तो शिफा भी देता है,
मेरा यार दगा देता है,
फिर बता भी देता है....!
कमबख्त हर रात पिछली रात के जैसी,
हालत-ए-चश्म बरसात के जैसी....।
अपनों ने ही निभाई दुश्मनी
गैरों को क्या फ़िक्र
भला हम खुशगवार रहे
कि रहे ग़मज़दा...!
टकरा के गर
लौट आती फलक से
तो भी सुकून होता...
अफ़सोस तो ये है कि
गले में घुट कर रह गयीं
दुआए मेरी....।
न जाने क्यों,
इतना बेतकल्लुफ़ वो,
हँसता है मेरे दर्द पे
ऐसा भी क्या
उसकी ख़ुशी का
सबब आहें मेरी
कदाचित सम्मान का प्रयोजन है,
याचना नहीं,
विपत्तियां हैं स्वीकार्य,
प्रताड़ना नहीं.....।
पेटी में बंदी,
हीरे और मोती के,
निरर्थक अस्तित्तव का,
बोध है....।
आह, दुर्भाग्य,
प्रेम और स्नेह को,
दुर्बलता माना गया...।
शक्ति पर्याय,
बल स्तम्भ को,
किंचित अवसर न मिला....!
ऊर्जा के विछोभ,
तांडव को उसने,
मोड़ दिया,
स्नेहासिक्त.....।
ह्रदय की अंतरिम,
विमाओं में,
वह शक्ति का पर्याय हो कर भी,
बहे गंगा और सरस्वती बन कर....।
सिंचित है जिसकी श्वास से,
भू, जल और वायु...!
जिसके लिए,
विलास त्यक्त,
आनंद परित्यक्त,
ममता के समक्ष....!
अस्तित्व का मूल,
शक्ति के पर्याय को,
बोध है......।
स्व:प्रकृति का.....!
कदाचित संतुलन का,
कारण तुम ही हो,
धन्य हो.....!
मैं हूँ या,
दंभ ही दंभ है...?
या सब कुछ है,
एक स्वतंत्र अस्तित्व के सिवा?
ईर्ष्या ही ईर्ष्या है,
और बस यही है,
अकाल मृत्यु....?
संतोष है,
धन ही धन है...?
निरर्थक विचार हैं?
या बलिवेदी पर समय...?
विचित्र है, विचित्र है,
असमंजित भी,
सूत्रहीन भी....!
प्रथम विचार परस्पर,
मेरा है की तुम्हारा?
और देखो अंतरिम भाग,
स्वच्छ निर्मल,
अकलुषित, परिमार्जित..!
शून्य में विलीन होना क्या है?
समझ गया हूँ...!
प्रेम है.....और बस प्रेम है...!
जीवन को इतना ही समझा हूँ,
कि तुम हो, तुम हो और तुम हो...!
न तुम जन्मते,
न मुद्रा ही हुई होती,
खड़ग से भी,
महत्त्वपूर्ण....।
अपनी गुप्त वीथिकाओं में,
न रचे होते ,
तुमने ये विचार,
तो भोजन सुलभ होता..।
न श्रीमूल्य की महत्ता,
न सुवर्ण भारी होता,
मानव जीवन पर...!
शास्त्र-वेद ही होते,
कदाचित प्राथमिकता....।
किन्तु श्रीशास्त्र में,
इतना भार कहाँ से लाये....।
मानो अथवा नहीं,
विश्वयुद्ध के,
प्रणेता तुम ही थे...।
अप्रत्यक्ष ही सही...!
सहस्राब्दी परांत,
यह दोष.....?
पूर्ण नही,
अंशदोष तो है ही...।
क्या तुमने कभी,
कल्पना भी की थी...?
तुम्हारा विचार,
बनेगा, मानव अस्तित्व का,
गूढ़तम आधार....।
आह....!
तुम्हारी कल्पना,
पूर्ण हुई होती...!
तुमने स्वहस्त,
अपनी रचा,
अग्नि को आहूत की होती।
परन्तु तुम चाणक्य थे....?