Thursday, May 1, 2025
मैं वक्त हूं..!
Monday, April 28, 2025
परिधि
अनंत और शून्यता
मिश्रित कर दी हम ने..!
कि अपर्मिति की सीमा,
तय की हमारी मूर्खता ने..!!
मानवता गौण हो गयी..!
ससंचित होने लगे
और प्रेम व्यापार हो गया..!
तो तुम्हारी आद्रता कैसे,
संरक्षित हो सकी?
विस्मयकारी हल दिया है?
बढ़ गया अकस्मात्,
भाग्य का?
आवृत्तियों में,
पुनर्गठित किया विधि ने?
"परिधि" संसार हो गया..!
Sunday, March 7, 2021
शिकस्त
मुझे अंजाम मे,
“हमारी” शिकस्त दिख रही है,
तो ज़रा बता हमारा....
आगाज़ क्या है..........?
खिलखिलाहट में,
अब भी वो मोती हैं,
पर नज़रें चुराने का अंदाज़
जुदा है,
सब न बता, पर इतना तो बता,
आखिर ये अंदाज़ क्या
है......?
हमराज़ मान के तुझको,
बाँट ली जिन्दगी अपनी,
बस इतना बता.......
तेरे सीने दबा वो एक,
राज़ क्या है.........?
मेरा दर्द न पंहुचा,
मेरी आह न पहुंची तुझ तक,
तो वो चीख ही क्या,
वो आवाज़ क्या है.........?
जो है ये सब तो देख,
मैं अपनी शामों को,
पैमानों में घोल के पी रहा
हूँ...!
मोहब्ब्बत में तो,
सब ही होते हैं बर्बाद,
क्या फ़कीर और,
फिर सरताज क्या
है.........?
Saturday, June 8, 2019
फीका विश्व
Sunday, October 13, 2013
दिल्ली भी निष्ठुर है...!
दिल्ली में खुली छत,
और कनोपियों की मुंडेरे,
बड़ी महंगी हैं।
एक किराए की मुंडेर से,
एक घर बनते देख रहा हूँ,
कुछ रोज़ से....।
और तभी से कविता,
उलझी पड़ी है,
उलझी सोच से.....!
क्या ये कारीगर,
ईंट पत्थर, सीमेंट के सिवा,
प्यार भी मिला जाते है,
सीली और गीली दीवारों में....?
जो बरसों रिस रिस कर,
कुनबों के रिश्तों को,
चिपकाए रखता है....?
कहीं ये मजदूर ही तो नहीं,
जो चुन देते हैं,
अपनी मेहनत,
यमुना की रेत के प्लास्टर में...?
जो मेरे जैसा कामगार,
हर शाम टूटी हिम्मत ले कर,
ऐसे ही किराए के घर में,
मरम्मत करता है....।
अगली सुबह,
बलि भेंट की खातिर
अपने इरादों की....!
कहीं ये कन्नी वसूली,
की हलकी चोट,
वजह बनती हो.....?
बच्चे, जो अनोखे ख्वाब,
देखते हैं....इन माचिस के,
डिब्बी जैसे कमरों में...?
उत्सुकता मुझे,
कारीगर के पीछे पीछे,
उसके आशियाने तक,
खींच ले गयी आज.....!
रईसों के आशियाने,
रचने वाला,
रूखा सूखा खा,
तिरपाल के नीचे,
सोने की तैयारी कर रहा था...!
लौट रहा हूँ.....!
आज शाम फिर,
सीली हैं आँखें..!
दिल्ली भी निष्ठुर है....।
Sunday, August 18, 2013
हिजाब तले चीखें..!
तुमने लगायी थी आग,
तुमको ही बुझानी होगी
किसी की लगाई....!
अब कोई और नही बुझाता...!
बड़ी बेसब्र है,
पल पल में आती जाती है,
कमबख्त साँस को,
कुछ और नहीं आता....?
तुम जो थे,
न जाने क्या बेचैनी थी,
बड़ा सुकून आता था
अब और नही आता...!
दीवारे टटोल के आज भी,
पहुचा हूँ जानिब-ए क़िबला,
रास्ता अभी भी,
कोई और नही बताता...!
सबके ज़ख्मो पे,
तेरी नेमत का,
मरहम भी क्या मुकम्मल था....!
खुद का हमदर्द,
जब से बन पड़े हैं सब
किसी की चोट तेरे यहाँ अब,
कोई और नही सहलाता...!
इतनी नफरत-ओ-रंजिश,
देख कर भी,
न धड़का दिल इक बार....!
अपने गुनाहों में,
मुब्तिला शख्स को,
खौफ-ए-खुदा,
अब और नही डराता....!
सीना ठोक खुद को,
कहने वालो फ़रिश्ता....!
मैंने देखी है हकीकत,
तुम्हारी ड्योढ़ीयों के पार.....!
चाहो तो कह लो बुज़दिल,
जब से,
पाक वतन में सुनी हैं,
हिजाब तले चीखें.....!
अंतस अब उस ओर,
और नहीं जाता...!
मूर्खता के चिरायु पर्याय...!
लो बुझा दो साँसों का दीपक,
यदि तुम्हे प्रकाश मिले.....!
मैं आखिर करूँगा भी क्या,
नश्वरता का पर्याय बनना ही,
अंततः मेरा भाग्य....!
तो निस्संदेह, निरंकुश हो,
अपनी महत्त्वाकांक्षाओं में,
मुझे आहूत करो....!
यदि हो सके तो मेरे प्राण ले,
अपनी ईर्ष्या के कुटज को,
सिंचित प्रफ्फुल्लित करो...!
अकारण ही मैं भयग्रस्त रहा,
अब तो स्वयं समर्पित हूँ.....।
अनाधिकार पर लोभ,
और समय व्यर्थ करना,
अब और क्यों हो....?
क्यों न तुम्हे भी ज्ञात हो..?
कि मेरा वर्तमान,
तुम्हारा भी भविष्य है.....!
यदि तुम्हारी मूर्खता,
मेरे धैर्य से अधिक,
प्राणवती हुई....!
तो निस्संदेह शूरवीर बन,
आत्मसंतोष का गान करोगे...!
अन्यथा सत्य से परिचय,
हुआ ही समझो...!
ग्लानि बस इतनी ही है,
की तुम मानव हो,
और....!
मूर्खता के चिरायु पर्याय।
Thursday, May 16, 2013
जिंदगी.....!
रौशनी लबरेज़ कुछ,
कुछ परछाइयों के दिन...!
सुलगती शामे,
धुंधलके सवेरे कुछ,
सतरंगी मिलन की दोपहर कोई,
कुछ तन्हाइयों के दिन.....!
मुहब्बतों के झीने परदे कुछ,
कभी इश्क तार तार,
वफाओं की खुशबुएं कभी,
कभी रुसवाईयों के दिन...!
रौशनी लबरेज़ कुछ,
कुछ परछाइयों के दिन...!
मेरा तुझसे लिपटना कभी,
कभी खफ़ा खफ़ा होना,
उदासियों के दिन,
कुछ अंगड़ाईयों के दिन.....!
कुछ तेरे दामन के लम्हे,
कुछ मेरे वजूद के पल छिन....!
अब समझ रहा हूँ,
जिंदगी क्या थी...!
बस "तेरे" कुछ दिन
और "मेरे" कुछ दिन....!


