Thursday, December 18, 2008
साठ लाख भूखे बच्चे..........
जहाँ हर रोज़ साठ लाख,
भूखे हैं बच्चे,
वहाँ टनों दूध पीते,
पत्थर के भगवान्........
इस सबके जिम्मेवार,
कुछ मुट्ठी भर इंसान......
जहाँ सरकारी दफ्तरों के आगे चढ़ती,
बेरोजगारों की बलि, और
आत्महत्या कर लेते,
हर साल बीस हज़ार नौजवान.........
इक दस्तखत के बदले, जहाँ एक बाबू...
कभी उतार लेता आबरू,
या आधी जिन्दगी की कमाई,
और उस पर भी जताता एहसान.........
नैतिकता और भ्रष्टाचार के,
इस कुरुक्षेत्र में,
पतित ही कर्ण, और अर्जुन भी वही
उन्ही के हाथों खडग, उन्ही के हाथ तीर-कमान...........
जहाँ हर मोहल्ले में, औरतों लड़कियों पे फब्तियां,
न बस ट्रेन में, बुजुर्गों को सम्मान.....
जहाँ हरिजनों को साठ साल में भी,
न मिला सबके जैसा अधिकार समान............
तो प्रश्न उठता है.......क्या सचमुच "मेरा भारत महान"?
चलो प्रश्न का उत्तर ढूंढें,
उठें, आगे बढ़ें,
अधिकार और सम्मान के लिए.......
न्याय के लिए करें प्रयोग अपने अधिकार और RTI,
जाने संविधान को,
और करें विश्वास का आह्व्हान.......
सच में बनाएं भारत महान............
एक कवि और जागरूक नागरिक होने के नाते, मैं भारतवर्ष के सामजिक उत्थान को अपना कर्तव्य और अधिकार समझता हूँ, मैं हर सम्भव प्रयास करता हूँ संविधान को समझने और अपने मौलिक अधिकारों के प्रयोग का.............क्या आप करते हैं?
मेरी पुत्रियाँ......
पुत्री कहूं तो सर्वथा उचित,
मैं जन्मदाता जो हूँ......
और वो मेरी रचना......
प्रकृति को पुत्रियों के स्वभाव में.....
उडेला करता हूँ....
कभी कभी मैं भी,
शब्दों के साथ खेला करता हूँ.........
हर एक की तरह, यह खेल भी,
रचयिता ने रचाया है,
कि मैंने भी,
रचयिता होने का सुख पाया है.........
इच्छानुसार तोडा है, मरोड़ा है,
बहुत कुछ घटाया और जोड़ा है.....
कुछ में भावों का अतिरेक है,
कुछ को पकाया है, तार्किकता कि धूप में,
कुछ वुत्पन्न हो कर निखरी हैं, नैसर्गिक रूप में.............
न जाने क्यों, मेरी स्वाभाविक जटिलता,
मेरी रचनाओं में है,
वही जो मेरे संकल्प में है,
मेरी कल्पनाओं में है...........
रचनाओं पर है एक विचित्र आवरण,
न जाने क्या है कारण,
शब्दकोष, या व्याकरण.......
मुझे यह बोध है, क्योंकि मुझे भी शुष्क लगती हैं,
शिथिल लगती हैं,
आम इंसान बन कर देखता हूँ तो,
मुझे भी जटिल लगती हैं............
भावार्थ Meaning, अस्तित्व Existance, सर्वथा Exactly, अतिरेक Extreme, व्युत्पन्न Derivative,
नैसर्गिक Natural, आवरण Envalop, Cover, Protection, शब्दकोष Dictionary, व्याकरण Grammer, बोध Realization, शुष्क Dry.
Tuesday, December 9, 2008
आज निशब्द अँधेरा है............
मेरे चेतन में, शब्दों के जुगनू चमका करते थे.......
आज निशब्द अँधेरा है,
धरातल बौधिक चिंतन का ही है,
पर भौतिकता का व्यापार फैला है...........
आवश्यकताओं ने सोख ली है,
मेरी वैचारिक ऊष्मा,
अलंकारों का गुंजन, प्रायः निष्प्राण है........
सर्वथा आवश्यक बालबोध अब भी जीवित है कहीं,
पर अब, अप्रयोज्य हो चला है.......
बस यही जान कर, रहता हूँ मौन,
के सुन तो कोई भी लेगा,
पर पीड़ा समझेगा कौन...........
मेरी यह पीड़ा और अंतस का विश्लेषण,
ले जाता है, कारण की खोज में........
पर यह मंथन अधिक समय नही लेता,
मेरी खोज को मिलता है, पूर्णविराम......
तीन शब्दों पर, "यही दुनिया है"..........
यह मेरी पीड़ा का पूर्णविराम नही बन पाता.........
बढ़ जाता है, संताप और,
होता है, पश्चाताप और.......
इस अनुत्क्रमणीय अवस्था का,
मेरे पास कोई हल नही,
आज इतना शुष्क है शब्दकोष,
की आँखें भी सजल नही.............
अस्पष्ट सी इस कविता जैसा,
अस्पष्ट सा ही एक असंतोष है।
बीते दो बरस में मुझे बस यही अवगुन लगा है,
लेखनी के चंदन में प्रश्नवाचक घुन लगा है..........
सबसे बड़ा भय.................
जीवनसाथी से बिछड़ने के बारे में पूर्वाभास होना आम बात है, मैंने एक प्रेमी के मन में उस समय उमड़ते प्रश्नों को समझने की चेष्टा की..............
बाहर भी तम्, और भीतर भी,
घना फैला अन्धकार दूर तक,
आशाओं का दीपक ले, चलता हूँ............
डगमगाता, ठोकर खाता............
तुम्हे पता है...............?
मेरे लिए सबसे बड़ा भय क्या है...............?
यही अन्धकार।
मेरा मन, मेरा बालमन, भयाक्रांत है,
इतना सहमा की रोता भी नही,
इतना भय कि,मानस सोता भी नही.............
यह भयानुभूति भौतिक ही है,
सांसारिक है,
मैं जानता हूँ, संबंधो का परिणाम है............
विश्वासघात ने उपजा है अन्धकार,
जन्मदाता हैं वो,
जो कभी थे मेरे अपने............
किया मेरे विश्वास को छिन्न-भिन्न,
पर फिर भी जीवन पुकारता है,
कहीं रौशनी दिखती है,
तुम आते दीखते हो.............
पर कुछ और भी है, तुम्हारे साथ,
मेरे भय को साथ लिए चले आते हो............
एक परछाई भी है न तुम्हारे साथ,
उसी भय का अंश,
मुझे आहात विश्वास का स्मरण हो आया है.......
क्या मेरे विश्वास और भय का,
फिर द्वंद होना है.................?
कहाँ मिलेगा शोर मुझे, कहाँ मिलेगी ये भीड़..........
चला जाता हूँ, कभी स्टेशन,
कभी चांदनी चौक, कनाट प्लेस, या इंडिया गेट.........
फिर खड़े हो कर भीड़ में,
चाहता हूँ,
की आवाजें कुछ और तेज़ हो जाएँ.............
कुछ देर ही सही,
बसों के हार्न, या ट्रेन की आवाज़,
छीन ले, सुनने की ताक़त मुझसे........
शायद तब न सुन पाऊँ,
अपने भीतर के सन्नाटे का शोर.............
शायद तब ही, मेरे भीतर की खामोशी,
चुप हो जाए, कुछ देर............
सदमा तो ये सोच कर है,
की रात बीतेगी कैसे,
जब के नींद को बैर मुझसे,
बाहर से ले कर भीतर तक,
खामोशियाँ डराएँगी मुझे..........
एक पल में सौ बार, सताएंगी मुझे...........
कहाँ मिलेगा शोर मुझे, कहाँ मिलेगी ये भीड़..........
मिलेंगे तो बस रात, बेचैनी, सन्नाटा, सूनापन, अकेलापन, तन्हाई....................
पालनहार से ये सारे प्रश्न......................
ऐसा नही की मेरी विनती न सुनते होगे,
समझते भी हो,
चाह कर भी दे नही पाते,
ज्ञात है मुझे..............
पर यह विश्वास आहत होने लगा है,
जब से मैंने जाना,
कि मानव ने सीख ली है,
पशुओं कि संस्कृति,
परभक्षी और भक्ष्य का नाता.........
हे! जगतपिता क्या संसार पर आपका,
अब कोई नियंत्रण नही,
क्या दुर्दैव दिन, और इनकी उष्णता,
यूँ ही बढती जायेगी.........
हे! परमपिता, मैं असमंजस और चिंता में घिरा हूँ,
आपकी दी हुई प्रतिभा कि बोली लगाने को,
आतुर है, आपका ये संसार............
किसी निधिवान के चरणों कि भेंट कर दूँ,
तो जीवन की काया पलट जाए.........
पर यह आकांक्षा तो आप से है,
परमपिता, कम से कम ये तो कहो,
कितना शेष है, इस भौतिक जगत में.........?
अब आपका............?
या हर लिया है मानव ने अधिकार,
वंशजों ने जैसे साम्राज्य किसी वृद्ध सम्राट का...................?
सवालों का ये सिलसिला..............
जब कभी एक ही इंसान किसी के लिए पूरी दुनिया हो जाए
और फिर वो बेवजह उस से जुदा हो जाए तो सवालों का ये सिलसिला दिल में आए...............
तुम सुनतीं तो कहता मैं,
समझती तो इशारा देता,
पर इतनी अजनबी क्यों हुई जाती हो,
मैं बिखरने लगा हूँ,
क्या तुमने दामन छुडाया है...............?
ये काली रात मुझे सोने नही देती,
क्या तुम्हे किसी और का ख्वाब आया है.............?
पिघलने लगा हूँ, जलने लगा हूँ,
क्या शीशा-ऐ-दिल की ओर,
तुमने भी पत्थर उठाया है..........?
ख़ुद को आज कारवां से,
जुदा पाता हूँ मैं,
क्या किसी और को तुमने हमसफ़र बनाया है............?
बस उस इल्म की तस्दीक़ कर दो,
जिस से ख़ुद को मेरे प्यार से महरूम किया,
ये तो कहो दिल से मुझे भुलाने का,
कौन सा तरीका आजमाया है..............?
हाल-ऐ-दिल बताऊँ किसे, यार ने घर ही बदल डाला,
एक ज़रूरी ख़त उस के पते से लौट कर आया है...............
कोई फाँस चुभी हैं, मन में.................
मेरी यह कविता उसी आवेग का विश्लेषण हैं..........
शब्दों का एक अविरल प्रवाह,
अवचेतन में,
एक फाँस चुभी है, तर्जनी में,
और एक मन में..................
विचित्र हैं पर सत्य यही,
कल सुख देती थी, आज पीड़ा......
कदापि यही भाग्य,
यही प्रारब्ध की क्रीडा.........
समय बीता तो बन गई,
अंश अस्तित्व का........
आधा भाग जीवन का,
आधा व्यक्तित्व का..........
साथी बनी थी, आकुलता बन कर,
आज शत्रु सद्रश, व्याकुलता बन कर..........
प्रेम, ईर्ष्या, मोह के आवेगों में बहता,
नवरूप को खोजता.......
वर्षों की पीड़ा मन में,
और मन की पीड़ा वर्तनी में.......
एक फाँस चुभी हैं, तर्जनी में........
शीश अब भी झुके, समक्ष ईश के,
थोडी वितृष्णा ह्रदय में,
पूरी श्रृद्धा नमन में,
पर कोई फाँस चुभी हैं, मन में.................
Wednesday, November 26, 2008
तेरी खातिर...........
तो मसखरा बना रहता हूँ,
उसकी हँसी के बदले,
रोज़ ख़ुद को ज़ख्म लगा लेता हूँ मैं.............
उसे सुकून मिलता है, दर्द से मेरे,
तो ख़ुद को यूँ ही सज़ा देता हूँ मैं...........
इतने रूप हैं मेरे, माना मैंने,
पर ख्वाहिश नही मेरी, मर्ज़ी है उसकी............
जैसा वो चाहे रूप बना लेता हूँ मैं..............
वो ही करे के मैं करुँ,
पर ख़ुद को मुजरिम बना लेता हूँ मैं.......
उसे सुकून मिलता है,
तो ख़ुद को सज़ा देता हूँ मैं.............
उसकी चाहत हैं, रोशन शामें,
तो बार बार हर शाम, दिल जला लेता हूँ मैं...........
आज यूँ है, कि मुझ से हो कर जानी है,
उसकी खुशियों कि डगर,
तो चलो अपनी कब्र ख़ुद बना लेता हूँ मैं.....................
मैं रहूँ न रहूँ...........
ख्वाब कहता है, कैसे मैं रहूँ, जब न तू रहे.........
मै रहूँ, न रहूँ, बस तू रहे......
हमेशा खुश रहे, दिल में बस यही जुस्तजू रहे...........
कुछ होने को मेरी हर तमन्ना कहे,
फिर मैं कुछ न रहूँ,
कभी तेरी महफिल में ये भी मौजू रहे..............
मुझे किनारा बन कर यूँ ही फ़ना हो जाने दे..........
तू मौज की रवानी ले आगे चल,
तुझपे किस का काबू रहे..............
ख़ाक कर लूँ मैं ख़ुद को, तेरी छोटी से ख्वाहिश पे,
की मेरी बदन की रेत पे तेरा निशान-ऐ- आरजू रहे...............
खुशबू बन कर जो बसा है, मेरे जेहन में,
तो मुझे अपने गुल होने का एहसास होता है,
मुझे कोई कुचल भी दे तो क्या,
बाद उसके तू ही तो हर सू रहे.....................
Sunday, October 12, 2008
ये अजनबी शहर

कोशिश भी न कर सके,
दर्द कम न हो सका.............
दूसरी ओर उदासी छुपी है,
इस शहर को दोहरी जिन्दगी जीने की,
आदत सी पड़ी है.............
Monday, October 6, 2008
शायद यही मेरे होने की वज़ह हो.........

मुझे डराने आए हैं, वो सवाल.......
पूछा करता था, मेरा दिल जो मुझसे.........
उसका अक्स ही समझा होगा,
आइना होता तो, मेरा भी अक्स होता,
किसी ने समझा होता..........
सर्द है, अँधेरी है, अकेली, और मैं भी,
जैसे हर पल मरना,
जब तब, जहाँ तहां..........
Saturday, October 4, 2008
मुत्फर्रिक आशार..........
जैसे राह का काँटा हूँ,
याद रहा जो चुभ गया.......
निकला, तो दो पल में ज़माना (वो) भूल गया...........
एक बार फिर सूरज सर पे आने लगा है,
फिर तपती धूप की आहट आई है,
फिर सुलगती ज़मी पे नंगे पाँव चलने का वक्त आया है.............
आधी सी है, अधूरी है,
ये आस भी जैसे झूठी है,
तोडे मुझे रोज़, पर ख़ुद कब टूटी है................
तेरी याद से कुछ यूं लरजती है रात,
करवटें बदलते गुज़रती है रात....!
थरथराते होठो पे रखू निगाह,
की मह्बेखाब आँखे देखू,
रात तमाम तेरे गेसुओं से,
मेरा मशविरा चलता रहा......!
शिद्दत-ओ-दर्द-ए-हिज्र मरने नही देता,
इंतज़ार वस्ल की रात का भी कुछ कम नही,
पथराई नज़र में चुभते हैं, अधूरे ख्वाब,
सिवा इसके बड़ा कोई ग़म नही....!
तेरी आवाज़ भी सुन सकू,
तो रोशन हो दीदए उम्मीद,
और इस से भला मरहम नही...!
आ.........और यूं आ,
की वफ़ा का भरम न टूटे,
मैंने ज़माने को एक दौर तलक,
तेरे नाम की दुहाई दी है,
बेपरवाह सही मेरा पत्थर का सनम नहीं...!
Thursday, September 25, 2008
क्या कहूं?

मुझे दो गज ज़मीन भी न मिली,
पैरों तले ज़मीन नही,
रोशन राह करने को,
हरक़तों में क़यामत की बानगी देखता हूँ,
जूनून देखता हूँ,
दर्द लायी,
क्या अजीब सी बात है..............
रिसते हैं यूँ ज़ख्म,
सर्द हुआ बदन,
कभी इन्तहा तक चला,
Wednesday, September 24, 2008
दौर गुज़र ही गया......

सबब-ए-ख्वाहिश, कि समंदर फिर से खामोश हो..........
थमे ये दौर-ऐ-तूफां.......
एक बार फिर तू मुझे सीने से लगा ले..........
पर न बुझा सका मेरी प्यास,
कोई भी पानी, तो ज़हर पीने लगा.......
रोज़ मरने के जैसे,
मैं फिर से जीने लगा.........
आखिरकार.......
बिखर गई जिन्दगी, आरजुएं और ख्वाब,
और मौत के पहलू मैं भी करीने लगा..........
अधूरा वादा, आधा इरादा.........
एक ख़याल यूं भी आया.......

बस चटका सा है,
शीशा-ए-दिल............
एक उसके चले जाने से,
सूनी है मेरी महफिल.........
लाखों हैं पर,
कोई तेरा जवाब नहीं बन सकता.......
सितारे मिल भी जाएँ.......
तो आफताब नहीं बन सकता.........
सोचता हूँ,
वक़्त का भी, ये क्या असर है.......
मुझे तो है, पर क्या तुझे भी..........
मुझे खोने का डर है.......
Thursday, August 21, 2008
निर्झर

पर अनुभव नया.....
समय फिर समय पथ पर गुज़र गया.........
ये निर्झर यूँ ही बहता रहेगा...........
प्रारब्ध की अप्रतिम कहानी,
कहता रहेगा.........
समय की कोख से,
कुछ और पल उतरेंगे.......
जीवन का थोड़ा सा जीवन,
और कुतरेंगे...........
इस सम्यक धरा - धारा में,
बस स्मृति शेष रहती है........
अस्पष्ट अकथ्य के,
कुछ भ्रंश भी मिल जाया करेंगे...........
जब भी गहरी पैठ लूँगा.........
प्रलय हो जब भी ये लय टूटे,
प्रश्नचिन्ह लगे हर रचना पर,
जब भी ये वलय टूटे..........
मैं चिंतन वन में
सुप्त, संज्ञा विहीन.........
चेतना हीन............
स्वयं में स्वयं को खोजता...........
मैं दिग्भ्रमित, मैं पथिक........
Saturday, August 16, 2008
मैं जिन्दगी का आइना हूँ.............

खुश्बू देखी, खूबसूरती भी..........
मासूमियत की महक देखी,
नन्हीं सी सितारा आँखें,
साँसों में मोहब्बत की नमी..........
तोतली, पर बेपनाह प्यारी बातें...........
ऊँगली पकड़, डगमगाती.......
चलने की कोशिश करती......
इठलाती, खिलखिलाती.........
और मुझमें उमंगों का समंदर भरती.......
मैं जिन्दगी का आइना हूँ, बिखरने न देना........
कहती रही..............
एक नन्ही बच्ची, मेरी गोद में खेलती रही.........
मैंने नाक से ऊँगली छू ली, तो हंस दी...........
यूँ तो शाम हो चली है पर,
मैं अब भी खोया हूँ, उलझा हूँ,
उसकी मासूमियत में,
अपनी जिन्दगी की तमाम सख्तियाँ भूल कर..................
Friday, August 8, 2008
गले मत लगना............
Saturday, August 2, 2008
इस से पहले कि.........

दो पल रुकता हूँ,
तो जेहन में उभर आते हो,
हाथों में ले कर हाथ, कहते हो........
बस कुछ कदम और,
जैसे जिन्दगी फ़िर से देती है,
कुछ साँसे उधार..............
चला आता हूँ तुम्हारी ओर,
पर छलावा बन कर,
फिर से क्यों दूर हो जाते हो................
जीवन के किसी अगले मोड़ पर खड़े मुस्कुराते हो,
तो रुक जाओ न,
बस दो पल
छू लेने दो, वो नाज़ुक होंठ,
इस से पहले, कि प्यास हद से गुज़र जाए,
और जाम-ऐ-जिंदगी, छलक जाए..............
Wednesday, July 30, 2008
और अधूरी है एक कविता..........

तुम्हे शब्दों की सीमा में बाँध पाना,
कभी कभी प्रयास करता रहता हूँ...........
निरर्थक रहते हैं,
कदाचित सम्भव होता..............
विश्व भी तुमसे परिचित होता।
मेरा विश्व.........
आज फिर कविता को उकसाया.......
आगे बढे, बाँध ले तुम्हे,
पर इसके शब्दों का बाहुपाश छोटा है.............
फिर से आज.......
फिर न बाँध सकी, आज........
और अधूरी है, एक कविता...................
निरर्थक = meaning less, कदाचित = perheps, gosh, उकसाया = encouraged, बाहुपाश = arm grip
Monday, July 14, 2008
कोई नही..................

सुनने को कोई नही......
धागे बिखरे हैं दोस्ती के,
रिश्ते बुनने को कोई नही............
सब आते हैं, शब्दों के मोती बिखेर चले जाते हैं,
पर बीनने को कोई नही...........
इस आसमान पे चाँद बन, चमकना हैं सब ने,
पर सितारे भी गिनने को कोई नही.................
सुनो तो मिल लो मुझसे, वरना करना क्या,
बस यूँ ही मिलने को कोई नही................
कांटे बन चुभ कर एहसास दिलाएं दर्द का सब,
बिखरने को फूल बन महकने को कोई नही.................
कहने को तो सब हैं पर सच में अपना कोई नही……….
Saturday, July 12, 2008
विजयश्री कामना............
सांसारिक परिचालन का आवश्यक निमित्त............
यही मेरी भी प्रेरणा, यही पीड़ा भी,
कभी गतिरोध बन जाती,
कभी मनोरंजक क्रीडा भी................
"विजयश्री कामना" भी,
बड़ा अप्रत्याशित व्यवहार करती है,
कभी हृदयशूल बन जाती,
कभी औषधि बन उपचार करती है.....................
थक जाऊं तो उत्साह देती,
विचारों, योजनाओं का प्रवाह देती,
प्रतिज्ञा बन जाती, अनुरोध बन जाती है,
कभी संबंधों का गतिरोध हो जाती है............
विजय कामना के, और जीव कामना के वश,
युगों से रची बसी, जीव के अंतस
यह "कामना विजयश्री"...............
Friday, July 11, 2008
वो तीन साल की बच्ची........

वो फूल सी बच्ची, कुम्हलाई सी..............
गंदे कपडों में लिपटी,
एक फटा बैग कंधे पे टांग,
सड़क किनारे खड़ी रहती है,
और मैं बालकनी में उसी वक़्त.............
सिलसिला हफ्तों चलता रहा,
मैं उस से यूँ ही रोज़ मिलता रहा............
बस आती, बच्चे चले जाते,
पर उसे अकेला छोड़ कर.......................
न जाने बच्चों को या बस को,
देर तक हाथ हिला, विदा करती रहती..........
फिर थके से कदम उसे घर खींच ले जाते.............
बस जाने के बाद, उसके मुड़ने से पहले,
एक रोज़ मैं उसके पीछे खड़ा था.......
घूमी तो गाल थपथपाए, शरारती आँखे मुस्कुरा दीं............
बोली गुड मार्निंग अंकल,
मैंने नाम पुछा, बोली 'शबनम'.....
स्कूल नही गई, मैंने पुछा, तो सर झुका लिया उसने,
एक राज़ दिल में और एक आंसू आँख में छुपा लिया उसने........
फिर हौले से सर उठाया, बोली लड़की हूँ न.........
लड़की स्कूल नही जाती.......
और पापा, जूते सिलते हैं, तो पढने को पैसे नही हैं.....
कुम्हलाई सी वो तीन साल की बच्ची,
अब सिर्फ़ मुस्कुराती है,
रोज़ मेरे पास पढने आती है............
Thursday, July 10, 2008
विशिष्ट बच्चा

ये मैंने उसी से जाना........
सीढियों पे घंटों मेरी प्रतीक्षा,
दूर से देख कर बुलाने की कोशिश,
वो बोल नही सकता,
पर आँखें सब कहती हैं,
जी भर बातें करना चाहता है,
सीधा नही उठा सकता पर,
हाथ मिलाना चाहता है,
अपनी पतली कमजोर टांगों को,
इरादे की ताकत दे कर,
ख़ुद को खड़ा कर लेता है ख़ुद ही,
दीवार से ज्यादा उसकी हिम्मत है सख्त,
तो सहारा देती है.........
मेरे हाथ को पकड़, अस्पष्ट शब्दों में,
सारी खुशी, स्पष्ट कर देता है..........
प्यार के सिवा कुछ और न दे सका मैं उसे,
मेरी कालोनी में एक "विशिष्ट बच्चा" रहता है...........
वह हिन्दी है...............
बरसों का मेरा साथ,
कुछ दिनों से उसे उदास देखा करता हूँ.......
कहती है, सब को बड़ा अभिमान था,
मैं न निभा सकी, न चल सकी,
समय के साथ..........
मेरा भी यौवन जाता सा लगता है........!
ये परिवर्तन तो सार्वभौम है,
बस इतना ही कह सका, उस दिन.......
प्रकृति अनुरूप सरल शब्द कह
धीरे धीरे चली गई.........
फिर मिली एक दिन,
बोली.......
मेरी सौतने आधुनिक हैं,
और मेरी भावना शायद थोडी जटिल.......
तो क्या समाज और मेरा प्रेम
कम होने का यह कारण उचित है........
प्रत्युत्तर में शब्दों का अभाव था,
मैं मौन रह गया, फिर से एक दिन...........
मेरी अधर-प्रिया थी,
अब भी कभी कभी, मिलती है अधरों पर.........
पर अधरों का साथ छोड़,
मेरी लेखनी की सहभागिनी है...........
वह हिन्दी है...............
प्रकृतिपालक/प्रक्रतिहंता
न वृष्टि से विनाश,
न सार्थक हो सके
न सफल मानव प्रयास.......
प्रकृति तो अप्रतिम, अतुलनीय,
मानव काया कोमल, कमनीय.......
मूढ़ है मानव, युगों से मदांध,
न समझा प्रकृति से,
ईश्वर का अप्रत्यक्ष सम्बन्ध.......
धर्म रटा तो सही, पर समझा नही,
समझता तो वट अब भी पूजे जाते...
तुलसी, कुलमाता......
पीपल, कुलदेव कहलाते.........
प्रकृतिपालक ने रची प्रकृति,
उत्तरदायित्व मिला मानव को.........
भाव मिले, विशेष अंग मिले,
जीवन के विशिष्ट रंग मिले,
पर न समझ सका उदारता, परमपिता की........
प्रकृतिहन्ता बन होड़ लेने चला,
सर्वशक्तिमान से,
दृष्टिविहीन मूढ़ खड़ा है तन कर,
बड़े अभिमान से..........
प्रकृति का दोष क्या, जो नष्ट हो,
मानव की यह इच्छा है,
प्रलय, परमात्मा की सेविका को,
आदेश मात्र की प्रतीक्षा है..............
समय है अभी भी,
मानव भूल सुधार ले........
घर-बाहर, मन-मस्तिष्क बुहार ले.........
Friday, July 4, 2008
एक तमन्ना ऐसी भी.................!
बस अभी अभी तो,
वो बहला कर गए हैं,
और फिर मन उदास हो चला,
दिन भर उनकी प्रीत संग रही,
फिर उनके बिन दिन ढला............
ओ बदलियों, न छेडो अभी,
अभी भरा भरा है मन,
अभी न सुलगा आग ह्रदय की,
ठहर जा ऐ पगली पवन.........
सपनो का घर मुझे बनाने दे,
साहिल तू ही रोक ले लहरें, दो पल
बस उन को आ जाने दे...........
एक और मिलन हो जाने दो, ऐ सूनी वादियों,
मैं सौंप दूँगा ख़ुद ही, तुम्हे ख़ुद को,
फिर मिल जाऊँगा मैं, ज़र्रे ज़र्रे में,
बेहिचक समंदर की बाहों में उतर जाऊंगा............
बस ह्रदय ही मेरा..............!

संगिनी कहूं, या संग नही कहूं,
उचित है कुछ भी न कहूं............
अपेक्षा ही तो है, हम दोनों के मध्य,
सारी समस्या का मूल, बस यही एक तथ्य...........
फिर सत्यवदन का पुरूस्कार मिला,
संसार भर से तिरस्कार मिला,
अब बोलने से पहले, सौ बार सोचता हूँ मैं,
स्वयं को, स्वयं से भी सत्य कहने से रोकता हूँ मैं.............
जब से मन के संबंधों पे धूल जमी है,
हम दोनों की आंखों में नमी है.........
न मैं कहता हूँ, कुछ, न ही वो.......
पर दोनों की आंखों में प्रश्न होते हैं,
फिर यूँ समझाते हैं एक दूजे को,
की साथ बैठ कर रोते हैं,
सारा जहाँ जब एक तरफ़
हो कर मुझे परखता है,
बस ह्रदय ही मेरा,
मुझे समझता है...................
Wednesday, July 2, 2008
न जाने कौन बदला..............?
खोने की फ़िक्र न थी, न पाने की......
बस कर दिया जो दिल ने कहा।
शीशे सा साफ़ जेहन,
माया से अछूता एक मन।
पर दुनिया विपरीत खड़ी थी,
मेरे समक्ष हमेशा समस्यायें बड़ी थीं।
कुछ यूँ था के....................
जो दिल में था, वो होठों पे था।
और उन दिनों मैं मुश्किलों में था।
फिर दुनिया बदली,
और मैंने अपने तरीके................
आँखें मूँद लीं,
होठ सी लिए,
अव्यवस्था पर आपत्ति न की...............
कड़वे घूँट पी लिए.........
अब दिल में हजारों राज़ छुपा रखे हैं,
अपने कई रूप बना रखे हैं।
हर इंसान से मिलता हूँ, जैसे "वो" चाहे............
बोलता हूँ, "वो" जो दुनिया सुनना चाहे...........
दुनियादारी आ गई मुझे भी।
तो सपनो सा सजा रखा है।
अब उसी दुनिया ने पलकों पे बिठा रखा है.....................
Thursday, June 19, 2008
न करूंगा अन्याय कविता से
चाहा था मैंने भी।
पर योग्य न समझा लोगो ने,
मुझ में भी तो धड़कन है,
और तड़पता प्रेम,
फिर क्यों मुझसे ही रूठे सब कवि,
बस यही सोच उद्विग्न बहुत था,
ह्रदय कह उठा भीतर से,
बस बहुत हुआ, अब कलम उठा लो..............
पंक्ति-पंक्ति पर मैंने अपना रोष निकाला
दिल में भरा गुबार था, सब कह डाला,
फिर मुझको ये बोध हुआ,
मुझसे भी अपराध हुआ।
"कुछ" कहने के प्रयास में,
जाने क्या क्या कह डाला।
अनगढ़ हूँ पर फिर भी,
मैं रहा निरंतर जूझ,
शायद बड़ी यही थी चूक,
कुछ "अनमोल रतन" काव्य के
मेरे मार्ग-दीप,
बने प्रेरणा स्रोत,
पर ना मिल पायी वो प्रतिभा मुझको,
न ही शब्दकोष।
अपने काव्य का स्तर जान,
जब हुआ सत्य से परिचय
अब और न करूंगा अन्याय कविता से,
लिया है अन्तिम निर्णय।
इस बाज़ार में शोर बहुत है......
मेढ़े के भाव भी नही चढ़ पाते,
सोचता हूँ मैं भी दूकान समेट लूँ...........
इस बाज़ार में शोर बहुत है।
Saturday, June 14, 2008
साढे पाँच फुट की दीमक
लकड़ी चुगते देखता था,
बच्चा हुआ करता था..........
कुछ वैसा ही अब देखा,
जब संवेदनशील आँखें खुली हैं,
साढे पाँच फुट की दीमक.......
सफ़ेद खद्दरधारी दीमकों की,
इम्पोर्टेड कारें,
इन्ही आंखो के आगे से गुज़रती हैं....
काले जेहन वाले सफेदपोश,
भ्रष्ट सोच और धूर्त आँखें,
दिन भर उद्घाटन यहाँ वहाँ,
फिर इन्तिहाई काली रातें......
हर कोने में मेरे देश को खोखला करतीं,
इन दीमकों के आका,
पार्लिआमेंट में मिलते हैं सिलसिलेवार,
तय करते हैं, की कैसे देश को, मिल बाँट कर खाना है और,
पेंशन, सरकारी भत्ता बढाना है और...........
इनकी नई पौध गरीबों की कमाई पर,
विदेश जाया करती है,
नई तरकीबें सीख कर,
पुश्तैनी धंधे में में लग जाया करती है.............
इन दीमकों ने,
हिन्दुस्तान के दिल में,
जमा रखा है अड्डा.......
और एक फिक्र नें मेरे दिल में...........
ना जाने कल,
मेरे भूखे हिन्दुस्तान का,
ये क्या हाल करेंगे,
बेच कर अपनी ही माँ,
माइक्रोसाफ्ट को मालामाल करेंगे..........
काश मैं हर बेईमान नेता की,
मौत की वज़ह बन सकता,
भले ही आप मुझे आतंकवादी ठहरा देते,
आजाद देश का गुलाम क्रांतिकारी,
होने की सज़ा देते.....
Friday, June 13, 2008
किसने की ?...........
जेहन को प्यार के
एहसास से सजाने की कोशिश किसने की?.........
बात चुभती थी दिल में,
मैं चुभ जाने दी............
कि अपनी राह का पत्थर
तो सभी हटाते हैं,
सड़क का पत्थर........
हटाने कि कोशिश किसने की?.............
ईश्वर की रचना में भी निकाल दे कमी,
वो फितरत इंसान की,
उसी नज़र की कसौटी पर,
ख़ुद को आजमाने की कोशिश किसने की?................
मेरी हर बात पे बजती है ताली,
हर लाइन पे वाह वाह,
मेरी खता बताने कि कोशिश किसने की?..........
यूँ ही ढकी रहने दो........
जिस पर उगा था कोई पेड़,
एक दिन नज़र पड़ी,
करीब जा कर देखा, गुलाब था............
चीथडों, प्लास्टिक और,
सब्जी के छिलकों से ढका...
ना जाने क्या दिल में आया........
तो एक प्लास्टिक को,
हटाने की कोशिश की....
उसने हलके से हिल कर॥
एक काँटा चुभा दिया, शिकायत की, शायद..........
जैसे कह रहा था.........
मैं गरीब, बेसहारा, "माँ" हूँ।
यूँ ही ढकी रहने दो,
दामन में कुछ कुछ गुल छुपा रखे हैं,
दुनिया की नज़र में उजागर ना हो,
तो बेहतर......
वरना ये मेरी बेटियाँ, मेरे बेटे,
किसी शाह के हरम की क़नीज़,
या शहजादी का खिलौना बन जायेंगे....
कहीं क़दमों तले बिछ जायेंगे......
अपनी ऊँगली सहलाता मैं,
कमरे पे चला आया,
कल गुज़रा था उधर से,
तो उस माँ की लाश पड़ी देखि.........
उसके बेटे, बेटियों को लूट ले गए थे,
जो ख़ुद को कहते हैं,
इंसान,
मैं कहूं तो सभ्य "पशु"................
यूँ समझते हैं....
नवम्बर की वो धुंद,
जिन्होंने नही देखी,
वो यहाँ, गर्द-ओ-गुबार को,
सुहाना मौसम कहते हैं.....
पैसा मेरी खातिर यहाँ...
मसाइल-ओ-ज़द्दोज़हद है,
वो मरहम समझते हैं......
रात पार्टी थी, लोधी गार्डन में,
बीयर जमी है, घास पर,
शबनम समझते हैं..............
यहाँ अंग्रेज़ी, फ्रेंच,
बोलते हैं फर्राटेदार,
इंसानियत की बोली,
कुछ कम समझते हैं.....
चीजों से दिल लगा बैठे हैं,
पर क्या हमसफ़र को भी,
कभी हमदम समझते हैं............
पहाड़ सा शहर
जिसमे धँसे हैं, कुछ गिने चुने दरख्त....
इसी पहाड़ पर रेंगते हैं,
कुछ मशीने, कुछ इंसान
जहाँ इंसानों के दिल........
पत्थर से भी सख्त।
रईसों की कोठिआं,
उनकी तस्वीर-ऐ-रुतबा हैं,
गरीब फुटपाथ पे सोता है,
गरीबी को ले कर ख़ुद से खफा है....
क्या रईस क्या मुफलिस,
सब की पेशानी पे लकीरें हैं,
कुछ की एक नंबर की कमाई,
कुछ की दो नंबर की तदबीरें हैं.....
ये होटल ताज जो बना है..
ज़र्रा ज़र्रा जुड़कर,
मुझे ठिगना कहता है,
पैसा है अब दूसरा खुदा,
एहसास दिलाता है.....
कंक्रीट के इसी जंगल में अपने जैसी...
बस एक और जिन्दगी तलाशता हूँ शाम-ओ-सहर...
दो साल से प्यासा रखे है,
ये मुर्दा शहर,
कंक्रीट के पहाड़ सा शहर...........
Wednesday, June 11, 2008
बेघरों की रात
की एक रात तिरपाल की छत तले कुछ यूँ गुज़रती है................
चूर चूर हुआ जाता है बदन
गारा चूना ढो ढो कर गुज़रे हैं
जो सहर-ओ-दिन
दिहाड़ी है हाथ में
तो ख़ुद खाएं या
बीमार बच्चे के लिए बचाएँ
चल आज फिर आटा घोल ले यार
पेट भर जाए
नींद तो आ ही जाए
फटी तिरपाल की छत को
शब ढले आशिकी सूझी है
हवा संग अठखेलियाँ करे तो करे
क्यों हम मजदूरों की नींद हराम करती है
फटी कमीज़ की जेब में एक फोटो पड़ा है
निकाल दे यार
कभी मेले गया था, बा-कुनबा
याद कर लूँ अपनी जवानी
और आज फिर से एक बार दिल जला ले यार
मैं देख लूँ बेटे को..........यहाँ अँधेरा बहुत है.................
Tuesday, June 10, 2008
तो किस्मत एक रोज़ उलझ ही पड़ेगी,
पिघलता रहेगा दिल बर्फ बन बन कर,
और इस गुज़रते वक्त को.......
पल पल अपनी जवानी देता हूँ मैं...
घुटनों पे झुकती हैं, आरजुएँ
दो पल और जिंदगी मांगती हैं...
अपने अश्क पिला देता हूँ....
फिर टूटे हुए ख़्वाबों की,
ख़ुद को निशानी देता हूँ मैं.....
जानता हूँ कि कट ही जायेंगे कल....
फिर भी दरख्तों को पानी देता हूँ मैं,
जिंदगी मांगती है मुझसे तो.....
हर रोज़ नई कहानी देता हूँ मैं............
Friday, May 16, 2008
कारण ये प्रश्न.......
क्यों इतनी सम्वेदना मुझमे ही.......
क्यों भोर के पहले पहर
भीनी हलकी सी सुगंध भी...
जगा देती है मुझे............
क्योँ भावनाओं का अतिरेक
मादकता की अतिशयोक्ति है।
प्रेम का चरम...
क्यों मुझ में....
अलौकिक से आभाष
या ये प्रकृति के परिहास,
ये अकथ्य का बोध....
व्यक्तित्व का मूल्यांकन...
मेरे लिए बस खेल।
क्यों ये प्रतिभा...
मूल्यांकन की...
पर या स्वः...
कठिन क्यों नही...
पर-विचार, सिद्धांत, या स्वाव्धारना...
क्यों इनमे परिमार्जन की रिक्ति मिलती सदैव...
क्यों ये समंजन की क्षमता
ये रचनात्मकता।
क्यों ये भाव, ये उद्विग्नता...
त्रुटी परिशोधन की अति।
और विश्लेषण भाव अन्तर्निहित
क्यों ये पीड़ा वैशेश्य की...
क्यों कारण ये प्रश्न सभी ?
Sunday, May 11, 2008
एक टुकडा फिर सुनहरा हो जाए

शीशे के टुकड़े के मानिंद,
सालों मैंने कोशिशे की हैं,
इनको खुरचने की,
निशानियाँ दी हैं, अपने ज़ख्मों की...
लहू-लुहान करते रहे हैं, जब तब मुझे....
एक टुकडा सुनहरा गुज़रा था,
जब तुम मिले थे,
फिर हर टुकडा चांदी हो गया था,
मुझे निखारा था, संवारा था, उन दिनों
दिल के आईने में ख़ुद को,
देखना सिखाया था, तुमने....
दुनियादारी की राह पे,
चलना सिखाया था, "तुमने"
मैंने अपने मरतबे तराशे थे,
"तुम्हारा" हाथ थाम कर,
शीशे की इन कतारों के पार जा कर,
जीना सिखाया मुझे..................
सपनो की दुनिया बनाते हैं कैसे,
बताया था मुझे,
फिर कैसे करना है, सच उन्हें....
बताते थे मुझे छू कर..........
जब पहली बार किया कोई सपना सच,
मैंने अपना...........
ख़ुद को पाया था सातवें आसमान पे,
ढूँढा तुम्हे फलक से जमी तलक,
क्योँ नही मिले तब से अब तक......
मैं अब भी बैठ जाता हूँ,
उस सच हुए ख्वाब के पास...........
दोनों झुकते हैं सज़दे में एक साथ...
दोनों की दुआ वही एक...
काश एक टुकडा फिर सुनहरा हो जाए......................
दिल्ली की उदास सी शाम को...........
सब अपने बन कर पराये होते,
और फिर से कोई अपना तलाशते.......
जिनकी हथेलियों में लकीरें न रहीं,
बस चंद टुकड़े हरे कागज़ के,
और थोड़े से सिक्के,
यूँ भागते के ज़लज़ला आया,
यूँ चीखते के गर्दन पे नेजे की धार हो,
बस यही तमाशा देखता हूँ दिल्ली की हर उदास शाम को.........
सड़कों पे मासूमों को देखा है,
मोल भाव करते, पाँच बरस की उमर में,
पेन बेचते, या नई पुरानी किताबें..............
सडको पे न जाने कब इनका बचपन छीन ले गया कोई,
एक लड़की को देखता हूँ,
तार तार कपडों में छुपाती हैं ख़ुद को, एक पेड़ की आड़ में,
रात रोज़ लूट लेती है, उसे कई बार.......
हर मर्द अब एक जानवर है बस, उसके लिए...........
मैं नज़रें चुराता हूँ उस से, और ख़ुद से भी......
आगे बढ़ जाता हूँ ख़ुद को कोसता,
दिल्ली की एक उदास सी शाम को........................
कुछ बड़ी अकड़ वाले सर कारों में धसे देखे,
इतराना और ये अकड़ ना जाने पैसे की है,
या काम के बोझ की, मैं सोचता हूँ....
आंखों पे काला चश्मा, बदन पे महंगे कपड़े,
अपना लहू दे कर खरीदे, जो इन्होने,
लहू देने गुडगाँव जाते हैं,
बस "कैब" के "कैदी" हो कर हर रोज़.......
BPO लहू मांगते हैं, ये देते हैं....
वो और मांगते हैं ये और देते हैं...........
आज शाम की अकेली खुशी, मैं इस भीड़ में शामिल नही...........
मैं खुश होता हूँ दिल्ली की उदास शाम को........
मैंने सुना था दिल्ली की शाम सुहानी होती थी,
रही होगी, जब गालिब रहा होगा.......
हर मौसम इंसान के मुताबिक रहा होगा,
अब ना तो पीने को पानी हैं,
न जीने को हवा,
मैली हो चुकी यमुना के किनारे,
मैं खड़ा सोचता हूँ यही,
दिल्ली की एक उदास सी शाम को.................
Friday, April 11, 2008
ख़ुद से जुदा मुझसे खफा, थोडी सी ये जिन्दगी,
शाम के पहलू में रोता हूँ सर को ढाल के,
एक टुकडा कब से मैंने, रखा बहुत सम्हाल के,
बस उसी टुकड़े को फिर से ढूँढती ये जिन्दगी,
ख़ुद से जुदा मुझसे खफा, थोडी सी ये जिंदगी,
हर गज़र मुझको सुनाये, शब-ऐ-आख़री की आहटें,
अपने ही तय अंजाम से भागती ये जिन्दगी..................
Friday, April 4, 2008
सिक्के हैं ये.......
बटुए से गिरे तो, क्रेडिट कार्ड वालों को लजा गए,
ये किसी के नही..........
न मेरी जेब से दोस्ती,
न तेरी जेब से रिश्ता,
सिक्के हैं ये .........
शीशे
ये काले सफ़ेद शीशों के कैदी ही
दिल तोड़ने का हुनर जानते हैं
शीशे के घर बनाता तो परीशां रहता,
कब संग आ लगे दीवार से,
फिर लोगों का खैरख्वाह कोई तो हो....
उस शाम
दूसरे को मिटटी का तेल और तीली,
दे दी घर और खानदान ने,
बाहर निकल कर मोहल्ले वाले बोले,
किस्सा ख़त्म, चलो बदनामी तो ना होगी अब
न कोई रिपोर्ट न गिरफ्तारी,
मामला उलझा ही नही,
दरअसल कुछ हुआ ही कहाँ था,
बस दो जिस्म नही रहे, दो घरो में,
खानदानों ने अलविदा कहा था दोनों को, अपनी अपनी तरह,
बस एक लड़की को, एक लड़के से प्यार हुआ था.....
ख्वाहिश
बच्चे का क्या कुसूर,
एक खिलौना मांग लिया दूकान के सामने से गुजरते हुए,
बाप ने रुक कर दो पल
बच्चे की ख्वाहिश और नोट की रंगत को तोला,
हरा था, वजनी था, नोट था,
मासूम की खुशी पर भरी पड़ा,
कौन जाने क्या वज़ह थी,
हाथ पकड़ा और ले चला,
हसरतों ने आंसू बन कर आंखों से बहना शुरू कर दिया,
काश नोट की रंगत आंसुओं से धुल जाती,
मासूम को मनपसंद गुडिया मिल जाती................
उलझन
वक्त गुजरता जाए है,
तू मुझसे रफ्ता रफ्ता जुदा होती जाए,
मुश्किलों की बारिश में रोज़ भीगता मैं,
कुछ कोशिशें करता हूँ,
ख़ुद को धोखा देने की, सुखाने की,
कहीं किसी दरख्त की तलाशता हूँ टहनी,
की मुश्किल शायद गुजर ही जाए,
पर वो तो चली ही आती है,
मेरी तन्हाई, तेरी फुरकत का एहसास दिलाने,
नीम के पेड़ पे बैठे,
भीगे परिंदे की याद दिलाने।
सालों बाद शहर में
मौसम ने महीने भर बाद होली खेली,
बारिश को न्योता मिला तो खुशी खुशी चली आई,
ठंडी हवा ने भंग घोल दी साँसों में,
बादलों ने ऊंची छत पे चढ़ के सबको सराबोर किया,
पेड़ों पे न जाने किसने हरा गुलाल डाला,
सूरज शाम को टेसू के फूल छिड़क के भागा,
सालों बाद आज एक कोने में
मैंने शहर में इन्द्रधनुष देखा है...................
हैं ना
किसी का छोर किसी के किनारे से नही मिलता,
बस अलग थलग, मैं मुस्कुराता हूँ,.......
बस यूँ ही.........
सुबह उगे कभी दिल बुझता है,
कभी शाम ढले रंगीनी आती है,
तेरी याद आती है और कहती है मुझसे,
तुझे इश्क है न.............?
धागा
ये धागा...........
मुझे मुश्किलों में लिए जाता है
साँसों में कोई डोर है
तो टूटती क्योँ नही....................?
..............
लफ्ज़ डूबते उतराते यादों के समंदर में,
जैसे कश्ती कोई टूटी लहरों से चोट खा के,
सोचता हूँ, क्या चुन लूँ, क्या लिख दूँ,
दर्द हल्का हो जाए,
लिख दूँ तो शायद हो ही जाए...........
पर साफ साफ लिखने से कलम कतराए...........
सफर
पर संग मेरे तन्हाई चले,
एक सुबह उगे,
एक शाम ढले,
कहीं भी रहूँ ,
पर संग तेरा नाम चले !
Sunday, February 3, 2008
फिर वही शाम
मेरी रूठी जिन्दगी को मना कर लाये हैं,
इस्तकबाल करूं तो लफ्जों का टोटा है,
क्या इल्म था ऐसा भी होता है,
बेपीर दर्द दे गया था,
दवा लाया है,
जमिन्दोज़ के खातिर,
हवा लाया है।
अब के सावन में
बूंदों में नयी बात होगी,
दिल बस तू सोच,
क्या खूबसूरत मुलाकात होगी,
मेरा हम्नफ्स मेरा हमराह,
मेरी जिन्दगी साथ है,
वही सालों पहले की रात है,
कुछ भी कर गुज़र जाऊं,
इस दो पल की मुलाकात के लिए,
दोस्तो मुझे मुबारक बाद दो
इस नयी शुरुआत के लिए.
कुछ असंभव भी
कुछ कटु, कुछ मधुर बोलती हैं,
समर्थ और असफल की वाणी
समान
सब संभव है,
यह तो प्रयास की सार्थकता।
असमर्थता को मैंने भी जाना है,
मेरी अंतरंग मित्र है,
मुझे मुँह चिढाती,
पर बरसों से साथ है।
मुझे रुलाती भी है,
फिर सहलाती भी है,
रग रग दुखा कर,
मुस्कुराती भी है।
न बनने देतीं है,
न बिखरने देती है,
साहस भी लचीला हो चला,
न वो दुस्साहस बना,
न ही हुआ मैं निराश,
उम्मीद और नाउम्मीदी,
के झूले पे मैं झूलता रोज़,
तो मान लिया मैंने,
किस्मत भी है कुछ,
सब है संभव,
तो कुछ असंभव भी।
Friday, February 1, 2008
अनिंद्य
चुप था कुछ न कहा,
फिर धीरे से मुस्कुरा के बोला,
सर्वस्व तुम्हे अर्पण,
तुम्ही मेरे ईश्वर,
मेरे माली थे तुम,
तुम्ही विनाशक,
तुम्हे देने में,
क्षोभ कैसा,
मैंने महक को जी भर,
मन में उतारा,
कहने लगा,
प्रेम से भी निहारो,
मुझे प्रियतम कहो,
प्राण कह कर पुकारो,
किसी मूर्ती चरणों में ही देना,
अगर फेकना भी,
इतना बड़ा ह्रदय,
पुष्प का?
तुमसे प्रेरणा ले कर,
पुष्प बना,
तुम्हारी समीक्षा करने को,
मेरे पास कसौटी नही।
तुम अनिंद्य.
Tuesday, January 29, 2008
असर
हथेलियों से,
न जाने कैसे खीचीं ज़ालिम ने,
लकीरें थीं की मिटी ही नही.
Sunday, January 20, 2008
बहार जाने को है.................
हर पत्ती कुम्हलाई सी है।
अँधेरा बढ़ गया है,
यौवन एक पीढ़ी और चढ़ गया है।
ज़र्द पत्तियां अब ठिठुरने लगी हैं,
शाखों से बिछुड़ने लगी हैं।
अब कहाँ बागों में बहार होगी,
हाँ! हवा में जरूर, नेज़े की धार होगी,
हर फूल पे खामोशी बा-असर हो गयी है,
शायद चमन को,
पतझड़ आने की खबर हो गई है।
ये खिजां गुलिस्तां में सूनापन लिख जायेगी,
हर शाख़ पे तन्हाई बैठ के,
रोती दिख जायेगी।
अब ये मंज़र फिर सूने हुआ करेंगे,
किसी नयी बहार की दुआ करेंगे............
परिवर्तन
मस्तिष्क में विचारों ने रुप बदला,
बालों के साथ बातें भी पक सी गयीं,
नज़र में सोंधी सी महक समाने लगी,
कमर भी आख़िर आकार बढाने लगी।
बच्चे अब बच्चे लगने लगे हैं,
कुछ ज्याद ही अच्छे लगने लगे हैं।
वर्तमान को भविष्य और अतीत एक साथ दिखने लगे हैं,
सोच में आशा निराशा की खिचडी पकने लगी है,
उँगलियाँ कीमती पन्नों को अलग रखने लगी हैं।
घडी से क्षण बस टपके ही जाते हैं,
हर पल जी लेने का संदेश दिए जाते हैं,
अपनी अहमियत टिक टिक से बताते हैं।
एकाकीपन का रुप ले कर कोई और आया है,
शायद जीवंन का दूसरा दौर आया है....................
Friday, January 18, 2008
कुछ नाम दे दो
एक यही शै, जिन्दगी की आज़माइश है,
भला और क्या जिन्दगी है,
फ़क़त तमन्नाओ की नुमाइश है,
कर सके तो करें यकीं,
दोस्तों ये शेर मेरी ही पैदाइश है..........
शायद
लिपि का अमृत
एहसास हो ही गया,
चला, मैं लौट चला..............
गंतव्य पहुँचा तो कब्रें देखीं,
हज़ारों चिताएँ,
कुछ अधबनी, अधजली
कुछ, बस राख़ के ढेर.........
तभी एक और चिता बनने लगी;
इस बार रोक लिया,
उस विचार को दफ़न होने से,
लिपि का अमृत दे कर.........
कुछ अधजले भी,
उठने की कोशिश करने लगे........
सहारा दिया, संभाला ,
अब मेरे साथ हैं.............
अब अक्सर, "विचारों के कब्रिस्तान" से,
कुछ को जिंदा लौटा कर लाता हूँ,
खुद को इसी तरह जिंदा रख पाता हूँ,
विचारों को लिपि दे कर बचाता हूँ.............
Thursday, January 17, 2008
कविता का संसार
भावनाएं बना और छलका,
फिर स्याही बना और बिखरा,
छींटे अक्षर बने,
पन्नों पे असर छोड़ चले,
विचारों ने रेखाएं खींचीं,
तो मनस्थिति की ज्यामिति उभरी.........
हर पद्य का अपना स्वभाव,
किसी न किसी का संबल बनता,
यूँ लचीला की,
हर क्षण रुप बदले,
पारखी की दृष्टि के समानांतर.........
रचनाएं खंगालते लोग,
खुद को ढूँढ कर निकालते लोग........
आमने सामने बैठ,
कुछ पहेलियाँ बुनते,
कुछ मौन हो, सुनते......
प्रकृति जैसा अनंत विस्तार,
विचित्र, सम्मोहक, लुभावना,
कविता का संसार..................
Wednesday, January 16, 2008
अंततः
कितनी प्राकृतिक और हरीतिम,
पुरानी शाखों से..............
आगे निकल कर....
हदें तोड़ कर ठिठोली करतीं,
हवा के संग,
जैसे कोई अल्हड़ किशोरी,
जैसे जुलूस में आगे चलते बच्चे।
कुछ और हरी पत्तियां,
पर गहराई लिए,
अपने रंग में,
समेटे अँधेरे को,
खुद को सीमित करतीं,
दुबकती, छुपती..........
जैसे कोशिश हर नजर से बचने की।
शायद अनुभवों का परिणाम,
कई मौसम देखे हैं,
जिनका वसंत भी जा चुका।
अब अन्तिम सत्य की प्रतीक्षा.........
नयी कोपलों को विस्तार चाहिए,
स्थान तो सीमित ही है,
जो पुराने हुए उन्हें जाना होगा......
थके हारे बुजुर्गों जैसा.........
Saturday, January 12, 2008
आधुनिक उपाय
दाग उभरने लगे,
कुछ ज्यादा तो न किया था,
बस इतना,
की एक रोज़ मैं अपने लिए सोचने लगा,
जैसे दुनिया ही पलट गयी,
रिश्तों में, अपने पराये की
एक रेखा दिख पड़ी,
संग और तंज़ एक साथ बरसे,
खुद को मेरा साया कहने वाला,
चला गया, तन्हा छोड़ कर,
एक और दाग लगा कर,
उलझनों में घिर कर बैठा था,
एक शरारती बच्चा पूछ बैठा,
क्यो क्या हुआ अंकल?
शब्द थे, कि बस बह ही गए,
मैं बोल उठा........दाग लगे हैं बेटा मुझ में,
वो जवाब दे गया मुझे...................
मेरे सवालों का........
बोला.....
अंकल
सर्फ़ एक्सल हैं न............
मैं भी

मुझे कोफ्त थी,
इन लफ्जों से,
आज मैं भी कहने लगा..........
कहता था! मैं क्यों सहूँ?
फिर जहाँ भर को सहते देखा,
और जख्म सहने लगा...
बस मैं भी समय में बहने लगा......
चलो अब हार भी जाओ,
मेरे ही भीतर से कोई कहने लगा,
समय के बहाव में छोड़ दो सब
और फिर मैं बहने लगा.........
महफिल में मुस्कुराने की,
सख्त हिदायत मिली थी मुझे,
तो मुस्कुराता था,
पर तन्हाई में गुमसुम रहने लगा......
और समय में बहने लगा........
Thursday, January 10, 2008
आ भी जा.....
चाँद को तनहा नही,
फिर ये उजाला क्यों अँधेरे की पलकों से खेला
क्यों मेरी रात इतनी अकेली,
क्यों आसमां पे चाँद अकेला,
जो कल तक मेरी ख़ुशी में ही थी तेरी ख़ुशी.....
तो क्या वजह तेरी बेरुखी की.....
जिन पे हम मिल कर कुर्बान हुए,
वो नजारे कहाँ गए........
चाँद को तन्हा छोड़
सितारे कहाँ गए.....
आ भी जा
कहीं ऐसा न हो के......
जिंदगी ही ग़ज़ल हो जाये
मेरा वजूद, मेरा आज,
तेरे लिए, गुजरा हुआ कल हो जाये..........
किस्मत.....
कुछ नया पकना है.......
तो एक दिन,
विस्मृति के नखरों से खुरचने लगा.....
भूत की घटनाएं,
पपडी बन निकलने लगीं...
एक सूखा सा विश्वास,
चटक कर टूटा,
अलग हो गया...
पुराना प्रेम कोई, जंग लगा,
आज न रहा पात्र में....
गलती पिघलती बासी भावनाओं को,
अलग होना पड़ा,
पात्र को साफ होना पड़ा.......
कुछ नया पकना है.............
मैं समंदर हूँ.............

तो क्या कुसूर उनका,
गुनहगार तो मैं............
समंदर हूँ......
शौक क्या, और क्या मजबूरी,
गहराइयों में तो उतरना ही था,
तो अब मैं.....
समंदर हूँ..........
लहरें भी दिखें और,
जुम्बिश भी न हो,
तो गहरा हूँ अब....
मैं समंदर हूँ.............
एक कतरे तक की जगह न थी,
अब सूरज भी बुझते हैं मुझमे,
मैं अब समंदर हूँ............
कोई तो कश्ती साहिल पे आएगी,
कुछ तो मोती उगेंगे,
तो बस मैं........
समंदर हूँ.........
ज़माने भर के और अपने,
अश्क पी कर,
कड़वा हूँ, खारा हूँ...........
अब समंदर हूँ.............
गहरा हूँ, दर्द हूँ, पर अपने ही अन्दर हूँ..................
मैं समंदर हूँ.............
यूँ होता है
Thursday, January 3, 2008
ईश्वर और ऊर्जा
इसी समय हर युग की तरह कुछ अधिक बुद्धिमान मानव हर सभ्यता में विकसित होने लगे जिनको मानवता कि समझ आने लगी, जो प्रकृति के गूढ़ रहस्य तो नही समझ पाए परन्तु सभ्यता की आवश्यकताओं को अवश्य समझने लगे। इन प्रबुद्ध आदिमानवों में एक प्राकृतिक प्रेरणा बलवती होने लगी जो बाद में मानवता और अंततः विकृत हो कर धार्मिकता बन गयी। कबीलों का निर्माण होने लगा , भाषा विकसित नही हुई लेकिन बात समझने के लिए सांकेतिक भाषा का प्रयोग होने लगा। इसी समय आवश्यक था कि एक ऐसे भय कि रचना हो जो मनुष्य को मानव बनाए, प्रकृति की रहस्यमई अन्तःप्रेरना ने मानव मस्तिष्क पर विचित्र प्रभाव डाला, जंतुओं के समान मानव मन में प्राकृतिक घटनाओं का भय समाया। आदिमानव ने सोचा कि कुछ तो है जो प्रकृति का संचालन करता है, और इस प्रश्न का उत्तर जब उसे सदियों तक नही मिला तो ईश्वर नामक एक वैचारिक भय और उत्पन्न हुआ, जिसे समझा न जा सका, हर उस घटना को इस विचार से जोड़ दिया गया। यह भी प्राकृतिक प्रेरणा है कि भय कि अवस्था में मानव में समर्पण का भाव उत्पन्न होता है। मानव ने अनदेखे, अनजाने, अनसुलझे उस वैचारिक रहस्य को सब कुछ समर्पित करना शुरू कर दिया, रुधिर से पुष्प तक सब कुछ, जो उसकी आदिचेतना ने उसे सुझाया। यही प्रथम धार्मिक समर्पण था। जनसंख्या बढ़ी, भाषा विकसित हुई, प्रबुद्ध आदिमानवों का विकास तीव्र हुआ उनमें वार्तालाप हुआ तो ईश्वरीय वैचारिकता के विस्तार की आवश्यकता महसूस हुई। कर्म-काण्ड एवं अनुष्ठान भी प्रारंभ हुए। विचार विस्तृत हुए। अज्ञानी मानव में स्मृति ने इस भय का और विस्तार किया। कथाओं के जन्म लेने के साथ ईश्वर एवं धर्म के विचार को प्रमाणित करने की दिशा में भी प्रयास प्रारंभ हो गए।
मेरे विचार से धर्म एक डंडा है जो मनुष्य नामक जंगली पशु को मानव बनाता है और इस डंडे के संचालन के लिए ईश्वर नामक अकल्पनीय विचार की रचना हुई है।
समाज का एक वर्ग वर्तमान में मानवता की रक्षा के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है जिसे पंडित, मौलाना, या पादरी के रुप में देखा जाता है. ईश्वर नामक अप्रतिम भय की गूढ़ता एवं रहस्य को बरकरार रखना इनकी जिम्मेदारी है ताकि धार्मिक डंडे से मनुष्य नामक जंगली पशु को मानवता कि राह दिखाई जा सके।
एक यक्ष प्रश्न पुनः उत्पन्न होता है कि यदि ईश्वर एक विचार है तो प्रकृति का संचालन कौन करता है? इस प्रश्न का उत्तर है "ऊर्जा"। हर धर्म एक दिव्यशक्ति, नूर या सुपरनेचुरल गलो की बात करता है, जो अप्रत्यक्ष रुप से ऊर्जा ही है। विज्ञान जिस प्रकार प्रिकृति से संबंधित है उसी प्रकार धर्म ईश्वर से संबंधित है, जब विज्ञान अपनी निर्धारित सीमा से बाहर जाने लगता है तो प्रकृति उस पर पुनः नियंत्रण स्थापित करती है, उसी प्रकार ईश्वर धर्म की पुनर्स्थापना करता है जब वह विकृत होने लगता है। विज्ञान भले ही ऊर्जा के कुछ रुप निर्धारित कर दे लेकिन कुछ रुप विज्ञान की समझ से परे रह जाते हैं, और शायद वही रुप अलौकिक, प्राकृतिक घटनाओं का संचालन करते हैं। रुप भले ही कितने हों, ईश्वर आख़िर एक है और प्रकार भले ही कितने हों ऊर्जा भी एक ही है। न ही ईश्वर उत्पन्न होता और न ही मरता है जैसे ऊर्जा। आदिब्रम्ह और आदिऊर्जा दोनो समान रहस्य हैं। ये रहस्य मानव कि समझ से परे हैं। मैं सिक्के का एक पहलू ऊर्जा को और दूसरा ब्रम्ह को मानता हूँ। लौकिक और अलौकिक जगत कि समस्त क्रियाएँ इसी ऊर्जा से संचालित होती हैं, यहाँ तक कि विचार भी! विचार दरअसल रासायनिक प्रक्रिया हैं और इनके संचालन के लिए भी ऊर्जा की आवश्यकता होती है, या हम यह कहें कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नही हिलता तो बात एक ही है।
फिर भी एक प्रश्न ईश्वर कि सत्ता को बल प्रदान करता है कि यदि ऊर्जा ही प्रकृति का संचालन कर भी रही है तो इसकी आवश्यकता क्या है? यदि ऊर्जा का रूपांतरण होता भी है तो क्यों? असीमित विस्तार के ब्रम्हांड का निर्माण हुआ तो क्यों अब तक अनेकों विद्वानों से मिल कर भी इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त नही हुआ और जिसे उत्तर के रुप में परिभाषित न कर सके, मानव उसे ईश्वर कहने का पूर्णतयः हक़दार है।
यदि ऊर्जा ने पदार्थ का रुप धारण कर के अनंत ब्रम्हांड में विस्तार प्राप्त कर भी लिया हैं तो क्यो, ईश्वर ने प्रकृति की रचना कि भी है तो क्यों? यही प्रश्न हैं जो ईश्वर को ईश्वर का महत्व प्रदान करते हैं, और ऊर्जा से भिन्नता भी।
इन्ही प्रश्नों ने मुझे और सारे विश्व को सम्मोहन कि अवस्था में रखा हुआ है, मुझे भी परमज्ञान की खोज है और मैं भी इन प्रश्नों से छुटकारा पाना चाहता हूँ, वह भी यदि संभव हुआ तो..........................