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Monday, January 19, 2026

क्या से क्या हो गया है वो?


तुझे पाने की हसरत लिए,

न पूछ कहां कहां गया है वो,

अल्हड़पन तुझपे वार के

जवां हो गया है वो..!


तेरे इश्क में,

क्या से क्या हो गया है वो?


सामने खड़ा है

इस ग़फ़लत में उसे

अपना न समझ अब,

पेश ए अक्स है मगर

बहुत दूर चल गया है वो..!


क्या से क्या हो गया है वो..?


उसके चेहरे पे बकाया

अब्र ए नूर से धोखा न खा

गहरे कहीं टूट गया है

मुरझा गया है वो...!


कहीं खो गया है वो..!


तुझसे मिला था वो,

गोया खुद से मिला था,

अब फिर खो गया है वो

क्या से क्या हो गया है वो..?


उसके होने से

कूचा ए यार रोशन था

ये देखता है जो धब्बे गहरे?

अब बनके कालिख,

दीवारों में समा गया है वो..!!


क्या से क्या हो गया है वो


पुरसुकून सो सकेगा

आखिरकार जहां गया है वो

तेरे इश्क में मेरे दोस्त

अपनी जां से गया है वो..!!

Friday, July 18, 2025

इक आदमी रहता था

बच्चों, एक औरत,

दीवारों खिड़कियों के दरम्यान,

एक आदमी भी, रहता था


उलझनों, खर्चों, तानों, उलाहनों

तीज त्यौहार, सर्दी गर्मी, 

बच्चों की ख्वाहिशों के बीच

इक आदमी भी रहता था


हर बात पे वो कहता

ठीक है कोई बात नहीं,

हर चोट पे कहता, भर जायेगी

कांच के मानिंद, जो खुद रोज टूटता

एक आदमी रहता था


रंगीन अलमारियों, रोशनियों,

बच्चों की हंसी ठिठोली के बीच

एक बेरंग आदमी रहता था


वो घर जिसमें सामान भरा था सब

अरमानों से खाली दिल लिए

एक आदमी रहता था


बिगड़ गए लम्हात पे, 

खुद के, दूसरों के हालात पे,

सब ठीक हो जाएगा, कहता था

उस घर में इक खंडहर सा

आदमी रहता था


जिसको फख्र था घर पे दावे का,

जो दरख़्त था, सख़्त था,

कैसे हवा में घुल गया, वहां

वो जो आदमी रहता था


औलादों की नजर, मैं बुरा न हो जाऊं,

जिसको फिक्र थी अखलाक की,

शराफत पसंद था, मासूम था

इक आदमी रहता था


शोर से पैदा हुए सन्नाटे में,

आफिस के मुनाफे घाटे में,

फल, सब्जी, तेल, आटे में,

लाड़ दुलार के बीच,

बच्चों के मारे चांटे में,

ढूंढता था अपना भी वजूद,

वो, जो उसी घर में,

एक आदमी रहता था


लोग कहते थे, उसमे कुछ अना थी,

घर से आफिस, घर का आदी था,

जिन्दगी की बुझती लौ,

उसमे शायद अब भी रवां थी,

बोलता था कभी कभी,

शायद उसके के भी मुह में ज़बां थी,

ऐसा कोई उस घर में आदमी रहता था,


सुबह उसके बिस्तर पे सलवटें

अब भी मिलती है

उसी के जैसी इक परछाई का

घर से अब भी, आना जाना है

कैसे ताल्लुक बदल गया, घर से उसका

वो जो वहां आदमी रहता था


कैसे उसका होना, न होना हो गया,

कैसे गोया पूरा शख्स फना हो गया,

वो अपने ही घर में मना हो गया

जहां वो रहता था,

एक आदमी रहता था


कैसे वक्त के साथ वो शफ़ाफ़ हो गया?

जिसने इब्तिदा ए ठिकाना किया

क्या हुआ वहां, धीरे धीरे?

शायद, वहां एक आदमी रहता था? 

Wednesday, June 21, 2023

उस से

फिर भी जुदा हो,

बहुत फर्क है,

तोहमत लगाना कोई तुमसे सीखे

इल्ज़ाम लगाना उस से..!!


दिमाग लगा सको,

तो बताना हमे,

पहले दिल लगाना उस से..!!


उसी ने राख किया है,

कोई कैसे बेहतर जानेगा,

मेरा ठिकाना उस से..!!


वो खुदा बन गया है,

दगा दे दे कर,

छुपना नामुमकिन है,

मत बनाना कोई बहाना उस से..!!


कायनात के,

इस पार भी है उस पार भी,

सीख लेना,

हद के पर जाना उस से..!!


मंदिर मसीती, काबे मक्के,

गिरजे रंगशाला उसकी,

मयखाना उस से..!!


सुना है, मसीहा है,

कभी मिलाना उस से..!!

शतरंज

हमारी ज़ुबानों में ज़माने का,

फर्क था,

बातों को, इशारों में,

समझाया हमने...!


बताओ चालों से,

कैसे बचते?

जब शतरंज पे,

घर बनाया हमने..!


पलट पलट के,

कभी भी उलझ पड़ता है,

और कहता है,

बात को बढ़ाया हमने..!


खुद के जिंदा होने का,

एहसास दिलाया हमने..!

किसी से ख़त भेजा,

उसे बुलाया हमने..!!


फिर सिरहाने,

खड़ा किया,

और खुद को,

दफनाया हमने..!!


सफ्ह में सबसे आगे बढ़,

उसने दाद दी, मदद दी,

अपनी बर्बादी का,

जब जश्न मनाया हमने..!

ज़मी ऐ हिन्द - आजकल

यहां अश्क चाट के,

सब जिंदा हैं इक दूजे के,

वतन हुआ या,

रेतीली फसीलों में,

कैद जैसे शहर कोई..?


मुरझा के गिर पड़े,

शाखों से परिंदे तक,

वो आया तो ऐसे,

जहरीली जैसे लहर कोई..!!


मसीहा मान के उस को,

लोगों ने पलकों पे बिठाया,

वो लगा दामन ए मुल्क पे,

जैसे बुरी नजर कोई..!!


न पांव उठा सकता है न हाथ,

न आवाज़ उठा सकता है,

न सिर कोई..!

लगता नही के अब बचा है,

जिंदा यहां बशर कोई..!!


लहरों के निशान रेत पे,

आवाम के माजी का,

अक्स दिखा रहे हैं,

बहती थी इस जमी पे कभी 

मुहब्बत की नहर कोई..!!


लौट के कभी आयेंगे,

तो हिंद की जमी पे,

तलाशेंगे परिंदे कल के, 

और कहेंगे खुद से कराह कर,

मुल्क ए हिंद में भी था,

जम्हूरियत का शजर कोई..!!

आइना समझ ले मुझे

 भला यह कैसी,

फरियाद करता हूं?

तू सामने होता है,

और तुझे याद करता हूं..!


यह कैसा सितम है

यह कैसे कत्ल किया है तूने?

मुझ में और मिट्टी में फर्क

कैसे खत्म किया है तूने?


समझ नहीं आता

इश्क हूं कि समझौता हूं मैं?

तेरे आगोश में होता हूं,

तो क्यों दर्द में होता हूं मैं?


चल आईना समझ ले,

तोड़ दे मुझे,

बंदिश नहीं हूं,

मजबूरी भी नहीं

छोड़ दे मुझे..!!

ठिकाने लगा है वो

 न जाने कितनी और,

सच्चाइयों से महरूम रहता,

ध्यान न देता के,

नजरें चुराने लगा है वो


बिस्तर पे सुबह,

सलवटें नही मिलती अब

बाहर कहीं तो

रात जाने लगा है वो


वो सुना देता है,

मैं मान जाता हूं

कैसे रोज नए,

बहाने बनाने लगा है वो


मुझसे दगा कर 

दर दर की ठोकरें खा रहा है

अब कहीं जा के

ठिकाने लगा है वो


संवार रहे थे

जो दो जहां उसका 

उन्ही हाथों से,

दामन बचाने लगा है वो


अब मान लूंगा ये बात

हां बदल गया वो

मुझे दर्द में देखा है

मुस्कुराने लगा है वो

इश्क के असर दोगले होते हैं

 पंछियों का मौसम बीत जाता है,

फिर बचा इक बूढ़ा दरख़्त होता है,

उसपे कुछ पुराने घोंसले होते हैं..!


लोग मुरझा जाते हैं,

जां सूख जाती है, मगर,

जिस्म हरा भरा रहता है,

इश्क के असर बड़े दोगले होते हैं..!


वो कहीं नहीं पहुंचते, जो,

पतवारों पे खड़े होते हैं..!!

घड़ी की सुइयों संग चले होते हैं।


खुद की हार में जो,

अपनों की जीत देख लें,

वो लोग बड़े भले होते हैं..!

मगर इश्क के असर दोगले होते हैं..!!


जिंदगी अभी आधी हुई

 रूठ के गया,

तो हर दफा लौट आऊंगा

ये जरूरी नहीं.......


मेरे तुम्हारे बीच

लिबास आ गए हैं

कैसे कहते हो?

कोई दूरी नही ............


मुहब्बत हो तुम मेरी

बर्दाश्त कर लेता हूं

झुका दे मुझे वरना

ऐसी कोई मजबूरी नही.........


तंग आ गया तो,

छोड़ दूंगा तुझे

जिंदगी अभी आधी हुई

जाया पूरी नहीं.........


Saturday, June 8, 2019

फीका विश्व

अर्थ, राज्य, देश परदेश,
राग रंग, प्रेम द्वेष,
ईश्वर की सत्ता,
धर्म की कसौटियां,
दर्शन और माहात्म्य,
सब फीके हैं.....!!

सुबह सुबह बच्चों को,
भूख से बिलखते देखा है...!
 

Wednesday, October 16, 2013

बकरीद मन गयी है....!



छुट्टी थी, देर से उठा, फिर सुबह से लैपटाप पर कोई न कोई फिल्म देखे जा रहा था ! जिस मोहल्ले में रहता हूँ वह मुस्लिम बस्ती नहीं है थोड़ी देर पहले अचानक पता चला कि किराए के कमरों और घरों में कई मुस्लिम परिवार रहते हैं.........!


मुझे कैसे पता चला..........?


पिछले कई महीनो में सिर्फ आज सुबह से ही कुछ बकरों के मिमियाने की करुण आवाज़ सुने दे रही है......आवाज़ कर्कश से ज्यादा करुण है.... जो शायद दोपहर बाद तक खामोश हो जाएगी........आवाज़ भी इतनी करुण कि उसमे में छुपा डर मुझे साफ़ सुनाई दे रहा है.....कौन कहता है की आने से पहले मौत का पता नहीं चलता....आज मुझे पता चला जानवर भी जानते हैं...!

अब हर बाप अपने बेटे को कुर्बानी का मतलब समझाते हुए बेटे और खुद को तैयार करेगा! अक्सर हर्षोल्लास से बेहद खुश बच्चे इस पल का कई महीनो से इंतज़ार कर रहे होते हैं.....जब उनके सामने पहले कुर्बानी होती है...!

सब रस्मो रिवाज पूरे करने के बाद बकरे को लिटा दिया गया है....बच्चा बहुत खुश है...! उसके लिए ये मदारी के किसी करतब से कहीं कम नहीं है....! पिता ने छुरी पर धार पहले ही रख ली थी.....थोडा नापतोल कर बकरे की गर्दन पर रख कर उसने दुआ पढ़ते हुए बकरे के गले पर फेर दी........मुह बंधे बकरे की छटपटाहट और गले से बहते खून को देख कर बच्चा सहम रहा है.......३-४ मिनट तक बकरा छटपटाता है........और बच्चे के भीतर का इंसान भी......जो उस से पूछता है कि अगर कुर्बानी हम दे रहे हैं.....तो दर्द इस बकरे को क्यों सहना पड़ रहा है......?

खैर........सर उतारे जाने के बाद भी बकरे के जिस्म में जुम्बिश है.......जिस को देख कर बच्चे को झुरझुरी छूट रही है.......उसे मटन बेहद पसंद रहा है.....पर आज ही उसे पता चला है कि दूकान से मटन उसकी थाली तक आने में कितनी जुगुप्सा इसमें भरी है...!

पिता बच्चे की ओर देखे बिना बड़ी हुलस के साथ बकरे को एक तसले के ऊपर उल्टा टांग उसकी आंतें और खाल निकाल देता है....इस विजय भाव से जैसे ही वो बच्चे की ओर मुड़ता है उसे बच्चे की आँखों में वो सवाल दिख जाता है....पिता मन ही मन उस उस सवाल के लिए खुद को तैयार कर रहा है!

मटन के टुकड़े किचन में चले गए हैं, बेटा सदमे से पूरी तरह उबर नहीं पाया है.........उधर एक जीव की आत्मा प्रकृति में विलीन हो गयी है जिसे ये भी नहीं पता कि उसकी जान क्यों गयी है...!

बच्चे ने सवाल अपने पिता के सामने रख दिया है.......पिता अपने संवेदनशील बच्चे को संवेदनाघाती एक कहानी सुना रहा है......एक बार अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम का इम्तेहान लेने के लिए उनसे अपनी सबसे प्यारी चीज़ कुर्बान करने को कहा....तब हज़रात इब्राहीम ने अपने सबसे अज़ीज़ बेटे इस्माइल को कुर्बान करने का फैसला किया..जैसे ही वो कुर्बानी देने लगे अल्लाह ने बेटे की जगह एक दुम्बे (भेड़) को रख दिया और खुश हो कर हज़रत को बताया कि ये सिर्फ एक इम्तिहान था....और वो बेटे की जगह दुम्बे की कुर्बानी दे दे...!

बेटे ने पिता से सवाल पूछ लिया.........तो आपको मेरी कुर्बानी देनी चाहिए थी.....? अल्लाह मियां मेरी जगह दुम्बे को रख देते....?
लाजवाब बाप अल्लाह पर लाये आपने ईमान को तोलता रहा.......बेटा सामने बैठा और न जाने क्या क्या बोलता रहा..!

शाम से मोहल्ले में अजीब सा सन्नाटा पसरने वाला है....बकरों के मिमियाने की आवाजें कम होने लगेंगी...बच्चों का उल्लास सवालों में बदलने लगेगा......!

पीछे बचे सन्नाटे में रह जाएगा........नालियों में बहता ताज़ा खून, ताजे कटे मांस की अजीब सी महक जो मिल मिल जायेगी कढाईयों और भौगौने में पक रहे मटन के खुशबूदार मसालों की महक से....!
शाम को ही कुछ लोगों के घरो के बाहर कसाई खड़े हो कर उतरी हुई खालों का मोल भाव कर रहे होंगे...!


आवाजें थमने लगी हैं........मेरी बेचैनी बढ़ने लगी है.....आज शाम मुझसे खाना नहीं खाया जायेगा....!
रात भर दिमाग में हथौड़े बजते रहेंगे.....और मैं सोचता रहूँगा.......संस्कृति और धर्म इतने स्वार्थी क्यों होते हैं....?


बकरा ईद मन गई है....मेरे जेहन में कई सवाल रह गए हैं....!

क्या बाप को अल्लाह पर अपने ईमान की असल तोल मिल गयी है...?
क्या बेटे को उसके सवालों के जवाब मिल गए हैं........?
क्या बच्चे के भीतर के इंसान को एक रिवाज़ और उसके बाप ने मिल कर थोडा सा मार दिया है....?

कहीं ऐसा तो नहीं कि दाढ़ को लगे मटन के स्वाद ने इस रिवाज़ को पक्का करने में अहम् भूमिका निभाई है...?