क्यों रचा विधि ने मुझे
क्यों इतनी सम्वेदना मुझमे ही.......
क्यों भोर के पहले पहर
भीनी हलकी सी सुगंध भी...
जगा देती है मुझे............
क्योँ भावनाओं का अतिरेक
मादकता की अतिशयोक्ति है।
प्रेम का चरम...
क्यों मुझ में....
अलौकिक से आभाष
या ये प्रकृति के परिहास,
ये अकथ्य का बोध....
व्यक्तित्व का मूल्यांकन...
मेरे लिए बस खेल।
क्यों ये प्रतिभा...
मूल्यांकन की...
पर या स्वः...
कठिन क्यों नही...
पर-विचार, सिद्धांत, या स्वाव्धारना...
क्यों इनमे परिमार्जन की रिक्ति मिलती सदैव...
क्यों ये समंजन की क्षमता
ये रचनात्मकता।
क्यों ये भाव, ये उद्विग्नता...
त्रुटी परिशोधन की अति।
और विश्लेषण भाव अन्तर्निहित
क्यों ये पीड़ा वैशेश्य की...
क्यों कारण ये प्रश्न सभी ?
Friday, May 16, 2008
Sunday, May 11, 2008
एक टुकडा फिर सुनहरा हो जाए

रोज़ एक दिन गुज़रता है, मेरे सामने से,
शीशे के टुकड़े के मानिंद,
सालों मैंने कोशिशे की हैं,
इनको खुरचने की,
निशानियाँ दी हैं, अपने ज़ख्मों की...
लहू-लुहान करते रहे हैं, जब तब मुझे....
एक टुकडा सुनहरा गुज़रा था,
जब तुम मिले थे,
फिर हर टुकडा चांदी हो गया था,
मुझे निखारा था, संवारा था, उन दिनों
दिल के आईने में ख़ुद को,
देखना सिखाया था, तुमने....
दुनियादारी की राह पे,
चलना सिखाया था, "तुमने"
मैंने अपने मरतबे तराशे थे,
"तुम्हारा" हाथ थाम कर,
शीशे की इन कतारों के पार जा कर,
जीना सिखाया मुझे..................
सपनो की दुनिया बनाते हैं कैसे,
बताया था मुझे,
फिर कैसे करना है, सच उन्हें....
बताते थे मुझे छू कर..........
जब पहली बार किया कोई सपना सच,
मैंने अपना...........
ख़ुद को पाया था सातवें आसमान पे,
ढूँढा तुम्हे फलक से जमी तलक,
क्योँ नही मिले तब से अब तक......
मैं अब भी बैठ जाता हूँ,
उस सच हुए ख्वाब के पास...........
दोनों झुकते हैं सज़दे में एक साथ...
दोनों की दुआ वही एक...
काश एक टुकडा फिर सुनहरा हो जाए......................
शीशे के टुकड़े के मानिंद,
सालों मैंने कोशिशे की हैं,
इनको खुरचने की,
निशानियाँ दी हैं, अपने ज़ख्मों की...
लहू-लुहान करते रहे हैं, जब तब मुझे....
एक टुकडा सुनहरा गुज़रा था,
जब तुम मिले थे,
फिर हर टुकडा चांदी हो गया था,
मुझे निखारा था, संवारा था, उन दिनों
दिल के आईने में ख़ुद को,
देखना सिखाया था, तुमने....
दुनियादारी की राह पे,
चलना सिखाया था, "तुमने"
मैंने अपने मरतबे तराशे थे,
"तुम्हारा" हाथ थाम कर,
शीशे की इन कतारों के पार जा कर,
जीना सिखाया मुझे..................
सपनो की दुनिया बनाते हैं कैसे,
बताया था मुझे,
फिर कैसे करना है, सच उन्हें....
बताते थे मुझे छू कर..........
जब पहली बार किया कोई सपना सच,
मैंने अपना...........
ख़ुद को पाया था सातवें आसमान पे,
ढूँढा तुम्हे फलक से जमी तलक,
क्योँ नही मिले तब से अब तक......
मैं अब भी बैठ जाता हूँ,
उस सच हुए ख्वाब के पास...........
दोनों झुकते हैं सज़दे में एक साथ...
दोनों की दुआ वही एक...
काश एक टुकडा फिर सुनहरा हो जाए......................
दिल्ली की उदास सी शाम को...........
ये आलम के साँस लेने की फुरसत नही किसी को,
सब अपने बन कर पराये होते,
और फिर से कोई अपना तलाशते.......
जिनकी हथेलियों में लकीरें न रहीं,
बस चंद टुकड़े हरे कागज़ के,
और थोड़े से सिक्के,
यूँ भागते के ज़लज़ला आया,
यूँ चीखते के गर्दन पे नेजे की धार हो,
बस यही तमाशा देखता हूँ दिल्ली की हर उदास शाम को.........
सड़कों पे मासूमों को देखा है,
मोल भाव करते, पाँच बरस की उमर में,
पेन बेचते, या नई पुरानी किताबें..............
सडको पे न जाने कब इनका बचपन छीन ले गया कोई,
एक लड़की को देखता हूँ,
तार तार कपडों में छुपाती हैं ख़ुद को, एक पेड़ की आड़ में,
रात रोज़ लूट लेती है, उसे कई बार.......
हर मर्द अब एक जानवर है बस, उसके लिए...........
मैं नज़रें चुराता हूँ उस से, और ख़ुद से भी......
आगे बढ़ जाता हूँ ख़ुद को कोसता,
दिल्ली की एक उदास सी शाम को........................
कुछ बड़ी अकड़ वाले सर कारों में धसे देखे,
इतराना और ये अकड़ ना जाने पैसे की है,
या काम के बोझ की, मैं सोचता हूँ....
आंखों पे काला चश्मा, बदन पे महंगे कपड़े,
अपना लहू दे कर खरीदे, जो इन्होने,
लहू देने गुडगाँव जाते हैं,
बस "कैब" के "कैदी" हो कर हर रोज़.......
BPO लहू मांगते हैं, ये देते हैं....
वो और मांगते हैं ये और देते हैं...........
आज शाम की अकेली खुशी, मैं इस भीड़ में शामिल नही...........
मैं खुश होता हूँ दिल्ली की उदास शाम को........
मैंने सुना था दिल्ली की शाम सुहानी होती थी,
रही होगी, जब गालिब रहा होगा.......
हर मौसम इंसान के मुताबिक रहा होगा,
अब ना तो पीने को पानी हैं,
न जीने को हवा,
मैली हो चुकी यमुना के किनारे,
मैं खड़ा सोचता हूँ यही,
दिल्ली की एक उदास सी शाम को.................
सब अपने बन कर पराये होते,
और फिर से कोई अपना तलाशते.......
जिनकी हथेलियों में लकीरें न रहीं,
बस चंद टुकड़े हरे कागज़ के,
और थोड़े से सिक्के,
यूँ भागते के ज़लज़ला आया,
यूँ चीखते के गर्दन पे नेजे की धार हो,
बस यही तमाशा देखता हूँ दिल्ली की हर उदास शाम को.........
सड़कों पे मासूमों को देखा है,
मोल भाव करते, पाँच बरस की उमर में,
पेन बेचते, या नई पुरानी किताबें..............
सडको पे न जाने कब इनका बचपन छीन ले गया कोई,
एक लड़की को देखता हूँ,
तार तार कपडों में छुपाती हैं ख़ुद को, एक पेड़ की आड़ में,
रात रोज़ लूट लेती है, उसे कई बार.......
हर मर्द अब एक जानवर है बस, उसके लिए...........
मैं नज़रें चुराता हूँ उस से, और ख़ुद से भी......
आगे बढ़ जाता हूँ ख़ुद को कोसता,
दिल्ली की एक उदास सी शाम को........................
कुछ बड़ी अकड़ वाले सर कारों में धसे देखे,
इतराना और ये अकड़ ना जाने पैसे की है,
या काम के बोझ की, मैं सोचता हूँ....
आंखों पे काला चश्मा, बदन पे महंगे कपड़े,
अपना लहू दे कर खरीदे, जो इन्होने,
लहू देने गुडगाँव जाते हैं,
बस "कैब" के "कैदी" हो कर हर रोज़.......
BPO लहू मांगते हैं, ये देते हैं....
वो और मांगते हैं ये और देते हैं...........
आज शाम की अकेली खुशी, मैं इस भीड़ में शामिल नही...........
मैं खुश होता हूँ दिल्ली की उदास शाम को........
मैंने सुना था दिल्ली की शाम सुहानी होती थी,
रही होगी, जब गालिब रहा होगा.......
हर मौसम इंसान के मुताबिक रहा होगा,
अब ना तो पीने को पानी हैं,
न जीने को हवा,
मैली हो चुकी यमुना के किनारे,
मैं खड़ा सोचता हूँ यही,
दिल्ली की एक उदास सी शाम को.................
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