Wednesday, January 26, 2011

वो कमरा..........


उसी कमरे में,
जहाँ बरसात के पानी के साथ
हर रोज़ टपकती होंगी यादें मेरी......

देर शाम गए,
घुरघुराते पंखे को,

अनजाने ही घूरते हुए.........
हार कर.......
बस थोड़ी देर के लिए ही ,
भुला देना चाहते होगे.....
सारी घटनाएं, दुर्घटनाएं......
जो हो गयीं,
बस कुछ ही दिनों में...
जानता हूँ, मेरे शब्द,
बजते होंगे कानो में तुम्हारे...........
आधी रात जैसे गाड़ रहा हूँ,
कील.........
पलंग से सटी दीवार में.........
तोड़ देना चाहते होगे,
मेरे तुम्हारे बीच,
यादों की सूखी लकड़ी से बनी........
एक अद्रश्य सी 'वो' दीवार..............
मैं भी आज सोच रहा हूँ...........
वहां तो पूरा एक.....
कमरा छोड़ कर आया था......
यहाँ एक लकीर खींच पाना भी,
असंभव लगने लगा है.......

1 comment:

shiva said...

बहुत सुंदर कविता