Thursday, November 5, 2009

अजीब है मयकदा मेरा.......!

इस से बढ़ कर,
और क्या मुफलिसी होगी......?
की आज बिक जाने को,
राज़ी हूँ मैं.........

किस्मत से चुक गया हूँ,
मयस्सर नही,
दस्त-ऐ-खाक भी,
बस ईमान से,
थोड़ा बाकी हूँ मैं...........

अजीब है मयकदा मेरा.......!
ख़ुद मैं ही ग़म, मय भी मैं,
पैमाना भी ख़ुद, और जाम मैं,
जामनोश ख़ुद, ख़ुद साकी हूँ मैं..........

टूटा था बिखरता था.........!
तो कौन दस्त आगे बढ़ा.......?
छुपाते छुपाते, इक अश्क छलका,
यूँ बदनाम हो गया........
कि ज़ज्बाती हूँ मैं...............

जीत न सका, हालात से,
न उनसे.......
पर ख़ुद को ख़त्म कर देने को,
काफ़ी हूँ मैं........

उनसे तो मौत बेहतर,
जब छोड़ चले सब, तो पुचकारती है,
कहती हैं.................
आ तुझे गले लगाती हूँ मैं............

1 comment:

VaRtIkA said...

bahut saara dard, niraashaa, aur ek indifference..... sab dikh gaye ismein.... khoobsoorat hai bahut ismein koi shaq nahin....

"किस्मत से चुक गया हूँ,
मयस्सर नही,
दस्त-ऐ-खाक भी,
बस ईमान से,
थोड़ा बाकी हूँ मैं..........."

poori nazm mein yahin thodaa saa positivity dikhi....khaak mein bhi jo baaki hai vo dhoondh paaye tum... yeh halki si positivity bhi ujaala karne ko kaafi hai... :) bas koi pakad to le ise....

"जीत न सका, हालात से,
न उनसे.......
पर ख़ुद को ख़त्म कर देने को,
काफ़ी हूँ मैं......"
khud ko kahtm karnaa haar ki taraf ek aur kadm badhaana hi hogaa shayad.... it wont prove one's might or capability.... it would just add dat one has let the situations take over him nd his life....