Saturday, October 31, 2020
आइना
Thursday, October 29, 2020
लोकतंत्र
Monday, February 17, 2020
खुशबू
उधेड़बुन
ख़ामोश भी बहुत है....
ख़ुशी है बेपनाह,
फिर तन्हाई को तेरा,
अफ़सोस भी बहुत है....
ज़िंदगी,
बड़ा एहसान मानती है तेरा,
पर ये फरामोश भी बहुत है...
हाँ,
हारी भी है बाज़ी-ऐ -रूह,
पर बचा जोश भी बहुत है...
लड़खड़ाई है, बाद फुरकत,
अब दगाओं का, होश भी बहुत है......
उधर,
पाकीज़गी भी दिल की बेहिसाब,
मुब्तिला गुनाहों में भी इधर बहुत है.....
इधर
मचलती है वही आरज़ू दामन में,
तेरे रूबरू जो सरगोश बहुत है....
पेशानी पे,
कालिख बन भी लगी है,
किस्मत सफेदपोश भी बहुत है...
अंतस,
आलम है लम्हो का, बेतरतीब,
इधर दर्द-रोज़ बहुत है....
Saturday, November 30, 2019
कोई..!
Monday, November 4, 2019
अब जब भी शुबहा हो..!
मैं कल से आज तक
देखा न गया
मौसम सा सनम
फिरकी
क्यों है?
दावा
गुल ओ किमाम वजूद
वो वर्दियों वाले लोग..!
शायद दूसरा भी किनारा हो?
क्या है?
Thursday, October 17, 2019
किसी तरह
हर चाहने वाला मेरा,
दीदावर है,
किसी न किसी तरह..!!
हां यूं तो बेअसर हूँ,
पर बडा असर है तुझपे,
किसी न किसी तरह...!!
जिंदगी बाकायदा अंधेरी है,
पर जब से तू है, दोपहर है,
किसी न किसी तरह..!!
सिर्फ शाम कहा जाता था मैं,
पर ये कैसे हुआ?
सहर है किसी न किसी तरह?
पगडंडियां सब खो गयीं,
राह भटका था मैं,
तेरे मिलने से कैसे?
रहगुज़र है किसी तरह..?
इश्क़ की बात कर
दूरियों का ज़िक्र न कर,
पास आने की बात कर
हार जाने का न नाम ले अब
तेरे कहने से उलझ गया हूँ,
अब लड़ रहा हूँ हर सवाल से,
तो जीत जाने की बात कर....!
जियें या कुर्बान हो जाएं,
फैसला मुश्किल नही,
मुलाकात की बात कर...!
सहरा में भटकने वाला आदम हूँ,
प्यास की बात कर,
पानी की बात कर..!!
बेरुखी रही है, किस्मत हमेशा,
नज़दीकियों की बात कर,
अब सिर्फ इश्क की बात कर..!!
Thursday, September 19, 2019
मायने
सूख तो जाने ही हैं ज़ख्म सब,
सर पे तपता सूरज एक ओर,
उधर बहता मुसलसल ख़ून जो है..!!
क्या हुआ जो फ़ना भी हुए,
देखो जिहाद हासिल है..!
कुछ अजीब ही है ये,
वतन का जुनून जो है..!!
हमने वतनपरस्ती के,
मायने तक बदल डाले,
तुम भी बदलो ये,
सड़ते गलते कानून जो हैं..!!
Tuesday, September 17, 2019
हकीकत
खींच लेगा कोई इस कदर,
क्या कोई ऐसी भी वजह है?
सोचा न था नियत बदलेगी,
मिलने में रखा क्या है..?
अजीब सा हो रहा है कुछ,
न जाने आखिर क्या है..?
खुमार है जुल्फों का, और,
आंखों से नशा दिया क्या है..?
ईमान डगमगा रहा मेरा,
तुमने देखो किया क्या है..?
खूबसूरत लग रही है,
कमबख्त ये कैसी ख़ता है..?
अंजुमन, जानता हूँ, बेरंग मेरा,
तेरे नाम की होली में रंगा है..!!
दिल में खलबली भी मची है
कुछ न होगा ये भी पता है..!
होगी बस हकीकत पेश्तर,
और सब रंग उड़ जाएंगे,
चंद अगले रोज़ में यही बदा है..!!
Monday, September 16, 2019
सौदे
रिश्ते में रही यूं बंदिश,
कि मेरे थे अश्क़,
और उसकी आँखों से निकले..!!
कैद में बीत गयी उम्र,
कौन अब सलाखों से निकले..?
इक्के दुक्के सिक्के,
कैसे लाखों के निकले..?
ठगे तो गए इश्क में लेकिन,
सौदे मुनाफों के निकले...!!
किसी न किसी ने तो,
पढ़े ही होंगे, वरना..!!
कैसे इतने खत
बिना लिफाफों के निकले...?
रसोई और कविताएं
तुम्हारे इंद्रधनुषी प्रेम ने,
मेरे हर काव्य को,
भिन्न स्वाद दिया..!!
कविताएं चटपटी,
चटखारेदार हैं,
मीठी भी, तीखी भी,
सीली सी कुछ,
कुछ गीली सी,
सूखी सी कुछ,
कुछ रसीली सी...!!
कोई बनारस हो गई,
कोई प्रयाग है,
किसी में शर्करा तो,
किसी मे मिर्चों की आग है..!!
देखो....तुम्हारी रसोई,
मेरी कविताओं में बस गयी..!!
Monday, September 2, 2019
सफ़ह-ऐ-इश्क़
तोड़ दी दीवार-ओ-नींव
तमने अपने ही हाथ, रिश्तों की,
फिर भी नुक्कड़ पे,
यादों का मकान बाकी है..!!
हमने भी अखलाक निभाया है,
दुनियावी जो थे चुका दिए,
रूहानी एक एहसान अभी बाकी है
कैसे सोच लिया कि,
मुकर के बच जाओगे..??
माना सब सफ़हे
हिफ़्ज़ हुए इश्क के लेकिन,
इक इम्तेहान अभी बाकी है..!!
Friday, June 28, 2019
महारत
एहसान चुकाएँ तो चुकाएं कैसे,
सब तो तुम्हारी अमानत है,
कर सका इतना ही, के तेरे दर्दों को,
साथ सहने की कोशिश की है..!
तेरी हमनवाई, इतनी बुलंद,
के खिलाफत, बेमतलब थी,
तो संग बहने की कोशिश की है..!!
इस हुनर का माहिर नही,
बस तेरा बयान-ऐ-दिल,
मैनें अपनी जुबां से,
कहने की कोशिश की है..!!!
Thursday, June 27, 2019
तोहफा-ऐ-तवारीख़
नसीब वाली होती हैं,
उन घरों की ईंटें तक..!!
बेटियों की किलकारियां,
जिनमे गूंजी होती हैं...!!
मजबूर-ऐ-मोहब्बत, उस रब ने,
बुत... बेटी का बनाया,
फिर झुक के खुद,
कदम चूम लिए खुदा ने...!!
ऐ बशर नादां-ओ-बेपरवाह,
कम से कम बेटियों के,
इस मर्तबे की तो कद्र कर..!!!
सुबहा
भला कहाँ छुपा है ये राज अब?
पैरहन अपने लहू में भिगो दिया है..।
भला ऐसे कैसे हुआ कि हम,
बावफ़ा भी रहे, दग़ा भी दिया है..?
सुनो कुछ शक है हमें इस रिश्ते पे,
घर बनाया भी, उजाड़ भी दिया है...!!
जब सब खो दिया है, फिर भी,
मज़ार-ए-रूह में तेरे नाम का दिया है...!!
Wednesday, June 26, 2019
फकीराना रईसी
रोशन जगमग घरों में,
पसरा सन्नाटा है,
मातमी उदासी है,
निगल रही है साँसों को,
चाट रही है लम्हों को,
रूह इस कदर प्यासी है..!
पल भर अपने ही बेटे को
थपथपाने का वक़्त नहीं,
उन कलाइयों के पास.....
जिनकी घड़ियों पे,
हीरों की नक्काशी है...!!
Thursday, June 20, 2019
क्यों
हां तुम हो,
एक बड़ा प्रश्न...!!
जिसके जवाब,
ढूंढता रहता हूँ...!!!
पर और भी बड़ा प्रश्न
के आखिर हम,
हैं ही क्यों...!!
बस यही विरक्तिदोष है...!!
Wednesday, June 19, 2019
तेरा पता..!!
मैने आदम दिलों, बुतों,
संग-ओ-फौलाद,
को पिघलते देखा..!!!
तू बच्चों की किलकारियों
में ही बसा है कहीं...!!!
Tuesday, June 18, 2019
हाल-ऐ-शब
तेरी यादों को,
अक्सर अशआर बना कर,
कागज़ में लपेट,
डायरी में बंद कर देता हूँ..!!
सोचता हूँ अक्सर,
के वो ख़याल,
जिसे दफना दिया,
दोबारा पेशतर न होगा..!!
लेकिन चौराहे के खंभे सा,
रोज़ मेरे वजूद के आगे,
खड़ा हो कर,
तेरी वफाओं का सिला मांगता है..!!
मैं नजर झुकाये,
बच के निकलने की,
कोशिश में रोज़,
उलझ जाता हूँ,
तेरी यादों की डयोढ़ी पे..!!
फिर ये लम्हे,
सर पटक पटक के,
मातम करते हैं,
तेरे मेरे किस्से का..!!
और हां, तेरी यादों की,
मजलिस भी बैठती है,
हर रोज़, मेरे संग दीवान पे,
तो.. ये हाल है मेरी रातों का..!!
Saturday, June 15, 2019
करतब
ग़म-ऐ-दिल बेशक,
तुम्हारा, बड़ा है बहुत,
लेकिन कभी क्या,
किसी तंगहाल से मिले हो?
तलाशोगे, तो उसकी भूख में,
दर्द की नई गहरायी मिलेगी..!!
वो नट बन के पैदा न हुए,
न मजमगार थे उनके पुरखे,
ये करतब तो सब,
पेट की आग कराती है..!!
ढपली की थाप पे,
उसका राग नही है ये,
ये भूख का दर्द है,
जो तान बन के निकला..!!
मुरमुरे बेचना चाहा कब,
उम्र तो उसकी खाने की थी,
उनकी तंगहाली तो बस नतीजा है,
तलब तुम्हे ख़ज़ाने की थी..!!
Thursday, June 13, 2019
वो
उसने कहा 'सुनो'
और कदम थम गये..!!
फिर ज़िन्दगी गुजरी,
हम वहीं रह गये..!!
उसने कहा 'चलो'
हम चल दिये,
दरम्यां सितारों के,
आज मकां हमारा है..!!
उसने कहा 'बस'
और सांसे थम गयीं..!!
तुरबत है, कब्र है,
कुछ सूखे फूल हैं..!!
Tuesday, June 11, 2019
रिश्ता
दिल ओ दुनिया के बीच,
मेरा रिश्ता तू ही तो है
लौटा दिया ग़मे दहलीज़ से,
फरिश्ता तू ही तो है,
गुज़रा सारा जहां बेहिसाब जब,
आहिस्ता तू ही तो है
कहाँ रही फिक्र मेरी किसी को,
एक बाबस्ता तू ही तो है..!!
खंजर
आदम ओ दुनिया की,
अब बात मत कर,
मैने ग़मों का समंदर देखा है,
तेरी झील झील आंखों में,
किसी और के नाम का
मंज़र देखा है..!!
जीने की ख्वाहिश कैसे भला?
हाथ में तेरे, मैनें अपने नाम का,
खंज़र देखा है..!!
मंज़िल
आराम लेने नही देता दिल,
इसे जीने का जतन बहुत है,
तेरे एहसान कैसे ओढूं बता?
ये झीना पैरहन भी बहुत है..!!
उतार ले इसे अब जिस्म से,
इस रूह का वजन बहुत है..!!
गुलशन की अब खाक ख्वाहिश?
कांटो का ये अंजुमन बहुत है..!!
बशर जाएगा भी कहाँ आखिर,
दो गज़ का वतन बहुत है..!!
खामोशियाँ
मेरी खामोशियां,
गूंज कर बहरी हो गयीं,
उसी कमरे में जहां,
हमारी मोहब्बत सोती रही..!!
अब सूख चुकी तो,
पोंछने का क्या फायदा,
यही है वो आंख जो,
उम्र भर रोती रही..!!
तुम्हारे सेहरा में जब,
खिल रहे थे वफ़ा के फूल,
आग बारिश की मेरे जिस्म को,
बरसों भिगोती रही..!!
तुम क्या गए, पीछे से,
मुकद्दर भी ले गए,
मेरी किस्मत ताउम्र फिर,
तेरी ड्योढी पे रोती रही..!!
यही है वो आंख जो,
उम्र भर रोती रही..!!
Monday, June 10, 2019
दलदल
बेघर चले आते हैं,
इन गली कूचों में ही,
कहीं समा जाते हैं....!!
गाँवों को समूचा,
निगल रहे हैं...!
हर रोज़, शहर,
दलदल हो रहे हैं...!!
खता
चोट जिस्म ने खायी,
शमशीर-ओ-तलवार,
सह रहा है...!!
कट ही जायेंगे,
ये लम्हे हिज़्र के,
कहीं भीतर दिल,
ये कह रहा है....!!
बात दीगर है की,
जिस्म के, हर गोशे से,
मानिंद-ऐ-आब,
लहू बह रहा है...!!
माद्दा
हारने में नहीं,
चमन को गुलज़ार रखे,
असल दीदावर वही....!
ज़माने की कसौटियों पे,
खरी है बात,
तेरी नज़र में गलत,
और ज़रा सी सही.....!
लड़....! के बुलबुलें आज़ादी मांगती हैं,
कोहराम तेरा...खामोशी नहीं..!
Saturday, June 8, 2019
फीका विश्व
खूबसूरत मोड़
एक खूबसूरत मोड़ दिया,
खातिर-ऐ-क़त्ल,
जब खंज़र उठाया उसने,
हमने खुद को,
ढीला छोड़ दिया......!
नकाब
ये बिखरा सा ख्वाब क्यों है?
क्या छुपाये हो दिल में,
चेहरे पे हंसी का नकाब क्यों है?
मिलता था जो इत्मीनान से,
वो शख्स बेताब क्यों है?
क्या छुपाये बैठे हो,
ये हंसी का नकाब क्यों है?
साथ
साथ का वादा करने वाले,
दस्त-ऐ-ख्वाहिश, मजबूर हो गए....!
जाते थमा गए अरमा हज़ारों,
जो ये मुट्ठी कस दी जरा सी,
ख्वाब, सब वो चूर हो गए....!
शीशा-ऐ-दिल टूटने का "अंतस",
जश्न यूं मनाया फिर हमने,
"दीवाने" मशहूर हो गए...........!!!
खुद से मिलना भूल गए
Sunday, October 28, 2018
खाली पेट
खाली पेट नींद नही आती,
हमसे बेहतर जानेगा भी कौन?
फाके किए हैं महीनो हमने!!
रहने दो शर्मो हया और
ये हिजाबपारस्ती, झूठ है सब
कब्र मे गुज़ारी है जिंदगी,
पर्दानशीनो हमने...!
नखरे हैं सब, और शोखियाँ,
ये जो तुम्हारे मुश्किलों के जिक्र हैं,
कसौटियों पे शबें गुज़ारी,
नज़नीनो हमने....!
और फाके किए हैं,
महीनों हमने..I
Thursday, October 18, 2018
इलज़ाम
वजहें हैं, जीत है, हारें हैं....
ज़ख्म-ओ-मरहम हैं
दरारें हैं दीवारें है
उनके हैं या तुम्हारे हैं...?
दीमकों का राज
खुद को आज में....!
हिन्द की संताने लड़-मर रही हैं,
दीमकों के राज में.....!
उद्योगपतियों का राग, बजट है,
लोकतंत्र के साज़ में.....!
बस्तर की अछूत लड़की की,
चीखो-पुकार दब गयी,
बंदूकों के अट्टहास में,
वर्दियों की आवाज़ में.....!
पर असल कातिल हैं वो,
जो छुपे हैं, सफ़ेद कुर्तो,
और कारखानों की आड़ में....!
ऊंची हो गयी दहलीज़ न्याय की,
रोकड़े के चबूतरे आधार बन गए,
असर नहीं रहा अब,
गरीब की फरियाद में...!
हिचकियां
जब हिचकियां आती हैं...!!
सो जाना, या फिर,
बाहर निकाल जाना...!!!
अपने जबड़े फाड़,
मुझे खाने को दौड़ती हैं...!!!
तकल्लुफ तो होता ही होगा.....!
दीवारें एक जैसी है....!!!
जब दरवाज़ा खोलता हूं,
मेरे कमरे और मुझ में,
भर जाता है.....!!!
हालिया बशर
सुना है,
गोया दिमागी बीमार हैं...!!!
इक कतरा ना पेश फरमाया गया,
खून बहाने को आए,
मिल के चार हैं..!!!
वतन की चादर बुनी,
वो आज,
मलाल ओ रंजिश के दस्तकार है..!!
मिलते थे शामो शहर जो दिल,
मर गए हैं,
वजह ये सियासती बदकार हैं..!!!
मर गई बरसों पहले...!!
पतझड़ बरकरार है..!!
जिरह कर निकले थे,
आज हमारे शहरों में भी,
आपसी तकरार है...!!
Thursday, November 23, 2017
सम्पूर्ण हूँ मैं
जो हर दोपहर, कढ़ी की सोंधी खुशबू बन,
खींच लेता है मुझे घर के जानिब,
मैं सम्मोहित सा, खिंचा आता हूँ..!!!
माया हो कर खुद भी,
तुमने जन्मी है एक और माया,
में विरक्त रह भी कैसे पाता,
तो अब माया पाश में बंधा हूँ तुम्हारे...!!
अनमना था, निष्पक्ष था मैं,
पर प्रेम इतना भारी होगा
ये पता न था।
झुक गया अस्तित्व पूरा
तुम्हारी ओर, और तब मैंने जाना
सन्यास बेमानी है।
कदाचित ये विचित्र है,
की माया के आसक्त मैं,
प्रवाह में बहता हूँ,
तुम्हारे प्रभाव में
रहता हूँ
ये संयोग सुखद है
मेरा इच्छित है,
अब और कोई आकांक्षा नही
सम्पूर्ण हूँ मैं।
Monday, November 20, 2017
तुम पर आशार लिखने हैं
Wednesday, November 15, 2017
किमाम
मैं हिफ़्ज़ करूँ तेरे गोशे गोशे को ऐसे
तेरे नक्श ओ वज़ूद की
तुझसे भी ज्यादा पहचान हो जाये.......!!
पाक हो जाएं दिन
सुन्नत हो जाएं रातें
की हर लम्हा
माहे रमजान हो जाये.....!!
कभी इधर एहसान हो जाये.......!!
वहम
सिलसिले चाहे मुश्किलों के
कम हो न हो...
के दर्द जिंदगी का दूसरा नाम है
चाहे कोई
सितम हो न हो........!
रखा करो इस पे
न जाने और आशिकी का
ये जख्म हो न हो......?
हमेशा हम तुम पे मेहर ये
वहम हो न हो.........?
और रोने दिया करो जार बेजार
कोई गम हो न हो...........?
किसे पता फिर कोई
जनम हो न हो.........?
कौन जाने कल
हम हो न हो..........??
Saturday, September 24, 2016
हर तरफ जंग है
दोपहर,
बच्चे के एडमिशन के लिये,
कूड़ा फेकने के लिए,
रिपोर्ट लिखाने के लिए,
डिग्री का ढेर लिए,
सीमा पर,
कुलचे के ठेले के बगल,
कुछ बकरे की कुर्बानी पर आमादा,
मूर्ती न फेको गंगा में,
मीडिया डाल रहा पर्दा,
ठेके पे,
कुछ जंगल,
बहुतों ने छोड़ दिया,
राम बड़ा या अल्लाह,
उधर अपनी नफ़्स से,
Monday, August 29, 2016
ज्यामिति
मैं केंद्र में,
जड़वत खड़ा होता हूं....!
समर्पण के सम्बन्ध के,
एक सिरे को पकडे हुए.....!
जिसका दूसरा सिरा,
पकड़...!
तुम चलती हो,
पूरी परिधि पर...!
तभी तो पाती हो तुम,
अपना इच्छित,
पूर्ण विस्थापन..!
ये समर्पण की त्रिज्या,
कभी अतीत,
तो कभी भविष्य में,
बढ़ कर व्यास हो जाती है...!
केंद्र में, मुझ पर,
भविष्यगत शंकाओं का.
जब कभी,
एक लम्ब, अवतरित होता है..!
तो समेट लेता है तुम्हे भी...!
आच्छादित,
अस्तित्व हमारे,
शंकु बन जाते हैं...!
न होता वृत्त यदि आधार..!
तुम्हारे प्रेम और विश्वास का,
तो यह शंकु....
अपने ही,
शीर्ष पर टिका होता....!
हाँ.....तब भी
विस्थापन तो होता ही....!
परंतु तब,
केंद्र में एक नुकीला,
सिरा होता...!!!
जो हमारी
सारी ज्यामिति पर
खूंटे सा गड़ा होता..!!!
Wednesday, August 24, 2016
सुरसा उलझने
मैं ख्यालों का तराज़ू लिए
अपना मन तोलता हूँ..!
उलझने हैं,
प्रेम करू तो किस से?
प्रेयसी या देश??
पथ चुनूं तो कौन सा?
जो घर जाता है?
या जो घर से बाहर?
संदेह करूँ तो किस पर?
रूढ़ियों पर या
रूढ़ियों के संदेह पर?
अर्थ को महत्त्व दूं?
या महत्त्व के अर्थ को?
प्रेम में घुल कर
कृष्ण वर्ण हो जाऊं?
या निष्काम का अनुचर?
उलझने ही तो हैं
उलझनों का गोला
सुबह निकलता है
और शुबहों का चाँद, रात..!
मैं इस चाँद को
उस सूरज से तोलता हूँ
आरज़ूओं से खेलता हूँ
फिर समय थप्पड़ मार
मुझे सच पर पटक देता है..!
उलझने फिर
सुरसा हो जाती हैं...!
Wednesday, June 29, 2016
आधी लकीर
बताना ही चाहें सब,
पर निभाना जरूरी तो नहीं...?
यूं भी हो सकती है
दूरी ही हो जरूरी तो नहीं...!
पूरी हो जरूरी तो नहीं...!
तो तुम्हारी ही होगी,
लकीर आधी भी थी
मेरी हथेली में पूरी तो नहीं....!
जरूरी तो नहीं...?
मुहब्बत....मुहब्बत है,
मजबूरी तो नहीं....!
NGO's और उन पर उठे प्रश्न
इनमे से कुछ मैं सब के साथ बांटना चाहता हूँ.......
१- अस्थिरता : अस्थिरता एक ऐसा कारक है जो संभवतः भारतवर्ष के हर गैरसरकारी संस्था का अंग बन चुका है खास तौर से वो जिन्हें हम NGO कहते हैं। मेरे दृष्टिकोण से इस समस्या का सबसे बड़ा कारण उस समझ का अभाव है जो NGO के कार्यकारी सदस्यों और प्रशासनिक सदस्यों के मध्य होनी चाहिए। जिन पाश्चात्य देशों में इस संस्कृति का जन्म हुआ उन्होंने न सिर्फ जन्म दिया बल्कि इसका समुचित विकास भी किया...यही कारण है की अमेरिका जैसे देश में कुल NGO की संख्या भारतवर्ष से कही कम है। इतनी अधिक संख्या होने के बावजूद लोग आज भी NGO में कार्य करने से कतराते हैं। मैंने जब इसका कारण जानने की कोशिश की तो परिणाम अपेक्षित ही थे। लोगो के अनुसार न तो इनका स्तर होता है न ही समय पर समुचित वेतन दिया जाता है। मेरे दृष्टिकोण से ये अस्थिरता सिर्फ इस लिए है क्योंकि NGO भारतीय संस्कृति नहीं है, भारत को इस संस्कृति की समझ भी नहीं है, और अगर है भी तो १०-२०% से अधिक गैरसरकारी संस्थाएं अपने प्रपोगंडा के अनुसार कार्य भी नहीं करती।
२- अनियंत्रित पंजीकरण एव कार्यप्रणाली : भारत में प्रतिदिन 800 से अधिक NGO पंजीकृत होते हैं, और ये प्रक्रिया कई दशकों से चल रही है...पंजीकरण की प्रक्रिया पर कोई नियंत्रण नहीं है। केवल एक संस्था के सदस्य ही जितनी चाहे उतनी संस्थाए पंजीकृत करा सकते हैं। मैंने जिन संस्थाओं में कार्य किया दुर्भाग्य से वो सभी समाजसेवा के हित में समाजसेवा करने के नाम पर बनाई गयी थी। इन सभी संस्थाओ के प्रशासन का ध्यान केवल धनोपार्जन पर ही रहा। न सिर्फ इतना ही बल्कि प्रत्येक संस्थाजनित कार्य में उस सुविधा अथवा मौके की तलाश की गई जिसमे अधिकाधिक धन बचाया जा सकता था, वह धन जो बच्चो, वृधो, सामाजिक अथवा राष्ट्रीय विकास के लिए था। धन को NGO में किस प्रकार खर्च किया गया है इसके लिए कोई जांच अगर होती भी है तो वो भारतीय बाबुशाही की भेंट चढ़ जाती है। भारतवर्ष में NGO के पंजीकरण की प्रक्रिया भी एक हास्यास्पद घटना है। किसी भी प्रकार बना हुआ एक दस्तावेज जो पंजीकरण के लिए आवश्यक है, एक समुचित नाम, कुछ जाली दस्तावेज जो सदस्यों के नाम, स्थायी पते के लिए आवशयक हैं के अतिरिक्त ५-६ हज़ार रुपये। इस सभी सामग्री के साथ NGO संस्कृति को भारत में होम कर दिया जाता है। पंजीकृत होने वाले NGO'S के अधिकाँश सदस्यों के नाम या तो जाली, मित्रों के या रिश्तेदारों के होते हैं। पंजीकरण की प्रक्रिया के दौरान ही हर उस बाधा का तोड़ उस दस्तावेज में ड़ाल दिया जाता है जो बाद में आ सकती हैं। भारत की न्यायिक व्यवस्था और कर व्यवस्था की पेचीदगी भी उन संस्थाओं की मदद ही करती हैं जो सिर्फ धनोपार्जन के लिए बने जाती हैं। कर मुक्ति एक सबसे बड़ा उपाय हैं NGO के माध्यम से धनोपार्जन करने का। न ही पंजीकरण के दौरान और न ही सक्रीय कार्यकाल में इस पर भारतीय प्रशासन ध्यान देता हैं। पंजीकरण कार्यालय से संपर्क करने पर पता चला की सरकारी अमला इस लिए इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप इस लिए नहीं करता क्यों की पंजीकरण से लाखों रुपये की प्रतिमाह आमदनी होती हैं। परन्तु पंजीकरण के बाद इन संस्थाओं को दिए गए और निजी स्वार्थ में खर्च होने वाले करोड़ों सरकारी रुपयों के बारे में कार्यालय अधिकारी के पास कोई कोई जवाब नहीं मिला। मुझे अधिकारी की समझ के बारे में आश्चय हुआ जिसने लाखों के राजस्व को तो ध्यान में रखा पर करोड़ों के अपव्यय पर उसका ध्यान नहीं गया।
३- अनुचित लोग, अनुचित कार्य: मेरे एक निकट मित्र ने कई NGO पंजीकृत करा रखे हैं, जिनके माध्यम से उन्हें प्रतिवर्ष लाखों रूपये की आमदनी होती हैं वो भी सरकार से। उनके द्वारा किये गए किसी भी कार्य का मुझे ज्ञान नहीं हैं। एक बार बात बात में मैंने जब यह पूछ लिया की बिना काम के आप को पैसा कैसे दे दिया जाता हैं तो उनका जवाब था.....साहब काम तो हम भी करते हैं, सारा दिन फ़ाइल ही तो तैयार करते हैं.....यह एक मजाक तो था ही पर कटु सत्य भी था। मैंने पुछा की आप के NGO में कार्य करने वाले लोगो को तो आप को वेतन देना ही पड़ता हैं...तो उनका उत्तर था......एक लड़का और एक लड़की ऑफिस में गुटरगूं करने के लिए काफी हैं दोनों को ४-४ हज़ार रुपये आशिकी करने के देता हूँ, बाकी फाइल में रहते हैं। मैंने जब उनसे कर्मचारियों के योग्यता के बारे में पुछा तो जवाब था की साहब NGO में काम करने के लिए ग्रेजुएट होना काफी हैं।
इतने सत्य बोलना भी बुराई करना ही हैं, ख़ास तौर से जब मैंने खुद ऐसी संस्थाओं में काम किया हैं। मुझे लगता हैं इतना काफी हैं........!