Wednesday, September 9, 2009

क्या तुम न आओगे.........?

एक दोस्त जो जिन्दगी बन गया था, बिछड़ गया था..................और खो गया हमेशा के लिए.........याद आता है, हर उस दोपहर जो आग बन कर बरसती है मेरे सर पर और मैं एक छाँव की तलाश में भटकता रहता हूँ...........


सब कहते हैं,
के अब तुम न आओगे लौट कर........
दूर चले गए हो न,
बहुत दूर.............
तुम्हारी याद क्यों नही जाती..............?

कहते हैं,
तुम्हे जन्नत नसीब हुई होगी...........

मुझे धोखा क्यों दिया.....?
क्यों छोड़ दिया अकेला.......?
वादा किया था,
जुदा न होगे.........!

सोचता हूँ, फिर सोचता रहता हूँ.....
मैं क्यों हूँ.........?
क्यों ठहर जाया करता हूँ......!

इन सूनी गलियों में,
बंद दरवाजों से,
उलझता रहता हूँ,
इनसे मेरा रिश्ता ही क्या है.........?
सब तो तुम्हारे थे........?

क्यों मैं दीवारों पे,
हाथ लगाते चलता हूँ......?
कुछ भी नही अब,
इन मुर्दा दीवारों में.........!

हाँ कहीं कहीं, कुछ धब्बे,
खून के..........
दीवारों के संग लिपट कर
सूख चुके.......

एक चिपचिपे से धब्बे पे,
ठहर गया है हाथ.......
वहीँ जहाँ तुम खड़े थे,
टिक कर, मुझे बाहों में लिए,
जूझते अपने दर्द से.......

ये धब्बा,
क्यों नम है अब तक........
बिल्कुल तुम्हारे उस रुमाल जैसा,
जिसे तुमने बाँधा था,
मेरे कंधे पे.............

तुमने देख ली थी वो छोटी से चोट,
पर मैं न देख सका वो गोली,
जो मुझे लगी थी,
पर तुमसे हो कर.......

तुम्हारी ही बाहों में,
होश खो दिया.....

फिर तुम्हे खो दिया...........

हाथ का ज़ख्म भर चला है,
दिल का हर रोज़ हरा हो जाता है..........

वो हाथ हिंदू थे के मुसलमान,
नही पता.........
पर हथियार हर हाथ में थे..........

कौंधती हैं यादें,
अब भी उस दोपहर की......

जब तुम खड़े थे,
मेरे और हर वार के बीच,
मेरे आगे, पीछे और हर तरफ़.....
उन हाथों से बचाने के लिए...............

बचा भी लिया,
पर अब कौन बचायेगा........
जल्द ही किसी रोज़,
इस शहर में, फिर दंगा हो जाएगा.................

5 comments:

VaRtIkA said...

behad behad khoobsoorat.... bole to ekdam katl........

"तुम्हारी याद क्यों नही जाती..............?"

"तुम्हारी ही बाहों में,
होश खो दिया.....
फिर तुम्हे खो दिया..........."

"हाथ का ज़ख्म भर चला है,
दिल का हर रोज़ हरा हो जाता है.........."

Sudeep Dwary said...

Bahut hi umda aur nayaab hai!

हाथ का ज़ख्म भर चला है,
दिल का हर रोज़ हरा हो जाता है..........

jazbaat-packed lines hain Gaurav ji ... likhte rahiye ...

Dr. Amarjeet Kaunke said...

बहुत मर्म स्पर्शी कविता है....उदास करने वाली.....

sakhi with feelings said...

ankhe nam kar di ...

jab koi apna khota hai
jo dil ke kareeb hota hai
dil jaar jaar rota hai
dard ise beintihaa jo hota hai
yaade aksar aakar uski
karti hai pareshaan
man ki dagar hoti hai phir hairaan
yaade jo chalne lagti hai
kai ek sath nahi karti hai koi nayee wo mujhse alag si koi baat
sab us apne se judi purani bate hai
jo dil ke kone se chupke se
kabhi bhi bahar aati hai
aur hame yuhi aksar rulaati hai

apki kavita padkar khuch khyaal bheeg chale..to likh diya

Aditya ! said...

amazing work. loved it. padhkar kuch yun khyaal aaya zehen mein..

tum ye kaise juda ho gaye,
har taraf har jagah ho gaye..