Thursday, May 1, 2025
मैं वक्त हूं..!
Monday, April 28, 2025
परिधि
अनंत और शून्यता
मिश्रित कर दी हम ने..!
कि अपर्मिति की सीमा,
तय की हमारी मूर्खता ने..!!
मानवता गौण हो गयी..!
ससंचित होने लगे
और प्रेम व्यापार हो गया..!
तो तुम्हारी आद्रता कैसे,
संरक्षित हो सकी?
विस्मयकारी हल दिया है?
बढ़ गया अकस्मात्,
भाग्य का?
आवृत्तियों में,
पुनर्गठित किया विधि ने?
"परिधि" संसार हो गया..!
Thursday, October 31, 2024
लड़के चुप हो गए
मनचाहा खिलौना,
न मिलने पर,
पसंदीदा पटाखा,
किसी और के हाथ जलने पर,
वो चुप हो गए,
पिता की डांट पर,
माँ की फटकार पर,
बहन के तिरस्कार पर,
वो चुप हो गए,
उनकी आँखे बोलती जब,
लड़के चुप हो गए,
कक्षा में पाठ,
समझ ना आने पर,
पहले प्यार के,
अधूरे फ़साने पर,
लड़के चुप हो गए,
वो चुप हो गए,
जब शिक्षक ,
उनके समझे नहीं,
उनके छोटे छोटे मसले,
बड़ों से सम्हले नहीं,
मगर उनकी आँखे बोलती रही,
दिवाली पे बुआ के हाथ से,
दस रुपये का इंतज़ार रहा,
गर्मियों में नानी के घर का,
साल भर इंतजार रहा,
पा नहीं सके तो,
लड़के चुप हो गए,
पढाई की गला काट होड़ में,
नौकरी की दौड़ में,
जब दम घुट गया,
लड़के चुप हो गए,
सिगरेट के कश में,
कभी रंज जला दिया,
शराब के घूटों में,
कुछ गम घुला दिया,
फिर कानों में उनके,
साँसे कुछ फुसफुसाती रही,
पर लड़के चुप हो गए,
सब तमन्नाओं, भावनाओं को,
कविता कहानियों में जगह मिल गयी,
लड़कों का किशोरपना
कुंवारा रह गया,
लड़के चुप हो गए..........!!
Wednesday, June 21, 2023
क्या है?
तुम तो कहते थे,
सब टूटा है, सब छूट गया,
तो फिर ये तुम्हारे,
सीने से लगा क्या है?
क्यों इतने बेचैन हो?
ये तुमको हुआ क्या है?
वो तो बस कह देता है,
अपने दिल की बात,
इसमें बुरा क्या है..??
ऐसा नहीं है कि,
ये रास्ता उधर नही जाता..!
मैं उसकी गली से,
गुजरता हूं रोज लेकिन,
अब उसके घर नहीं जाता..!
वो जब कर रहा था,
मेरी लंबी उम्र की दुआएं,
एक मैं, जो कहा करता था,
ये शख्स क्यों मर नही जाता..!
क्या चाहिए क्या नहीं?
मुझ से होकर,
इज्जत चाहिए,
दाद चाहिए..!
बस मेरे मुंह में
ज़बान नहीं चाहिए..!!
उसे मुझसे सब चाहिए,
बस एहसान नहीं चाहिए..!
मुझे ज़र्रा बना कर,
वो आसमान होना चाहता है,
लेकिन उसे अंतस की,
पहचान नहीं चाहिए..!
बड़ा अजीब सा शख्स है,
गत्ते से दिल लगाए बैठा है,
भीतर का कीमती,
सामान नहीं चाहिए..!!
सब सजदे उसके,
बनावटी हैं..!!
दिखावे की इबादतें उसकी,
उसे घर में अपने,
ईमान नहीं चाहिए..!
मेरा मुर्दा जिस्म ही अब ,
शायद रास आए उसे..!
इस जिस्म में उसे,
जान नही चाहिए.!!
मैं
ये जान कर हर शाम,
और गुनाह करता है वो,
के सुबह सुबह,
माफ कर दूंगा मैं..!
जिस बिस्तर पे,
कत्ल हुआ रात मेरा,
अपने ही हाथों,
साफ़ कर दूंगा मैं..!!
हमारी भी कहानी में,
नया कुछ नही,
उसके हाथ में,
हर रात खंजर होता है,
और साथ में मैं..!!
कहानी खत्म और हाथ,
मेरे कुछ आया ही नहीं,
उसके हाथ सब आया,
और साथ में मैं।
सच बोला है उसने
पहली दफा बोला है उसने,
मैं सहम गया हूं,
सच बोला है उसने..!
जिन सच्चाइयों पे,
मेंने पर्दा डाल रखा था,
उनका पुलिंदा,
खोला है उसने..!!
मैं अपने वजूद की,
ओट ले रहा हूं,
आख़िर ऐसा भी क्या,
बोला है उसने?
मैं हर शख्स पे,
इल्ज़ाम लगाता रहा,
क्या खुद को भी,
टटोला है मैंने?
उस से
फिर भी जुदा हो,
बहुत फर्क है,
तोहमत लगाना कोई तुमसे सीखे
इल्ज़ाम लगाना उस से..!!
दिमाग लगा सको,
तो बताना हमे,
पहले दिल लगाना उस से..!!
उसी ने राख किया है,
कोई कैसे बेहतर जानेगा,
मेरा ठिकाना उस से..!!
वो खुदा बन गया है,
दगा दे दे कर,
छुपना नामुमकिन है,
मत बनाना कोई बहाना उस से..!!
कायनात के,
इस पार भी है उस पार भी,
सीख लेना,
हद के पर जाना उस से..!!
मंदिर मसीती, काबे मक्के,
गिरजे रंगशाला उसकी,
मयखाना उस से..!!
सुना है, मसीहा है,
कभी मिलाना उस से..!!
शतरंज
हमारी ज़ुबानों में ज़माने का,
फर्क था,
बातों को, इशारों में,
समझाया हमने...!
बताओ चालों से,
कैसे बचते?
जब शतरंज पे,
घर बनाया हमने..!
पलट पलट के,
कभी भी उलझ पड़ता है,
और कहता है,
बात को बढ़ाया हमने..!
खुद के जिंदा होने का,
एहसास दिलाया हमने..!
किसी से ख़त भेजा,
उसे बुलाया हमने..!!
फिर सिरहाने,
खड़ा किया,
और खुद को,
दफनाया हमने..!!
सफ्ह में सबसे आगे बढ़,
उसने दाद दी, मदद दी,
अपनी बर्बादी का,
जब जश्न मनाया हमने..!
ज़मी ऐ हिन्द - आजकल
यहां अश्क चाट के,
सब जिंदा हैं इक दूजे के,
वतन हुआ या,
रेतीली फसीलों में,
कैद जैसे शहर कोई..?
मुरझा के गिर पड़े,
शाखों से परिंदे तक,
वो आया तो ऐसे,
जहरीली जैसे लहर कोई..!!
मसीहा मान के उस को,
लोगों ने पलकों पे बिठाया,
वो लगा दामन ए मुल्क पे,
जैसे बुरी नजर कोई..!!
न पांव उठा सकता है न हाथ,
न आवाज़ उठा सकता है,
न सिर कोई..!
लगता नही के अब बचा है,
जिंदा यहां बशर कोई..!!
लहरों के निशान रेत पे,
आवाम के माजी का,
अक्स दिखा रहे हैं,
बहती थी इस जमी पे कभी
मुहब्बत की नहर कोई..!!
लौट के कभी आयेंगे,
तो हिंद की जमी पे,
तलाशेंगे परिंदे कल के,
और कहेंगे खुद से कराह कर,
मुल्क ए हिंद में भी था,
जम्हूरियत का शजर कोई..!!
आइना समझ ले मुझे
भला यह कैसी,
फरियाद करता हूं?
तू सामने होता है,
और तुझे याद करता हूं..!
यह कैसा सितम है
यह कैसे कत्ल किया है तूने?
मुझ में और मिट्टी में फर्क
कैसे खत्म किया है तूने?
समझ नहीं आता
इश्क हूं कि समझौता हूं मैं?
तेरे आगोश में होता हूं,
तो क्यों दर्द में होता हूं मैं?
चल आईना समझ ले,
तोड़ दे मुझे,
बंदिश नहीं हूं,
मजबूरी भी नहीं
छोड़ दे मुझे..!!
ठिकाने लगा है वो
न जाने कितनी और,
सच्चाइयों से महरूम रहता,
ध्यान न देता के,
नजरें चुराने लगा है वो
बिस्तर पे सुबह,
सलवटें नही मिलती अब
बाहर कहीं तो
रात जाने लगा है वो
वो सुना देता है,
मैं मान जाता हूं
कैसे रोज नए,
बहाने बनाने लगा है वो
मुझसे दगा कर
दर दर की ठोकरें खा रहा है
अब कहीं जा के
ठिकाने लगा है वो
संवार रहे थे
जो दो जहां उसका
उन्ही हाथों से,
दामन बचाने लगा है वो
अब मान लूंगा ये बात
हां बदल गया वो
मुझे दर्द में देखा है
मुस्कुराने लगा है वो
रिश्ता
उस से,
राब्ता हो गया,
फिर पहली दफा रात को,
मैं अपने घर जा के सो गया..!!
तेरा नाखून टूटा था,
शहर में चर्चा था,
के मुझे कुछ हो गया..!!
मंदिर, मस्जिद, शिवालों से,
हार कर आया,
मेरी गोद में,
वो अपना दर्द रो गया..!!
इक ख़ज़ाने का आज पता मिला मुझे,
मेरी सांसों के मोतियों में..!
अपनी सांसों का धागा पिरो गया.!
पहले जैसा,
कोई भी नही लौटा,
उसकी गली में जो गया..!!
इश्क के असर दोगले होते हैं
पंछियों का मौसम बीत जाता है,
फिर बचा इक बूढ़ा दरख़्त होता है,
उसपे कुछ पुराने घोंसले होते हैं..!
लोग मुरझा जाते हैं,
जां सूख जाती है, मगर,
जिस्म हरा भरा रहता है,
इश्क के असर बड़े दोगले होते हैं..!
वो कहीं नहीं पहुंचते, जो,
पतवारों पे खड़े होते हैं..!!
घड़ी की सुइयों संग चले होते हैं।
खुद की हार में जो,
अपनों की जीत देख लें,
वो लोग बड़े भले होते हैं..!
मगर इश्क के असर दोगले होते हैं..!!
गया कम था लौटा बहुत है
जाने किस के आगोश से
निकल के आता है
लेकिन मेरे गले लग के
रोता बहुत है..!!
कुछ खास ख्वाब देखता है
वो आजकल
सुना है सोता बहुत है
में तुम्हे भी समझाऊं
ये अब मुमकिन नहीं
मेरे दिल से ही मेरा
समझौता बहुत है
मेरे हाथ में
उसकी हथेली जरा सी थी
वो गया कम था
लौटा बहुत है
तुम्हारी सब खयानतों को
माफ कर दिया मैंने
मेरा दिल छोटा बहुत है
मेरी असली शक्ल देखने की
तुम्हारी ये ज़िद बेमानी है
मुखौटा देख लो, बहुत है
दोस्त?
वहीं घाव लिखते हो?
वहीं खंजर लिखते हो?
वहीं इक हाथ लिखते हो दोस्त?
कैसे इतने कातिल?
अल्फाज लिखते हो दोस्त?
वफा के तगादों से,
तुमने ही जान ली,
तुम ही हमे
दगाबाज लिखते हो दोस्त?
स्याही से लहू की,
महक आती है
कैसे जुल्म का नगमा लिखते हो?
कैसे सितम का साज लिखते हो दोस्त?
जिंदगी अभी आधी हुई
रूठ के गया,
तो हर दफा लौट आऊंगा
ये जरूरी नहीं.......
मेरे तुम्हारे बीच
लिबास आ गए हैं
कैसे कहते हो?
कोई दूरी नही ............
मुहब्बत हो तुम मेरी
बर्दाश्त कर लेता हूं
झुका दे मुझे वरना
ऐसी कोई मजबूरी नही.........
तंग आ गया तो,
छोड़ दूंगा तुझे
जिंदगी अभी आधी हुई
जाया पूरी नहीं.........
Monday, September 27, 2021
कहां तक जाओगे 2
Sunday, September 5, 2021
कहां तक जाओगे 1
दामन निचोड़ दिया मैने।
Monday, July 12, 2021
झूठे हैं लोग
Monday, April 19, 2021
बातें कच्ची मिट्टी
Wednesday, March 10, 2021
नया बहाना
Sunday, March 7, 2021
शिकस्त
मुझे अंजाम मे,
“हमारी” शिकस्त दिख रही है,
तो ज़रा बता हमारा....
आगाज़ क्या है..........?
खिलखिलाहट में,
अब भी वो मोती हैं,
पर नज़रें चुराने का अंदाज़
जुदा है,
सब न बता, पर इतना तो बता,
आखिर ये अंदाज़ क्या
है......?
हमराज़ मान के तुझको,
बाँट ली जिन्दगी अपनी,
बस इतना बता.......
तेरे सीने दबा वो एक,
राज़ क्या है.........?
मेरा दर्द न पंहुचा,
मेरी आह न पहुंची तुझ तक,
तो वो चीख ही क्या,
वो आवाज़ क्या है.........?
जो है ये सब तो देख,
मैं अपनी शामों को,
पैमानों में घोल के पी रहा
हूँ...!
मोहब्ब्बत में तो,
सब ही होते हैं बर्बाद,
क्या फ़कीर और,
फिर सरताज क्या
है.........?
हद
कभी तूने सुना,
कभी अनसुना कर दिया,
हाले दिल मैंने यूं,
बयां किया तो बहुत.......
जान निकल रही है,
जब जर्रा जर्रा,
जिंदगी की अहमियत,
खुद की कीमत, समझा हूँ,
यूं मैं जिया तो बहुत.....
प्यास प्यार की थी,
पर हिस्से अश्क ही पड़े
मेरे,
घूँट घूँट, मैंने दर्द,
यूं पिया तो
बहुत............
तेरा एहसान,
मेरे हर करम पे अब भी भारी
है,
फ़र्ज़ अदा मैंने किया तो
बहुत.......
उम्र कम पड रही है,
और तेरे साथ के पल,
नाकाफी हैं,
यूं जिन्दगी ने जीने की
खातिर,
दिया तो
बहुत.................
घुट घुट के जीना क्या होता
है,
तुमने सिखा दिया,
मैंने भी हर,
सफ्हे पे गौर किया तो
बहुत......
घूँट घूँट यूं दर्द,
मैंने पिया तो बहुत...
बहुत कुछ बाकी रहा फिर भी,
तेरे साथ मैं, यूं जिया तो
बहुत............
x
Saturday, October 31, 2020
आइना
Thursday, October 29, 2020
लोकतंत्र
Monday, February 17, 2020
खुशबू
उधेड़बुन
ख़ामोश भी बहुत है....
ख़ुशी है बेपनाह,
फिर तन्हाई को तेरा,
अफ़सोस भी बहुत है....
ज़िंदगी,
बड़ा एहसान मानती है तेरा,
पर ये फरामोश भी बहुत है...
हाँ,
हारी भी है बाज़ी-ऐ -रूह,
पर बचा जोश भी बहुत है...
लड़खड़ाई है, बाद फुरकत,
अब दगाओं का, होश भी बहुत है......
उधर,
पाकीज़गी भी दिल की बेहिसाब,
मुब्तिला गुनाहों में भी इधर बहुत है.....
इधर
मचलती है वही आरज़ू दामन में,
तेरे रूबरू जो सरगोश बहुत है....
पेशानी पे,
कालिख बन भी लगी है,
किस्मत सफेदपोश भी बहुत है...
अंतस,
आलम है लम्हो का, बेतरतीब,
इधर दर्द-रोज़ बहुत है....
Saturday, November 30, 2019
कोई..!
Monday, November 4, 2019
अब जब भी शुबहा हो..!
मैं कल से आज तक
देखा न गया
मौसम सा सनम
फिरकी
क्यों है?
दावा
गुल ओ किमाम वजूद
वो वर्दियों वाले लोग..!
शायद दूसरा भी किनारा हो?
क्या है?
Thursday, October 17, 2019
किसी तरह
हर चाहने वाला मेरा,
दीदावर है,
किसी न किसी तरह..!!
हां यूं तो बेअसर हूँ,
पर बडा असर है तुझपे,
किसी न किसी तरह...!!
जिंदगी बाकायदा अंधेरी है,
पर जब से तू है, दोपहर है,
किसी न किसी तरह..!!
सिर्फ शाम कहा जाता था मैं,
पर ये कैसे हुआ?
सहर है किसी न किसी तरह?
पगडंडियां सब खो गयीं,
राह भटका था मैं,
तेरे मिलने से कैसे?
रहगुज़र है किसी तरह..?
इश्क़ की बात कर
दूरियों का ज़िक्र न कर,
पास आने की बात कर
हार जाने का न नाम ले अब
तेरे कहने से उलझ गया हूँ,
अब लड़ रहा हूँ हर सवाल से,
तो जीत जाने की बात कर....!
जियें या कुर्बान हो जाएं,
फैसला मुश्किल नही,
मुलाकात की बात कर...!
सहरा में भटकने वाला आदम हूँ,
प्यास की बात कर,
पानी की बात कर..!!
बेरुखी रही है, किस्मत हमेशा,
नज़दीकियों की बात कर,
अब सिर्फ इश्क की बात कर..!!
Thursday, September 19, 2019
मायने
सूख तो जाने ही हैं ज़ख्म सब,
सर पे तपता सूरज एक ओर,
उधर बहता मुसलसल ख़ून जो है..!!
क्या हुआ जो फ़ना भी हुए,
देखो जिहाद हासिल है..!
कुछ अजीब ही है ये,
वतन का जुनून जो है..!!
हमने वतनपरस्ती के,
मायने तक बदल डाले,
तुम भी बदलो ये,
सड़ते गलते कानून जो हैं..!!
Tuesday, September 17, 2019
हकीकत
खींच लेगा कोई इस कदर,
क्या कोई ऐसी भी वजह है?
सोचा न था नियत बदलेगी,
मिलने में रखा क्या है..?
अजीब सा हो रहा है कुछ,
न जाने आखिर क्या है..?
खुमार है जुल्फों का, और,
आंखों से नशा दिया क्या है..?
ईमान डगमगा रहा मेरा,
तुमने देखो किया क्या है..?
खूबसूरत लग रही है,
कमबख्त ये कैसी ख़ता है..?
अंजुमन, जानता हूँ, बेरंग मेरा,
तेरे नाम की होली में रंगा है..!!
दिल में खलबली भी मची है
कुछ न होगा ये भी पता है..!
होगी बस हकीकत पेश्तर,
और सब रंग उड़ जाएंगे,
चंद अगले रोज़ में यही बदा है..!!
Monday, September 16, 2019
सौदे
रिश्ते में रही यूं बंदिश,
कि मेरे थे अश्क़,
और उसकी आँखों से निकले..!!
कैद में बीत गयी उम्र,
कौन अब सलाखों से निकले..?
इक्के दुक्के सिक्के,
कैसे लाखों के निकले..?
ठगे तो गए इश्क में लेकिन,
सौदे मुनाफों के निकले...!!
किसी न किसी ने तो,
पढ़े ही होंगे, वरना..!!
कैसे इतने खत
बिना लिफाफों के निकले...?
रसोई और कविताएं
तुम्हारे इंद्रधनुषी प्रेम ने,
मेरे हर काव्य को,
भिन्न स्वाद दिया..!!
कविताएं चटपटी,
चटखारेदार हैं,
मीठी भी, तीखी भी,
सीली सी कुछ,
कुछ गीली सी,
सूखी सी कुछ,
कुछ रसीली सी...!!
कोई बनारस हो गई,
कोई प्रयाग है,
किसी में शर्करा तो,
किसी मे मिर्चों की आग है..!!
देखो....तुम्हारी रसोई,
मेरी कविताओं में बस गयी..!!
Monday, September 2, 2019
सफ़ह-ऐ-इश्क़
तोड़ दी दीवार-ओ-नींव
तमने अपने ही हाथ, रिश्तों की,
फिर भी नुक्कड़ पे,
यादों का मकान बाकी है..!!
हमने भी अखलाक निभाया है,
दुनियावी जो थे चुका दिए,
रूहानी एक एहसान अभी बाकी है
कैसे सोच लिया कि,
मुकर के बच जाओगे..??
माना सब सफ़हे
हिफ़्ज़ हुए इश्क के लेकिन,
इक इम्तेहान अभी बाकी है..!!
Friday, June 28, 2019
महारत
एहसान चुकाएँ तो चुकाएं कैसे,
सब तो तुम्हारी अमानत है,
कर सका इतना ही, के तेरे दर्दों को,
साथ सहने की कोशिश की है..!
तेरी हमनवाई, इतनी बुलंद,
के खिलाफत, बेमतलब थी,
तो संग बहने की कोशिश की है..!!
इस हुनर का माहिर नही,
बस तेरा बयान-ऐ-दिल,
मैनें अपनी जुबां से,
कहने की कोशिश की है..!!!
Thursday, June 27, 2019
तोहफा-ऐ-तवारीख़
नसीब वाली होती हैं,
उन घरों की ईंटें तक..!!
बेटियों की किलकारियां,
जिनमे गूंजी होती हैं...!!
मजबूर-ऐ-मोहब्बत, उस रब ने,
बुत... बेटी का बनाया,
फिर झुक के खुद,
कदम चूम लिए खुदा ने...!!
ऐ बशर नादां-ओ-बेपरवाह,
कम से कम बेटियों के,
इस मर्तबे की तो कद्र कर..!!!
सुबहा
भला कहाँ छुपा है ये राज अब?
पैरहन अपने लहू में भिगो दिया है..।
भला ऐसे कैसे हुआ कि हम,
बावफ़ा भी रहे, दग़ा भी दिया है..?
सुनो कुछ शक है हमें इस रिश्ते पे,
घर बनाया भी, उजाड़ भी दिया है...!!
जब सब खो दिया है, फिर भी,
मज़ार-ए-रूह में तेरे नाम का दिया है...!!
Wednesday, June 26, 2019
फकीराना रईसी
रोशन जगमग घरों में,
पसरा सन्नाटा है,
मातमी उदासी है,
निगल रही है साँसों को,
चाट रही है लम्हों को,
रूह इस कदर प्यासी है..!
पल भर अपने ही बेटे को
थपथपाने का वक़्त नहीं,
उन कलाइयों के पास.....
जिनकी घड़ियों पे,
हीरों की नक्काशी है...!!
Thursday, June 20, 2019
क्यों
हां तुम हो,
एक बड़ा प्रश्न...!!
जिसके जवाब,
ढूंढता रहता हूँ...!!!
पर और भी बड़ा प्रश्न
के आखिर हम,
हैं ही क्यों...!!
बस यही विरक्तिदोष है...!!
Wednesday, June 19, 2019
तेरा पता..!!
मैने आदम दिलों, बुतों,
संग-ओ-फौलाद,
को पिघलते देखा..!!!
तू बच्चों की किलकारियों
में ही बसा है कहीं...!!!
Tuesday, June 18, 2019
हाल-ऐ-शब
तेरी यादों को,
अक्सर अशआर बना कर,
कागज़ में लपेट,
डायरी में बंद कर देता हूँ..!!
सोचता हूँ अक्सर,
के वो ख़याल,
जिसे दफना दिया,
दोबारा पेशतर न होगा..!!
लेकिन चौराहे के खंभे सा,
रोज़ मेरे वजूद के आगे,
खड़ा हो कर,
तेरी वफाओं का सिला मांगता है..!!
मैं नजर झुकाये,
बच के निकलने की,
कोशिश में रोज़,
उलझ जाता हूँ,
तेरी यादों की डयोढ़ी पे..!!
फिर ये लम्हे,
सर पटक पटक के,
मातम करते हैं,
तेरे मेरे किस्से का..!!
और हां, तेरी यादों की,
मजलिस भी बैठती है,
हर रोज़, मेरे संग दीवान पे,
तो.. ये हाल है मेरी रातों का..!!
Saturday, June 15, 2019
करतब
ग़म-ऐ-दिल बेशक,
तुम्हारा, बड़ा है बहुत,
लेकिन कभी क्या,
किसी तंगहाल से मिले हो?
तलाशोगे, तो उसकी भूख में,
दर्द की नई गहरायी मिलेगी..!!
वो नट बन के पैदा न हुए,
न मजमगार थे उनके पुरखे,
ये करतब तो सब,
पेट की आग कराती है..!!
ढपली की थाप पे,
उसका राग नही है ये,
ये भूख का दर्द है,
जो तान बन के निकला..!!
मुरमुरे बेचना चाहा कब,
उम्र तो उसकी खाने की थी,
उनकी तंगहाली तो बस नतीजा है,
तलब तुम्हे ख़ज़ाने की थी..!!
Thursday, June 13, 2019
वो
उसने कहा 'सुनो'
और कदम थम गये..!!
फिर ज़िन्दगी गुजरी,
हम वहीं रह गये..!!
उसने कहा 'चलो'
हम चल दिये,
दरम्यां सितारों के,
आज मकां हमारा है..!!
उसने कहा 'बस'
और सांसे थम गयीं..!!
तुरबत है, कब्र है,
कुछ सूखे फूल हैं..!!
Tuesday, June 11, 2019
रिश्ता
दिल ओ दुनिया के बीच,
मेरा रिश्ता तू ही तो है
लौटा दिया ग़मे दहलीज़ से,
फरिश्ता तू ही तो है,
गुज़रा सारा जहां बेहिसाब जब,
आहिस्ता तू ही तो है
कहाँ रही फिक्र मेरी किसी को,
एक बाबस्ता तू ही तो है..!!
खंजर
आदम ओ दुनिया की,
अब बात मत कर,
मैने ग़मों का समंदर देखा है,
तेरी झील झील आंखों में,
किसी और के नाम का
मंज़र देखा है..!!
जीने की ख्वाहिश कैसे भला?
हाथ में तेरे, मैनें अपने नाम का,
खंज़र देखा है..!!
मंज़िल
आराम लेने नही देता दिल,
इसे जीने का जतन बहुत है,
तेरे एहसान कैसे ओढूं बता?
ये झीना पैरहन भी बहुत है..!!
उतार ले इसे अब जिस्म से,
इस रूह का वजन बहुत है..!!
गुलशन की अब खाक ख्वाहिश?
कांटो का ये अंजुमन बहुत है..!!
बशर जाएगा भी कहाँ आखिर,
दो गज़ का वतन बहुत है..!!
खामोशियाँ
मेरी खामोशियां,
गूंज कर बहरी हो गयीं,
उसी कमरे में जहां,
हमारी मोहब्बत सोती रही..!!
अब सूख चुकी तो,
पोंछने का क्या फायदा,
यही है वो आंख जो,
उम्र भर रोती रही..!!
तुम्हारे सेहरा में जब,
खिल रहे थे वफ़ा के फूल,
आग बारिश की मेरे जिस्म को,
बरसों भिगोती रही..!!
तुम क्या गए, पीछे से,
मुकद्दर भी ले गए,
मेरी किस्मत ताउम्र फिर,
तेरी ड्योढी पे रोती रही..!!
यही है वो आंख जो,
उम्र भर रोती रही..!!
Monday, June 10, 2019
दलदल
बेघर चले आते हैं,
इन गली कूचों में ही,
कहीं समा जाते हैं....!!
गाँवों को समूचा,
निगल रहे हैं...!
हर रोज़, शहर,
दलदल हो रहे हैं...!!
खता
चोट जिस्म ने खायी,
शमशीर-ओ-तलवार,
सह रहा है...!!
कट ही जायेंगे,
ये लम्हे हिज़्र के,
कहीं भीतर दिल,
ये कह रहा है....!!
बात दीगर है की,
जिस्म के, हर गोशे से,
मानिंद-ऐ-आब,
लहू बह रहा है...!!
माद्दा
हारने में नहीं,
चमन को गुलज़ार रखे,
असल दीदावर वही....!
ज़माने की कसौटियों पे,
खरी है बात,
तेरी नज़र में गलत,
और ज़रा सी सही.....!
लड़....! के बुलबुलें आज़ादी मांगती हैं,
कोहराम तेरा...खामोशी नहीं..!
Saturday, June 8, 2019
फीका विश्व
खूबसूरत मोड़
एक खूबसूरत मोड़ दिया,
खातिर-ऐ-क़त्ल,
जब खंज़र उठाया उसने,
हमने खुद को,
ढीला छोड़ दिया......!
नकाब
ये बिखरा सा ख्वाब क्यों है?
क्या छुपाये हो दिल में,
चेहरे पे हंसी का नकाब क्यों है?
मिलता था जो इत्मीनान से,
वो शख्स बेताब क्यों है?
क्या छुपाये बैठे हो,
ये हंसी का नकाब क्यों है?
साथ
साथ का वादा करने वाले,
दस्त-ऐ-ख्वाहिश, मजबूर हो गए....!
जाते थमा गए अरमा हज़ारों,
जो ये मुट्ठी कस दी जरा सी,
ख्वाब, सब वो चूर हो गए....!
शीशा-ऐ-दिल टूटने का "अंतस",
जश्न यूं मनाया फिर हमने,
"दीवाने" मशहूर हो गए...........!!!
खुद से मिलना भूल गए
Sunday, October 28, 2018
खाली पेट
खाली पेट नींद नही आती,
हमसे बेहतर जानेगा भी कौन?
फाके किए हैं महीनो हमने!!
रहने दो शर्मो हया और
ये हिजाबपारस्ती, झूठ है सब
कब्र मे गुज़ारी है जिंदगी,
पर्दानशीनो हमने...!
नखरे हैं सब, और शोखियाँ,
ये जो तुम्हारे मुश्किलों के जिक्र हैं,
कसौटियों पे शबें गुज़ारी,
नज़नीनो हमने....!
और फाके किए हैं,
महीनों हमने..I
Thursday, October 18, 2018
इलज़ाम
वजहें हैं, जीत है, हारें हैं....
ज़ख्म-ओ-मरहम हैं
दरारें हैं दीवारें है
उनके हैं या तुम्हारे हैं...?
दीमकों का राज
खुद को आज में....!
हिन्द की संताने लड़-मर रही हैं,
दीमकों के राज में.....!
उद्योगपतियों का राग, बजट है,
लोकतंत्र के साज़ में.....!
बस्तर की अछूत लड़की की,
चीखो-पुकार दब गयी,
बंदूकों के अट्टहास में,
वर्दियों की आवाज़ में.....!
पर असल कातिल हैं वो,
जो छुपे हैं, सफ़ेद कुर्तो,
और कारखानों की आड़ में....!
ऊंची हो गयी दहलीज़ न्याय की,
रोकड़े के चबूतरे आधार बन गए,
असर नहीं रहा अब,
गरीब की फरियाद में...!
हिचकियां
जब हिचकियां आती हैं...!!
सो जाना, या फिर,
बाहर निकाल जाना...!!!
अपने जबड़े फाड़,
मुझे खाने को दौड़ती हैं...!!!
तकल्लुफ तो होता ही होगा.....!
दीवारें एक जैसी है....!!!
जब दरवाज़ा खोलता हूं,
मेरे कमरे और मुझ में,
भर जाता है.....!!!
हालिया बशर
सुना है,
गोया दिमागी बीमार हैं...!!!
इक कतरा ना पेश फरमाया गया,
खून बहाने को आए,
मिल के चार हैं..!!!
वतन की चादर बुनी,
वो आज,
मलाल ओ रंजिश के दस्तकार है..!!
मिलते थे शामो शहर जो दिल,
मर गए हैं,
वजह ये सियासती बदकार हैं..!!!
मर गई बरसों पहले...!!
पतझड़ बरकरार है..!!
जिरह कर निकले थे,
आज हमारे शहरों में भी,
आपसी तकरार है...!!
Thursday, November 23, 2017
सम्पूर्ण हूँ मैं
जो हर दोपहर, कढ़ी की सोंधी खुशबू बन,
खींच लेता है मुझे घर के जानिब,
मैं सम्मोहित सा, खिंचा आता हूँ..!!!
माया हो कर खुद भी,
तुमने जन्मी है एक और माया,
में विरक्त रह भी कैसे पाता,
तो अब माया पाश में बंधा हूँ तुम्हारे...!!
अनमना था, निष्पक्ष था मैं,
पर प्रेम इतना भारी होगा
ये पता न था।
झुक गया अस्तित्व पूरा
तुम्हारी ओर, और तब मैंने जाना
सन्यास बेमानी है।
कदाचित ये विचित्र है,
की माया के आसक्त मैं,
प्रवाह में बहता हूँ,
तुम्हारे प्रभाव में
रहता हूँ
ये संयोग सुखद है
मेरा इच्छित है,
अब और कोई आकांक्षा नही
सम्पूर्ण हूँ मैं।
Monday, November 20, 2017
तुम पर आशार लिखने हैं
Wednesday, November 15, 2017
किमाम
मैं हिफ़्ज़ करूँ तेरे गोशे गोशे को ऐसे
तेरे नक्श ओ वज़ूद की
तुझसे भी ज्यादा पहचान हो जाये.......!!
पाक हो जाएं दिन
सुन्नत हो जाएं रातें
की हर लम्हा
माहे रमजान हो जाये.....!!
कभी इधर एहसान हो जाये.......!!