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Thursday, January 8, 2026

मैं चाँद लिखूँ

मैं चाँद लिखूँ 

तुम आसमान लिखो


मैं ख़ुद को तुम लिख दूँ 

तुम मुझे

इक अनजान लिखो


मैं तुमको चाँद लिखूँ

इक आसमानी एहसान लिखूँ 


तुम मेरे जिस्म पे,

नक़्श बनाओ कुछ,


मैं तुम्हारी रूह पे,

अपना निशान लिखूँ 


आओ हर लम्हे को,

नबी बना दूँ,

हर रात को,

क़ुरान लिखूँ...


तुम ज़िन्दगी की 

सुनहरी आयतें लिखो,

मैं साँसो का,

गुलाबी फ़रमान लिखूँ,


दीवारों को,

ख़ुशी लिख डालें,

मस्ती में घर को,

जन्नत लिख दें,


तुम दरवाज़ों को

चंदन लिख दो, 

मैं खिड़कियों को 

गुलदान लिखूँ....


सब पत्थरों को,

घोल कर,

पानी कर दें.....

सब दर्दों को मिल के,

पी जायें...


बाहों में समेटे तुंम्हे,

इस रात को रमज़ान लिखूँ...


तुम ज़िन्दगी की आयतें लिखो,

मैं साँसो का फ़रमान लिखूँ,


बाहों में समेटे तुंम्हे,

इस रात को रमज़ान लिखूँ...


मैं तुमको चाँद लिखूँ

इक आसमानी एहसान लिखूँ

Thursday, December 18, 2025

नया चलन

इस कदर अपना नहीं रहा मैं,

कोई मेरा नाम पूछे

तेरा नाम बता देता हूं मैं


चल एक नया चलन चला देता हूं मैं

कुछ जलने पे तू हंस पड़ता है,

तो ये घर खुद जला देता हूं मैं,


जैसे कांच हो गया हूं अब

तुझे हर राज़ बता देता हूं मैं


मेरे कल का भरोसा नहीं रहा

तुझे आज बता देता हूं मैं


इंतजार से इस कदर मँझ गया

कौन जानिबे दर है मेरे

और किसके कदमों की है

आहट दूर से बता देता हूं मैं


इश्क ने इस कदर घोल दिया

मुझे फिजाओं में, कोई पूछे

हर बुत को शीरी, खुद को

फरहाद बता देता हूं मैं


जिनको तेरा आरज़ू ए दीदार

मुतमईन कर देता हूं

उनको अपने दिल के

ज़ख्म दिखा देता हूं मैं


लिल्लाह..|

ये क्या अजीब कैफियत है?

मक्के की राह

पूछने वालों को भी

तेरे घर की राह बता देता हूं मैं..|

तुम क्यों आई हो...?

उपेक्षा की सूखी लकड़ियों पर
सब भावनाओं को
तिरोहित कर दिया था मैंने
आह, कि सब आर्द्र हो गया

ज्वार जो काट देता था
मेरे अस्तित्व के बांधों को
और जो लुप्त हो गया था
अंतहीन समय में कहीं
लौट आया है...

सूर्योदय
जो कभी प्रणय से
द्वंद तक रूपांतरित
हो चुका था
फिर क्यों होने लगा है?

और जिन कपाटों पर
मैंने धूल जम जाने दी,
उनके खुलने की
आहट डरावनी है

हृदय और उदर के मध्य
फिर से पीड़ा हो रही है कहीं
और इस बार इसमें
असहजता भी है

निस्संदेह तुम
जीवन की बयार हो
मेरे होने और न होने
के आर पार हो

मुझे डर लग रहा है,
उलझन है, उल्लास है,
उत्साह है, अपेक्षा है,
और फिर से डर है।


तुम क्यों आई हो?

Wednesday, June 21, 2023

उस से

फिर भी जुदा हो,

बहुत फर्क है,

तोहमत लगाना कोई तुमसे सीखे

इल्ज़ाम लगाना उस से..!!


दिमाग लगा सको,

तो बताना हमे,

पहले दिल लगाना उस से..!!


उसी ने राख किया है,

कोई कैसे बेहतर जानेगा,

मेरा ठिकाना उस से..!!


वो खुदा बन गया है,

दगा दे दे कर,

छुपना नामुमकिन है,

मत बनाना कोई बहाना उस से..!!


कायनात के,

इस पार भी है उस पार भी,

सीख लेना,

हद के पर जाना उस से..!!


मंदिर मसीती, काबे मक्के,

गिरजे रंगशाला उसकी,

मयखाना उस से..!!


सुना है, मसीहा है,

कभी मिलाना उस से..!!

शतरंज

हमारी ज़ुबानों में ज़माने का,

फर्क था,

बातों को, इशारों में,

समझाया हमने...!


बताओ चालों से,

कैसे बचते?

जब शतरंज पे,

घर बनाया हमने..!


पलट पलट के,

कभी भी उलझ पड़ता है,

और कहता है,

बात को बढ़ाया हमने..!


खुद के जिंदा होने का,

एहसास दिलाया हमने..!

किसी से ख़त भेजा,

उसे बुलाया हमने..!!


फिर सिरहाने,

खड़ा किया,

और खुद को,

दफनाया हमने..!!


सफ्ह में सबसे आगे बढ़,

उसने दाद दी, मदद दी,

अपनी बर्बादी का,

जब जश्न मनाया हमने..!

आइना समझ ले मुझे

 भला यह कैसी,

फरियाद करता हूं?

तू सामने होता है,

और तुझे याद करता हूं..!


यह कैसा सितम है

यह कैसे कत्ल किया है तूने?

मुझ में और मिट्टी में फर्क

कैसे खत्म किया है तूने?


समझ नहीं आता

इश्क हूं कि समझौता हूं मैं?

तेरे आगोश में होता हूं,

तो क्यों दर्द में होता हूं मैं?


चल आईना समझ ले,

तोड़ दे मुझे,

बंदिश नहीं हूं,

मजबूरी भी नहीं

छोड़ दे मुझे..!!

ठिकाने लगा है वो

 न जाने कितनी और,

सच्चाइयों से महरूम रहता,

ध्यान न देता के,

नजरें चुराने लगा है वो


बिस्तर पे सुबह,

सलवटें नही मिलती अब

बाहर कहीं तो

रात जाने लगा है वो


वो सुना देता है,

मैं मान जाता हूं

कैसे रोज नए,

बहाने बनाने लगा है वो


मुझसे दगा कर 

दर दर की ठोकरें खा रहा है

अब कहीं जा के

ठिकाने लगा है वो


संवार रहे थे

जो दो जहां उसका 

उन्ही हाथों से,

दामन बचाने लगा है वो


अब मान लूंगा ये बात

हां बदल गया वो

मुझे दर्द में देखा है

मुस्कुराने लगा है वो

रिश्ता

 उस से,

राब्ता हो गया,

फिर पहली दफा रात को,

मैं अपने घर जा के सो गया..!!


तेरा नाखून टूटा था,

शहर में चर्चा था,

के मुझे कुछ हो गया..!!


मंदिर, मस्जिद, शिवालों से,

हार कर आया,

मेरी गोद में,

वो अपना दर्द रो गया..!!


इक ख़ज़ाने का आज पता मिला मुझे,

मेरी सांसों के मोतियों में..!

अपनी सांसों का धागा पिरो गया.!


पहले जैसा,

कोई भी नही लौटा,

उसकी गली में जो गया..!!

इश्क के असर दोगले होते हैं

 पंछियों का मौसम बीत जाता है,

फिर बचा इक बूढ़ा दरख़्त होता है,

उसपे कुछ पुराने घोंसले होते हैं..!


लोग मुरझा जाते हैं,

जां सूख जाती है, मगर,

जिस्म हरा भरा रहता है,

इश्क के असर बड़े दोगले होते हैं..!


वो कहीं नहीं पहुंचते, जो,

पतवारों पे खड़े होते हैं..!!

घड़ी की सुइयों संग चले होते हैं।


खुद की हार में जो,

अपनों की जीत देख लें,

वो लोग बड़े भले होते हैं..!

मगर इश्क के असर दोगले होते हैं..!!