछे,
मुझे देख आँखो में,
जुगनू दमकते हैं...!!!

मैंने सितारों से ले कर,
गुलों तक मशविरा किया है,
अंदाज़े बयान नहीं मिलता,
आज मुझे भी तुम पर आशार लिखने हैं..!!!

Wednesday, November 15, 2017

तू ही खुदा तू ही कुरान हो जाये
मैं हिफ़्ज़ करूँ तेरे गोशे गोशे को ऐसे
तेरे नक्श ओ वज़ूद की
तुझसे भी ज्यादा पहचान हो जाये.......!!
पाक हो जाएं दिन
सुन्नत हो जाएं रातें
की हर लम्हा
माहे रमजान हो जाये.....!!
तेरे नज़रे करम का जो
कभी इधर एहसान हो जाये.......!!

कभी यूं जुड़ने दे खुद से,
के कोई दूरी न रहे,
मिले सांस यूं,
तेरे मेरे बीच किमाम हो जाये.......!

ये जो रूखे से ख्यालों का 
छोटा सा कुनबा बसा है दरम्यां,
कुन्ह-ऐ-गुल हो जाये,
गुलफाम हो जाये.....!

चलो इस रिश्ते को  वो मुकाम दें,
के झुक जाये बशर तमाम,
इस मोहब्बत के नाम,
एक सजदा-ऐ-अवाम हो जाये....!

मिसाल बन जाये इश्क़ यूं,
के हर ज़ालिम-ओ-सितमगर
दस्तूर-ऐ-आशिक़ी का गुलाम हो जाये....!

मिल कभी यूं,
के मेरे अश्क़ भिगो दें तुझे
बेपनाह,
और तेरी साँसे मुझ में किमाम
हो जाएँ.....!

फिर तू ही खुदा,
तू  ही कुरआन हो जाये....! 
कम रह जाती है जिंदगी हमेशा
सिलसिले चाहे मुश्किलों के
कम हो न हो...

वो तो होता ही रहेगा
के दर्द जिंदगी का दूसरा नाम है
चाहे कोई
सितम हो न हो........!

अपनी मुस्कुराहटों का मरहम
रखा करो इस पे
न जाने और आशिकी का
ये जख्म हो न हो......?

बहुत खूबसूरत है तोहफा ये ज़िन्दगी
हमेशा हम तुम पे मेहर ये
वहम हो न हो.........?

रखने दिया करो काँधे पे सर
और रोने दिया करो जार बेजार
कोई गम हो न हो...........?

इसी जनम चाहो जितना चाहना है
किसे पता फिर कोई
जनम हो न हो.........?

रूठा भी करो तो आगोश में सोया करो
कौन जाने कल
हम हो न हो..........??

Saturday, September 24, 2016

लड़ रहे हैं..!!

सुबह दूध के लिए लाइन में लड़ रहे हैं
दोपहर बिल जमा करने के लिए लड़ रहे हैं
बच्चे के एडमिशन के लिए स्कूल में लड़ रहे हैं
कूड़ा फेकने के लिए पडोसी से लड़ रहे हैं
रिपोर्ट लिखाने के लिए थाने में लड़ रहे हैं
डिग्री का ढेर लिए नौकरी पाने के लिए लड़ रहे हैं
सीमा पर देश बचाने के लिए लड़ रहे हैं
कुलचे के ठेले पर गरीब बच्चे जूठन खाने के लिए लड़ रहे हैं
कुछ बकरे की कुर्बानी पर आमादा कुछ बचाने को लड़ रहे हैं
मूर्ती न फेको गंगा में, तो कुछ नहाने के लिए लड़ रहे हैं
मीडिया डाल रहा पर्दा तो लड़के सच बताने के लिए लड़ रहे हैं
ठेके पे बोतल पाने के लिए लड़ रहे हैं
गणेश को दूध पिलाने को लड़ रहे हैं
कुछ जंगल तो कुछ गाय बचाने को लड़ रहे हैं
कुछ पानी बचा रहे हैं तो कुछ बहाने को लड़ रहे हैं
बहुतों ने छोड़ दिया कुछ देश में आने को लड़ रहे हैं
राम बड़ा या अल्लाह कुछ ये आज़माने को लड़ रहे हैं
अपनी नफ़्स से हम जमाने से लड़ रहे हैं।

लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं

राजनीति एक पपड़ी है और देश की हालत उसके नीचे का गहरा घाव, कभी कभी पपड़ी उखाड़ फेकने से घाव जल्दी भर जाता है....!!

Monday, August 29, 2016

ज्यामिति

मैं केंद्र में,
जड़वत खड़ा होता हूं....!

समर्पण के सम्बन्ध के,
एक सिरे को पकडे हुए.....!

जिसका दूसरा सिरा,
पकड़...!
तुम चलती हो,
पूरी परिधि पर...!

तभी तो पाती हो तुम,
अपना इच्छित,
पूर्ण विस्थापन..!

ये समर्पण की त्रिज्या,
कभी अतीत,
तो कभी भविष्य में,
बढ़ कर व्यास हो जाती है...!

केंद्र में, मुझ पर,
भविष्यगत शंकाओं का.
जब कभी,
एक लम्ब, अवतरित होता है..!

तो समेट लेता है तुम्हे भी...!

आच्छादित,
अस्तित्व हमारे,
शंकु बन जाते हैं...!

न होता वृत्त यदि आधार..!
तुम्हारे प्रेम और विश्वास का,
तो यह शंकु....

अपने ही,
शीर्ष पर टिका होता....!

हाँ.....तब भी
विस्थापन तो होता ही....!

परंतु तब,
केंद्र में एक नुकीला,
सिरा होता...!!!

जो हमारी
सारी ज्यामिति पर
खूंटे सा गड़ा होता..!!!