Saturday, April 9, 2011

मैं और तुम............अंततः........

कभी तुम्हारी कुशाग्रता,
और तुम्हार वाक्चातुर्य,
मुझे हीन भाव दे देता,

कभी तुम्हारा समर्पण,
मुझमे धारण कर लेता,
रूप आत्मबल का..........

तुम मुझसे प्रगाढ़ कब थे,
कब मैं तुम्हारे लिए समर्पित.....?

यही प्रश्न, तब से अब तक,
स्थिति को मथ रहे हैं,
और अब तक,
कोई सन्दर्भ नहीं निकला.........

मुझे भे ज्ञात और तुम्हे भी,
छल के रूप और उनके प्रयोग,
तुम भी निपुण और मैं भी,
ये तो प्रतियोगिता हो चली है.........

अवसाद अधिक न टिक पायेगा,
इसका भी अंत निकट आएगा,
शीघ्र ही, सत्य.......
स्वतः विदित हो जयेगा...........

पुनः, नयी जटिलताएं,
मेरे और तुम्हारे समक्ष,
मुह बाए खड़ी होंगी..........

हम हतप्रभ कभी जटिलताओं का,
और कभी एक दूजे का,
मुह ताकते...................

एक दूजे को ही दोष देते,
आरोप प्रत्यारोपण करेंगे.........

तब अंततः...........
समर्पण कर देगा कोई एक,
और दूसरा,
विजय की झूठी गर्वित मुस्कान लिए,
आगे बढ़ जाएगा...........

इस तरह हम अपनी नियति को,
प्रवाहित कर,
अपने अपने अस्तित्व के कारण को,
सारगर्भित कर देंगे...........

मैं, मैं ही रहूँगा..........
तुम भी तुम ही रहोगे........
बस संरचना का अर्थ,
सिद्ध हो जाएगा,
और..............

अपरिमित को.............
उसकी परिभाषा का,
एक और विस्तार मिल जाएगा...........

तुम भी संतुष्ट,
और मैं अज्ञानी भी संतुष्ट..............!




रचना..........!

पिछले कुछ दिन, प्रकृति की गोद में बिताने का सौभाग्य मिला....ईश्वर-प्रकृति-स्वयं सम्बन्ध का कुछ और स्पष्ट बोध हुआ.....लगा जैसे अकथनीय से संवाद हो रहा है....और मुझे मेरे चिर-प्रतीक्षित प्रश्नों के उत्तर मिल रहे है........!

ध्वनि, ऊष्मा......
तो कभी प्रकाश बन कर....
मिलता है.....
अनादि, अनंत.........

खेल जाती है,
प्रकृति के अधरों पर,
रहस्यमयी मुस्कान,
अपनी परिभाषा का,
गठन होते देख............

तो अनादि अनंत,
अपने अपररूप,
लेखनी से कहता है.......

देख मैं तू बन कर,
खुद को रच रहा हूँ........

विचित्र है, यह भी,
की अलौकिक, पराभौतिक से,
साक्षात्कार करने के,
मिलते हैं निर्देश,
लौकिक, भौतिक रचनाओं से........

कल्पना, भय और विश्वास की,
खिचड़ी परोस देते हैं,
धार्मिक ठग.......!

मन भर छक लेता है,
अनुचर समाज........

और यहाँ, वो कहता है,
अबोध विस्तार से..........

हूँ रहस्यमय.....
और उधृत होते होते भी.........
नया रहस्य रच रहा हूँ........

प्रश्न का उत्तर गढ़ रहा हूँ,
या उत्तर का......
प्रतिप्रश्न बन रहा हूँ......!

अति साधारण हूँ,
पर असाधारण लग रहा हूँ..........!

देख मैं तू बन कर,
खुद को रच रहा हूँ...........!

मंथन.........

बड़े ही विचित्र क्षणों में......विचित्र अनुभवों की एक श्रृंखला से साक्षात्कार हुआ........भौतिक परिवर्तनों का, विचित्र  आभाषों का, सर्वशक्तिमान से इन सबका और सबसे अपने अस्तित्व के सम्बन्ध का विश्लेषण करते करते लेखनी का सहारा ले लिया तो विश्लेषण का रूप कुछ कुछ कविता जैसा दिखने लगा.......ह्रदय ने कहा पोस्ट कर देना चाहिए.


परिवर्तन.....अवश्यम्भावी.......!
फिर इतना.........
अनापेक्षित क्यों प्रतीत होता है......?

संभावित तो सदैव.......
विस्तृत या लघु रूप ले कर,
संज्ञान में रहते ही हैं......!

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आभाष,
इन संज्ञानो को.....
आकृति भी देते रहते हैं.......!

सम और विषम संभावनाओं को,
इतना परिचय तो पर्याप्त होता है,
अकस्मात् के आत्मसात के लिए.........!

गुण-दोष, राग-विराग को,
भली भाँती, समझता है 'अंतस'....!

फिर विडम्बनाओं का अस्तित्व,
मंथन प्रदेश में रहने का औचित्य क्या है.........?

अप्रतिम अतुलनीय से,
साक्षात्कार की भूमिका.........
प्रारम्भ हो चुकी संभवतः............!

फिर शंकाओं का स्रोत, कोई आधार....
अभी तक शेष क्यों.....?

त्याज्य और ग्राह्य का विभेद......
अति सरल.......!
और सम्पादन,
अत्यधिक दुष्कर...........!

कदाचित संभव.......!
परिवर्तन ही रचना है.....!
एक अन्य मूल प्रश्न की..........!

परन्तु कहीं यह भी,
बौद्धिक क्लिष्टता का,
कोई संजाल तो नहीं.........?

समानातर और संयुग्मी,
होते रहने वाले आभाष,
बढ़ा देते हैं, स्थैतिक जटिलता..........!

अधिक संज्ञान,
अधिकाधिक विभ्रम.....!

अंततः....यह भौतिक परिवर्तन,
समस्या का मूल.........
कदाचित अधिक अथवा कम...........!