Sunday, July 5, 2009

दुर्घटना

किसी घटना के लिए क्या कारण उत्तरदायी है......कभी कभी पता नही चलता पर बाद में हम सोचने को मजबूर हो जाते हैं........वो एक घटना ही हमें अपना और समाज का पूरा प्रतिबिम्ब दिखा देती है........



मैं, ऑटो पे सवार,
जा रहा था, अपने अस्थाई निवास,
ब्रेक और हार्न की,
मिली जुली आवाजों ने,
भंग कर दी तंद्रा,
विचारों ने छोड़ दिया,
कुछ पल के लिए.........

एक विचार न माना,
बोल ही उठा....
क्रासिंग होगी शायद.........

रुका हुआ ऑटो थोड़ा सरका,
फिर रुक गया.......

कुछ जुबाने कह रही थीं,
एक्सीडेंट हुआ है........

मेरी उत्सुकता ने सर बाहर निकाला.....
स्वाभाविक, मानवीय......

दूर तक गाड़ियों की कतारें....
पुलिस के सायरन की आवाज़.......

एक बार फिर देर से..........

डंडा फटकारता एक सिपाही.......

भीड़ छंटी तो एक ढेर दिख गया.......

तुडे मुडे से अंग,
जैसे सिलवटी रेशम......

नए जूते से बंधा एक पैर.....

अधरंगी लाल सफ़ेद चादर से,
बाहर झांकता हुआ.........

और हर दर्शक जूते पे अफ़सोस करता हुआ....

थोडी ही दूर,
उतनी ही टूटी पड़ी,
एक मोटरबाइक.......

कुछ और अफ़सोस,
गलों से निकल, सड़क पर फैल गए.......

सुना तेज़ जा रहा था,
ट्रक से टकरा गया........

कोई बोला, ट्रैफिक भी तो हैवी है........
हाँ..........सिग्नल भी ख़राब है........
प्रशासन ही मुर्दा है साला..........

बात मुख्यमंत्री पर आ गई......
मुर्दाबाद के नारे,
न जाने कब गाड़ियों के बीच आ गए.......

फिर सब ठीक हो गया.......
पुलिस आ गई थी न.........

सुबह अखबार ने बताया.......
वो ट्रक,
वो सिग्नल,
वो ट्रैफिक,
वो प्रशासन
सब बाइज्ज़त बरी हो गए.........
पता चला शराब दोषी थी......
बाइक वाले में छुपी थी.......

फरार हो गई, बह गई,
लाइसेंसी दुकानों में छुप गई,
अंग्रेज़ी और देशी का रूप धर कर.......

मैं सोचता रह गया.....
ये दुर्घटना कल नही हुई थी.....
उस दिन हुई थी जब,
मदिरा का अविष्कार हुआ था........

1 comment:

VaRtIkA said...

hmmm... bahut gehri rachnaa....... aksar kuch ghatnaein kayi saare nakaab hataa deti hain... aur samaksh rakh deti hain humari hi sacchaiyaan... dosharopan kar hum humesha unse munh modte rehte hain... bas koi kandhaa mil jaaye ilzaam dhone ko, phir kya... hum bhool jaate hain sab........

a very strong poem dat gives enuf food for thought