Tuesday, October 16, 2012

मैं तुम सब हूँ.....

न हिन्दू हूँ,
न मुसलमां,
हर मज़हब जिया हूँ
कहकशां हू .....

मेरी पहचान पे,
सवाल उठाने वालो,
गौर से देखो,
सिर्फ तुम्हारा ही .....
नाम-ओ-निशां  हूँ .......

खुद से मुझे जुदा करने की,
कर  लो हज़ार कोशिशें,
आखिर न कर पाओगे,
अक्स हूँ तुम्हारा ........
बस तुम सा हूँ ......

मेरे तुम्हारे वजूद में,
दरअसल,
फर्क ही कहाँ कोई,
जो तुम न हो,
तो फिर मैं कहाँ हूँ ..........

मासूमियत हूँ,
बुज़ुर्गी हूँ,
और मैं ही तो,
अल्हड जवां  हूँ ....

बेशक तुमने मुझे लुटाया,
नादानी  के तहत,
पर अब तो सम्हालो,
मैं ही तो बचा,
तुम्हारा कुल जमा हूँ ...........


कच्चे पक्के रिश्तों पे ही सही,
पर खड़ा हूँ, शान से,

मैं तुम  सब हूँ,
मैं हिन्दोस्तां हूँ ......

1 comment:

राकेश कौशिक said...

बहुत-बहुत सुंदर