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Sunday, October 13, 2013

दिल्ली भी निष्ठुर है...!


दिल्ली में खुली छत,
और कनोपियों की मुंडेरे,
बड़ी महंगी हैं।

एक किराए की मुंडेर से,
एक घर बनते देख रहा हूँ,
कुछ रोज़ से....।

और तभी से कविता,
उलझी पड़ी है,
उलझी सोच से.....!

क्या ये कारीगर,
ईंट पत्थर, सीमेंट के सिवा,
प्यार भी मिला जाते है,
सीली और गीली दीवारों में....?

जो बरसों रिस रिस कर,
कुनबों के रिश्तों को,
चिपकाए रखता है....?

कहीं ये मजदूर ही तो नहीं,
जो चुन देते हैं,
अपनी मेहनत,
यमुना की रेत के प्लास्टर में...?

जो मेरे जैसा कामगार,
हर शाम टूटी हिम्मत ले कर,
ऐसे ही किराए के घर में,
मरम्मत करता है....।

अगली सुबह,
बलि भेंट की खातिर
अपने इरादों की....!

कहीं ये कन्नी वसूली,
की हलकी चोट,
वजह बनती हो.....?

बच्चे, जो अनोखे ख्वाब,
देखते हैं....इन माचिस के,
डिब्बी जैसे कमरों में...?

उत्सुकता मुझे,
कारीगर के पीछे पीछे,
उसके आशियाने तक,
खींच ले गयी आज.....!

रईसों के आशियाने,
रचने वाला,
रूखा सूखा खा,
तिरपाल के नीचे,
सोने की तैयारी कर रहा था...!

लौट रहा हूँ.....!
आज शाम फिर,
सीली हैं आँखें..!

दिल्ली भी निष्ठुर है....।

Sunday, August 18, 2013

हिजाब तले चीखें..!


तुमने लगायी थी आग,
तुमको ही बुझानी होगी
किसी की लगाई....!
अब कोई और नही बुझाता...!

बड़ी बेसब्र है,
पल पल में आती जाती है,
कमबख्त साँस को,
कुछ और नहीं आता....?

तुम जो थे,
न जाने क्या बेचैनी थी,
बड़ा सुकून आता था
अब और नही आता...!

दीवारे टटोल के आज भी,
पहुचा हूँ जानिब-ए क़िबला,
रास्ता अभी भी,
कोई और नही बताता...!

सबके ज़ख्मो पे,
तेरी नेमत का,
मरहम भी क्या मुकम्मल था....!

खुद का हमदर्द,
जब से बन पड़े हैं सब
किसी की चोट तेरे यहाँ अब,
कोई और नही सहलाता...!

इतनी नफरत-ओ-रंजिश,
देख कर भी,
न धड़का दिल इक बार....!

अपने गुनाहों में,
मुब्तिला शख्स को,
खौफ-ए-खुदा,
अब और नही डराता....!

सीना ठोक खुद को,
कहने वालो फ़रिश्ता....!
मैंने देखी है हकीकत,
तुम्हारी ड्योढ़ीयों के पार.....!

चाहो तो कह लो बुज़दिल,
जब से,
पाक वतन में सुनी हैं,
हिजाब तले चीखें.....!

अंतस अब उस ओर,
और नहीं जाता...!

Friday, March 29, 2013

मियाद...।

एक मुद्दत से परछाई,
पीछे पीछे चली आती है,
और तुम...?

बरसों से,
मेरे इंतज़ार की,
वजह बन कर.....!

मेरी नज़रों की मियाद से,
कोसों परे हो...

बेशक मुझे दिलासे,
दे गए हो,
पर इनकी भी तो मियाद है...!

अब मुकरने लगे हैं....

तुम्हारी दुहाई दे कर,
तुम जैसे ही,
अंधेरों में, फ़ना होने लगे हैं...

हाँ उन्ही अंधेरों से,
अबअजनबी सा दर्द,
नमूदार होता है....!

कभी मैं इसके पार होता हूँ,
कभी ये मेरे पार होता है.....।

इन परछाइयों, फुरकत,
और अंधेरों के दरम्यान,
कभी बेबसी की टीस है,
कभी सुर्खरू दर्द,
गुलज़ार होता है....!

दुआओं में तो,
आखिरी अंजाम माँगा है इसका,
हर सुबह,हर शाम,
हर दफा,
न जाने क्यों हर बार होता है...?

यूं तो तुमसे भी परे,
और जहाँ भर से,
पर कोई तो समझ लेगा,
बाज़ दफा, झूठा एतबार होता है...!

कमबख्त क्या ये है...?
अंजाम-ऐ-इश्क...?

दीवाना ही,
हर बार, गुनाहगार होता है......?