Sunday, July 5, 2009

सुई.........

वर्तमान में मानव की सबसे बड़ी आवश्यकता, मेरे अंतस में खलबली मचाये रहती है.......मैं सोचता रहता हूँ की क्या खो गया है............शायद एक सुई की आवश्यकता है जो मानवता के वस्त्र दे कर सभ्य पशु मनुष्य को मानव बना सके...........


मानवता की खोज में कुछ पथिक,
भूसे के ढेर में, सुई ढूंढते हैं.......

ये जिज्ञासा न जाने कहाँ से आई है,
बड़ी प्रबल है,
न जाने कहाँ ले जायेगी.......

फाउन्टेन पेन से,
मोबाइल फोन तक का विकास.......
पथिकों ने सब देखा....

सभ्यताएं भी कुछ मिटती हुई.......

आतंक और व्यवसायिकता ने,
गढ़ दी है, दोस्ती की नई परिभाषा......

पथिक फिर भी ढूंढते हैं,
इस परिभाषा में, मानवता का तार........

पूरा विश्व देखना होगा,
पूरा ढेर छानना होगा,
शायद सुई मिल सके.......
शायद सभ्यता के वस्त्र फिर सिल सकें........

मानवता की सुई खोई हुई है,

धर्म की दुकाने खोली गई,
सिर्फ़ ये सुई बेचने के लिए,
पर अब यहाँ,
भेदभाव बिकता है,
घृणा सबसे सस्ती वस्तु है,
इस दूकान में.........

पथिकों को आगे जाना है......
मनुष्य को वस्त्र देने हैं.....
सुई बिना तो सम्भव नही.......

विदेशी राजदूत और समझौते,
समझौते पे हस्ताक्षर......
उनका कलम उसी, सुई जैसा दीखता है......

बस दो पल........

पथिकों को समझौते पर सुई नही मिली......

मानव मनुष्य बन रहा है........
उसे नग्नता का आनंद अच्छा लगता है,
और नग्नता का आनंद अच्छा लगता है,
क्या मनुष्य को वस्त्र नही चाहिए.........?

तो क्या पथिक अब न चलें,
सुई की खोज का क्या होगा.......?

बुद्ध, महावीर, गांधी,
पथिक ही तो थे,
उन्हें तो सुई मिल गई थी,
मानवता के वस्त्र पहने थे,
तो चित्रों में नग्न-अर्धनग्न क्यों.......?

नेत्रों का दोष है,
सभ्यता के वस्त्र किसे दिखे अब तक ........?

पथिक बुद्ध या गाँधी नही,
पर सुई तो चाहिए.......
अपने वस्त्र सीने हैं........
उसे भी सभ्य होना है........

पथिक को प्रेम का धागा भी चाहिए......?

एक और खोज.......
सीमित जीवन, अंतहीन खोज.....

वस्त्र अधूरे रह गए,
पथिक को चिर विश्राम करना पड़ा......

सभ्यता की नग्नता,
चिरजीवी....
मनुष्य की पशुता चिरजीवी.......

कुछ और पथिकों को,
ढूंढनी होगी,
मानवता की सुई,
मनुष्य को वस्त्र देने हैं,

नग्न रह कर प्रकृति का रोष,
असहनीय, अन्त्य.......
न सह सकेगा मनुष्य
वस्त्र तो पहनने ही होंगे।

वायु से भी आवश्यक,
मानवता के वस्त्र,
और एक सुई, जो चुभती नही,
सबसे अधिक महत्वपूर्ण.............

2 comments:

Murari Pareek said...

बहुत खुबसूरत गहरे भाव, आपने तो सुई का मुशल बना कर पेश किया है !! सुन्दर ati सुन्दर!!

VaRtIkA said...

"नेत्रों का दोष है,
सभ्यता के वस्त्र किसे दिखे अब तक ........?"

sach.... kya kahoon samajh nahin aa raha ... itni gehrai shabdon mein aur itni oonchai bhaavon mein...naapna vyarth hoga... yun hi likhte rahein.... sui bhi mil jaayegi... aur prem kaa dhaaga bhi....