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Wednesday, June 21, 2023

ज़मी ऐ हिन्द - आजकल

यहां अश्क चाट के,

सब जिंदा हैं इक दूजे के,

वतन हुआ या,

रेतीली फसीलों में,

कैद जैसे शहर कोई..?


मुरझा के गिर पड़े,

शाखों से परिंदे तक,

वो आया तो ऐसे,

जहरीली जैसे लहर कोई..!!


मसीहा मान के उस को,

लोगों ने पलकों पे बिठाया,

वो लगा दामन ए मुल्क पे,

जैसे बुरी नजर कोई..!!


न पांव उठा सकता है न हाथ,

न आवाज़ उठा सकता है,

न सिर कोई..!

लगता नही के अब बचा है,

जिंदा यहां बशर कोई..!!


लहरों के निशान रेत पे,

आवाम के माजी का,

अक्स दिखा रहे हैं,

बहती थी इस जमी पे कभी 

मुहब्बत की नहर कोई..!!


लौट के कभी आयेंगे,

तो हिंद की जमी पे,

तलाशेंगे परिंदे कल के, 

और कहेंगे खुद से कराह कर,

मुल्क ए हिंद में भी था,

जम्हूरियत का शजर कोई..!!

ठिकाने लगा है वो

 न जाने कितनी और,

सच्चाइयों से महरूम रहता,

ध्यान न देता के,

नजरें चुराने लगा है वो


बिस्तर पे सुबह,

सलवटें नही मिलती अब

बाहर कहीं तो

रात जाने लगा है वो


वो सुना देता है,

मैं मान जाता हूं

कैसे रोज नए,

बहाने बनाने लगा है वो


मुझसे दगा कर 

दर दर की ठोकरें खा रहा है

अब कहीं जा के

ठिकाने लगा है वो


संवार रहे थे

जो दो जहां उसका 

उन्ही हाथों से,

दामन बचाने लगा है वो


अब मान लूंगा ये बात

हां बदल गया वो

मुझे दर्द में देखा है

मुस्कुराने लगा है वो

दोस्त?

 वहीं घाव लिखते हो?

वहीं खंजर लिखते हो?

वहीं इक हाथ लिखते हो दोस्त?

कैसे इतने कातिल?

अल्फाज लिखते हो दोस्त?


वफा के तगादों से,

तुमने ही जान ली,

तुम ही हमे

दगाबाज लिखते हो दोस्त?


स्याही से लहू की,

महक आती है

कैसे जुल्म का नगमा लिखते हो?

कैसे सितम का साज लिखते हो दोस्त?

जिंदगी अभी आधी हुई

 रूठ के गया,

तो हर दफा लौट आऊंगा

ये जरूरी नहीं.......


मेरे तुम्हारे बीच

लिबास आ गए हैं

कैसे कहते हो?

कोई दूरी नही ............


मुहब्बत हो तुम मेरी

बर्दाश्त कर लेता हूं

झुका दे मुझे वरना

ऐसी कोई मजबूरी नही.........


तंग आ गया तो,

छोड़ दूंगा तुझे

जिंदगी अभी आधी हुई

जाया पूरी नहीं.........


Thursday, May 16, 2013

जिंदगी.....!

रौशनी लबरेज़ कुछ,
कुछ परछाइयों के दिन...!

सुलगती शामे,
धुंधलके सवेरे कुछ,
सतरंगी मिलन की दोपहर कोई,
कुछ तन्हाइयों के दिन.....!

मुहब्बतों के झीने परदे कुछ,
कभी इश्क तार तार,
वफाओं की खुशबुएं कभी,
कभी रुसवाईयों के दिन...!

रौशनी लबरेज़ कुछ,
कुछ परछाइयों के दिन...!

मेरा तुझसे लिपटना कभी,
कभी खफ़ा खफ़ा होना,
उदासियों के दिन,
कुछ अंगड़ाईयों के दिन.....!

कुछ तेरे दामन के लम्हे,
कुछ मेरे वजूद के पल छिन....!

अब समझ रहा हूँ,
जिंदगी क्या थी...!

बस "तेरे" कुछ दिन
और "मेरे" कुछ दिन....!