Saturday, September 24, 2016

लड़ रहे हैं..!!

सुबह दूध के लिए लाइन में लड़ रहे हैं
दोपहर बिल जमा करने के लिए लड़ रहे हैं
बच्चे के एडमिशन के लिए स्कूल में लड़ रहे हैं
कूड़ा फेकने के लिए पडोसी से लड़ रहे हैं
रिपोर्ट लिखाने के लिए थाने में लड़ रहे हैं
डिग्री का ढेर लिए नौकरी पाने के लिए लड़ रहे हैं
सीमा पर देश बचाने के लिए लड़ रहे हैं
कुलचे के ठेले पर गरीब बच्चे जूठन खाने के लिए लड़ रहे हैं
कुछ बकरे की कुर्बानी पर आमादा कुछ बचाने को लड़ रहे हैं
मूर्ती न फेको गंगा में, तो कुछ नहाने के लिए लड़ रहे हैं
मीडिया डाल रहा पर्दा तो लड़के सच बताने के लिए लड़ रहे हैं
ठेके पे बोतल पाने के लिए लड़ रहे हैं
गणेश को दूध पिलाने को लड़ रहे हैं
कुछ जंगल तो कुछ गाय बचाने को लड़ रहे हैं
कुछ पानी बचा रहे हैं तो कुछ बहाने को लड़ रहे हैं
बहुतों ने छोड़ दिया कुछ देश में आने को लड़ रहे हैं
राम बड़ा या अल्लाह कुछ ये आज़माने को लड़ रहे हैं
अपनी नफ़्स से हम जमाने से लड़ रहे हैं।

लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं

राजनीति एक पपड़ी है और देश की हालत उसके नीचे का गहरा घाव, कभी कभी पपड़ी उखाड़ फेकने से घाव जल्दी भर जाता है....!!

Monday, August 29, 2016

ज्यामिति

मैं केंद्र में,
जड़वत खड़ा होता हूं....!

समर्पण के सम्बन्ध के,
एक सिरे को पकडे हुए.....!

जिसका दूसरा सिरा,
पकड़...!
तुम चलती हो,
पूरी परिधि पर...!

तभी तो पाती हो तुम,
अपना इच्छित,
पूर्ण विस्थापन..!

ये समर्पण की त्रिज्या,
कभी अतीत,
तो कभी भविष्य में,
बढ़ कर व्यास हो जाती है...!

केंद्र में, मुझ पर,
भविष्यगत शंकाओं का.
जब कभी,
एक लम्ब, अवतरित होता है..!

तो समेट लेता है तुम्हे भी...!

आच्छादित,
अस्तित्व हमारे,
शंकु बन जाते हैं...!

न होता वृत्त यदि आधार..!
तुम्हारे प्रेम और विश्वास का,
तो यह शंकु....

अपने ही,
शीर्ष पर टिका होता....!

हाँ.....तब भी
विस्थापन तो होता ही....!

परंतु तब,
केंद्र में एक नुकीला,
सिरा होता...!!!

जो हमारी
सारी ज्यामिति पर
खूंटे सा गड़ा होता..!!!

Wednesday, August 24, 2016

सुरसा उलझने

किसी नशेड़ी बनिए सा
मैं ख्यालों का तराज़ू लिए
अपना मन तोलता हूँ..!

उलझने हैं,
प्रेम करू तो किस से?
प्रेयसी या देश??

पथ चुनूं तो कौन सा?
जो घर जाता है?
या जो घर से बाहर?

संदेह करूँ तो किस पर?
रूढ़ियों पर या
रूढ़ियों के संदेह पर?

अर्थ को महत्त्व दूं?
या महत्त्व के अर्थ को?

प्रेम में घुल कर
कृष्ण वर्ण हो जाऊं?
या निष्काम का अनुचर?

उलझने ही तो हैं

उलझनों का गोला
सुबह निकलता है
और शुबहों का चाँद, रात..!

मैं इस चाँद को
उस सूरज से तोलता हूँ
आरज़ूओं से खेलता हूँ

फिर समय थप्पड़ मार
मुझे सच पर पटक देता है..!

उलझने फिर
सुरसा हो जाती हैं...!

Wednesday, June 29, 2016

आधी लकीर

होता है दिल में दर्द
बताना ही चाहें सब,
जरूरी तो नहीं....?

प्यार, प्यार ही होता है
पर निभाना जरूरी तो नहीं...?

दिलों में खलिश
यूं भी हो सकती है
दूरी ही हो जरूरी तो नहीं...!

ख्वाहिश, ख्वाहिश है
आधी है तो भी सही
पूरी हो जरूरी तो नहीं...!

तुमको उम्मीदें,
तो तुम्हारी ही होगी,
शिकन, किसी और के,
माथे पे हो जरूरी तो नहीं...!

मिला भी और नहीं भी
लकीर आधी भी थी
मेरी हथेली में पूरी तो नहीं....!

तू ही वजह हो जीने की
जरूरी तो नहीं...?

मुहब्बत....मुहब्बत है,
मजबूरी तो नहीं....!

NGO's और उन पर उठे प्रश्न

कई संस्थाओं में काम कर चुका हूँ और अब उनकी प्रवृत्ति भी समझ में आने लगी हैं। कार्यप्रणाली का आन्तरिक विश्लेषण अब उतना जटिल और असहज नहीं लगता। कई वर्ष इन संस्थाओं में कार्य करने के पश्चात गैरसरकारी संस्थाओं के बारे में मेरे जो विचार बने हैं, वो संभवतः संचालकों को स्वीकार्य नहीं होंगे.....
इनमे से कुछ मैं सब के साथ बांटना चाहता हूँ.......

१- अस्थिरता : अस्थिरता एक ऐसा कारक है जो संभवतः भारतवर्ष के हर गैरसरकारी संस्था का अंग बन चुका है खास तौर से वो जिन्हें हम NGO कहते हैं। मेरे दृष्टिकोण से इस समस्या का सबसे बड़ा कारण उस समझ का अभाव है जो NGO के कार्यकारी सदस्यों और प्रशासनिक सदस्यों के मध्य होनी चाहिए। जिन पाश्चात्य देशों में इस संस्कृति का जन्म हुआ उन्होंने न सिर्फ जन्म दिया बल्कि इसका समुचित विकास भी किया...यही कारण है की अमेरिका जैसे देश में कुल NGO की संख्या भारतवर्ष से कही कम है। इतनी अधिक संख्या होने के बावजूद लोग आज भी NGO में कार्य करने से कतराते हैं। मैंने जब इसका कारण जानने की कोशिश की तो परिणाम अपेक्षित ही थे। लोगो के अनुसार न तो इनका स्तर होता है न ही समय पर समुचित वेतन दिया जाता है। मेरे दृष्टिकोण से ये अस्थिरता सिर्फ इस लिए है क्योंकि NGO भारतीय संस्कृति नहीं है, भारत को इस संस्कृति की समझ भी नहीं है, और अगर है भी तो १०-२०% से अधिक गैरसरकारी संस्थाएं अपने प्रपोगंडा के अनुसार कार्य भी नहीं करती।

२- अनियंत्रित पंजीकरण एव कार्यप्रणाली : भारत में प्रतिदिन 800 से अधिक NGO पंजीकृत होते हैं, और ये प्रक्रिया कई दशकों से चल रही है...पंजीकरण की प्रक्रिया पर कोई नियंत्रण नहीं है। केवल एक संस्था के सदस्य ही जितनी चाहे उतनी संस्थाए पंजीकृत करा सकते हैं। मैंने जिन संस्थाओं में कार्य किया दुर्भाग्य से वो सभी समाजसेवा के हित में समाजसेवा करने के नाम पर बनाई गयी थी। इन सभी संस्थाओ के प्रशासन का ध्यान केवल धनोपार्जन पर ही रहा। न सिर्फ इतना ही बल्कि प्रत्येक संस्थाजनित कार्य में उस सुविधा अथवा मौके की तलाश की गई जिसमे अधिकाधिक धन बचाया जा सकता था, वह धन जो बच्चो, वृधो, सामाजिक अथवा राष्ट्रीय विकास के लिए था। धन को NGO में किस प्रकार खर्च किया गया है इसके लिए कोई जांच अगर होती भी है तो वो भारतीय बाबुशाही की भेंट चढ़ जाती है। भारतवर्ष में NGO के पंजीकरण की प्रक्रिया भी एक हास्यास्पद घटना है। किसी भी प्रकार बना हुआ एक दस्तावेज जो पंजीकरण के लिए आवश्यक है, एक समुचित नाम, कुछ जाली दस्तावेज जो सदस्यों के नाम, स्थायी पते के लिए आवशयक हैं के अतिरिक्त ५-६ हज़ार रुपये। इस सभी सामग्री के साथ NGO संस्कृति को भारत में होम कर दिया जाता है। पंजीकृत होने वाले NGO'S के अधिकाँश सदस्यों के नाम या तो जाली, मित्रों के या रिश्तेदारों के होते हैं। पंजीकरण की प्रक्रिया के दौरान ही हर उस बाधा का तोड़ उस दस्तावेज में ड़ाल दिया जाता है जो बाद में आ सकती हैं। भारत की न्यायिक व्यवस्था और कर व्यवस्था की पेचीदगी भी उन संस्थाओं की मदद ही करती हैं जो सिर्फ धनोपार्जन के लिए बने जाती हैं। कर मुक्ति एक सबसे बड़ा उपाय हैं NGO के माध्यम से धनोपार्जन करने का। न ही पंजीकरण के दौरान और न ही सक्रीय कार्यकाल में इस पर भारतीय प्रशासन ध्यान देता हैं। पंजीकरण कार्यालय से संपर्क करने पर पता चला की सरकारी अमला इस लिए इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप इस लिए नहीं करता क्यों की पंजीकरण से लाखों रुपये की प्रतिमाह आमदनी होती हैं। परन्तु पंजीकरण के बाद इन संस्थाओं को दिए गए और निजी स्वार्थ में खर्च होने वाले करोड़ों सरकारी रुपयों के बारे में कार्यालय अधिकारी के पास कोई कोई जवाब नहीं मिला। मुझे अधिकारी की समझ के बारे में आश्चय हुआ जिसने लाखों के राजस्व को तो ध्यान में रखा पर करोड़ों के अपव्यय पर उसका ध्यान नहीं गया। 

३- अनुचित लोग, अनुचित कार्य: मेरे एक निकट मित्र ने कई NGO पंजीकृत करा रखे हैं, जिनके माध्यम से उन्हें प्रतिवर्ष लाखों रूपये की आमदनी होती हैं वो भी सरकार से। उनके द्वारा किये गए किसी भी कार्य का मुझे ज्ञान नहीं हैं। एक बार बात बात में मैंने जब यह पूछ लिया की बिना काम के आप को पैसा कैसे दे दिया जाता हैं तो उनका जवाब था.....साहब काम तो हम भी करते हैं, सारा दिन फ़ाइल ही तो तैयार करते हैं.....यह एक मजाक तो था ही पर कटु सत्य भी था। मैंने पुछा की आप के NGO में कार्य करने वाले लोगो को तो आप को वेतन देना ही पड़ता हैं...तो उनका उत्तर था......एक लड़का और एक लड़की ऑफिस में गुटरगूं करने के लिए काफी हैं दोनों को ४-४ हज़ार रुपये आशिकी करने के देता हूँ, बाकी फाइल में रहते हैं। मैंने जब उनसे कर्मचारियों के योग्यता के बारे में पुछा तो जवाब था की साहब NGO में काम करने के लिए ग्रेजुएट होना काफी हैं।

इतने सत्य बोलना भी बुराई करना ही हैं, ख़ास तौर से जब मैंने खुद ऐसी संस्थाओं में काम किया हैं। मुझे लगता हैं इतना काफी हैं........!

भारत और पाक

अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के मुद्दे पर आज मैँ एक परिचर्चा सुन रहा था जिसमे अफगानिस्तान पाकिस्तान ओर भारत के प्रतिनिधि शामिल हुए।
परिचर्चा के दौरान ही यह साबित हो गया की क्षेत्रीयआतंकवाद की जड़ पाकिस्तान के एसे कट्टरवादी लोगोँ हे जो ना खुद चैन से रहते हे न दूसरोँ को रहने देते हैँ अफगानिस्तान के प्रतिनिधियो ने भारत की इस बात का समर्थन किया।
मैं इस तरह के वाद विवाद सुनने का अभ्यस्त हूँ लेकिन आज ये देख कर दंग रह गया कि पाकिस्तान के प्रतिनिधियो ने आर एस एस, बजरंग दल, मुक्ति वाहिनी और विश्व हिंदू परिषद का नाम लेकर हिंदुओं को भी उसी कट्टरवादी श्रेणी मेँ रख दिया इसके ठीक बाद भारत और अफगानिस्तान के प्रतिनिधि विचलित दिखाई देने लगे।
यह अफसोसजनक है की कुछ कट्टरवादी हिंदू संगठनोँ के कारण सभी हिंदुओं की कई हजार साल पुरानी अहिंसक प्रकृति पर प्रश्नचिंह लग रहे हैं।
कुछ ओर हो ना हो पर आर एस एस और बजरंग दल की कट्टरवादिता के कारण हिंदुओं को भी मुसलमानोँ की तरह कट्टरवादी और हिंसक समझा जाने लगेगा।

मेरे पिता ने कहा

भला शंकर, ब्रम्हा, अल्लाह, मोहम्मद, कृष्ण, और जीसस से मुझे क्या मतलब......बने रहें वो जो भी हैं........? मेरे पिता ने कहा....तू हिन्दू पैदा हुआ है पर........ इंसान बनना.........बस मुझे इस से मतलब है..!

आदर्श

अपने आप में एक चिरंतन प्रगतिवादी घटना है जिसकी परिभाषा घटना के प्रादुर्भाव के पहले ही क्षण स्वयं को झुठला देती है।
आदर्श का अस्तित्त्व प्रकृति के सन्दर्भ में प्रतिपल बदलता है लेकिन मानव स्मृति में यह घटना भाव बन कर लंबे समय तक रह जाती है यही कारण है की मानव सभ्यता में "आदर्श" जीवित रहते हैं।

रंगीला महात्मा गांधी।


इसी शीर्षक पर और ऐसे ही कई और आर्टिकल मैंने अभी हाल ही में फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया साधनो पर देखे जिनको जोर शोर से शेयर किया जा रहा है।
गांधी कैसे थे कैसे नहीं वो अलग मुद्दा है पर जिन्होंने लिखे वो कुत्सित और विकृत मानसिकता के लोग हैं। ऐसे लोगों को तलाश रहती है मुद्दों की जिनको उछाल कर लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकें और अपनी मानसिक विकृति की क्षुधा को तुष्ट कर सकें।
नहीं तो भला 70 साल पहले मरे हुए की कमी निकालने की क्या जरुरत। भाई उसमे से वो ढूंढो जो अच्छा है और आगे काम आये। तुम एक विकृति की बार बार बात कर के उसका विज्ञापन ही कर रहे हो।
और पढ़ने वाले......उनको तो रस मिलता ही है। कल्पनाओं में ही सही वो पोर्नोग्राफी का मज़ा लेते हैं।
मैं शर्त लगा कर कहता हूँ जो लिख रहे हैं उनका कोई न कोई आर्थिक राजनैतिक या सामजिक फायदा अवश्य है (और दिमाग में गंदगी है) लेकिन पढ़ने वाले काठ के उल्लू, गधे हैं।

विकास

वो चीज़ जिसे तुम विकास कहते हो.........वो गरीबों के लिए नहीं है---
विकास है उनके लिए जो कोयला खोदने से पहले आदिवासियों की झोपड़ियाँ खोद देते हैं...!
विकास है थुलथुले मोटे करोड़पतियों और अरबपतियों के लिए!
विकास है इन अरबपतियों की बड़ी कंपनियों में नौकरी कर रहे मोटी तनख्वाह पा रहे लोगों के लिए!
विकास है उन धंधेबाजों के लिए जो किसानों का अनाज १० में खरीद १०० में बेचते हैं!
विकास है उनके लिए जो कार खरीद सकते हैं, जो ५० हज़ार का फोन खरीद सकते हैं, जो माल में जाकर २०० किलो की दाल खरीद सकते हैं!
विकास है उनके लिए जिन्होंने कभी गाँव नहीं देखा लेकिन गाँव का हर संसाधन उनके लिए पैसा फेकते ही हाज़िर है....!
विकास है उनके लिए जो रोज़ शाम को ५००० की शराब मर्सिडीज़ के अन्दर बैठे पी जाते हैं!
विकास हैं उन पुलिस वालों के लिए जो आदिवासियों की लड़कियों को उठा ले जाते हैं बलात्कार करते हैं गोली मार देते हैं और बन्दूक बगल में डाल कर उन लड़कियों को नक्सली घोषित कर देते हैं क्योंकी इसके बाद लड़ाई लड़ रहे आदिवासियों का इधर हौसला टूट जाता है उधर दरोगा को इतना करने के १-२ लाख रूपये मिल जाते हैं!
विकास है उन नेताओं के लिए जो उद्योगपतियों के लिए वेश्या का किरदार अदा करते हैं! नेता जो अपने आत्मसम्मान का बलात्कार करवाने के बदले चुनाव की फंडिंग पाते हैं...फिर किसानो से ले कर माध्यम वर्ग तक सब का शोषण करते हैं...!
अगर तुम किसान के बेटे हो.....एक छोटे नौकरी पेशा बाप की औलाद हो.....एक छोटे दूकानदार की जायज़ औलाद हो.......................तो ये सारी बातें तुम्हारे लिए हैं... .................और फिर बता दूं की विकास तुम्हारे लिए नहीं है..!

मुझे विश्वास है

मुझे तसल्ली है की तुम मुझे पसंद नहीं करते, और ये विश्वास भी है कि मैं ही सही हूँ....!
क्योंकि यदि तुम मुझे पसंद करते तो इसका मतलब होता - मैं वो कहता हूँ जो तुम चाहते हो, मैं वो लिखता हूँ जो तुम चाहते हो, वो सब झूठ होता, वो सब चापलूसी होती!
तुम्हे मीठी गोलियां पसंद हैं, मैं कडवी नीम हूँ, तुम्हे जलेबियाँ पसंद हैं, मैं मिर्च सा तीखा हूँ.....!
अगर तुम मेरे साथ नहीं चल रहे तो ऐसा नहीं है कि मैं अकेला हूँ...........दरअसल तुम मेरे साथ नहीं चल पा रहे हो......मेरा पथ कांटो भरा है और तुम्हे गुदगुदे कालीन पसंद हैं....!
तुम वातानुकूलित कमरों के आराम के तलबगार हो.....मैं कड़ी धूप का राहगीर.........! तुम मुझसे लड़ते हो, कीचड उछालते हो मुझपर और मुझे उकसाते हो तुम्हारी उन अतार्किक बातों का जवाब देने के लिए जिनका कोई ठोस आधार नहीं है......! 
और जब तुम देखते हो कि मैंने तुम्हे नकार दिया है, तुम चिढ जाते हो, मुझे कोसते हो, गलियाँ देते हो...! 
गालियाँ देते हुए तुम ये भूल जाते हो की अनजाने ही उनका अपमान कर रहे हो जिनकी दुहाई दे कर तुम अपना धंधा चलाते हो........तुम स्त्री, माँ, बहन जैसे शब्दों की महत्ता भूल जाते हो....!
हाँ इसीलिए............मुझे विश्वास है की मैं ही सही हूँ...!

Saturday, June 4, 2016

तुम, इम्तेहान और सब..!

तुझसे ही बस फेर लेता हूँ नज़र
कर देता हूँ नज़र अंदाज़

वरना

मोहब्बत भी करता हूँ
तो इम्तेहान लेता हूँ
आँखे पढ़ लेता हूँ
शख्शियत पहचान लेता हूँ

निस्सार करता हूँ वफ़ा
तो बेवफाई पे
जान लेता हूँ
मुझ से मिलना जरा सम्हल कर
लफ़्ज़ों से पहले ज़ुबान लेता हूँ

कितने भी पोशीदा हो तुम
के हो लाख परदों में फितरतें
और छुपा लो जैसे भी
के राज़ हों तो....जान लेता हूँ..!

मुझसे वफाओं में
जो पाओगे महक है जन्नतनशीं
की रिश्तों में, किमाम लेता हूँ
ज़ाफ़रान लेता हूँ

खुद को भी परखता हूँ
बेवफाई से बचता हूँ
अपना भी इम्तेहान लेता हूँ..!

ऐसी रातों से दिल भर गया

ये ज़िन्दगी भी
गर रात भर की हुआ करती..
हर दुसरे रोज़
सुबह होती..
यूं स्याह अँधेरे न रेंगते
मेरे वजूद के इर्द गिर्द..

ना आये ख्वाब
तो भी क्या बात थी?
जिंदगी यूं भी
तो बसर हो सकती है

अंगड़ाई होती के
गोया आज़ादी ही होती
सुबह होती के इंतज़ार होता
आती ही होगी

ज़िम्मा होता भी
तो ज़र्रा ज़र्रा
फ़िक्र होती तो
कतरा कतरा...
होती तो बस इतनी ही होती..

मेरे पैमाने भरने का
सबब भी क्या...?
ये बेहिसाब रातों का नाश
और मयनोशी
मेरी तो फितरत न थी

ऐसी रातों से
दिल भर गया....!

Tuesday, May 31, 2016

तुम...हाँ तुम...!

जब न करना चाहूँ
सबसे ज्यादा याद आती हो तुम..

मैं उदास होता हूँ
और मुस्कुराती हो तुम

कभी कभी यूं भी
दिल बहलाती हो तुम...

इंतज़ार होता है न जाने किसका
और ख्वाबों में आती हो तुम..

इधर उठता है धुआं दिल से मेरे
और उधर इठलाती हो तुम...

कभी यूं भी होता है
की शाम होती है बेहद अँधेरी...फिर
अपनी यादों का
दिया जलाती हो तुम

मेरी अहमियत ज्यादा नहीं
फिर भी मेरे वज़ूद में हो
क्यों मुझसे इतना जुड़ जाती हो तुम

कभी कभी
बहुत याद आती हो तुम....!

Monday, May 2, 2016

जागें फिर से...

चलो फिर से
आज़ादी की कहानी लिखें

लिखें तो नयी लिखें
क्या नए मुलम्मे में पुरानी लिखें

जहाँ मज़हबों की आंच
ठंडी पड़ी है, ऐसी बारिशों की
शाम सुहानी लिखें

तुमने अपनी जवानी ज़ाया कर दी
मंदिर मसाजिद के फेर में
हम क्यों उसी लकीर पे
अपनी जवानी लिखें

थोडा आबे जमजम लिखें
थोडा गंगा का पानी लिखें
फिरकों को दफ़न करो
आओ कुछ रूहानी लिखें

निकलो सियासती बुज़ुर्गो
हमारी संसद से
हटो के हम आते हैं
नज़र ऐ वतन नौजवानी लिखें

तुमने कैसे चूसा है खून सियासत में
बता देंगे अब, और ये भी
के बस इक अम्न खातिर
कितनी हमने ख़ाक छानी लिखे

दंगों के दहकते शोलों को हटा
नरम गोद दें माओं को
जख्म ले के बहनों के
किस्मतों में उनके रातरानी लिखें

उठ के बच्चा कोई
न बिलखे दूध खातिर
न फिक्रमंद हो अवाम भूखे सोने की
कभी तो ऐसी सुबह सुहानी लिखें

Sunday, May 1, 2016

हालात

बहाने से ले के हिजाब की ओट
बैठी है मेरी मा, के चेहरे पे
बाप की मर्दानगी के निशान दिखते हैं

मेरे मोहल्ले में भी,
खुदा नहीं दिखता,
खुदाई नहीं दिखती
सिर्फ हदीस-ओ-कुरआन दिखते हैं

ये कैसा मज़हब है?
और कैसा मुल्क है
हैवान की फितरत में डूबे
इंसान दिखते हैं

उनको अय्याशी,
हमें मजदूरी की आदत
लेकिन वो,
हमारे दड़बे की रौशनी से
परेशान दिखते हैं

हक़ की बात न करो बुर्कानशीनो
मज़्ज़म्मत न बुलाओ अपनी
अजब अदालतें है इस मुल्क की
यहाँ एहसान में लिपटे,
खूनी फरमान लिखते हैं

यूं गिरियां, तोहमतें न लगा
चुप रह, इक इब्रत क्या काफी नहीं
तेरे ज़ूद एहसास के खातिर
क्या तुझे नहीं इस मुल्क के
मुर्दा जवान दिखते हैं

इस अब्तर नस्ल की खैर
लेने न आएगा कोई
हमसे ले गए जो बुलंदियां
उनको पैरों तले जमी अब याद नहीं
सिर्फ आसमान दिखते हैं

आओ गमख़्वार हो जाएँ
हम एक दूजे के ही
कहाँ अब इस गोशे में
वो मज़हब के ठेकेदार
वो हुक्मरान दिखते हैं


शब्दकोष मदद के लिए

गिरियां- चीखना चिल्लाना
इब्रत-डांट
ज़ूद-तुरंत
अब्तर- नष्ट, मूल्यहीन
गोशा- कोना, एकांत
गमख़्वार- दिलासा देने वाला

Friday, April 8, 2016

असम

काज़ीरंगा की धुंधली सुबहों में
चहकते जो परिंदे
हरियाली चादर पे
फिरती नाचती प्रकृति
जन्नत का होता भरम

तिबा मिसिंग कोरबी
और बोडो संग वैष्णव
थिरकते मचलते नाचते
झंकृत हो करताल
और बजे मिरदंग

कहानियाँ सुनाती हैं
दीवारें राज़ छुपाती हैं कम
सीधा था सादा था
आज भी मासूम है
सदा के जैसा असम

बोध

रुई से धवल बादलों को तुम
सहलाते होगे....
महसूस करते होगे नरमी
और गुदगुदा एहसास

होराइजन की नीली छटा को निहार
पुलकित होते होगे

सुनहरी किरणों को समेट कर
अंजुली में अपनी
उछाल उछाल कर
बाल क्रीडा का आनंद
लेते ही होगे...!

वो जो आयनमंडल से लगी
बादलों के ऊपर की
निर्मल हवा है
भर के अपनी साँसों में
मुग्ध होते होगे

चुटकी बजाते ही
सब ज़हर हो जाता होगा
उड़नछू...
ईश्वर जो हो...!

कहो हम क्या करें
जो हमने अपनी
बगिया उजाड़ी है स्वयं

अब एक दम भर
सांस के लिए घुटते हैं
शहर शहर गाँव गाँव..!

रातें

करवटों की, सलवटों की कुछ
वस्ल रातें

नमूंदार कुछ शोख चटक धब्बे
वो क़त्ल रातें

फितरतन न तेरी न मेरी
नामालूम नस्ल रातें

कुछ सेहरा कुछ दरिया
कुछ गुस्ल रातें

जुदा जुदा, मिली मिली सी
कुछ हमशक्ल रातें

गुमशुदा, कुछ रिमझिम, अंगड़ाइयां
आजकल रातें

हंसाती रुलाती, रूठती मनाती
दरअसल रातें

मुस्कुराहटें, शिकवे, अश्क, शैतानियाँ
बातें और रातें।

Wednesday, March 9, 2016

वर्ण व्यवस्था और उच्च सामजिक रक्तचाप भाग 1

काफी उच्च रक्तचाप की शिकायत थी बहुत दिनों से, आखिरकार आज सुबह अस्पताल जा रहा था। किराए के घर से निकलते ही एक व्यक्ति को देखा जिसकी एक आँख खराब थी। बचपन में परिवार वालों की कही हुई बात कौंध गयी, "आज का दिन खराब"। विज्ञान से जुड़ा हूँ साथ ही दर्शन, अध्यात्म और संस्कृति का भी गहन अध्ययन किया है और जानता था की बकवास विचार है इसलिए सर झटक कर इस विचार को दिमाग से निकाल दिया। पूरे रास्ते दिमाग में ख्यालों की गुत्थमगुत्था चलती रही। दरअसल मिथकों को भारत में परवरिश के साथ बच्चों के मष्तिस्क में इतना गहरे बिठा दिया जाता है की उम्र भर वो उस मिथक की छाया में ही जीते हैं।

क्यों की शिक्षा का स्तर अभी भी 80 प्रतिशत जनता के मिथकों को तोड़ने के लिए प्रभावशाली रूप में नहीं आया है ज्यादातर लोग जीवन भर ऐसे हज़ारों देशव्यापी मिथकों को हमेशा सच ही मानते रहते हैं। और कुछ हो न हो पर इन मिथकों पर अपने अटूट विश्वास के चलते लोग न सिर्फ अपने कई आवश्यक कार्यो को बीच में छोड़ देते हैं या बंद कर देते हैं बल्कि बेचारे कई आंशिक द्रष्टिबाधित लोगों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। कुछ जो अन्धविश्वास की पराकाष्ठा पर हैं वो बेचारे पीड़ित व्यक्तियों को दंड भी दे डालते हैं। पहले से ही पीड़ित एक व्यक्ति को यह सुन कर कदापि अच्छा नही लगेगा की ईश्वर अथवा प्रकृति प्रद्दत्त समस्या का जिम्मेदार उस व्यक्ति को माना जा रहा है और उसे उस स्थिति का दंड दिया जा रहा है जिसमें उसका कोई हाथ नहीं है।

मेरी परवरिश गाँव में हुई जहाँ अंधविश्वास का ये आलम था की न सिर्फ ईश्वर बल्कि भूत प्रेत के भौतिक स्वरूपों को सहज रूप से सभी ने स्वीकार कर लिया था। वर्ष में 30 से अधिक ऐसे त्यौहार मनाये जाते थे जो मिथकों को मात्र भ्रम और अफवाह से कहीं अधिक आगे ले जाकर विश्वास में और उसके बाद अन्धविश्वास में परिवर्तित करते रहे हैं। भारत का 5 हज़ार वर्षों से अधिक पुराना इतिहास इस तथ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है। धर्मांध वर्ग की उलटी सीधी कल्पनाओं को दृढ करने में अफवाहों ने सबसे अहम् भूमिका निभायी है। यह भी विडम्बना है की कई ऐसे लोग जो नास्तिक हैं, ज्योतिष पर अटूट विश्वास रखते हैं जबकि ज्योतिष धर्म का परिउत्पाद ही है उस से अधिक कुछ नहीं।

भारत में मिथकों ने अतीत के कुछ सबसे बड़े व्यवसायों को बहुत ही प्रभावी रूप से स्थापित करने में कोई कसर नही छोड़ी जिनमे से पंडिताई जिसमे सारे कर्मकाण्ड, जन्म से झाड़फूंक, ज्योतिष और आयुर्वेद प्रमुख हैं। निस्संदेह आयुर्वेद को स्थापित और प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति साबित करने में भारतीयों ने कोई कोर कसर न छोड़ते हुए हर एड़ी छोटी का जोर लगाया है। आयुर्वेद का नाम मैंने इस लिए लिया क्योंकि इसकी विश्वसनीयता भारत के अतिरिक्त किसी अन्य देश में प्रमाणित नहीं है इसके अतिरिक्त आयुर्वेद की दवाओ के परिशोधन की प्रक्रिया भी सन्देहास्पद है जिस से मिली दवाओं की प्रभावशीलता भी अभी तक प्रमाणित नही हुई है।

प्रमाणों के अभाव में स्पष्टतः और विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता की ज्योतिष-पंडिताई और सुनारों के सिंडिकेट का अभ्युदय कब हुआ परंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य का निष्पक्ष विश्लेषण यह साफ़ कर देता है की इन तीनो व्यवसायों में गूढ़ सम्बन्ध हैं। पंडित समस्याओं को मिथकों और काल्पनिक देवी देवताओं से जोड़ कर भौतिक परेशानियो का कारण अलौकिक बता देते हैं (वर्तमान में कुछ मीडिया चैनल श्री यंत्र, लक्ष्मी यंत्र, यिन यान यंत्र और ना जाने क्या क्या बेच कर लाखों का मुनाफा भी कमा रहे हैं बल्कि अन्धविश्वास को बढ़ावा भी दे रहे हैं)। इसी बीच ज्योतिष-पंडित हवन, पूजा पाठ और दूसरे कर्मकांडों के दौरान अच्छा खास व्यवसाय कर लेते हैं। आकस्मिक और बड़ी समस्याओं पर पंडितों, ओझाओं और बाबाओ की तो कमाई देखते ही बनती है। वर्षों से स्थापित बाबाओं ने तो बाकायदा अपने चिकित्सालय भी खोल लिए हैं। कोई गुलाब की पंखुड़ी से गुर्दे, यकृत, पित्त थैली की शल्य चिकित्सा कर रहा है तो कोई मछली के मुह में विचित्र पीली दवाई रख कर जिन्दा मछली मरीजों को खिला रहा है।

लोग हैं की हज़ारों की तादाद में लाइन लगा कर खड़े हुए हैं। खैर ये तो जो है सो है कुछ ऐसे भी बाबा हैं जो भूत प्रेत (जो प्रायः मानसिक बीमारी होती है) भगाने के नाम पर महिलाओं युवतियों को लात घूंसों से पीटते हैं, लाल मिर्च को धूनी पर डाल उसका जहरीला धुंआ मरीज़ को जबरदस्ती सूंघने पर मजबूर करते हैं। जितना मौका मिले और संभव हो ये बाबा-ओझा-गुरु आर्थिक शोषण करते हैं। इन सारी प्रताड़नाओं के बदले समाज के तरफ से इनको मिलने वाले पुरुस्कारों में मांस मदिरा, धन, सोना चांदी आदि बहुत कुछ होता है। कुछ मामलों में देखा गया है की अन्धविश्वास से ओतप्रोत माता पिता ने अपनी 14-15 वर्ष की पुत्री या पुत्र को बाबा के हवाले कर दिया जो महीनो उसका शारीरिक शोषण करता रहा। आज भी पूरे देश के ग्रामीण इलाकों में ऐसी घटनाएं सामान्य हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु, बंगाल में ऐसी घटनाएं किसी दिन अखबार में न छपें ऐसा कम ही होता है। ऐसा भी नहीं की शहर के लोग इस प्रकार

लंबे समय से आर्थिक सामजिक समस्याओं से जूझ रहे लोग ज्योतिषियों की शरण में चले जाते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है की ज्योतिषी के पास जाने को सलाह इनको या तो किसी निकट संबंधी या फिर किसी पंडित ओझा या बाबा से ही मिली होती है। निकट संबंधी भी ऐसे जो छद्म भावना में जी रहे होते हैं की ज्योतिष द्वारा पूर्व में सुझाये गए किसी उपाय के कारण उनको समस्या से छुटकारा मिल गया है जबकि ये नित्तान्त उनके अपने निजी प्रयासों के कारण हुआ होता है। ज्योतिषी के पास पहुचे लोग प्रायः धनी वर्ग से होते हैं जिनकी शिक्षा में अधिकांशतः विज्ञान का समावेश बाकी रह गया होता है। इसी कमी के चलते वो लंबे समय से चलीआ रही भौतिक समस्याओं को (अपनी कल्पनाओं से) निराधार कारणों से जोड़ने लगते हैं। इनमे शनि एवं मंगल जैसे दूरस्थ ग्रहों को भी लपेट लिया जाता है। लाखों किलोमीटर दूर ऐसे गृह जिनका गुरुत्वाकर्षण तक पृथ्वी को प्रभावित नहीं कर पाता वहां पृथ्वीवासी (अधिकाँश भारतीय) ये सोचते हैं की ग्रहों की दशा उनके जीवन को प्रभावित कर रही है।

ग्रहों से जुड़े मिथक के आडम्बर को हज़ारों सालों में इतना बड़ा कर दिया गया की अनपढ़ या अल्पशिक्षित वर्ग इसी आडम्बर को (अविकसित विज्ञान के समय में) सत्य मानने लगा। समाज में सदैव तीन वर्ग होते हैं। पहले को आप भोला मासूम अशिक्षित या मूर्ख कुछ भी कह लें दूसरा समझदार जो प्रायः शिक्षित भी होता है तीसरा चालाक। तीसरा चालाक वर्ग सदैव पहले भोले वर्ग का शोषण करता है और मौका मिलने पर दुसरे समझदार वर्ग को भी पहले वर्ग में होने का अनुभव करा देता है।

हज़ारो वर्षों की किसी भी मिश्रित संस्कृति में ऐसे मिथकों का अभ्युदय अवश्य होता है जो वहां के समाज के इन तीनो समाज वर्गों पर तीक्ष्ण प्रभाव डालते हैं। भारतवर्ष इसी परंपरा का द्योतक है। मनु (यदि काल्पनिक व्यक्तिव नहीं है तो) से चली परंपरा जब अमर्त्य सेन और कैलाश सत्यार्थी तक आती है तो कुछ ऐसा ही परिद्रश्य उपस्थित होता है। यह एक ब्रम्हांडीय सत्य है की महान संस्कृतियों के सम्पूर्ण जीवन में एक सिरे पर मिथक और दुसरे पर विज्ञान खड़ा होता हैं और दोनों सिरों के मध्य मिथकों से विज्ञान की पूरी कहानी होती है। मनुष्य की विचारधारा जैसे जैसे धर्म से विज्ञान की और खिसकती है वह उत्परिवर्तन के सिद्धान्त को सार्थक करता जाता है। ध्यान देने योग्य बात है की उत्परिवर्तन सिर्फ शारीरिक ही नहीं मानसिक भी होता है और विचारधारा में परिवर्तन भी मानसिक उत्परिवर्तन का ही एक प्रकार है इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।

मैं पुनः ज्योतिष के मिथकों पर आता हूँ। न सिर्फ हिन्दू बल्कि हर धर्म में सितारों, ग्रहों, सूर्य और अन्य खगोलीय अवयवों का महिमामंडन किया गया है। प्रारम्भ में ये महिमामंडन केवल सर्वशक्तिमान के प्रति मानव के समर्पण का द्योतक था परंतु बाद में धीरे धीरे मानव ने इसमें व्यवसाय भी ढूंढ लिया।

सूर्य, मंगल, शनि, बृहस्पति, बुध जैसे ग्रहों की शान्ति के लिए रत्नों को उनके साथ जोड़ दिया गया। एक तरफ रत्नों की चमक लोगों को लुभाती रही दूसरी तरफ ग्रहों का खड़ा किया गया आडम्बर लोगों को डराता रहा इस डर और लोभ ने मिथक सम्बन्ध को इतना दृढ कर दिया की आज बड़े से बड़े व्यवसायी से लेकर वैज्ञानिक तक के हाथ में मूंगे, मोती और नीलम की अंगूठी देखी जा सकती है।

ज्योतिषियों ने मानव के मनोविज्ञान का भलीभाँति न सिर्फ अध्ययन किया बल्कि उसे अपने व्यवसाय में भरपूर इस्तेमाल भी किया। आशा और उम्मीद जैसी सकारात्मक और सार्थक भावना को रत्नों और ग्रहों की माला में पिरो कर  इन्होंने हज़ारों सालो तक अपने लिए सभी साधनो की उपलब्धता सुनिश्चित की। चेहरे और जेब को पढ़ लेने की अद्भुत कला में पारंगत हो चुके ये महाशातिर मनोवैज्ञानिक सामने वाले की मनोस्थिति और आर्थिक क्षमता के अनुसार यथासंभव शोषण करने में सदैव सफल रहते हैं।

ना जाने कब और कैसे परंतु वैष्णव आर्यो के भारत में आने के उपरान्त संभवतः 5000 वर्ष पूर्व वैदिक काल की शुरुआत में धार्मिक कर्मकांडों ने संपूर्ण भारत को शिकंजे में जकड़ना शुरू कर दिया संभवतः इस से पूर्व शैव सम्प्रदाय के दक्षिण भारतीय मूलनिवासियों में कर्मकाण्ड के पाखण्ड इतने बड़े तौर पर नहीं थे। यद्यपि थे परंतु केवल शैव भौतिकी पर आधारित मंदिरों की स्थापना एवं शैव धर्म विधियां ही प्रचलन में थीं। संभवतः आर्यों की सभ्यता को तुलनात्मक स्तर पर रख कर  बाद में शैव एवं वैष्णव विचारधाराओं को आपस में जोड़ने के लिए बहुत सी मिथक कथाओं को जन्म दे दिया गया। यह प्रयास दरअसल शैव और वैष्णव सम्प्रदायों में होने वाले आपसी झगड़ों को रोकने के लिए किया गया होगा। मिथक कथाओं में अवतार के सिद्धांत, पूर्व अवतारों के बाद के अवतारों से शनैः शनैः सम्बद्ध कर दिए गए शायद यही कारण है की वर्तमान में आम हिन्दू परिवार न सिर्फ शैव और वैष्णव सम्प्रदाय में विभेद न करते हुए दोनों सम्प्रदायों की पूजा अर्चना की रीति को मानते हैं बल्कि विष्णु और शिव दोनों की एक साथ उपासना करते हैं। शैव और वैष्णव सम्प्रदाय के एक होने का सबसे अधिक फायदा मूलनिवासियों और आर्यों दोनों के मठाधीशों को एकसाथ मिला। जैसे जैसे आर्य धर्म के रीति रिवाजों की पैठ मूलनिवासियों में बढ़ने लगी मूलनिवासियों को अपना फायदा इनमें दिखने लगा। मूलनिवासियों की स्वीकारोक्ति के पश्चात आर्यों को भी धार्मिक सम्बद्धता के महत्त्व और  होने के उपरान्त उभयनिष्ठ रीति रिवाजों को दोनों संप्रदायों के मठाधीशों ने बहुत बड़े स्तर पर ले जा कर स्थापित कर दिया।

वैसे तो उपर्युक्त कही गयी सभी बातों का कोई ऐतिहासिक प्रमाण प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं है लेकिन अशोक के पूर्व, उसके अपने काल एवं उसके बाद के शिलालेखो। भित्ति पर उलब्ध जानकारी, एवं अन्य ऐतिहासिक वर्णनों को यदि आधार माना जाए तो पूर्णतयः न सही आंशिक रूप से ही जातिवादी  विचारधाराओं में गूढ़ त्रुटियाँ उजागर होती दिखती हैं।

शिक्षा व्यवस्था में खामियां और एक जाति विशेष के लिए शिक्षा की उपलब्धता ने पिछले कई हज़ार साल के समयकाल में जातिगत विभेदन को सुनिश्चित कर दिया। शिक्षा की असंतुलित असममित और पक्षपाती व्यवस्था ने लगातार सामाजिक वर्गों को धीरे धीरे इस प्रकार विभाजित किया कि केवल एक वर्ग को ही शिक्षा का अधिकारी माना जाने लगा। वैश्य समाज को शिक्षा की उपलब्धता इसलिए संभव हो सकी क्योंकि वह अपेक्षाकृत न केवल धनी था बल्कि शिक्षित समाज को झुकाने लायक मानसिक दृष्टिकोण उनके व्यवसाय से होते हुए उनकी आनुवंशिकता में भी समिलित होता गया। धन, बौद्धिक उच्च सामर्थ्य एवं व्यापारिक कुशलता ने वैश्य समाज को उतनी हानि नहीं होने दी जितनी इन कारणों की अनुपस्थिति में संभव थी।

सवर्ण शब्द के अभ्युदय के पीछे किंचित उपर्युक्त परिस्थिति संभावित है।