Thursday, September 24, 2009

प्रश्न और विडम्बनाएं..........

ख़ुद से मेरे प्रश्न और उनसे जुड़ी विडम्बनाएं मेरा पीछा नही छोड़ रही हैं.......इसी क्रम में एक कविता ने और जन्म ले लिया.....

कोई छंद लिखूं कैसे,
कैसे एक और मुक्तक लिखूं...........
कैसे स्वयं की परिभाषा लिखू...............?

दर्पण की मुझसे विरक्ति लिखूं,
या आहत ह्रदय की कहानी लिखूं॥?
कैसे टूट गई एक आशा लिखूं.............?

स्वयं से स्वयं का विद्रोह,
और समर्थन कभी,
या ह्रदय है कितना प्यासा लिखूं..........?

उडेल कर रख दूँ ख़ुद को,
की रिसने दूँ पीड़ा थोडी थोडी,
या घाव लगा है, ज़रा सा लिखूं..........?

माना की झूठा है अंतस कभी कभी,
पर सिर्फ़ मुझसे ही न,
धूल सना या जंग लगा,
या सच्चा सोना खरा सा लिखूं..........?

विडम्बना तो ये भी एक,
की तुम लिख रहे हो मेरी कहानी,
मैं लिखूं भी तो क्या लिखूं............?

6 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

विडम्बना तो ये भी एक,
की तुम लिख रहे हो मेरी कहानी,
मैं लिखूं भी तो क्या लिखूं............?
wah !

गौरव said...

Thnk you maam......

Divya Prakash said...
This comment has been removed by the author.
Divya Prakash said...

when did you write this poem ...??
Even i had written a poem on these lines but i written in 2004 ...
here is the link
aaobakarkarein.blogspot.com/

I don't know why but i feel END of this poem is not synchronized with the rest part .

Keep writing ,God bless
Regards
Divya Prakash Dubey
http://www.youtube.com/watch?v=oIv1N9Wg_Kg

charroo dubey said...

Gaurav bhai,many congratulations to u.Apke shabd aankhon se guzer ke dimag me ek jagah banate hai.aapki pehli kavita achhi lagi.Ye sach hai swaym ko paribhasit karne me akser virodhabaas hi haath lagte hain.SHAGAL & BAAD-E-HAYAT bhi achhi lagi.WHEN CULTURE EMERGED.....i feel there is room for improvement.the words r lackin it's rythm.no matter how serious topic it covers, poetry alwys has a rythm...i find words r not that provoking as well.....but nice effort.

Aparna Bajpai said...

Kya bhaw hai , kya anubhuti
man ho kisi ka , sab ko chhuti
likhne ko to kuchh bhi likh sakte hai
par kya wyakti kabhi paribhashit hote hai???

Bhutkhoob.