Monday, January 19, 2026

क्या से क्या हो गया है वो?


तुझे पाने की हसरत लिए,

न पूछ कहां कहां गया है वो,

अल्हड़पन तुझपे वार के

जवां हो गया है वो..!


तेरे इश्क में,

क्या से क्या हो गया है वो?


सामने खड़ा है

इस ग़फ़लत में उसे

अपना न समझ अब,

पेश ए अक्स है मगर

बहुत दूर चल गया है वो..!


क्या से क्या हो गया है वो..?


उसके चेहरे पे बकाया

अब्र ए नूर से धोखा न खा

गहरे कहीं टूट गया है

मुरझा गया है वो...!


कहीं खो गया है वो..!


तुझसे मिला था वो,

गोया खुद से मिला था,

अब फिर खो गया है वो

क्या से क्या हो गया है वो..?


उसके होने से

कूचा ए यार रोशन था

ये देखता है जो धब्बे गहरे?

अब बनके कालिख,

दीवारों में समा गया है वो..!!


क्या से क्या हो गया है वो


पुरसुकून सो सकेगा

आखिरकार जहां गया है वो

तेरे इश्क में मेरे दोस्त

अपनी जां से गया है वो..!!

Friday, January 16, 2026

तुमको जाना है?

तुम को जाना है,
चले जाओ,
कुछ है,
जो तुम्हे छोड़ के जाना होगा।

ये रंग ए इश्क है,
सिर्फ गहरा होगा
जितना भी पुराना होगा..!!

पलके मूंद लेंगे,
और नाम लेंगे तुम्हारा
जब भी तुमको बुलाना होगा

अरमान ओ जुस्तजू में बगावत होगी
कदम अदावत करेंगे
मैं बुलाऊंगा,
और तुमको आना होगा

मैं अपने कायदे से,
फिर नहीं सकता अब
ये रस्म ए वफ़ा,
निभानी होगी मुझे
तुम न होगे तो,
तुम्हारी जगह मयखाना होगा

अब मुझे फिक्र नहीं है,
किसी शै की,
किसी को रुसवा होना हुआ,
तो ज़माना होगा

वहीं होगी तस्बीह,
जहां मिले थे पहली दफा
तौर ए हद ए अंजाम
फिर वहीं जाना होगा

फिर बुलाऊंगा,
तो तुम्हे आना होगा

Thursday, January 8, 2026

मैं चाँद लिखूँ

मैं चाँद लिखूँ 

तुम आसमान लिखो


मैं ख़ुद को तुम लिख दूँ 

तुम मुझे

इक अनजान लिखो


मैं तुमको चाँद लिखूँ

इक आसमानी एहसान लिखूँ 


तुम मेरे जिस्म पे,

नक़्श बनाओ कुछ,


मैं तुम्हारी रूह पे,

अपना निशान लिखूँ 


आओ हर लम्हे को,

नबी बना दूँ,

हर रात को,

क़ुरान लिखूँ...


तुम ज़िन्दगी की 

सुनहरी आयतें लिखो,

मैं साँसो का,

गुलाबी फ़रमान लिखूँ,


दीवारों को,

ख़ुशी लिख डालें,

मस्ती में घर को,

जन्नत लिख दें,


तुम दरवाज़ों को

चंदन लिख दो, 

मैं खिड़कियों को 

गुलदान लिखूँ....


सब पत्थरों को,

घोल कर,

पानी कर दें.....

सब दर्दों को मिल के,

पी जायें...


बाहों में समेटे तुंम्हे,

इस रात को रमज़ान लिखूँ...


तुम ज़िन्दगी की आयतें लिखो,

मैं साँसो का फ़रमान लिखूँ,


बाहों में समेटे तुंम्हे,

इस रात को रमज़ान लिखूँ...


मैं तुमको चाँद लिखूँ

इक आसमानी एहसान लिखूँ

Thursday, December 18, 2025

रात की लम्बाई

वक़्त.... अँधेरा...!

रात की लम्बाई,

उस से पूछो,

जो इश्क में पड़ा हो,

और इज़हार न कर सका....!


इंसान नहीं, ख्याल है वो,

जज़्बा कोई,

जिसे बयां कोई,

फनकार न कर सका....!


और उस से मेरे,

दिल की लगी का,

अंदाजा यूं लगा लो,

उसने मुझे मेरी ही,

मौत की दावत दी, और मैं

इनकार, न कर सका..!!


होता कोई और तो,

सम्हाल लेते खुद को,

जिसका भी दिल उसने तोडा,

वो फिर किसी पे,

एतबार न कर सका..!

नया चलन

इस कदर अपना नहीं रहा मैं,

कोई मेरा नाम पूछे

तेरा नाम बता देता हूं मैं


चल एक नया चलन चला देता हूं मैं

कुछ जलने पे तू हंस पड़ता है,

तो ये घर खुद जला देता हूं मैं,


जैसे कांच हो गया हूं अब

तुझे हर राज़ बता देता हूं मैं


मेरे कल का भरोसा नहीं रहा

तुझे आज बता देता हूं मैं


इंतजार से इस कदर मँझ गया

कौन जानिबे दर है मेरे

और किसके कदमों की है

आहट दूर से बता देता हूं मैं


इश्क ने इस कदर घोल दिया

मुझे फिजाओं में, कोई पूछे

हर बुत को शीरी, खुद को

फरहाद बता देता हूं मैं


जिनको तेरा आरज़ू ए दीदार

मुतमईन कर देता हूं

उनको अपने दिल के

ज़ख्म दिखा देता हूं मैं


लिल्लाह..|

ये क्या अजीब कैफियत है?

मक्के की राह

पूछने वालों को भी

तेरे घर की राह बता देता हूं मैं..|

तुम क्यों आई हो...?

उपेक्षा की सूखी लकड़ियों पर
सब भावनाओं को
तिरोहित कर दिया था मैंने
आह, कि सब आर्द्र हो गया

ज्वार जो काट देता था
मेरे अस्तित्व के बांधों को
और जो लुप्त हो गया था
अंतहीन समय में कहीं
लौट आया है...

सूर्योदय
जो कभी प्रणय से
द्वंद तक रूपांतरित
हो चुका था
फिर क्यों होने लगा है?

और जिन कपाटों पर
मैंने धूल जम जाने दी,
उनके खुलने की
आहट डरावनी है

हृदय और उदर के मध्य
फिर से पीड़ा हो रही है कहीं
और इस बार इसमें
असहजता भी है

निस्संदेह तुम
जीवन की बयार हो
मेरे होने और न होने
के आर पार हो

मुझे डर लग रहा है,
उलझन है, उल्लास है,
उत्साह है, अपेक्षा है,
और फिर से डर है।


तुम क्यों आई हो?

Friday, July 18, 2025

इक आदमी रहता था

बच्चों, एक औरत,

दीवारों खिड़कियों के दरम्यान,

एक आदमी भी, रहता था


उलझनों, खर्चों, तानों, उलाहनों

तीज त्यौहार, सर्दी गर्मी, 

बच्चों की ख्वाहिशों के बीच

इक आदमी भी रहता था


हर बात पे वो कहता

ठीक है कोई बात नहीं,

हर चोट पे कहता, भर जायेगी

कांच के मानिंद, जो खुद रोज टूटता

एक आदमी रहता था


रंगीन अलमारियों, रोशनियों,

बच्चों की हंसी ठिठोली के बीच

एक बेरंग आदमी रहता था


वो घर जिसमें सामान भरा था सब

अरमानों से खाली दिल लिए

एक आदमी रहता था


बिगड़ गए लम्हात पे, 

खुद के, दूसरों के हालात पे,

सब ठीक हो जाएगा, कहता था

उस घर में इक खंडहर सा

आदमी रहता था


जिसको फख्र था घर पे दावे का,

जो दरख़्त था, सख़्त था,

कैसे हवा में घुल गया, वहां

वो जो आदमी रहता था


औलादों की नजर, मैं बुरा न हो जाऊं,

जिसको फिक्र थी अखलाक की,

शराफत पसंद था, मासूम था

इक आदमी रहता था


शोर से पैदा हुए सन्नाटे में,

आफिस के मुनाफे घाटे में,

फल, सब्जी, तेल, आटे में,

लाड़ दुलार के बीच,

बच्चों के मारे चांटे में,

ढूंढता था अपना भी वजूद,

वो, जो उसी घर में,

एक आदमी रहता था


लोग कहते थे, उसमे कुछ अना थी,

घर से आफिस, घर का आदी था,

जिन्दगी की बुझती लौ,

उसमे शायद अब भी रवां थी,

बोलता था कभी कभी,

शायद उसके के भी मुह में ज़बां थी,

ऐसा कोई उस घर में आदमी रहता था,


सुबह उसके बिस्तर पे सलवटें

अब भी मिलती है

उसी के जैसी इक परछाई का

घर से अब भी, आना जाना है

कैसे ताल्लुक बदल गया, घर से उसका

वो जो वहां आदमी रहता था


कैसे उसका होना, न होना हो गया,

कैसे गोया पूरा शख्स फना हो गया,

वो अपने ही घर में मना हो गया

जहां वो रहता था,

एक आदमी रहता था


कैसे वक्त के साथ वो शफ़ाफ़ हो गया?

जिसने इब्तिदा ए ठिकाना किया

क्या हुआ वहां, धीरे धीरे?

शायद, वहां एक आदमी रहता था? 

Wednesday, July 2, 2025

मर्द अक्सर तन्हा होते हैं

जनाजों में, बारातों में,

वस्ल में, मुलाकातों में,

मर्द अक्सर तन्हा होते हैं!


बचपन महफिलों में बीता जिनका,

अक्सर अकेलेपन में, जवां होते हैं,


कुछ उनके जिस्म पे, घाव होते हैं,

कुछ ज़ेहन पे निशां होते हैं,


अपनी ही परछाइयों से

घबराते हैं, बदगुमां होते हैं,

मर्द अक्सर तन्हा होते हैं।


ताउम्र गुरूर में रहने वाले

रोज़ ए हश्र पशेमां होते हैं।


सलीबों के हकदार

अक्सर नौजवां होते हैं।

मर्द अक्सर तन्हा होते हैं।


तरबियत का कर्ज चुकाते,

भले इंसा होते हैं,

मर्द अक्सर तन्हा होते हैं


हर जगह होते हैं,

पर खुद में कहां होते हैं?

मर्द अक्सर तन्हा होते हैं।

Monday, June 23, 2025

मकाम

तो मुहब्बत में...

मकाम अब ये है,

तुम मुझे ढूंढते हो,

मैं दिल ढूंढता हूं..!


ये कैसा सफर है अन्तस,

कभी रास्ता ढूंढता हूं,

कभी मंजिल ढूंढता हूं..!


क्यों तुमसे मिलने में,

तकल्लुफ है,

क्यों बेचैनी है,

हल ढूंढता हूं तो

कभी मुश्किल ढूंढता हूं


तुम्हारे साथ दिल का

ये सौदा जंग हुआ जैसे

पेशियां हैं, मुकदमे हैं,

कभी मुजरिम ढूंढता हूं

कभी मुवक्किल ढूंढता हूं


मैदान ए कर्बला हुई

जिंदगी जैसे,

शहसवार रहा 

के तिफ्ल ढूंढता हूं


तुझे पहचान ने का जरिया,

वो दिल ढूंढता हूं,

जांघ पे तिल ढूंढता हूं


कभी हल ढूंढता हूं,

मुश्किल ढूंढता हूँ,

कभी तिल ढूंढता हूं..!!

हिसाब

 मेरे अशआरों में भी

कोई नक्श आयेगा,

उनके भी मायने होंगे


इंसान हश्र में खड़ा होगा

सामने आईने होंगे


इल्म जमी पे खड़ा होगा,

बुत सूली पे टंगे होंगे


उन सबका वजन होगा अंतस

जो वादे तुमने हमसे कहे होंगे


सब पल ठहरे होंगे

वक्त के सब कांटे

वहीं रुके होंगे


तुम होगे, हम होंगे,

और सब होंगे,..!!


वहां, वसीयत पढ़ी जाएगी,

इमदाद होगी, फैसले होंगे


ये सब होगा,

जब बस हम होंगे

अकेले होंगे..!!


हो चुका होगा हमारा होना

सब खयाल भी,

हो चुके होंगे..!


क्या ही मंजर होगा

बस तुम होगे

और हम होंगे..?


इतनी तफसीली दुनिया से

क्या ही वास्ता होगा

ज़र्रा से तुम होगे

सिफर से हम होंगे


एक लम्हा होगा

तुम होगे और 

हम होंगे..!!