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Wednesday, June 21, 2023

ज़मी ऐ हिन्द - आजकल

यहां अश्क चाट के,

सब जिंदा हैं इक दूजे के,

वतन हुआ या,

रेतीली फसीलों में,

कैद जैसे शहर कोई..?


मुरझा के गिर पड़े,

शाखों से परिंदे तक,

वो आया तो ऐसे,

जहरीली जैसे लहर कोई..!!


मसीहा मान के उस को,

लोगों ने पलकों पे बिठाया,

वो लगा दामन ए मुल्क पे,

जैसे बुरी नजर कोई..!!


न पांव उठा सकता है न हाथ,

न आवाज़ उठा सकता है,

न सिर कोई..!

लगता नही के अब बचा है,

जिंदा यहां बशर कोई..!!


लहरों के निशान रेत पे,

आवाम के माजी का,

अक्स दिखा रहे हैं,

बहती थी इस जमी पे कभी 

मुहब्बत की नहर कोई..!!


लौट के कभी आयेंगे,

तो हिंद की जमी पे,

तलाशेंगे परिंदे कल के, 

और कहेंगे खुद से कराह कर,

मुल्क ए हिंद में भी था,

जम्हूरियत का शजर कोई..!!

Saturday, June 8, 2019

फीका विश्व

अर्थ, राज्य, देश परदेश,
राग रंग, प्रेम द्वेष,
ईश्वर की सत्ता,
धर्म की कसौटियां,
दर्शन और माहात्म्य,
सब फीके हैं.....!!

सुबह सुबह बच्चों को,
भूख से बिलखते देखा है...!
 

Friday, August 23, 2013

सरहद से....!

चूड़ियो के टूटने की,
कुछ शोर की,
रोने कराहने की,
आवाजें आई हैं...!

शायद फौजी के घर
चिट्ठी आई है..!

दो दिनों से मरघट की,
उदासी है गली में...!

उधर भी जरूर गई होगी..!
सरहद से फिर इस बार,
कई घरों में मिटटी आई है....!

इक जोड़ी बुज़ुर्ग आँखों में,
बस सवाल हैं...!

क्या हर सुख का,
हक बस तुम्हारा,
जान देने की कसम
सिर्फ मेरे कुनबे ने उठाई है...?

सरहद से....!
कई घरों में मिटटी आई है।