Wednesday, December 26, 2007

शुभचिंतक


बोझ महसूस हुआ, तो सिर उठा कर देखा,
कंधे पे, दो विचार बैठे दिखे,
एक ने सिर झुकाया,
मेरे कान में फुसफुसाया,
उदास क्यों हो?

जबान तो थी, पर जवाब न था,
फिर, हितैषी का रुप धर कर बोला,
मुझे बताओ मैं सुनूंगा!

लगा, सब्र का बाँध टूट जाएगा,
नमी बढ़ी, तो आँखें चमकीली हो गयीं,
कुछ पुरानी यादें, और नुकीली हो गयीं,

निचली परतों में कुछ सुलगने लगा,
संध्या के पात्र में अँधेरा भरने लगा,

लचीली व्यथा कुछ कड़ी हो गयी,
समस्या और बड़ी हो गयी,

आंखो से मोती ढलके,
उसी अँधेरे में खो गए,
गालों पे चलके,

अँधेरे पे क्या कहानी गर्हूँ ,
अपनी ही व्यथा पर,
क्या कविता पढूं,

विचारों का धीरज न रहा,
तो उतर कर चले गए,

जैसे तुम गए थे,
अकेला छोड़ कर,
मुझे इन अंधेरों में,

मेरे ही अधीन हैं,
तो फिर बुला लूंगा,
उन विचारों को,

पर क्या तुम भी लौट कर आओगे,
मेरे हितैषी बन कर,
मुझे रौशनी दिखाने,
मेरी व्यथा मिटाने,

सच मानो विचारों कि नही,
तुम्हारी जरूरत हैं मुझे..........................

1 comment:

VaRtIkA said...

kavita to bahut sunder hai hi... seedhe dil tak pahunchti hai...aur aapne jis tarah iske dono siron ko jod ise ek sootr mein piroya hai uske liyejitni tareef karoon kam hogi...

par iss pankti ki sunderta to bas adhbhut hi hai...
"नमी बढ़ी, तो आँखें चमकीली हो गयीं,"