Friday, April 26, 2013

गोया मोहब्बत है.....!

तुम से छुप के,
हो जाती थी,
बाज़ दफा मयनोशी..।

सामने देख कभी तुम्हे,
फेक दिया करता था,
सिगरेट.....।

गोया मुहब्बत न थी,
हौव्वा था....।

अब सुबह से शाम तक,
सुरूर ही सुरूर है..।

तुम्हे याद करता हूँ,
तो हथेली पे ही,
बुझाता हूँ सिगरेट....!

बड़ा आराम आता है,

हकीम कहते हैं,
चँद रोज़ है जिंदगी बची,

न तो खुल्लम खुल्ला,
जामनोशी पे है काबू..।

न सिगरेट ही गिरती है,
हाथ से, छटपटा कर...।

हमारे हौव्वे के जनाज़े,
कब के उठ चुके.......!

रिश्तों की वादियों में...।

जो तेरा भरोसा था,
पीछे खड़ा,
फौलाद था मेरा सीना...।

आज तेरे बिना, मात रूबरू है,
और ये मुश्किल, तेरे भरोसे से,
बड़ी है शायद....।

फिर आज की रात,
नम है, सर्द है,

रिश्तों की वादियों में,
गफलतों की बर्फ,
पड़ी है शायद....।

कतरा कतरा बह रहे हैं,
वजूद-ओ-चश्म-ऐ-नम तेरे मेरे,
जिंदगी एक मर्तबा फिर,
दोराहे पे,
खड़ी है शायद....।

अजब सी बुनियाद पे,
खड़ी थी हमारे,
रिश्ते की दीवार...।

झटका तो लगा है कोई,
टूटने की आवाज़ आई है,
गिर पड़ी है शायद....।

Wednesday, April 24, 2013

बिस्तर पे दो चेहरे..।

दोस्तों में मसरूफ कभी,
लड़की का इंतज़ार,
एक लड़का करता रहा...।

तो कभी काम में उलझे,
लड़के की राह,
एक लड़की देखती रही..!

चिंदी चिंदी वक़्त गुज़रता रहा..!
थोड़ी सी गर्मी बढ़ती रही,
न जाने क्या सुलगता रहा..!

क्यों करू मैं फोन,
उसको ही फ़िक्र नही..!
जाना था बाहर,
बताने में हर्ज़ क्या था...?

लड़का एक हाथ में फ़ोन,
दूसरे में सिगरेट ले कर,
सोचता रहा...।

दो घंटे हो चुके,
एक फ़ोन भी नही किया जाता,
उसको मेरी फ़िक्र ही कहाँ अब?

कर लेता तो,
घिस नहीं जाता....!
रेस्त्रा में अकेली बैठी,
लड़की सोचती रही.....।

कुछ ऐसे ही और,
हालातों से रूबरू हो,
हर पल थोडा और दूर,
होते रहे....!

अब वो आलम है,
कि वजह नही कोई...!

न पास आ पाने की,
न खुद को,
न उसको, समझाने की..।

कि आखिर ये दूरियां,
कब दरम्यान सिमट आयीं...!

एक ही बिस्तर पे,
दो चेहरे, आँखे मूँद,
सोने का बहाना कर रहे हैं....!

न जाने कैसी ये खुदाई है....?

झूठ ही झूठ है,
धोखा ही धोखा है,

कुछ सोच कर मैंने भी,
अपने दिल को रोका है...।

तकलीफ-ओ-दर्द है,
लम्बी तन्हाई है...!

कुछ खुद किया है,
मेरी कुछ ये हालत,
दुनिया ने बनाई है...!

जिस से निभाना था,
जन्मो जनम का रिश्ता,
हर वो अपनी शै, पराई है।

चुके नही हो तुम भी,
जब भी मिला है मौका,
बेवफाई पूरी निभाई है...!

अब उड़ाता नही हूँ,
मज़ाक पीरों फ़कीरो का,
दिल दुनिया में क्यों नही लगाना,
आखिर बात समझ आई है....।

न जाने मैं हूँ कौन,
तुम हो क्या,
न जाने ये उलझने है क्यों,
न जाने कैसी ये खुदाई है...।

जब भी लगता है,
बात समझ आ गई,
जीने का सलीका आया,
और क्यों जीना है,
ये पता चल गया...।

दस्तक नई रुसवाई की,
फिर से दर पे आई है..।

न जाने मैं हूँ कौन,
तुम हो क्या,
न जाने ये उलझने हैं क्यों?
न जाने कैसी ये खुदाई है.....?

Monday, April 8, 2013

इस शहर में भी....

चौंक गया हूँ,
यहाँ भी हैं......

वही इमारतें.....कंक्रीट के दरख़्त।
उतनी बुलंद तो नहीं,
पर उतनी ही बेजान।

और उतना ही,
खून पीने वाली...।

इन दरख्तों में,
अजीब सा रिश्ता है...।

मेरे कमरे को भी,
आ कर घेरे खड़े हैं....।

बेजान दीवारों में,
इक दरवाज़ा दोनों ओर,
बराबर खुलता है.....।

कमरे में बस यही है,
दिल लगाने लायक....।

दो अलग दुनियाओं के दरम्यान,
मेरा बराबर का साझीदार...।

और इक पहाड़ी,
छत की फुनगी से,
बहुत दूर नज़र आती है.

पत्थर पाने को
कोख खोद डाली है उसकी।

तो बच के भागी है,
शहरी दरिंदो से....।

भला ऐसे शहरों में,
मासूमो की बिसात क्या होगी......?

Friday, March 29, 2013

मियाद...।

एक मुद्दत से परछाई,
पीछे पीछे चली आती है,
और तुम...?

बरसों से,
मेरे इंतज़ार की,
वजह बन कर.....!

मेरी नज़रों की मियाद से,
कोसों परे हो...

बेशक मुझे दिलासे,
दे गए हो,
पर इनकी भी तो मियाद है...!

अब मुकरने लगे हैं....

तुम्हारी दुहाई दे कर,
तुम जैसे ही,
अंधेरों में, फ़ना होने लगे हैं...

हाँ उन्ही अंधेरों से,
अबअजनबी सा दर्द,
नमूदार होता है....!

कभी मैं इसके पार होता हूँ,
कभी ये मेरे पार होता है.....।

इन परछाइयों, फुरकत,
और अंधेरों के दरम्यान,
कभी बेबसी की टीस है,
कभी सुर्खरू दर्द,
गुलज़ार होता है....!

दुआओं में तो,
आखिरी अंजाम माँगा है इसका,
हर सुबह,हर शाम,
हर दफा,
न जाने क्यों हर बार होता है...?

यूं तो तुमसे भी परे,
और जहाँ भर से,
पर कोई तो समझ लेगा,
बाज़ दफा, झूठा एतबार होता है...!

कमबख्त क्या ये है...?
अंजाम-ऐ-इश्क...?

दीवाना ही,
हर बार, गुनाहगार होता है......?

Sunday, March 24, 2013

बस ऐसे ही रहना......।

न हवाओं के रुख यूं ही रहेंगे,
न वादियों की खुशबुएं ही,
मुस्कुरायेंगी हमेशा...!

मैं बस यही रहूँगा..!

कभी कभी सूरज भी,
मद्धम हुआ करेगा,
और चाँद का दामन,
नम हुआ करेगा....!

मैं बस यही रहूँगा..!

शोखियां दो जानू,
सजदाफरोश कभी,
और ये गुरूर कभी,
ला-वहम दुआ करेगा...!

और मैं बस यही रहूँगा..!
रात की गहरी नीली चादरों में,
लिपटे पड़े सन्नाटे को,
कभी तुम छन से तोड़ दोगे,
और कभी वो मुझे....।

सब वजूद बदलेंगे,
सावन उतरेंगे चढ़ेंगे,

पर मैं बस यही रहूँगा..।

जब सुबह की पहली किरण,
हौले से पेड़ की फुनगी पर,
मखमली पत्तियों पे,
उतर उतर आएगी....।

सुर्ख, सूजी, उनींदी,
चार आँखे अपनी अपनी,
कहानियों के ढेर,
फिर अश्कों से तर करेंगी....।

यूं तो तुम्हारी नज़र,
मेरी जानिब बदल गयी होगी,
फिर भी मैं यही रहूँगा...।

तुमने ही तो कहा था,
सोना, हमेशा ऐसे ही रहना......!

Thursday, December 20, 2012

खुद भी सहा है, लोगों से भी सुना है......

विद्रोह है या विरक्ति?
या बस मन ही अनमना है?

यूं तो ज़रा सा है,
पर पहले से कई गुना है।

खुद भी सहा है,
लोगों से भी सुना है।

तुम जैसे, सब के जैसे,
ये जाल मैंने भी खुद बुना है।

उलझने हैं, परेशानियां हैं,
हसरतें हैं, हैरानियां हैं,

अफसाने हैं, कहानियां हैं,
तरफ़ एक हम हैं,
इक तरफ़ दुनिया है।

और बेबसी का मंज़र रूबरू,
तुम जैसे ही मैंने भी चुना है।

खुद भी सहा है,
लोगों से भी सुना है।

आदतन इंसानियत सब मे,
पर दिल सब मे अनसुना है।

खुद भी सहा है,
लोगों से भी....हमने सुना है......।

Tuesday, October 16, 2012

मैं तुम सब हूँ.....

न हिन्दू हूँ,
न मुसलमां,
हर मज़हब जिया हूँ
कहकशां हू .....

मेरी पहचान पे,
सवाल उठाने वालो,
गौर से देखो,
सिर्फ तुम्हारा ही .....
नाम-ओ-निशां  हूँ .......

खुद से मुझे जुदा करने की,
कर  लो हज़ार कोशिशें,
आखिर न कर पाओगे,
अक्स हूँ तुम्हारा ........
बस तुम सा हूँ ......

मेरे तुम्हारे वजूद में,
दरअसल,
फर्क ही कहाँ कोई,
जो तुम न हो,
तो फिर मैं कहाँ हूँ ..........

मासूमियत हूँ,
बुज़ुर्गी हूँ,
और मैं ही तो,
अल्हड जवां  हूँ ....

बेशक तुमने मुझे लुटाया,
नादानी  के तहत,
पर अब तो सम्हालो,
मैं ही तो बचा,
तुम्हारा कुल जमा हूँ ...........


कच्चे पक्के रिश्तों पे ही सही,
पर खड़ा हूँ, शान से,

मैं तुम  सब हूँ,
मैं हिन्दोस्तां हूँ ......

Sunday, September 30, 2012

शहर ओ बशर ........

आफत तमाम आ पडीं,
रास्ता कोई नज़र आता नही ......

उम्र बीती जो  तन्हाइयों में,
मज़ा-ओ-हम्नफ्सी में अब,
गुज़र आता नहीं ..........

वीरानियों में,
शब् अँधेरी ही आती है इधर .......

चराग-ए-उम्मीद लिए,
कोई बशर आता नहीं ........

मेरा साया दगाबाज़ निकला,
अब तो आस पास भी,
नज़र आता नहीं ............

फ़क़त एक ख़ुशी को तरसता,
मेरे आँगन का शज़र .......

उफ़ दौर-ए- गम,
क्यों, ये गुज़र जाता नहीं .......

छोटी छोटी तंजिया मुस्कुराहटों का,
कुछ तो राज़ है जरूर,

इस शहर में तफसील से,
कोई मुस्कुराता नहीं .........

Wednesday, August 29, 2012

और तुम......!

कभी थकान भरी निराशा को,
साथ लेकर,
हदों के पार जाने की कोशिश ......!

ये जो तुम मिलती हो मुझसे,
शाम की उदास लहरों की तरह ......!
 जैसे सहला रहे हो,
ज़ख्मो को आहिस्ता ....!

कभी जहां भर की ख़ुशी को,
खुद में समेटे,
जोश से लबरेज़,
लिपट जाती हो मुझसे ........!

मुझे झरने पे उछलती,
पानी की बूंदे याद आती हैं,

जब भी कभी तुम आती हो,
सर्द एहसास बन कर ...........!

बैठ जाती हो कभी यूं चुप हो कर,
कि समेट लेती हो शाम की,
सारी लाली  अपने आँचल में ..........!
और मेरा अस्तित्व,
रंगहीन लगता है मुझे ........!

देखो तुम ही तो,
सारा संसार हो ..........!

मेरे तुम्हारे रिश्ते जैसा..............!

,
देखो तुम फिर याद आ रहे हो,
मुझसे मत कहना,
कि लिखा मत करो .......!

खुद ब खुद छलकती है, स्याही,
भीगते हैं, कागज़ .......!

मुझे वैसे भी,
रंगीन कागजों को,
सिरहाने रख सोने की,
आदत ही कहाँ है .......?

जला ही देता था,
पर तुम .........!
संजो संजो रखते रहे ......!

ये  पेन तुमने ही पिरोया है,
उँगलियों में मेरी,
अब जुदा करते बनता नहीं ........!

यूं तो अरसा गुज़र गया,
पर जब तब,
बरबस खींच देता है, अक्स,
ये नामुराद न जाने कैसे कैसे,
सादगी से लिपटे सफ़ेद पन्नो पे ......!


तुम जब भी,
मुझे झूठा कहतीं,
मैं मन ही मन सोचता ....!

यार तुम से तो कभी नहीं कहता ...........!

ये कमबख्त पेन,
पुरानी सब सच्चाईयाँ खोल रहा है,

इस नज़्म में भी ढीला है कुछ,
अब ..........!
मेरे तुम्हारे रिश्ते जैसा ............!

बस ये सवाल रह गया है.....

तुम्हारे पीछे यादो ने,
मुझे तंग कर रखा हैं........

तुम जाओ,
ये खुद खुद चली जायंगी.....


बेतरतीब कमरा,
रोज़ पूछता हैं,
तुम कब रही हो.....


दूध अब भी गरम कर देता हूँ,
हर शाम, ये सोचते हुए,
सुबह तुम्हे चाय पीनी होगी.......


तुम उस दिन झगड़ते हुए,
कमीज़ के सब बटन तोड़ गई थी.....

हर रोज़ लगाने बैठता हूँ,
फिर बैठा ही रह जाता हूँ.......
एक जंग मेरे भीतर शुरू हो जाती है.....


रात अचानक नींद से जाग,
तुम्हारा नंबर मिला दिया..........
पहुच से बाहर था......

कौन कहता है,
फ़ोन ने दूरी मिटा दी है.............

क्यों चले गए हो,
सब यही पूछ रहे हैं.....
तुम्हारे बाद, बस ये सवाल रह गया है.....

पहेली...........!

जब भी.......
यथार्थ की सीमा से परे,
ले जाते हो ........!

तुम तो निराकार हो कर,
रम जाते हो,
सृष्टि में ..........!

परन्तु मेरे भौतिक अस्तित्व पर,
लग जाता है प्रश्नचिन्ह,
 मैं अपनी संवेदना को,
कौतुहल में पिरो कर,
जपता हूँ, कुछ अनसुलझे से शब्द ........!

फिर तन्द्रा भंग होने के साथ ही,
उग्र आवेग में बह जाता है,
सारा विश्वास, और ........!

एक क्रान्ति जन्म लेती है,
जिसे तुम्हारी सृष्टि,
अवज्ञा, नास्तिकता,
और ना जाने क्या क्या कहती है,

मैं उस क्रान्ति का,
अंतरिम भाग बन कर भी,
उद्विग्न रहता हूँ ..........!

भ्रम बढ़ता जाता है,
पल प्रतिपल,

अब सुलझा दो इसे,
ये पहेली पीड़ा देने लगी है ..........!

पानी के साथ...........!

गर्मियों की उमस भरी दोपहर में,
उकताया हुआ,
खुद पे थोडा गुस्साया हुआ,

शहर की बदनाम गलियों से,
गुज़रा मजबूरन ............!

फिर एक कार को रुकते,
और एक लड़की को,
उस से उतरते देखा .......!

मैं बढ़ गया,
पान की इक दूकान की ओर,
नज़र चुरा कर ......!

और लड़की मेरी ओर ......!


पानी की एक बोतल,
बुझा रही थी प्यास, बढ़ रही थी लड़की मेरी तरफ,


खाली बोतल फेकने से पहले,
उसने टोका मुझे,
ऐ बाबू  ............!


जैसे वो कार वाला कमीना,
फेक गया है मुझे,
तुम मत फेको इसे ..........!

Thursday, May 3, 2012

शोखी और बेवफाई, हर शबाब के साथ,
कांटे तो अदा हैं......
हर गुलाब के साथ.....

नज़र उठाई,शर्मिंदा हुए ,
उन्हें देख कर.....
फिर इक  तंज़  आया,
आदाब  के साथ.....

मुलाकात  आखिरी, बात आखिरी,
हमारे इक  सवाल,
उनके इक  जवाब के साथ....

इंतजार तो था और उम्मीद भी,
घर भी बहा ले जायेगा, ये मालूम  न  था,
वो आया भी, तो इक  सैलाब के साथ......

कांटे तो अदा हैं......
हर गुलाब के साथ.....


दिल  का ताज  खंडहर है,
हर दीवार-ओ-मेहराब के साथ.....

हस्ती दफन  कूचा-ऐ -यार में,
अंतस  का अलविदा,
इस  इन्तखाब के साथ.....

Saturday, April 7, 2012

अजीब है न........?

सुबह कुछ ज्यादा ही लाल है
या तुम्हारी लिपिस्टिक कर रंग
फैला है थोडा सा...



ट्राफिक में फसा हूँ,
सोच रहा हूँ,
तुम्हारी अंगड़ाई ख़त्म हो,
तो आफिस पहुचुं......



तुम्हे याद करता हूँ,
औफ़िस की कॉफ़ी में,
चीनी की ज़रुरत नहीं लगती..........




ऑफिस की छुट्टी की,
बाय बाय में....
तुम्हारा सुबह का हेलो,
अब तक मिला-जुला है..........
तुम घर में रहती हो,
या मेरे दिमाग में...........?



थोडा रूठ कर,
झगड़ कर, मेरे सीने पे,
मुक्के नहीं मारे आज.......
शाम उदास सी है...........!



छज्जे पे खड़ी तुम,
डांटती हो,
गली के बच्चों को,

मेरे कान में,
घुंघरू क्यों बजते हैं..........?




सब मुझे समंदर कहते हैं,
यहाँ मैं तुम में डूब जाता हूँ,..........
अजीब है न........?

Monday, April 2, 2012

फर्क......


एक घनी बस्ती, इक गन्दा सा रास्ता,
एक दोयम सी दुनिया, पक्का सा वास्ता....

सुलगी सी परछाइयाँ, आगे आगे,
ठहरा ठहरा सा ये मुल्क बजाफ्ता.....

निरे ढूह बुर्ज ईमान के,
गिरी पड़ी वफादारियों की हवेलियाँ,
ज़मीर-मरीज़-ऐ-बे-दम हांफता......

रिजवान-ऐ-अवाम को,
अब कहाँ काफिरी की फ़िक्र,
पुर्जे कागज़ के महंगे, लहू सस्ता....

दरकार-ऐ-दीद और कुछ नहीं,
बस वो मख्लूकात-इंसान,
उसका छोटा ईमान का एक पुश्ता............

Tuesday, September 20, 2011

सलाम...........

दिन भर के थके,
उदास शाम की गोद में बैठ,
जुबां और हलक की प्यास,
ना जाने किस किस ज़हर से बुझाकर,
पर फिर भी प्यासे रह कर,

वो जो, 
देर रात तक अपने तकिये,
गीले करते हैं...........

जिन्हें सुबह आ कर,
थपथपाती है......

माँ का प्यार देती है........
और कहती है........
बेटा उठ आज तुझे फिर,
दिन भर की जंग लड़नी है........

तू थक भी कैसे सकता है,
MNCs के गुलामों को,
थकने की आज़ादी नहीं है..........!

Monday, August 1, 2011

ख़ुदकुशी की और बेहतर तरकीब न मिली,
 हमने तुझसे आशिकी कर ली.........





Thursday, May 5, 2011

भरोसा...... !


क्या होते हैं
सच्चे मोती....
देखे हैं पहली बार,
तुम्हे मुस्कुराते देखा आज....

मेरे हर सवाल का जवाब,
यूं ही खूबसूरत,
क्यों नहीं होता.........?
सोच ही रहा था........

और बस फिर से,
तुम्हे मुस्कुराते देखा........

भरोसा हो चला है मुझे,
मेरी भी दुआ कबूल होती है.......

कुछ दिनों से,
मेरी सुबह खास होती है.........

प्यारी सी खुशबू,
एक गुलाब की,
रोज छू लेती हैं मुझे,
किसी न किसी बहाने....

एक दुआ तम्मना बन कर,
रोज लबों पे आ जाती है............

ये मदहोशी के दिन,
बस यूं ही चलते रहें........

Pretty 1

ये फूल सा......
चेहरा देखता हूँ.......

या माजी के सर,
एक नया सेहरा देखता हूँ.........

तेरी मासूमियत देखता हूँ.......
या इसके बराबर..........
अपने लफ़्ज़ों की
अहमियत देखता हूँ...........

इतना कमसिन तो.....
गुलाब भी न देखा.......
तेरे चेहरे सा रोशन.......
कभी आफताब भी न देखा.........

देखता हूँ, जीता हूँ,
महसूस करता हूँ,
और..........

देखा इतना हुस्न की........
बता नहीं सकता......

प्यास महसूस होने लगी है,
फिर मेरी आँखों को.......
बस जता नहीं सकता.......

याद आ गए
भूले बिसरे से कुछ,
ज़ख़्मी खुशबुओं वाले दिन........

घूमता फिरता था,
तनहा..........
न जाने किस की तलाश में........
एक जिन्दा दिल लिए,
अपनी ही लाश में...........
तब भी एक चेहरा.....
मेरे रूबरू हो कर गुज़रा

मुझमे बहता रहा,
जिंदगी बन कर........

पहाड़ों की नदी सा,
उफनता गरजता.......

मेरे हर रंग को,
सजाते संवारते........
लाश को जिंदा कर,
इंसान बनाते...........

कई साल........

फिर चला गया......

जाते जाते,
मेरे ख्यालों की
नमी तक ले गया.......

क्या दिल, क्या जिगर........
अब तो सब पत्थर......

इन पत्थरों पर,
बहेगा कोई,
अब उम्मीद कम ही हैं............

हर बंजर घाटी में,
क्या सरिता बहती है भला..........?

Saturday, April 9, 2011

अंततः........

कभी तुम्हारी कुशाग्रता,
और तुम्हार वाक्चातुर्य,
मुझे हीन भाव दे देता,

कभी तुम्हारा समर्पण,
मुझमे धारण कर लेता,
रूप आत्मबल का..........

तुम मुझसे प्रगाढ़ कब थे,
कब मैं तुम्हारे लिए समर्पित.....?

यही प्रश्न, तब से अब तक,
स्थिति को मथ रहे हैं,
और अब तक,
कोई सन्दर्भ नहीं निकला.........

मुझे भे ज्ञात और तुम्हे भी,
छल के रूप और उनके प्रयोग,
तुम भी निपुण और मैं भी,
ये तो प्रतियोगिता हो चली है.........

अवसाद अधिक न टिक पायेगा,
इसका भी अंत निकट आएगा,
शीघ्र ही, सत्य.......
स्वतः विदित हो जयेगा...........

पुनः, नयी जटिलताएं,
मेरे और तुम्हारे समक्ष,
मुह बाए खड़ी होंगी..........

हम हतप्रभ कभी जटिलताओं का,
और कभी एक दूजे का,
मुह ताकते...................

एक दूजे को ही दोष देते,
आरोप प्रत्यारोपण करेंगे.........

तब अंततः...........
समर्पण कर देगा कोई एक,
और दूसरा,
विजय की झूठी गर्वित मुस्कान लिए,
आगे बढ़ जाएगा...........

इस तरह हम अपनी नियति को,
प्रवाहित कर,
अपने अपने अस्तित्व के कारण को,
सारगर्भित कर देंगे...........

मैं, मैं ही रहूँगा..........
तुम भी तुम ही रहोगे........
बस संरचना का अर्थ,
सिद्ध हो जाएगा,
और..............

अपरिमित को.............
उसकी परिभाषा का,
एक और विस्तार मिल जाएगा...........

तुम भी संतुष्ट,
और मैं अज्ञानी भी संतुष्ट..............!




रचना..........!

पिछले कुछ दिन, प्रकृति की गोद में बिताने का सौभाग्य मिला....ईश्वर-प्रकृति-स्वयं सम्बन्ध का कुछ और स्पष्ट बोध हुआ.....लगा जैसे अकथनीय से संवाद हो रहा है....और मुझे मेरे चिर-प्रतीक्षित प्रश्नों के उत्तर मिल रहे है........!

ध्वनि, ऊष्मा......
तो कभी प्रकाश बन कर....
मिलता है.....
अनादि, अनंत.........

खेल जाती है,
प्रकृति के अधरों पर,
रहस्यमयी मुस्कान,
अपनी परिभाषा का,
गठन होते देख............

तो अनादि अनंत,
अपने अपररूप,
लेखनी से कहता है.......

देख मैं तू बन कर,
खुद को रच रहा हूँ........

विचित्र है, यह भी,
की अलौकिक, पराभौतिक से,
साक्षात्कार करने के,
मिलते हैं निर्देश,
लौकिक, भौतिक रचनाओं से........

कल्पना, भय और विश्वास की,
खिचड़ी परोस देते हैं,
धार्मिक ठग.......!

मन भर छक लेता है,
अनुचर समाज........

और यहाँ, वो कहता है,
अबोध विस्तार से..........

हूँ रहस्यमय.....
और उधृत होते होते भी.........
नया रहस्य रच रहा हूँ........

प्रश्न का उत्तर गढ़ रहा हूँ,
या उत्तर का......
प्रतिप्रश्न बन रहा हूँ......!

अति साधारण हूँ,
पर असाधारण लग रहा हूँ..........!

देख मैं तू बन कर,
खुद को रच रहा हूँ...........!

मंथन.........

बड़े ही विचित्र क्षणों में......विचित्र अनुभवों की एक श्रृंखला से साक्षात्कार हुआ........भौतिक परिवर्तनों का, विचित्र  आभाषों का, सर्वशक्तिमान से इन सबका और सबसे अपने अस्तित्व के सम्बन्ध का विश्लेषण करते करते लेखनी का सहारा ले लिया तो विश्लेषण का रूप कुछ कुछ कविता जैसा दिखने लगा.......ह्रदय ने कहा पोस्ट कर देना चाहिए.


परिवर्तन.....अवश्यम्भावी.......!
फिर इतना.........
अनापेक्षित क्यों प्रतीत होता है......?

संभावित तो सदैव.......
विस्तृत या लघु रूप ले कर,
संज्ञान में रहते ही हैं......!

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आभाष,
इन संज्ञानो को.....
आकृति भी देते रहते हैं.......!

सम और विषम संभावनाओं को,
इतना परिचय तो पर्याप्त होता है,
अकस्मात् के आत्मसात के लिए.........!

गुण-दोष, राग-विराग को,
भली भाँती, समझता है 'अंतस'....!

फिर विडम्बनाओं का अस्तित्व,
मंथन प्रदेश में रहने का औचित्य क्या है.........?

अप्रतिम अतुलनीय से,
साक्षात्कार की भूमिका.........
प्रारम्भ हो चुकी संभवतः............!

फिर शंकाओं का स्रोत, कोई आधार....
अभी तक शेष क्यों.....?

त्याज्य और ग्राह्य का विभेद......
अति सरल.......!
और सम्पादन,
अत्यधिक दुष्कर...........!

कदाचित संभव.......!
परिवर्तन ही रचना है.....!
एक अन्य मूल प्रश्न की..........!

परन्तु कहीं यह भी,
बौद्धिक क्लिष्टता का,
कोई संजाल तो नहीं.........?

समानातर और संयुग्मी,
होते रहने वाले आभाष,
बढ़ा देते हैं, स्थैतिक जटिलता..........!

अधिक संज्ञान,
अधिकाधिक विभ्रम.....!

अंततः....यह भौतिक परिवर्तन,
समस्या का मूल.........
कदाचित अधिक अथवा कम...........!

Monday, March 14, 2011

जब से बिछड़े हो........

मेरे अंतस में रचे बसे....
रंग ढूंढता रहा.......
एक, बस एक ..........
अन्तरंग ढूंढता रहा..........

कभी फिरोजी कभी सुर्ख.....
तो कभी गुलाबी का अकेलापन मिटाने को........
तुम्हारा संग ढूंढता रहा...

सहर तो कब की ढल चुकी.....
तुम्हारी हर ताज़ा याद ले कर......
ख्वाहिशों पे लगी पपड़ी कुरेदता रहा.....
तुम्हारे नाम की कोई ज़ंग ढूँढता रहा.......

तुम्हे शिकायत थी.......
मुझे जीने का तरीका नहीं आता.......
तुम्हारे बाद, वो तरीका बस दो पल जीने का...........
ये बेढंग ढूंढता रहा................

सुर, लय, ताल और अंदाज़ ढूँढता रहा,
जिन्दगी गुज़र गई.............

जिन्दगी का फकत,
तंग सा रंग ढूंढता रहा...........

जब से बिछड़े हो........
बस तुम्हारा संग ढूंढता रहा...........

Wednesday, January 26, 2011

वो कमरा..........


उसी कमरे में,
जहाँ बरसात के पानी के साथ
हर रोज़ टपकती होंगी यादें मेरी......

देर शाम गए,
घुरघुराते पंखे को,

अनजाने ही घूरते हुए.........
हार कर.......
बस थोड़ी देर के लिए ही ,
भुला देना चाहते होगे.....
सारी घटनाएं, दुर्घटनाएं......
जो हो गयीं,
बस कुछ ही दिनों में...
जानता हूँ, मेरे शब्द,
बजते होंगे कानो में तुम्हारे...........
आधी रात जैसे गाड़ रहा हूँ,
कील.........
पलंग से सटी दीवार में.........
तोड़ देना चाहते होगे,
मेरे तुम्हारे बीच,
यादों की सूखी लकड़ी से बनी........
एक अद्रश्य सी 'वो' दीवार..............
मैं भी आज सोच रहा हूँ...........
वहां तो पूरा एक.....
कमरा छोड़ कर आया था......
यहाँ एक लकीर खींच पाना भी,
असंभव लगने लगा है.......