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Thursday, January 8, 2026

मैं चाँद लिखूँ

मैं चाँद लिखूँ 

तुम आसमान लिखो


मैं ख़ुद को तुम लिख दूँ 

तुम मुझे

इक अनजान लिखो


मैं तुमको चाँद लिखूँ

इक आसमानी एहसान लिखूँ 


तुम मेरे जिस्म पे,

नक़्श बनाओ कुछ,


मैं तुम्हारी रूह पे,

अपना निशान लिखूँ 


आओ हर लम्हे को,

नबी बना दूँ,

हर रात को,

क़ुरान लिखूँ...


तुम ज़िन्दगी की 

सुनहरी आयतें लिखो,

मैं साँसो का,

गुलाबी फ़रमान लिखूँ,


दीवारों को,

ख़ुशी लिख डालें,

मस्ती में घर को,

जन्नत लिख दें,


तुम दरवाज़ों को

चंदन लिख दो, 

मैं खिड़कियों को 

गुलदान लिखूँ....


सब पत्थरों को,

घोल कर,

पानी कर दें.....

सब दर्दों को मिल के,

पी जायें...


बाहों में समेटे तुंम्हे,

इस रात को रमज़ान लिखूँ...


तुम ज़िन्दगी की आयतें लिखो,

मैं साँसो का फ़रमान लिखूँ,


बाहों में समेटे तुंम्हे,

इस रात को रमज़ान लिखूँ...


मैं तुमको चाँद लिखूँ

इक आसमानी एहसान लिखूँ

Wednesday, June 21, 2023

मैं

ये जान कर हर शाम,

और गुनाह करता है वो,

के सुबह सुबह,

माफ कर दूंगा मैं..!


जिस बिस्तर पे,

कत्ल हुआ रात मेरा,

अपने ही हाथों,

साफ़ कर दूंगा मैं..!!


हमारी भी कहानी में,

नया कुछ नही,

उसके हाथ में,

हर रात खंजर होता है,

और साथ में मैं..!!


कहानी खत्म और हाथ,

मेरे कुछ आया ही नहीं,

उसके हाथ सब आया,

और साथ में मैं।

उस से

फिर भी जुदा हो,

बहुत फर्क है,

तोहमत लगाना कोई तुमसे सीखे

इल्ज़ाम लगाना उस से..!!


दिमाग लगा सको,

तो बताना हमे,

पहले दिल लगाना उस से..!!


उसी ने राख किया है,

कोई कैसे बेहतर जानेगा,

मेरा ठिकाना उस से..!!


वो खुदा बन गया है,

दगा दे दे कर,

छुपना नामुमकिन है,

मत बनाना कोई बहाना उस से..!!


कायनात के,

इस पार भी है उस पार भी,

सीख लेना,

हद के पर जाना उस से..!!


मंदिर मसीती, काबे मक्के,

गिरजे रंगशाला उसकी,

मयखाना उस से..!!


सुना है, मसीहा है,

कभी मिलाना उस से..!!

शतरंज

हमारी ज़ुबानों में ज़माने का,

फर्क था,

बातों को, इशारों में,

समझाया हमने...!


बताओ चालों से,

कैसे बचते?

जब शतरंज पे,

घर बनाया हमने..!


पलट पलट के,

कभी भी उलझ पड़ता है,

और कहता है,

बात को बढ़ाया हमने..!


खुद के जिंदा होने का,

एहसास दिलाया हमने..!

किसी से ख़त भेजा,

उसे बुलाया हमने..!!


फिर सिरहाने,

खड़ा किया,

और खुद को,

दफनाया हमने..!!


सफ्ह में सबसे आगे बढ़,

उसने दाद दी, मदद दी,

अपनी बर्बादी का,

जब जश्न मनाया हमने..!

ठिकाने लगा है वो

 न जाने कितनी और,

सच्चाइयों से महरूम रहता,

ध्यान न देता के,

नजरें चुराने लगा है वो


बिस्तर पे सुबह,

सलवटें नही मिलती अब

बाहर कहीं तो

रात जाने लगा है वो


वो सुना देता है,

मैं मान जाता हूं

कैसे रोज नए,

बहाने बनाने लगा है वो


मुझसे दगा कर 

दर दर की ठोकरें खा रहा है

अब कहीं जा के

ठिकाने लगा है वो


संवार रहे थे

जो दो जहां उसका 

उन्ही हाथों से,

दामन बचाने लगा है वो


अब मान लूंगा ये बात

हां बदल गया वो

मुझे दर्द में देखा है

मुस्कुराने लगा है वो

रिश्ता

 उस से,

राब्ता हो गया,

फिर पहली दफा रात को,

मैं अपने घर जा के सो गया..!!


तेरा नाखून टूटा था,

शहर में चर्चा था,

के मुझे कुछ हो गया..!!


मंदिर, मस्जिद, शिवालों से,

हार कर आया,

मेरी गोद में,

वो अपना दर्द रो गया..!!


इक ख़ज़ाने का आज पता मिला मुझे,

मेरी सांसों के मोतियों में..!

अपनी सांसों का धागा पिरो गया.!


पहले जैसा,

कोई भी नही लौटा,

उसकी गली में जो गया..!!

इश्क के असर दोगले होते हैं

 पंछियों का मौसम बीत जाता है,

फिर बचा इक बूढ़ा दरख़्त होता है,

उसपे कुछ पुराने घोंसले होते हैं..!


लोग मुरझा जाते हैं,

जां सूख जाती है, मगर,

जिस्म हरा भरा रहता है,

इश्क के असर बड़े दोगले होते हैं..!


वो कहीं नहीं पहुंचते, जो,

पतवारों पे खड़े होते हैं..!!

घड़ी की सुइयों संग चले होते हैं।


खुद की हार में जो,

अपनों की जीत देख लें,

वो लोग बड़े भले होते हैं..!

मगर इश्क के असर दोगले होते हैं..!!


गया कम था लौटा बहुत है

 जाने किस के आगोश से

निकल के आता है

लेकिन मेरे गले लग के

रोता बहुत है..!!


कुछ खास ख्वाब देखता है

वो आजकल

सुना है सोता बहुत है


में तुम्हे भी समझाऊं

ये अब मुमकिन नहीं

मेरे दिल से ही मेरा

समझौता बहुत है


मेरे हाथ में

उसकी हथेली जरा सी थी

वो गया कम था 

लौटा बहुत है


तुम्हारी सब खयानतों को

माफ कर दिया मैंने

मेरा दिल छोटा बहुत है


मेरी असली शक्ल देखने की

तुम्हारी ये ज़िद बेमानी है

मुखौटा देख लो, बहुत है


दोस्त?

 वहीं घाव लिखते हो?

वहीं खंजर लिखते हो?

वहीं इक हाथ लिखते हो दोस्त?

कैसे इतने कातिल?

अल्फाज लिखते हो दोस्त?


वफा के तगादों से,

तुमने ही जान ली,

तुम ही हमे

दगाबाज लिखते हो दोस्त?


स्याही से लहू की,

महक आती है

कैसे जुल्म का नगमा लिखते हो?

कैसे सितम का साज लिखते हो दोस्त?