Wednesday, November 4, 2009

ऐ गर्दिश अब तो......

किसी महफिल में,
रुसवा न करा दे तू मुझे.....

बस यही सोच कर,
मैं कभी, दिल की न सुन सका.....

ऐ गर्दिश अब तो तरस खा मुझ पर........

कमबख्त तू.....!
मेरी धडकनों से भी,
ज्यादा चाहती है क्या मुझे.......?

जुदा हो भी जा अब......!

जीने दे सुकून के कुछ पल,
कुछ रोज़ को तो मेरा,
साथ छोड़ दे...........!

इक रूह बची है आखिरी,
इसे तो बेचने को,
मजबूर न कर............

तू बेहया है,
तो मैं......!
शर्मिंदा रहता हूँ..........!

चंद टूटी दीवारों में,
छुपा रहता हूँ..........

कहीं यार लोग,
न दे दें, आवाज़ महफिल के लिए.....

आज पी ली, तो कल पिलानी होगी.......

इस दाना-ऐ-ख़ाक को भी,
महफिल की रवायत निभानी होगी.......

2 comments:

Murari Pareek said...

bahut umdaa gaurav bhaai !!! mahfil ki rawaayat to nibhaani hi padati hai !!! antardwand achchha hai!!!

VaRtIkA said...

shabdon se khoob khelaa hai.....