Monday, June 15, 2009

कीडा..............

नफरतों की नई शक्ल, नया ज़ज्बा है, पर दुश्मन वही पुराना शहर है.........


शराबी है ये शहर,
मैंने देखा है........

लुढ़के से कुछ जिस्म,
डगमगाते कुछ कदम.......

घर का रास्ता पूछते,
मिन्नतें करते,
गिडगिडाते, वाइज़ के आगे........

घर का रास्ता पूछते........

फिर होश में होने का दिखावा,
वो सारी कवायदें,
सारी हरकतें, बेवकूफाना.......

ख़ुद को दगा देते,
शराबियों का शहर......

कीडों का शहर,
नालियों का शहर........

दगाओं का, बेईमानियों का,
इंसानों के आसामियों का शहर.........

नफरत हो चली है,
चिकनी सड़कों से.......

जो रोज़ भुला देती हैं,
की मैं, कच्ची धूल भरी.......

पर सोंधी महक वाली......
पगडंडियों का मुसाफिर....................

यहाँ नाली का कीडा हूँ.............

2 comments:

VaRtIkA said...

सच बेनकाब कम ही मिलता है... और जब मिलता है तो उससे उबरना मुश्किल होता है... अच्छी सशक्त रचना....

पर मन में एक doubt है ...
"जो रोज़ भुला देती हैं,
की मैं, कच्ची धूल भरी.......
पर सोंधी महक वाली......
पगडंडियों का मुसाफिर हूँ........

यहाँ नाली का कीडा हूँ............."

"पगडंडियों का मुसाफिर हूँ........यहाँ नाली का कीडा हूँ............." दोनों में ही "हूँ" शब्द का प्रयोग किया आपने... पग्दंदियाँ तो पीछे छोड़ आये आप ना.... फिर हूँ क्यूँ?"

गौरव said...

nice objection Vartika........thats why i find you my best critic.

i have corrected the error.

thak you so much