Tuesday, December 9, 2008

आज निशब्द अँधेरा है............

रूचि के विपरीत जाना पड़ता है, व्यवसाय को अपनाते हुए जब कविता से सम्बन्ध क्षीण होने लगा तो इस भाव ने भी कविता का रूप ले लिया, आप के समक्ष प्रस्तुत है..........

मेरे चेतन में, शब्दों के जुगनू चमका करते थे.......
आज निशब्द अँधेरा है,
धरातल बौधिक चिंतन का ही है,
पर भौतिकता का व्यापार फैला है...........

आवश्यकताओं ने सोख ली है,
मेरी वैचारिक ऊष्मा,
अलंकारों का गुंजन, प्रायः निष्प्राण है........

सर्वथा आवश्यक बालबोध अब भी जीवित है कहीं,
पर अब, अप्रयोज्य हो चला है.......

बस यही जान कर, रहता हूँ मौन,
के सुन तो कोई भी लेगा,
पर पीड़ा समझेगा कौन...........

मेरी यह पीड़ा और अंतस का विश्लेषण,
ले जाता है, कारण की खोज में........

पर यह मंथन अधिक समय नही लेता,
मेरी खोज को मिलता है, पूर्णविराम......
तीन शब्दों पर, "यही दुनिया है"..........

यह मेरी पीड़ा का पूर्णविराम नही बन पाता.........

बढ़ जाता है, संताप और,
होता है, पश्चाताप और.......

इस अनुत्क्रमणीय अवस्था का,
मेरे पास कोई हल नही,
आज इतना शुष्क है शब्दकोष,
की आँखें भी सजल नही.............

अस्पष्ट सी इस कविता जैसा,
अस्पष्ट सा ही एक असंतोष है।

बीते दो बरस में मुझे बस यही अवगुन लगा है,
लेखनी के चंदन में प्रश्नवाचक घुन लगा है..........

1 comment:

VaRtIkA said...

ur writings always have an analytical nd rational approach... kalpana ko bhi aap tarkikta se compliment karte hain, jisse patahk ko aapki rachnaa mein khud ko dhoond paana aur bhi aasan hota hai...

"बस यही जान कर, रहता हूँ मौन,
के सुन तो कोई भी लेगा,
पर पीड़ा समझेगा कौन..........."
so true nd so beautiful....

antarmann ke kolahal ko swar deti iss sunder rachnaa ke liye haardik badhai...