Thursday, September 19, 2019

मायने

सूख तो जाने ही हैं ज़ख्म सब,
सर पे तपता सूरज एक ओर,
उधर बहता मुसलसल ख़ून जो है..!!

क्या हुआ जो फ़ना भी हुए,
देखो जिहाद हासिल है..!
कुछ अजीब ही है ये,
वतन का जुनून जो है..!!

हमने वतनपरस्ती के,
मायने तक बदल डाले,
तुम भी बदलो ये,
सड़ते गलते कानून जो हैं..!!

Tuesday, September 17, 2019

हकीकत

खींच लेगा कोई इस कदर,
क्या कोई ऐसी भी वजह है?

सोचा न था नियत बदलेगी,
मिलने में रखा क्या है..?

अजीब सा हो रहा है कुछ,
न जाने आखिर क्या है..?

खुमार है जुल्फों का, और,
आंखों से नशा दिया क्या है..?

ईमान डगमगा रहा मेरा,
तुमने देखो किया क्या है..?

खूबसूरत लग रही है,
कमबख्त ये कैसी ख़ता है..?

अंजुमन, जानता हूँ, बेरंग मेरा,
तेरे नाम की होली में रंगा है..!!

दिल में खलबली भी मची है
कुछ न होगा ये भी पता है..!

होगी बस हकीकत पेश्तर,
और सब रंग उड़ जाएंगे,
चंद अगले रोज़ में यही बदा है..!!

Monday, September 16, 2019

सौदे

रिश्ते में रही यूं बंदिश,

कि मेरे थे अश्क़,

और उसकी आँखों से निकले..!!

कैद में बीत गयी उम्र,
कौन अब सलाखों से निकले..?

इक्के दुक्के सिक्के,
कैसे लाखों के निकले..?

ठगे तो गए इश्क में लेकिन,
सौदे मुनाफों के निकले...!!

किसी न किसी ने तो,
पढ़े ही होंगे, वरना..!!

कैसे इतने खत
बिना लिफाफों के निकले...?

रसोई और कविताएं

तुम्हारे इंद्रधनुषी प्रेम ने,
मेरे हर काव्य को,
भिन्न स्वाद दिया..!!

कविताएं चटपटी,
चटखारेदार हैं,

मीठी भी, तीखी भी,
सीली सी कुछ,
कुछ गीली सी,
सूखी सी कुछ,
कुछ रसीली सी...!!

कोई बनारस हो गई,
कोई प्रयाग है,
किसी में शर्करा तो,
किसी मे मिर्चों की आग है..!!

देखो....तुम्हारी रसोई,
मेरी कविताओं में बस गयी..!!

Monday, September 2, 2019

सफ़ह-ऐ-इश्क़

तोड़ दी दीवार-ओ-नींव
तमने अपने ही हाथ, रिश्तों की,
फिर भी नुक्कड़ पे,
यादों का मकान बाकी है..!!

हमने भी अखलाक निभाया है,
दुनियावी जो थे चुका दिए,
रूहानी एक एहसान अभी बाकी है

कैसे सोच लिया कि,
मुकर के बच जाओगे..??

माना सब सफ़हे
हिफ़्ज़ हुए इश्क के लेकिन,
इक इम्तेहान अभी बाकी है..!!

Friday, June 28, 2019

महारत




एहसान चुकाएँ तो चुकाएं कैसे,
सब तो तुम्हारी अमानत है,
कर सका इतना ही, के तेरे दर्दों को,
साथ सहने की कोशिश की है..!

तेरी हमनवाई, इतनी बुलंद,
के खिलाफत, बेमतलब थी,
तो संग बहने की कोशिश की है..!!

इस हुनर का माहिर नही,
बस तेरा बयान-ऐ-दिल,
मैनें अपनी जुबां से,
कहने की कोशिश की है..!!!

Thursday, June 27, 2019

तोहफा-ऐ-तवारीख़




नसीब वाली होती हैं,
उन घरों की ईंटें तक..!!

बेटियों की किलकारियां,
जिनमे गूंजी होती हैं...!!

मजबूर-ऐ-मोहब्बत, उस रब ने,
बुत... बेटी का बनाया,
फिर झुक के खुद,
कदम चूम लिए खुदा ने...!!

ऐ बशर नादां-ओ-बेपरवाह,
कम से कम बेटियों के,
इस मर्तबे की तो कद्र कर..!!!

सुबहा


भला कहाँ छुपा है ये राज अब?
पैरहन अपने लहू में भिगो दिया है..।

भला ऐसे कैसे हुआ कि हम,
बावफ़ा भी रहे, दग़ा भी दिया है..?

सुनो कुछ शक है हमें इस रिश्ते पे,
घर बनाया भी, उजाड़ भी दिया है...!!

जब सब खो दिया है, फिर भी,
मज़ार-ए-रूह में तेरे नाम का दिया है...!!

Wednesday, June 26, 2019

फकीराना रईसी


रोशन जगमग घरों में,
पसरा सन्नाटा है,
मातमी उदासी है,

निगल रही है साँसों को,
चाट रही है लम्हों को,
रूह इस कदर प्यासी है..!

पल भर अपने ही बेटे को
थपथपाने का वक़्त नहीं,
उन कलाइयों के पास.....

जिनकी घड़ियों पे,
हीरों की नक्काशी है...!!

Thursday, June 20, 2019

क्यों

हां तुम हो,
एक बड़ा प्रश्न...!!

जिसके जवाब,
ढूंढता रहता हूँ...!!!

पर और भी बड़ा प्रश्न
के आखिर हम,
हैं ही क्यों...!!

बस यही विरक्तिदोष है...!!

Wednesday, June 19, 2019

तेरा पता..!!

मैने आदम दिलों, बुतों,
संग-ओ-फौलाद,
को पिघलते देखा..!!!

तू बच्चों की किलकारियों
में ही बसा है कहीं...!!!

Tuesday, June 18, 2019

हाल-ऐ-शब

तेरी यादों को,
अक्सर अशआर बना कर,
कागज़ में लपेट,
डायरी में बंद कर देता हूँ..!!

सोचता हूँ अक्सर,
के वो ख़याल,
जिसे दफना दिया,
दोबारा पेशतर न होगा..!!

लेकिन चौराहे के खंभे सा,
रोज़ मेरे वजूद के आगे,
खड़ा हो कर,
तेरी वफाओं का सिला मांगता है..!!

मैं नजर झुकाये,
बच के निकलने की,
कोशिश में रोज़,
उलझ जाता हूँ,
तेरी यादों की डयोढ़ी पे..!!

फिर ये लम्हे,
सर पटक पटक के,
मातम करते हैं,
तेरे मेरे किस्से का..!!

और हां, तेरी यादों की,
मजलिस भी बैठती है,
हर रोज़, मेरे संग दीवान पे,
तो.. ये हाल है मेरी रातों का..!!

Saturday, June 15, 2019

करतब

ग़म-ऐ-दिल बेशक,
तुम्हारा, बड़ा है बहुत,

लेकिन कभी क्या,
किसी तंगहाल से मिले हो?

तलाशोगे, तो उसकी भूख में,
दर्द की नई गहरायी मिलेगी..!!

वो नट बन के पैदा न हुए,
न मजमगार थे उनके पुरखे,

ये करतब तो सब,
पेट की आग कराती है..!!

ढपली की थाप पे,
उसका राग नही है ये,
ये भूख का दर्द है,
जो तान बन के निकला..!!

मुरमुरे बेचना चाहा कब,
उम्र तो उसकी खाने की थी,

उनकी तंगहाली तो बस नतीजा है,
तलब तुम्हे ख़ज़ाने की थी..!!

Thursday, June 13, 2019

वो

उसने कहा 'सुनो'
और कदम थम गये..!!

फिर ज़िन्दगी गुजरी,
हम वहीं रह गये..!!

उसने कहा 'चलो'
हम चल दिये,

दरम्यां सितारों के,
आज मकां हमारा है..!!

उसने कहा 'बस'
और सांसे थम गयीं..!!

तुरबत है, कब्र है,
कुछ सूखे फूल हैं..!!

Tuesday, June 11, 2019

रिश्ता

दिल ओ दुनिया के बीच,
मेरा रिश्ता तू ही तो है

लौटा दिया ग़मे दहलीज़ से,
फरिश्ता तू ही तो है,

गुज़रा सारा जहां बेहिसाब जब,
आहिस्ता तू ही तो है

कहाँ रही फिक्र मेरी किसी को,
एक बाबस्ता तू ही तो है..!!

खंजर

आदम ओ दुनिया की,
अब बात मत कर,
मैने ग़मों का समंदर देखा है,

तेरी झील झील आंखों में,
किसी और के नाम का
मंज़र देखा है..!!

जीने की ख्वाहिश कैसे भला?
हाथ में तेरे, मैनें अपने नाम का,
खंज़र देखा है..!!

मंज़िल

आराम लेने नही देता दिल,
इसे जीने का जतन बहुत है,

तेरे एहसान कैसे ओढूं बता?
ये झीना पैरहन भी बहुत है..!!

उतार ले इसे अब जिस्म से,
इस रूह का वजन बहुत है..!!

गुलशन की अब खाक ख्वाहिश?
कांटो का ये अंजुमन बहुत है..!!

बशर जाएगा भी कहाँ आखिर,
दो गज़ का वतन बहुत है..!!

खामोशियाँ

मेरी खामोशियां,
गूंज कर बहरी हो गयीं,
उसी कमरे में जहां,
हमारी मोहब्बत सोती रही..!!

अब सूख चुकी तो,
पोंछने का क्या फायदा,
यही है वो आंख जो,
उम्र भर रोती रही..!!

तुम्हारे सेहरा में जब,
खिल रहे थे वफ़ा के फूल,
आग बारिश की मेरे जिस्म को,
बरसों भिगोती रही..!!

तुम क्या गए, पीछे से,
मुकद्दर भी ले गए,
मेरी किस्मत ताउम्र फिर,
तेरी ड्योढी पे रोती रही..!!

यही है वो आंख जो,
उम्र भर रोती रही..!!

Monday, June 10, 2019

दलदल

सैकड़ों हज़ारों,
बेघर चले आते हैं,
इन गली कूचों में ही,
कहीं समा जाते हैं....!!

गाँवों को समूचा,
निगल रहे हैं...!
हर रोज़, शहर,
दलदल हो रहे हैं...!!

खता

खता दिल की थी,
चोट जिस्म ने खायी,
शमशीर-ओ-तलवार,
सह रहा है...!!

कट ही जायेंगे,
ये लम्हे हिज़्र के,
कहीं भीतर दिल,
ये कह रहा है....!!

बात दीगर है की,
जिस्म के, हर गोशे से,
मानिंद-ऐ-आब,
लहू बह रहा है...!!

माद्दा

माद्दा निभा जाने में है,
हारने में नहीं,
चमन को गुलज़ार रखे,
असल दीदावर वही....!

ज़माने की  कसौटियों पे,
खरी है बात,
तेरी नज़र में गलत,
और ज़रा सी सही.....!

लड़....! के बुलबुलें आज़ादी मांगती हैं,
कोहराम तेरा...खामोशी नहीं..!

Saturday, June 8, 2019

फीका विश्व

अर्थ, राज्य, देश परदेश,
राग रंग, प्रेम द्वेष,
ईश्वर की सत्ता,
धर्म की कसौटियां,
दर्शन और माहात्म्य,
सब फीके हैं.....!!

सुबह सुबह बच्चों को,
भूख से बिलखते देखा है...!
 

खूबसूरत मोड़

बेबसी को उसकी,
एक खूबसूरत मोड़ दिया,

खातिर-ऐ-क़त्ल,
जब खंज़र उठाया उसने,

हमने खुद को,
ढीला छोड़ दिया......!

नकाब

हसरतों की पेशानी पे,
ये बिखरा सा ख्वाब क्यों है?

क्या छुपाये हो दिल में,
चेहरे पे हंसी का नकाब क्यों है?

मिलता था जो इत्मीनान से,
वो शख्स बेताब क्यों है?

क्या छुपाये बैठे हो,
ये हंसी का नकाब क्यों है?

साथ

रोज़-ऐ - क़यामत तक,
साथ का वादा करने वाले,
दस्त-ऐ-ख्वाहिश, मजबूर हो गए....!

जाते थमा गए अरमा हज़ारों,
जो ये मुट्ठी कस दी जरा सी,
ख्वाब, सब वो चूर हो गए....!

शीशा-ऐ-दिल टूटने का "अंतस",
जश्न यूं मनाया फिर हमने,
"दीवाने" मशहूर हो गए...........!!!

भूलना



तुमको चाहना तो सिर्फ दुश्वार था,
पर भूलना तो कोई जंग हो जैसे !

खुद से मिलना भूल गए

कुछ यूं बनाया संगदिल उसने,
दर्द में गैरों के पिघलना भूल गए,

लतखोरी ऐसी रही इश्क़ की,
घर से भी निकलना भूल गए,

फिर कातिल से मिले हर रोज़,
बस खुद से मिलना भूल गए....!!

Sunday, October 28, 2018

खाली पेट

खाली पेट नींद नही आती,
हमसे बे‍हतर जानेगा भी कौन?

फाके किए हैं महीनो हमने!!

रहने दो शर्मो हया और
ये हिजाबपारस्ती, झूठ है सब
कब्र मे गुज़ारी है जिंदगी,
पर्दानशीनो हमने...!

नखरे हैं सब, और शोखियाँ,
ये जो तुम्हारे मुश्किलों के जिक्र हैं,
कसौटियों पे शबें गुज़ारी,
नज़नीनो हमने....!

और फाके किए हैं,
महीनों हमने..I

Thursday, October 18, 2018

इलज़ाम

वक़्त का दरिया है
लोग हैं, यादें है, लहरें हैं..

उम्मीदों के समंदर है
वजहें हैं, जीत है, हारें हैं....
तन्हाईयाँ, इंतज़ार है....
अजीब से बादल हैं,
सिसकियाँ, खुशबुएँ,
ज़ख्म-ओ-मरहम हैं

माज़ी के तूफ़ान हैं
दरारें हैं दीवारें है
शबनम हैं शरारे हैं
दुनिया भर के दावे हैं
उनके हैं या तुम्हारे हैं...?

सुबह की मदहोशियाँ हैं,
के शाम की ललियाँ हैं,
जिंदगी हैं कि,
अंगारे हैं....!!

मैं ही भूखा नहीं,
रोटियों का मोहताज़,
करोड़ों बेचारे हैं...!!

इलज़ाम मोहताजों की 
हर खुदकुशी का,
तुम्हारे ही सर है,
जो उनके हिस्से से,
तुमने अपने घर,
सँवारे हैं........!!

दीमकों का राज

रक्तरंजित इतिहास दोहराता है,
खुद को आज में....!

हिन्द की संताने लड़-मर रही हैं,
दीमकों के राज में.....!

उद्योगपतियों का राग, बजट है,
लोकतंत्र के साज़ में.....!

बस्तर की अछूत लड़की की,
चीखो-पुकार दब गयी,
बंदूकों के अट्टहास में,
वर्दियों  की आवाज़ में.....!

पर असल कातिल हैं वो,
जो छुपे हैं, सफ़ेद कुर्तो,
और कारखानों की आड़ में....!

ऊंची हो गयी दहलीज़ न्याय की,
रोकड़े के चबूतरे आधार बन गए,
असर नहीं रहा अब,
गरीब की फरियाद में...!

हिचकियां

बड़ा अजीब लगता है,
जब हिचकियां आती हैं...!!

सोचता हूं,
उधर तुमको भी आती होंगी,
जब इधर हाल बुरा होता है,
मुफीद होता है,
सो जाना, या फिर,
बाहर निकाल जाना...!!!

वरना कमरे की चार दीवारें,
अपने जबड़े फाड़,
मुझे खाने को दौड़ती हैं...!!!

हां उधर तुमको भी अकेले में,
तकल्लुफ तो होता ही होगा.....!
दुनिया भर में,
दीवारें एक जैसी है....!!!

सुबह बेपनाह उनींदा,
जब दरवाज़ा खोलता हूं,
नाउम्मीदी का दरिया,
मेरे कमरे और मुझ में,
भर जाता है.....!!!

हालिया बशर

कूचे पे जमा हैं कुछ बशर,
सुना है,
इंसानी लहू के तलबगार है..!!
कह रहा था कोई,
गोया दिमागी बीमार हैं...!!!

जिनसे अकेले सबील पे,
इक कतरा ना पेश फरमाया गया,
खून बहाने को आए,
मिल के चार हैं..!!!

जिनके बुजुर्गों ने,
वतन की चादर बुनी,
वो आज,
मलाल ओ रंजिश के दस्तकार है..!!

नुक्कड़ की दुकानों पर,
मिलते थे शामो शहर जो दिल,
मर गए हैं,
वजह ये सियासती बदकार हैं..!!!

इस शहर की हवा की ताजगी भी,
मर गई बरसों पहले...!!

सुना है तुम्हारे शहर में भी,
पतझड़ बरकरार है..!!

तुम मुझ से,
जिरह कर निकले थे,
आज हमारे शहरों में भी,
आपसी तकरार है...!!

Thursday, November 23, 2017

सम्पूर्ण हूँ मैं

भूख नही है, प्रेम पाश है तुम्हारा,
जो हर दोपहर, कढ़ी की सोंधी खुशबू बन,
खींच लेता है मुझे घर के जानिब,
मैं सम्मोहित सा, खिंचा आता हूँ..!!!

माया हो कर खुद भी,
तुमने जन्मी है एक और माया,
में विरक्त रह भी कैसे पाता,
तो अब माया पाश में बंधा हूँ तुम्हारे...!!

अनमना था, निष्पक्ष था मैं,
पर प्रेम इतना भारी होगा
ये पता न था।
झुक गया अस्तित्व पूरा
तुम्हारी ओर, और तब मैंने जाना
सन्यास बेमानी है।

कदाचित ये विचित्र है,
की माया के आसक्त मैं,
प्रवाह में बहता हूँ,
तुम्हारे प्रभाव में
रहता हूँ

ये संयोग सुखद है
मेरा इच्छित है,
अब और कोई आकांक्षा नही
सम्पूर्ण हूँ मैं।


Monday, November 20, 2017

तुम पर आशार लिखने हैं

तुम ये जो सब्ज़ियों पे ज़ुल्म करती हो,
मुझे पता है,
मेरी हर गंद नफ़्स को,
यूँ ही काट देना चाहती हो...!!!

तुम जब धो देती हो एक तौलिए को,
बेपनाह रगड़ कर,
मैं समझ जाता हूँ..!!!
एक नाराज़गी धोने की,
कोशिश है ये..!!!!

बार बार चखती हो जो,
दाल में नमक,
तुम जांचती हो मेरे प्यार के तेवर..!!

क़रीने से कपड़े नहीं लगाए मेरे,
ज़िंदगी को सहूलियत का,
भरपूर अन्दाज़ दिया है..!!!!

संवरना कोई जरूरत नहीं,
पर हाँ तुम्हारी ख़्वाहिश भर है,
मेरे दिल की गहराइयी,
नापनी होगी आज तुमको..!!!

रोशनी की परिभाषा,
कोई तुमसे पूछे,
मुझे देख आँखो में,
जुगनू दमकते हैं...!!!

मैंने सितारों से ले कर,
गुलों तक मशविरा किया है,
अंदाज़े बयान नहीं मिलता,
आज मुझे भी तुम पर आशार लिखने हैं..!!!

Wednesday, November 15, 2017

किमाम

तू ही खुदा तू ही कुरान हो जाये
मैं हिफ़्ज़ करूँ तेरे गोशे गोशे को ऐसे
तेरे नक्श ओ वज़ूद की
तुझसे भी ज्यादा पहचान हो जाये.......!!

पाक हो जाएं दिन
सुन्नत हो जाएं रातें
की हर लम्हा
माहे रमजान हो जाये.....!!
तेरे नज़रे करम का जो
कभी इधर एहसान हो जाये.......!!

कभी यूं जुड़ने दे खुद से,
के कोई दूरी न रहे,
मिले सांस यूं,
तेरे मेरे बीच किमाम हो जाये.......!

ये जो रूखे से ख्यालों का 
छोटा सा कुनबा बसा है दरम्यां,
कुन्ह-ऐ-गुल हो जाये,
गुलफाम हो जाये.....!

चलो इस रिश्ते को  वो मुकाम दें,
के झुक जाये बशर तमाम,
इस मोहब्बत के नाम,
एक सजदा-ऐ-अवाम हो जाये....!

मिसाल बन जाये इश्क़ यूं,
के हर ज़ालिम-ओ-सितमगर
दस्तूर-ऐ-आशिक़ी का गुलाम हो जाये....!

मिल कभी यूं,
के मेरे अश्क़ भिगो दें तुझे
बेपनाह,
और तेरी साँसे मुझ में किमाम
हो जाएँ.....!

फिर तू ही खुदा,
तू  ही कुरआन हो जाये....! 

वहम

कम रह जाती है जिंदगी हमेशा
सिलसिले चाहे मुश्किलों के
कम हो न हो...

वो तो होता ही रहेगा
के दर्द जिंदगी का दूसरा नाम है
चाहे कोई
सितम हो न हो........!

अपनी मुस्कुराहटों का मरहम
रखा करो इस पे
न जाने और आशिकी का
ये जख्म हो न हो......?

बहुत खूबसूरत है तोहफा ये ज़िन्दगी
हमेशा हम तुम पे मेहर ये
वहम हो न हो.........?

रखने दिया करो काँधे पे सर
और रोने दिया करो जार बेजार
कोई गम हो न हो...........?

इसी जनम चाहो जितना चाहना है
किसे पता फिर कोई
जनम हो न हो.........?

रूठा भी करो तो आगोश में सोया करो
कौन जाने कल
हम हो न हो..........??

Saturday, September 24, 2016

हर तरफ जंग है

सुबह दूध के लिए,
लाइन में लड़ रहे हैं....!!!

दोपहर,
बिल जमा करने के लिए लड़ रहे हैं...!!

बच्चे के एडमिशन के लिये,
स्कूल में लड़ रहे हैं........!!

कूड़ा फेकने के लिए,
पडोसी से लड़ रहे हैं.......!!

रिपोर्ट लिखाने के लिए,
थाने में लड़ रहे हैं.....!!

डिग्री का ढेर लिए,
नौकरी पाने को लड़ रहे हैं.......!!!

सीमा पर,
देश बचाने को लड़ रहे हैं......!!!

कुलचे के ठेले के बगल,
बच्चे जूठन खाने के लिए लड़ रहे हैं...!!

कुछ बकरे की कुर्बानी पर आमादा,
कुछ बचाने को लड़ रहे हैं..........!

मूर्ती न फेको गंगा में,
तो कुछ नहाने के लिए लड़ रहे हैं.......!

मीडिया डाल रहा पर्दा,
तो लड़के सच बताने के लिए लड़ रहे हैं........!

ठेके पे,
बोतल पाने को  लड़ रहे हैं..........!
गणेश को दूध पिलाने को लड़ रहे हैं.....!

कुछ जंगल,
तो कुछ गाय बचाने को लड़ रहे हैं........!
कुछ पानी बचाने को,
तो कुछ बहाने को लड़ रहे हैं.....!

बहुतों ने छोड़ दिया,
कुछ देश में आने को लड़ रहे हैं..........!

राम बड़ा या अल्लाह,
जताने को लड़ रहे हैं....!

उधर अपनी नफ़्स से,
हम जमाने से लड़ रहे हैं।


लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं लड़ रहे हैं!!!!
राजनीति एक पपड़ी है और देश की हालत उसके नीचे का गहरा घाव, कभी कभी पपड़ी उखाड़ फेकने से घाव जल्दी भर जाता है....!!

Monday, August 29, 2016

ज्यामिति

मैं केंद्र में,
जड़वत खड़ा होता हूं....!

समर्पण के सम्बन्ध के,
एक सिरे को पकडे हुए.....!

जिसका दूसरा सिरा,
पकड़...!
तुम चलती हो,
पूरी परिधि पर...!

तभी तो पाती हो तुम,
अपना इच्छित,
पूर्ण विस्थापन..!

ये समर्पण की त्रिज्या,
कभी अतीत,
तो कभी भविष्य में,
बढ़ कर व्यास हो जाती है...!

केंद्र में, मुझ पर,
भविष्यगत शंकाओं का.
जब कभी,
एक लम्ब, अवतरित होता है..!

तो समेट लेता है तुम्हे भी...!

आच्छादित,
अस्तित्व हमारे,
शंकु बन जाते हैं...!

न होता वृत्त यदि आधार..!
तुम्हारे प्रेम और विश्वास का,
तो यह शंकु....

अपने ही,
शीर्ष पर टिका होता....!

हाँ.....तब भी
विस्थापन तो होता ही....!

परंतु तब,
केंद्र में एक नुकीला,
सिरा होता...!!!

जो हमारी
सारी ज्यामिति पर
खूंटे सा गड़ा होता..!!!

Wednesday, August 24, 2016

सुरसा उलझने

किसी नशेड़ी बनिए सा
मैं ख्यालों का तराज़ू लिए
अपना मन तोलता हूँ..!

उलझने हैं,
प्रेम करू तो किस से?
प्रेयसी या देश??

पथ चुनूं तो कौन सा?
जो घर जाता है?
या जो घर से बाहर?

संदेह करूँ तो किस पर?
रूढ़ियों पर या
रूढ़ियों के संदेह पर?

अर्थ को महत्त्व दूं?
या महत्त्व के अर्थ को?

प्रेम में घुल कर
कृष्ण वर्ण हो जाऊं?
या निष्काम का अनुचर?

उलझने ही तो हैं

उलझनों का गोला
सुबह निकलता है
और शुबहों का चाँद, रात..!

मैं इस चाँद को
उस सूरज से तोलता हूँ
आरज़ूओं से खेलता हूँ

फिर समय थप्पड़ मार
मुझे सच पर पटक देता है..!

उलझने फिर
सुरसा हो जाती हैं...!

Wednesday, June 29, 2016

आधी लकीर

होता है दिल में दर्द
बताना ही चाहें सब,
जरूरी तो नहीं....?

प्यार, प्यार ही होता है
पर निभाना जरूरी तो नहीं...?

दिलों में खलिश
यूं भी हो सकती है
दूरी ही हो जरूरी तो नहीं...!

ख्वाहिश, ख्वाहिश है
आधी है तो भी सही
पूरी हो जरूरी तो नहीं...!

तुमको उम्मीदें,
तो तुम्हारी ही होगी,
शिकन, किसी और के,
माथे पे हो जरूरी तो नहीं...!

मिला भी और नहीं भी
लकीर आधी भी थी
मेरी हथेली में पूरी तो नहीं....!

तू ही वजह हो जीने की
जरूरी तो नहीं...?

मुहब्बत....मुहब्बत है,
मजबूरी तो नहीं....!

NGO's और उन पर उठे प्रश्न

कई संस्थाओं में काम कर चुका हूँ और अब उनकी प्रवृत्ति भी समझ में आने लगी हैं। कार्यप्रणाली का आन्तरिक विश्लेषण अब उतना जटिल और असहज नहीं लगता। कई वर्ष इन संस्थाओं में कार्य करने के पश्चात गैरसरकारी संस्थाओं के बारे में मेरे जो विचार बने हैं, वो संभवतः संचालकों को स्वीकार्य नहीं होंगे.....
इनमे से कुछ मैं सब के साथ बांटना चाहता हूँ.......

१- अस्थिरता : अस्थिरता एक ऐसा कारक है जो संभवतः भारतवर्ष के हर गैरसरकारी संस्था का अंग बन चुका है खास तौर से वो जिन्हें हम NGO कहते हैं। मेरे दृष्टिकोण से इस समस्या का सबसे बड़ा कारण उस समझ का अभाव है जो NGO के कार्यकारी सदस्यों और प्रशासनिक सदस्यों के मध्य होनी चाहिए। जिन पाश्चात्य देशों में इस संस्कृति का जन्म हुआ उन्होंने न सिर्फ जन्म दिया बल्कि इसका समुचित विकास भी किया...यही कारण है की अमेरिका जैसे देश में कुल NGO की संख्या भारतवर्ष से कही कम है। इतनी अधिक संख्या होने के बावजूद लोग आज भी NGO में कार्य करने से कतराते हैं। मैंने जब इसका कारण जानने की कोशिश की तो परिणाम अपेक्षित ही थे। लोगो के अनुसार न तो इनका स्तर होता है न ही समय पर समुचित वेतन दिया जाता है। मेरे दृष्टिकोण से ये अस्थिरता सिर्फ इस लिए है क्योंकि NGO भारतीय संस्कृति नहीं है, भारत को इस संस्कृति की समझ भी नहीं है, और अगर है भी तो १०-२०% से अधिक गैरसरकारी संस्थाएं अपने प्रपोगंडा के अनुसार कार्य भी नहीं करती।

२- अनियंत्रित पंजीकरण एव कार्यप्रणाली : भारत में प्रतिदिन 800 से अधिक NGO पंजीकृत होते हैं, और ये प्रक्रिया कई दशकों से चल रही है...पंजीकरण की प्रक्रिया पर कोई नियंत्रण नहीं है। केवल एक संस्था के सदस्य ही जितनी चाहे उतनी संस्थाए पंजीकृत करा सकते हैं। मैंने जिन संस्थाओं में कार्य किया दुर्भाग्य से वो सभी समाजसेवा के हित में समाजसेवा करने के नाम पर बनाई गयी थी। इन सभी संस्थाओ के प्रशासन का ध्यान केवल धनोपार्जन पर ही रहा। न सिर्फ इतना ही बल्कि प्रत्येक संस्थाजनित कार्य में उस सुविधा अथवा मौके की तलाश की गई जिसमे अधिकाधिक धन बचाया जा सकता था, वह धन जो बच्चो, वृधो, सामाजिक अथवा राष्ट्रीय विकास के लिए था। धन को NGO में किस प्रकार खर्च किया गया है इसके लिए कोई जांच अगर होती भी है तो वो भारतीय बाबुशाही की भेंट चढ़ जाती है। भारतवर्ष में NGO के पंजीकरण की प्रक्रिया भी एक हास्यास्पद घटना है। किसी भी प्रकार बना हुआ एक दस्तावेज जो पंजीकरण के लिए आवश्यक है, एक समुचित नाम, कुछ जाली दस्तावेज जो सदस्यों के नाम, स्थायी पते के लिए आवशयक हैं के अतिरिक्त ५-६ हज़ार रुपये। इस सभी सामग्री के साथ NGO संस्कृति को भारत में होम कर दिया जाता है। पंजीकृत होने वाले NGO'S के अधिकाँश सदस्यों के नाम या तो जाली, मित्रों के या रिश्तेदारों के होते हैं। पंजीकरण की प्रक्रिया के दौरान ही हर उस बाधा का तोड़ उस दस्तावेज में ड़ाल दिया जाता है जो बाद में आ सकती हैं। भारत की न्यायिक व्यवस्था और कर व्यवस्था की पेचीदगी भी उन संस्थाओं की मदद ही करती हैं जो सिर्फ धनोपार्जन के लिए बने जाती हैं। कर मुक्ति एक सबसे बड़ा उपाय हैं NGO के माध्यम से धनोपार्जन करने का। न ही पंजीकरण के दौरान और न ही सक्रीय कार्यकाल में इस पर भारतीय प्रशासन ध्यान देता हैं। पंजीकरण कार्यालय से संपर्क करने पर पता चला की सरकारी अमला इस लिए इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप इस लिए नहीं करता क्यों की पंजीकरण से लाखों रुपये की प्रतिमाह आमदनी होती हैं। परन्तु पंजीकरण के बाद इन संस्थाओं को दिए गए और निजी स्वार्थ में खर्च होने वाले करोड़ों सरकारी रुपयों के बारे में कार्यालय अधिकारी के पास कोई कोई जवाब नहीं मिला। मुझे अधिकारी की समझ के बारे में आश्चय हुआ जिसने लाखों के राजस्व को तो ध्यान में रखा पर करोड़ों के अपव्यय पर उसका ध्यान नहीं गया। 

३- अनुचित लोग, अनुचित कार्य: मेरे एक निकट मित्र ने कई NGO पंजीकृत करा रखे हैं, जिनके माध्यम से उन्हें प्रतिवर्ष लाखों रूपये की आमदनी होती हैं वो भी सरकार से। उनके द्वारा किये गए किसी भी कार्य का मुझे ज्ञान नहीं हैं। एक बार बात बात में मैंने जब यह पूछ लिया की बिना काम के आप को पैसा कैसे दे दिया जाता हैं तो उनका जवाब था.....साहब काम तो हम भी करते हैं, सारा दिन फ़ाइल ही तो तैयार करते हैं.....यह एक मजाक तो था ही पर कटु सत्य भी था। मैंने पुछा की आप के NGO में कार्य करने वाले लोगो को तो आप को वेतन देना ही पड़ता हैं...तो उनका उत्तर था......एक लड़का और एक लड़की ऑफिस में गुटरगूं करने के लिए काफी हैं दोनों को ४-४ हज़ार रुपये आशिकी करने के देता हूँ, बाकी फाइल में रहते हैं। मैंने जब उनसे कर्मचारियों के योग्यता के बारे में पुछा तो जवाब था की साहब NGO में काम करने के लिए ग्रेजुएट होना काफी हैं।

इतने सत्य बोलना भी बुराई करना ही हैं, ख़ास तौर से जब मैंने खुद ऐसी संस्थाओं में काम किया हैं। मुझे लगता हैं इतना काफी हैं........!

भारत और पाक

अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के मुद्दे पर आज मैँ एक परिचर्चा सुन रहा था जिसमे अफगानिस्तान पाकिस्तान ओर भारत के प्रतिनिधि शामिल हुए।
परिचर्चा के दौरान ही यह साबित हो गया की क्षेत्रीयआतंकवाद की जड़ पाकिस्तान के एसे कट्टरवादी लोगोँ हे जो ना खुद चैन से रहते हे न दूसरोँ को रहने देते हैँ अफगानिस्तान के प्रतिनिधियो ने भारत की इस बात का समर्थन किया।
मैं इस तरह के वाद विवाद सुनने का अभ्यस्त हूँ लेकिन आज ये देख कर दंग रह गया कि पाकिस्तान के प्रतिनिधियो ने आर एस एस, बजरंग दल, मुक्ति वाहिनी और विश्व हिंदू परिषद का नाम लेकर हिंदुओं को भी उसी कट्टरवादी श्रेणी मेँ रख दिया इसके ठीक बाद भारत और अफगानिस्तान के प्रतिनिधि विचलित दिखाई देने लगे।
यह अफसोसजनक है की कुछ कट्टरवादी हिंदू संगठनोँ के कारण सभी हिंदुओं की कई हजार साल पुरानी अहिंसक प्रकृति पर प्रश्नचिंह लग रहे हैं।
कुछ ओर हो ना हो पर आर एस एस और बजरंग दल की कट्टरवादिता के कारण हिंदुओं को भी मुसलमानोँ की तरह कट्टरवादी और हिंसक समझा जाने लगेगा।

मेरे पिता ने कहा

भला शंकर, ब्रम्हा, अल्लाह, मोहम्मद, कृष्ण, और जीसस से मुझे क्या मतलब......बने रहें वो जो भी हैं........? मेरे पिता ने कहा....तू हिन्दू पैदा हुआ है पर........ इंसान बनना.........बस मुझे इस से मतलब है..!

आदर्श

अपने आप में एक चिरंतन प्रगतिवादी घटना है जिसकी परिभाषा घटना के प्रादुर्भाव के पहले ही क्षण स्वयं को झुठला देती है।
आदर्श का अस्तित्त्व प्रकृति के सन्दर्भ में प्रतिपल बदलता है लेकिन मानव स्मृति में यह घटना भाव बन कर लंबे समय तक रह जाती है यही कारण है की मानव सभ्यता में "आदर्श" जीवित रहते हैं।

रंगीला महात्मा गांधी।


इसी शीर्षक पर और ऐसे ही कई और आर्टिकल मैंने अभी हाल ही में फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया साधनो पर देखे जिनको जोर शोर से शेयर किया जा रहा है।
गांधी कैसे थे कैसे नहीं वो अलग मुद्दा है पर जिन्होंने लिखे वो कुत्सित और विकृत मानसिकता के लोग हैं। ऐसे लोगों को तलाश रहती है मुद्दों की जिनको उछाल कर लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकें और अपनी मानसिक विकृति की क्षुधा को तुष्ट कर सकें।
नहीं तो भला 70 साल पहले मरे हुए की कमी निकालने की क्या जरुरत। भाई उसमे से वो ढूंढो जो अच्छा है और आगे काम आये। तुम एक विकृति की बार बार बात कर के उसका विज्ञापन ही कर रहे हो।
और पढ़ने वाले......उनको तो रस मिलता ही है। कल्पनाओं में ही सही वो पोर्नोग्राफी का मज़ा लेते हैं।
मैं शर्त लगा कर कहता हूँ जो लिख रहे हैं उनका कोई न कोई आर्थिक राजनैतिक या सामजिक फायदा अवश्य है (और दिमाग में गंदगी है) लेकिन पढ़ने वाले काठ के उल्लू, गधे हैं।

विकास

वो चीज़ जिसे तुम विकास कहते हो.........वो गरीबों के लिए नहीं है---
विकास है उनके लिए जो कोयला खोदने से पहले आदिवासियों की झोपड़ियाँ खोद देते हैं...!
विकास है थुलथुले मोटे करोड़पतियों और अरबपतियों के लिए!
विकास है इन अरबपतियों की बड़ी कंपनियों में नौकरी कर रहे मोटी तनख्वाह पा रहे लोगों के लिए!
विकास है उन धंधेबाजों के लिए जो किसानों का अनाज १० में खरीद १०० में बेचते हैं!
विकास है उनके लिए जो कार खरीद सकते हैं, जो ५० हज़ार का फोन खरीद सकते हैं, जो माल में जाकर २०० किलो की दाल खरीद सकते हैं!
विकास है उनके लिए जिन्होंने कभी गाँव नहीं देखा लेकिन गाँव का हर संसाधन उनके लिए पैसा फेकते ही हाज़िर है....!
विकास है उनके लिए जो रोज़ शाम को ५००० की शराब मर्सिडीज़ के अन्दर बैठे पी जाते हैं!
विकास हैं उन पुलिस वालों के लिए जो आदिवासियों की लड़कियों को उठा ले जाते हैं बलात्कार करते हैं गोली मार देते हैं और बन्दूक बगल में डाल कर उन लड़कियों को नक्सली घोषित कर देते हैं क्योंकी इसके बाद लड़ाई लड़ रहे आदिवासियों का इधर हौसला टूट जाता है उधर दरोगा को इतना करने के १-२ लाख रूपये मिल जाते हैं!
विकास है उन नेताओं के लिए जो उद्योगपतियों के लिए वेश्या का किरदार अदा करते हैं! नेता जो अपने आत्मसम्मान का बलात्कार करवाने के बदले चुनाव की फंडिंग पाते हैं...फिर किसानो से ले कर माध्यम वर्ग तक सब का शोषण करते हैं...!
अगर तुम किसान के बेटे हो.....एक छोटे नौकरी पेशा बाप की औलाद हो.....एक छोटे दूकानदार की जायज़ औलाद हो.......................तो ये सारी बातें तुम्हारे लिए हैं... .................और फिर बता दूं की विकास तुम्हारे लिए नहीं है..!

मुझे विश्वास है

मुझे तसल्ली है की तुम मुझे पसंद नहीं करते, और ये विश्वास भी है कि मैं ही सही हूँ....!
क्योंकि यदि तुम मुझे पसंद करते तो इसका मतलब होता - मैं वो कहता हूँ जो तुम चाहते हो, मैं वो लिखता हूँ जो तुम चाहते हो, वो सब झूठ होता, वो सब चापलूसी होती!
तुम्हे मीठी गोलियां पसंद हैं, मैं कडवी नीम हूँ, तुम्हे जलेबियाँ पसंद हैं, मैं मिर्च सा तीखा हूँ.....!
अगर तुम मेरे साथ नहीं चल रहे तो ऐसा नहीं है कि मैं अकेला हूँ...........दरअसल तुम मेरे साथ नहीं चल पा रहे हो......मेरा पथ कांटो भरा है और तुम्हे गुदगुदे कालीन पसंद हैं....!
तुम वातानुकूलित कमरों के आराम के तलबगार हो.....मैं कड़ी धूप का राहगीर.........! तुम मुझसे लड़ते हो, कीचड उछालते हो मुझपर और मुझे उकसाते हो तुम्हारी उन अतार्किक बातों का जवाब देने के लिए जिनका कोई ठोस आधार नहीं है......! 
और जब तुम देखते हो कि मैंने तुम्हे नकार दिया है, तुम चिढ जाते हो, मुझे कोसते हो, गलियाँ देते हो...! 
गालियाँ देते हुए तुम ये भूल जाते हो की अनजाने ही उनका अपमान कर रहे हो जिनकी दुहाई दे कर तुम अपना धंधा चलाते हो........तुम स्त्री, माँ, बहन जैसे शब्दों की महत्ता भूल जाते हो....!
हाँ इसीलिए............मुझे विश्वास है की मैं ही सही हूँ...!

Saturday, June 4, 2016

तुम, इम्तेहान और सब..!

तुझसे ही बस फेर लेता हूँ नज़र
कर देता हूँ नज़र अंदाज़

वरना

मोहब्बत भी करता हूँ
तो इम्तेहान लेता हूँ
आँखे पढ़ लेता हूँ
शख्शियत पहचान लेता हूँ

निस्सार करता हूँ वफ़ा
तो बेवफाई पे
जान लेता हूँ
मुझ से मिलना जरा सम्हल कर
लफ़्ज़ों से पहले ज़ुबान लेता हूँ

कितने भी पोशीदा हो तुम
के हो लाख परदों में फितरतें
और छुपा लो जैसे भी
के राज़ हों तो....जान लेता हूँ..!

मुझसे वफाओं में
जो पाओगे महक है जन्नतनशीं
की रिश्तों में, किमाम लेता हूँ
ज़ाफ़रान लेता हूँ

खुद को भी परखता हूँ
बेवफाई से बचता हूँ
अपना भी इम्तेहान लेता हूँ..!

ऐसी रातों से दिल भर गया

ये ज़िन्दगी भी
गर रात भर की हुआ करती..
हर दुसरे रोज़
सुबह होती..
यूं स्याह अँधेरे न रेंगते
मेरे वजूद के इर्द गिर्द..

ना आये ख्वाब
तो भी क्या बात थी?
जिंदगी यूं भी
तो बसर हो सकती है

अंगड़ाई होती के
गोया आज़ादी ही होती
सुबह होती के इंतज़ार होता
आती ही होगी

ज़िम्मा होता भी
तो ज़र्रा ज़र्रा
फ़िक्र होती तो
कतरा कतरा...
होती तो बस इतनी ही होती..

मेरे पैमाने भरने का
सबब भी क्या...?
ये बेहिसाब रातों का नाश
और मयनोशी
मेरी तो फितरत न थी

ऐसी रातों से
दिल भर गया....!

Tuesday, May 31, 2016

तुम...हाँ तुम...!

जब न करना चाहूँ
सबसे ज्यादा याद आती हो तुम..

मैं उदास होता हूँ
और मुस्कुराती हो तुम

कभी कभी यूं भी
दिल बहलाती हो तुम...

इंतज़ार होता है न जाने किसका
और ख्वाबों में आती हो तुम..

इधर उठता है धुआं दिल से मेरे
और उधर इठलाती हो तुम...

कभी यूं भी होता है
की शाम होती है बेहद अँधेरी...फिर
अपनी यादों का
दिया जलाती हो तुम

मेरी अहमियत ज्यादा नहीं
फिर भी मेरे वज़ूद में हो
क्यों मुझसे इतना जुड़ जाती हो तुम

कभी कभी
बहुत याद आती हो तुम....!

Monday, May 2, 2016

जागें फिर से...

चलो फिर से
आज़ादी की कहानी लिखें

लिखें तो नयी लिखें
क्या नए मुलम्मे में पुरानी लिखें

जहाँ मज़हबों की आंच
ठंडी पड़ी है, ऐसी बारिशों की
शाम सुहानी लिखें

तुमने अपनी जवानी ज़ाया कर दी
मंदिर मसाजिद के फेर में
हम क्यों उसी लकीर पे
अपनी जवानी लिखें

थोडा आबे जमजम लिखें
थोडा गंगा का पानी लिखें
फिरकों को दफ़न करो
आओ कुछ रूहानी लिखें

निकलो सियासती बुज़ुर्गो
हमारी संसद से
हटो के हम आते हैं
नज़र ऐ वतन नौजवानी लिखें

तुमने कैसे चूसा है खून सियासत में
बता देंगे अब, और ये भी
के बस इक अम्न खातिर
कितनी हमने ख़ाक छानी लिखे

दंगों के दहकते शोलों को हटा
नरम गोद दें माओं को
जख्म ले के बहनों के
किस्मतों में उनके रातरानी लिखें

उठ के बच्चा कोई
न बिलखे दूध खातिर
न फिक्रमंद हो अवाम भूखे सोने की
कभी तो ऐसी सुबह सुहानी लिखें

Sunday, May 1, 2016

हालात

बहाने से ले के हिजाब की ओट
बैठी है मेरी मा, के चेहरे पे
बाप की मर्दानगी के निशान दिखते हैं

मेरे मोहल्ले में भी,
खुदा नहीं दिखता,
खुदाई नहीं दिखती
सिर्फ हदीस-ओ-कुरआन दिखते हैं

ये कैसा मज़हब है?
और कैसा मुल्क है
हैवान की फितरत में डूबे
इंसान दिखते हैं

उनको अय्याशी,
हमें मजदूरी की आदत
लेकिन वो,
हमारे दड़बे की रौशनी से
परेशान दिखते हैं

हक़ की बात न करो बुर्कानशीनो
मज़्ज़म्मत न बुलाओ अपनी
अजब अदालतें है इस मुल्क की
यहाँ एहसान में लिपटे,
खूनी फरमान लिखते हैं

यूं गिरियां, तोहमतें न लगा
चुप रह, इक इब्रत क्या काफी नहीं
तेरे ज़ूद एहसास के खातिर
क्या तुझे नहीं इस मुल्क के
मुर्दा जवान दिखते हैं

इस अब्तर नस्ल की खैर
लेने न आएगा कोई
हमसे ले गए जो बुलंदियां
उनको पैरों तले जमी अब याद नहीं
सिर्फ आसमान दिखते हैं

आओ गमख़्वार हो जाएँ
हम एक दूजे के ही
कहाँ अब इस गोशे में
वो मज़हब के ठेकेदार
वो हुक्मरान दिखते हैं


शब्दकोष मदद के लिए

गिरियां- चीखना चिल्लाना
इब्रत-डांट
ज़ूद-तुरंत
अब्तर- नष्ट, मूल्यहीन
गोशा- कोना, एकांत
गमख़्वार- दिलासा देने वाला

Friday, April 8, 2016

असम

काज़ीरंगा की धुंधली सुबहों में
चहकते जो परिंदे
हरियाली चादर पे
फिरती नाचती प्रकृति
जन्नत का होता भरम

तिबा मिसिंग कोरबी
और बोडो संग वैष्णव
थिरकते मचलते नाचते
झंकृत हो करताल
और बजे मिरदंग

कहानियाँ सुनाती हैं
दीवारें राज़ छुपाती हैं कम
सीधा था सादा था
आज भी मासूम है
सदा के जैसा असम

बोध

रुई से धवल बादलों को तुम
सहलाते होगे....
महसूस करते होगे नरमी
और गुदगुदा एहसास

होराइजन की नीली छटा को निहार
पुलकित होते होगे

सुनहरी किरणों को समेट कर
अंजुली में अपनी
उछाल उछाल कर
बाल क्रीडा का आनंद
लेते ही होगे...!

वो जो आयनमंडल से लगी
बादलों के ऊपर की
निर्मल हवा है
भर के अपनी साँसों में
मुग्ध होते होगे

चुटकी बजाते ही
सब ज़हर हो जाता होगा
उड़नछू...
ईश्वर जो हो...!

कहो हम क्या करें
जो हमने अपनी
बगिया उजाड़ी है स्वयं

अब एक दम भर
सांस के लिए घुटते हैं
शहर शहर गाँव गाँव..!