Thursday, April 1, 2010

ढेरी फोड़.......

ढेरी फोड़, खेल था......

बचपन में,
कंकडों की मीनार बना.....

दूर से गेंद मार फोड़ देते थे,
हम यार दोस्त...........

मीनार पत्थरों की थी,
गेंद कपडे की.............

खेल अब भी वही हैं.......

पर शब्दों की बनी गेंद,
तुम्हारे हाथ हैं.............

मीनार की जगह मैं,
कई सालों से खड़ा होता हूँ.........

तोड़ते हो...........संवार देते हो........
फिर तोड़ते हो.......फिर संवार देते हो..........

हमारा खेल, सांझ ढले.....
चुक जाया करता था...........

तुम्हारा कब तक चलेगा............?

2 comments:

Parthajeet Das said...

wah! bhai kyaa baat hai!
briliant.
minar ki jagah main khada hun - bahut khub
and the ending was just awesome

गौरव said...

Thank you Parth, well i feel honored by your comment.