Wednesday, March 9, 2016

वर्ण व्यवस्था और उच्च सामजिक रक्तचाप भाग 1

काफी उच्च रक्तचाप की शिकायत थी बहुत दिनों से, आखिरकार आज सुबह अस्पताल जा रहा था। किराए के घर से निकलते ही एक व्यक्ति को देखा जिसकी एक आँख खराब थी। बचपन में परिवार वालों की कही हुई बात कौंध गयी, "आज का दिन खराब"। विज्ञान से जुड़ा हूँ साथ ही दर्शन, अध्यात्म और संस्कृति का भी गहन अध्ययन किया है और जानता था की बकवास विचार है इसलिए सर झटक कर इस विचार को दिमाग से निकाल दिया। पूरे रास्ते दिमाग में ख्यालों की गुत्थमगुत्था चलती रही। दरअसल मिथकों को भारत में परवरिश के साथ बच्चों के मष्तिस्क में इतना गहरे बिठा दिया जाता है की उम्र भर वो उस मिथक की छाया में ही जीते हैं।

क्यों की शिक्षा का स्तर अभी भी 80 प्रतिशत जनता के मिथकों को तोड़ने के लिए प्रभावशाली रूप में नहीं आया है ज्यादातर लोग जीवन भर ऐसे हज़ारों देशव्यापी मिथकों को हमेशा सच ही मानते रहते हैं। और कुछ हो न हो पर इन मिथकों पर अपने अटूट विश्वास के चलते लोग न सिर्फ अपने कई आवश्यक कार्यो को बीच में छोड़ देते हैं या बंद कर देते हैं बल्कि बेचारे कई आंशिक द्रष्टिबाधित लोगों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। कुछ जो अन्धविश्वास की पराकाष्ठा पर हैं वो बेचारे पीड़ित व्यक्तियों को दंड भी दे डालते हैं। पहले से ही पीड़ित एक व्यक्ति को यह सुन कर कदापि अच्छा नही लगेगा की ईश्वर अथवा प्रकृति प्रद्दत्त समस्या का जिम्मेदार उस व्यक्ति को माना जा रहा है और उसे उस स्थिति का दंड दिया जा रहा है जिसमें उसका कोई हाथ नहीं है।

मेरी परवरिश गाँव में हुई जहाँ अंधविश्वास का ये आलम था की न सिर्फ ईश्वर बल्कि भूत प्रेत के भौतिक स्वरूपों को सहज रूप से सभी ने स्वीकार कर लिया था। वर्ष में 30 से अधिक ऐसे त्यौहार मनाये जाते थे जो मिथकों को मात्र भ्रम और अफवाह से कहीं अधिक आगे ले जाकर विश्वास में और उसके बाद अन्धविश्वास में परिवर्तित करते रहे हैं। भारत का 5 हज़ार वर्षों से अधिक पुराना इतिहास इस तथ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है। धर्मांध वर्ग की उलटी सीधी कल्पनाओं को दृढ करने में अफवाहों ने सबसे अहम् भूमिका निभायी है। यह भी विडम्बना है की कई ऐसे लोग जो नास्तिक हैं, ज्योतिष पर अटूट विश्वास रखते हैं जबकि ज्योतिष धर्म का परिउत्पाद ही है उस से अधिक कुछ नहीं।

भारत में मिथकों ने अतीत के कुछ सबसे बड़े व्यवसायों को बहुत ही प्रभावी रूप से स्थापित करने में कोई कसर नही छोड़ी जिनमे से पंडिताई जिसमे सारे कर्मकाण्ड, जन्म से झाड़फूंक, ज्योतिष और आयुर्वेद प्रमुख हैं। निस्संदेह आयुर्वेद को स्थापित और प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति साबित करने में भारतीयों ने कोई कोर कसर न छोड़ते हुए हर एड़ी छोटी का जोर लगाया है। आयुर्वेद का नाम मैंने इस लिए लिया क्योंकि इसकी विश्वसनीयता भारत के अतिरिक्त किसी अन्य देश में प्रमाणित नहीं है इसके अतिरिक्त आयुर्वेद की दवाओ के परिशोधन की प्रक्रिया भी सन्देहास्पद है जिस से मिली दवाओं की प्रभावशीलता भी अभी तक प्रमाणित नही हुई है।

प्रमाणों के अभाव में स्पष्टतः और विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता की ज्योतिष-पंडिताई और सुनारों के सिंडिकेट का अभ्युदय कब हुआ परंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य का निष्पक्ष विश्लेषण यह साफ़ कर देता है की इन तीनो व्यवसायों में गूढ़ सम्बन्ध हैं। पंडित समस्याओं को मिथकों और काल्पनिक देवी देवताओं से जोड़ कर भौतिक परेशानियो का कारण अलौकिक बता देते हैं (वर्तमान में कुछ मीडिया चैनल श्री यंत्र, लक्ष्मी यंत्र, यिन यान यंत्र और ना जाने क्या क्या बेच कर लाखों का मुनाफा भी कमा रहे हैं बल्कि अन्धविश्वास को बढ़ावा भी दे रहे हैं)। इसी बीच ज्योतिष-पंडित हवन, पूजा पाठ और दूसरे कर्मकांडों के दौरान अच्छा खास व्यवसाय कर लेते हैं। आकस्मिक और बड़ी समस्याओं पर पंडितों, ओझाओं और बाबाओ की तो कमाई देखते ही बनती है। वर्षों से स्थापित बाबाओं ने तो बाकायदा अपने चिकित्सालय भी खोल लिए हैं। कोई गुलाब की पंखुड़ी से गुर्दे, यकृत, पित्त थैली की शल्य चिकित्सा कर रहा है तो कोई मछली के मुह में विचित्र पीली दवाई रख कर जिन्दा मछली मरीजों को खिला रहा है।

लोग हैं की हज़ारों की तादाद में लाइन लगा कर खड़े हुए हैं। खैर ये तो जो है सो है कुछ ऐसे भी बाबा हैं जो भूत प्रेत (जो प्रायः मानसिक बीमारी होती है) भगाने के नाम पर महिलाओं युवतियों को लात घूंसों से पीटते हैं, लाल मिर्च को धूनी पर डाल उसका जहरीला धुंआ मरीज़ को जबरदस्ती सूंघने पर मजबूर करते हैं। जितना मौका मिले और संभव हो ये बाबा-ओझा-गुरु आर्थिक शोषण करते हैं। इन सारी प्रताड़नाओं के बदले समाज के तरफ से इनको मिलने वाले पुरुस्कारों में मांस मदिरा, धन, सोना चांदी आदि बहुत कुछ होता है। कुछ मामलों में देखा गया है की अन्धविश्वास से ओतप्रोत माता पिता ने अपनी 14-15 वर्ष की पुत्री या पुत्र को बाबा के हवाले कर दिया जो महीनो उसका शारीरिक शोषण करता रहा। आज भी पूरे देश के ग्रामीण इलाकों में ऐसी घटनाएं सामान्य हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु, बंगाल में ऐसी घटनाएं किसी दिन अखबार में न छपें ऐसा कम ही होता है। ऐसा भी नहीं की शहर के लोग इस प्रकार

लंबे समय से आर्थिक सामजिक समस्याओं से जूझ रहे लोग ज्योतिषियों की शरण में चले जाते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है की ज्योतिषी के पास जाने को सलाह इनको या तो किसी निकट संबंधी या फिर किसी पंडित ओझा या बाबा से ही मिली होती है। निकट संबंधी भी ऐसे जो छद्म भावना में जी रहे होते हैं की ज्योतिष द्वारा पूर्व में सुझाये गए किसी उपाय के कारण उनको समस्या से छुटकारा मिल गया है जबकि ये नित्तान्त उनके अपने निजी प्रयासों के कारण हुआ होता है। ज्योतिषी के पास पहुचे लोग प्रायः धनी वर्ग से होते हैं जिनकी शिक्षा में अधिकांशतः विज्ञान का समावेश बाकी रह गया होता है। इसी कमी के चलते वो लंबे समय से चलीआ रही भौतिक समस्याओं को (अपनी कल्पनाओं से) निराधार कारणों से जोड़ने लगते हैं। इनमे शनि एवं मंगल जैसे दूरस्थ ग्रहों को भी लपेट लिया जाता है। लाखों किलोमीटर दूर ऐसे गृह जिनका गुरुत्वाकर्षण तक पृथ्वी को प्रभावित नहीं कर पाता वहां पृथ्वीवासी (अधिकाँश भारतीय) ये सोचते हैं की ग्रहों की दशा उनके जीवन को प्रभावित कर रही है।

ग्रहों से जुड़े मिथक के आडम्बर को हज़ारों सालों में इतना बड़ा कर दिया गया की अनपढ़ या अल्पशिक्षित वर्ग इसी आडम्बर को (अविकसित विज्ञान के समय में) सत्य मानने लगा। समाज में सदैव तीन वर्ग होते हैं। पहले को आप भोला मासूम अशिक्षित या मूर्ख कुछ भी कह लें दूसरा समझदार जो प्रायः शिक्षित भी होता है तीसरा चालाक। तीसरा चालाक वर्ग सदैव पहले भोले वर्ग का शोषण करता है और मौका मिलने पर दुसरे समझदार वर्ग को भी पहले वर्ग में होने का अनुभव करा देता है।

हज़ारो वर्षों की किसी भी मिश्रित संस्कृति में ऐसे मिथकों का अभ्युदय अवश्य होता है जो वहां के समाज के इन तीनो समाज वर्गों पर तीक्ष्ण प्रभाव डालते हैं। भारतवर्ष इसी परंपरा का द्योतक है। मनु (यदि काल्पनिक व्यक्तिव नहीं है तो) से चली परंपरा जब अमर्त्य सेन और कैलाश सत्यार्थी तक आती है तो कुछ ऐसा ही परिद्रश्य उपस्थित होता है। यह एक ब्रम्हांडीय सत्य है की महान संस्कृतियों के सम्पूर्ण जीवन में एक सिरे पर मिथक और दुसरे पर विज्ञान खड़ा होता हैं और दोनों सिरों के मध्य मिथकों से विज्ञान की पूरी कहानी होती है। मनुष्य की विचारधारा जैसे जैसे धर्म से विज्ञान की और खिसकती है वह उत्परिवर्तन के सिद्धान्त को सार्थक करता जाता है। ध्यान देने योग्य बात है की उत्परिवर्तन सिर्फ शारीरिक ही नहीं मानसिक भी होता है और विचारधारा में परिवर्तन भी मानसिक उत्परिवर्तन का ही एक प्रकार है इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।

मैं पुनः ज्योतिष के मिथकों पर आता हूँ। न सिर्फ हिन्दू बल्कि हर धर्म में सितारों, ग्रहों, सूर्य और अन्य खगोलीय अवयवों का महिमामंडन किया गया है। प्रारम्भ में ये महिमामंडन केवल सर्वशक्तिमान के प्रति मानव के समर्पण का द्योतक था परंतु बाद में धीरे धीरे मानव ने इसमें व्यवसाय भी ढूंढ लिया।

सूर्य, मंगल, शनि, बृहस्पति, बुध जैसे ग्रहों की शान्ति के लिए रत्नों को उनके साथ जोड़ दिया गया। एक तरफ रत्नों की चमक लोगों को लुभाती रही दूसरी तरफ ग्रहों का खड़ा किया गया आडम्बर लोगों को डराता रहा इस डर और लोभ ने मिथक सम्बन्ध को इतना दृढ कर दिया की आज बड़े से बड़े व्यवसायी से लेकर वैज्ञानिक तक के हाथ में मूंगे, मोती और नीलम की अंगूठी देखी जा सकती है।

ज्योतिषियों ने मानव के मनोविज्ञान का भलीभाँति न सिर्फ अध्ययन किया बल्कि उसे अपने व्यवसाय में भरपूर इस्तेमाल भी किया। आशा और उम्मीद जैसी सकारात्मक और सार्थक भावना को रत्नों और ग्रहों की माला में पिरो कर  इन्होंने हज़ारों सालो तक अपने लिए सभी साधनो की उपलब्धता सुनिश्चित की। चेहरे और जेब को पढ़ लेने की अद्भुत कला में पारंगत हो चुके ये महाशातिर मनोवैज्ञानिक सामने वाले की मनोस्थिति और आर्थिक क्षमता के अनुसार यथासंभव शोषण करने में सदैव सफल रहते हैं।

ना जाने कब और कैसे परंतु वैष्णव आर्यो के भारत में आने के उपरान्त संभवतः 5000 वर्ष पूर्व वैदिक काल की शुरुआत में धार्मिक कर्मकांडों ने संपूर्ण भारत को शिकंजे में जकड़ना शुरू कर दिया संभवतः इस से पूर्व शैव सम्प्रदाय के दक्षिण भारतीय मूलनिवासियों में कर्मकाण्ड के पाखण्ड इतने बड़े तौर पर नहीं थे। यद्यपि थे परंतु केवल शैव भौतिकी पर आधारित मंदिरों की स्थापना एवं शैव धर्म विधियां ही प्रचलन में थीं। संभवतः आर्यों की सभ्यता को तुलनात्मक स्तर पर रख कर  बाद में शैव एवं वैष्णव विचारधाराओं को आपस में जोड़ने के लिए बहुत सी मिथक कथाओं को जन्म दे दिया गया। यह प्रयास दरअसल शैव और वैष्णव सम्प्रदायों में होने वाले आपसी झगड़ों को रोकने के लिए किया गया होगा। मिथक कथाओं में अवतार के सिद्धांत, पूर्व अवतारों के बाद के अवतारों से शनैः शनैः सम्बद्ध कर दिए गए शायद यही कारण है की वर्तमान में आम हिन्दू परिवार न सिर्फ शैव और वैष्णव सम्प्रदाय में विभेद न करते हुए दोनों सम्प्रदायों की पूजा अर्चना की रीति को मानते हैं बल्कि विष्णु और शिव दोनों की एक साथ उपासना करते हैं। शैव और वैष्णव सम्प्रदाय के एक होने का सबसे अधिक फायदा मूलनिवासियों और आर्यों दोनों के मठाधीशों को एकसाथ मिला। जैसे जैसे आर्य धर्म के रीति रिवाजों की पैठ मूलनिवासियों में बढ़ने लगी मूलनिवासियों को अपना फायदा इनमें दिखने लगा। मूलनिवासियों की स्वीकारोक्ति के पश्चात आर्यों को भी धार्मिक सम्बद्धता के महत्त्व और  होने के उपरान्त उभयनिष्ठ रीति रिवाजों को दोनों संप्रदायों के मठाधीशों ने बहुत बड़े स्तर पर ले जा कर स्थापित कर दिया।

वैसे तो उपर्युक्त कही गयी सभी बातों का कोई ऐतिहासिक प्रमाण प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं है लेकिन अशोक के पूर्व, उसके अपने काल एवं उसके बाद के शिलालेखो। भित्ति पर उलब्ध जानकारी, एवं अन्य ऐतिहासिक वर्णनों को यदि आधार माना जाए तो पूर्णतयः न सही आंशिक रूप से ही जातिवादी  विचारधाराओं में गूढ़ त्रुटियाँ उजागर होती दिखती हैं।

शिक्षा व्यवस्था में खामियां और एक जाति विशेष के लिए शिक्षा की उपलब्धता ने पिछले कई हज़ार साल के समयकाल में जातिगत विभेदन को सुनिश्चित कर दिया। शिक्षा की असंतुलित असममित और पक्षपाती व्यवस्था ने लगातार सामाजिक वर्गों को धीरे धीरे इस प्रकार विभाजित किया कि केवल एक वर्ग को ही शिक्षा का अधिकारी माना जाने लगा। वैश्य समाज को शिक्षा की उपलब्धता इसलिए संभव हो सकी क्योंकि वह अपेक्षाकृत न केवल धनी था बल्कि शिक्षित समाज को झुकाने लायक मानसिक दृष्टिकोण उनके व्यवसाय से होते हुए उनकी आनुवंशिकता में भी समिलित होता गया। धन, बौद्धिक उच्च सामर्थ्य एवं व्यापारिक कुशलता ने वैश्य समाज को उतनी हानि नहीं होने दी जितनी इन कारणों की अनुपस्थिति में संभव थी।

सवर्ण शब्द के अभ्युदय के पीछे किंचित उपर्युक्त परिस्थिति संभावित है।

Monday, July 27, 2015

एक गाँव की मौत भाग 2

सावन भादों के महीनों में गाँव जब सोंधी मिटटी की खुशबू से बेतहाशा महक रहा होता और बच्चे हर अतरे चौथे रेनी डे की छुट्टियां मना रहे होते हमारे गाँव और जिले के शायद हर गाँव में एक ऐसे त्यौहार की तैयारी चल रही होती थी जो बेहद ख़ास था। क्यों ख़ास था आगे बताऊंगा।
मिट्टी के पके हुए छोटे मध्यम और बड़े आकर के टूटे घड़ों में निचले आधे भाग में खेतों की उपजाऊ मिटटी भरने के बाद औरतें एक तिथि विशेष पर उसमे जौ के दाने डाल कर मिट्टी भिगो कर पूजा की अलमारी के बगल में रख देतीं। 7 दिन में कोपलों से निकल कर जौ के पौधे सुन्दर घास की शक्ल ले लेते थे। यह कार्य मुस्लिम समुदाय को छोड़ कर सभी सम्प्रदायों में बराबर होता था
..................तिथि को गाँव की अधिकांश औरतें उन टूटे घड़ों में उगी जौ की घास को (जिन्हें जवारे कहा जाता था) सर पर रख कर झुण्ड में निकलतीं...! ढोल और नगाड़े वाले महिलाओं के आगे चलते और उनसे भी आगे चलते करतब करने वाले...!
करतब करने वाले कहीं बाहर से नहीं आते थे बल्कि गाँव के ही होते थे..! गाँव के बाहर माता के मंदिर के प्रांगण में एक नीम का पेड़ था जिसके नीचे रखी मूर्तियों के इर्द गिर्द ऐसे त्रिशूल गड़े होते थे जिनका बीच का फाल कई फीट (२ से ले कर १० फीट या उस से भी अधिक) लम्बा होता था....इन त्रिशूलों को सांग कहा जाता था, जब सांग गडी होती थी तो तीनो नुकीले भाग ऊपर रहते थे लेकिन छोटा आधार जमीन के अन्दर होता था! लोहे को गाँव में लुहार न जाने कैसे परिशोधित कर इन्हें बनाते की साल भर खुले में गड़े रहने के बाद भी इनपर जंग का धब्बा तक नहीं लगता था..! त्रिशूलों को मंदिर प्रांगण उसी रोज़ सुबह उखाड़ लिए जाता जिस रोज़ महिलायें जवारे ले कर निकलती थीं! उखाड़ने से पहले इन सांगों की पूजा की जाती, उन्हें तिलक लगाया जाता तेल चढ़ाया जाता! महंत अपने अंगूठे में एक चीरा लगा कर सांगों को रक्त से तिलक करते थे!
बाज़ार में ढोल नगाड़ों की आवाज़ और चारों ओर से घेरे खडी सैकड़ों लोगों की भीड़ के बीच गाँव के युवक आगे आते, महंत सांग के बीच के सबसे बड़े फाल के नुकीले सिरे को पूजा के थाल में रखे दिए से गरम करते, ठंडा हो जाने पर सांग को युवक के दोनों गालों के आर पार भेद देते, जब सांग एक गाल से हो कर दुसरे से निकल जाती तो दुसरे सिरे पर एक जंगली फल लगा दिया जाता! इसे सांग चढ़ाना कहते थे! हम हमेशा ये सोचते थे की सांग चढ़वाने में दर्द क्यों नहीं होता और खून क्यों नहीं निकलता.....? इस सवाल का जवाब कभी मिल भी नहीं पाया...!
सांग के एक सिरे पर ये युवक होता जिसने गालों में भिदी हुई सांग दबाई होती तो दुसरे तरफ कोई सांग को पकड़ कर संभाल कर चलता! जिस युवक ने सांग चढ़वाई हुई होती वह नृत्य करता हुआ चलता जबकि दूसरा उसके साथ सांग सम्हाले चलता...!
कुछ युवक तलवारबाज़ी के करतब दिखाते हुए चलते तो कुछ लाठी के, कुछ प्राचीन अस्त्रों के करतब दिखाते...! इन करतबों में मुस्लिम सम्प्रदाय को छोड़ कर थोड़ी देर के लिए सब एक हो जाते, क्षत्रिय, ब्राम्हण, यादव, घोसी, छिरकहा, लपटहा, धानुक, नाई  लुहार, चमार, भंगी, सब के सब थोड़ी देर जात पात भूल कर सांग चढ़वाते....! हम सब हतप्रभ हो जाते जब देखते की मखंचू चमार की सांग पांडे या तिवारी के लड़के ने उठा रखी है! हमें समझ नहीं आता था की ऐसी छुआछूत का क्या मतलब है जो आज के दिन ख़त्म हो जाती है जब मेरे चचेरे भाई भंगियों के लड़कों से लठैती (लाठी से लड़ाई का नृत्य) करते...! खैर जो भी था बहुत सुखद होता था क्योंकि इस दिन चमार और भंगियों के लड़कों को छू लेने पर कोई गाली नहीं देता था...(साल में एक दिन ही सही पर जात पात मिट जाती थी)...!
बाज़ार में ऐसे करतब दोपहर बाद लगभग तीन या चार बजे बजे शुरू होते ३-४ घंटे चलते और छिटपुट अँधेरा होने तक सिमटने लगते उधर महिलायें करतब शुरू होते ही गाँव के बाहर बने तालाब की ओर चली जाती थीं, छोटे बच्चे उनके साथ तालाब चले जाते थे जबकि बड़े बच्चे और अन्य युवा खड़े हो कर करतब देखते रहते!
महिलायें तालाब में जवारों को प्रवाहित कर देती थीं जिसे कहते थे "जवारे ठन्डे करना" देशी भाषा में इसे जवारे सिरवाना भी कहते थे.....! जवारे सिरवाने के बाद महिलायें वापस घर आ कर "पक्का खाना" बनाती थीं जैसे पूड़ी, कचौड़ी, खीर, आलू टमाटर की सब्जी, पुए, गुलगुले, बेड़ई इत्यादि...!
उधर करतब समाप्त कर लोग अपने अपने घर चले जाते, पुरुष शौच से लौट कर आते हाथ मुह धोते और खाना खाते! ध्यान देने योग्य बात यह थी की कोई घर जा कर नहाता नहीं था बावजूद इसके की नीची जाति के लोगों की सांग उठा कर आये होते थे...!
जात पात से बहुत ऊपर उठ चुके  इस एक दिन को गुज़रे हुए कई साल हो चुके हैं जब से ये लौट कर नहीं आया.........लेकिन हर साल आने वाला वो दिन आज तक मेरी स्मृति में जीवित है...!

एक गाँव की मौत भाग 1

गाँव की प्रौढ़ युवा गृहणियां सब मिल कर किसी रविवार को (जब बाजार में आमों की पहली खेप आ चुकी होती) बुलावा कर "भौरियां डालने" का कार्यक्रम बनाती थीं। छोटे बड़े बच्चे हुलसते हुए माओं के साथ सुबह 10 बजे के करीब हलकी गर्मी में घरों से निकल बाजार में झुण्ड बना लेते। साढ़े दस तक माओं, बच्चों, गायों, कुत्तों और बिल्लियों का ये झुण्ड गाँव से 1 किलोमीटर दूर माता के मंदिर के प्रांगण में पहुचता जहाँ आम महुआ नीम बरगद और पीपल के पेड़ों का एक विरल झुरमुट था। पेड़ ऐसे लगे थे की बीच में छोटा सा गोलाकार मैदान था।

महिलायें बैठ कर उपले सुलगातीं उस पर गेहूं के आटे के मोटे हाथ से बने टिक्कर डालतीं जिन्हें "भौरियां" कहा जाता था। खरी सिकी भौरियों को जब दादी और माँ घी के कटोरे में डुबो कर बगल में बैठे बच्चों के हाथ में पकड़ातीं तो सोंधी खुशबू पा कर बच्चे निहाल हो जाते।

पतले रस वाले दशहरी आम बच्चों को भौरियों के साथ दिए जाते तब तक गायें और दुसरे जानवर आश्चर्यजनक समझदारी से प्रांगण के बाहर बैठे रहते। बच्चों के जी भर भौरियां और आम खा लेने के बाद माएं और दादियां उठ कर प्रांगण के किनारे किनारे बैठे जानवरों को कच्चे आटे की लोई या फिर पकी हुई भौरियां और कभी कभी तो घी में डुबो कर उन जानवरों को खिलाई जाती। बच्चे इस काम में महिलाओं की मदद करते थे।

न जाने कहाँ से महिलाओं के पास इतना पर्याप्त सामन होता की सब का पेट भर जाता था। बच्चों और पशुओं को खिला कर वे स्वयं खाने बैठतीं।
3 बजे तक यह कार्यक्रम चलता। बच्चे ऊँघने लगते तो माताएं उनको अपने आँचल मे ढक कर वहीँ प्रांगण में 1 घंटे सोतीं। 

4 बजे के करीब ये झुण्ड वापस गाँव आता। कितना जीवन था उन 4-5 घंटों में मैं बता नहीं सकता और आप समझ नहीं पाएंगे। बस इतना जानता हूं की गाँव को आधुनिकता, राजनीति और नशे की लत लगी है 15-20 साल से।

धीरे धीरे मेरा गाँव जरूर मर गया है लेकिन मुझे भौरियों का स्वाद, सोंधी खुशबू और दादी के हाथ का निर्मल स्नेह अब तक याद है।

फिर नशेमन

मय की बूंदों से
इबारत लिखी है

वो जो छलकने की
आवाज़ें.....
हाँ आवाजें....

उनके नुक्ते रखे हैं

सुरमई शीशों के
आर पार का समां
तोड़ कर बिखेरा है

जाम की लचक
जैसे बेल...
हर्फों में उतारी है

बोतल का नशा
तुम्हारी आँखों के नज़र कर
छिड़का है...

तेरी याद की खुमारी
कम करने को

अपने वज़ूद के पन्नों पे
केसरी आब के छींटें
मारे हैं...

आज फिर
बहुत नशे में हूँ मैं..!

पिछला वाला मैं

तरसे होंगे, तड़पे होगे,
हाँ जानता हूँ मैं....

सिसके होगे तकिये के पहलू
हाँ जानता हूँ मैं...

प्यार था, कभी बेशुमार था,
जानता हूँ मैं.....

सुबह से शाम सिर्फ इंतज़ार था,
हाँ जानता हूँ मैं..

दिल रख लिया तुमने
सौ दफा मेरा,
हाँ जानता हूँ मैं...

मैं, मैं न था
दर्द था.....!
हाँ जानता हूँ मैं.....

और इधर

एहसानों की गठरी है
चाहतों का बोझ है
और मैं हूँ....

क्या जानते हो तुम?

क्या पिछले वाले 'मुझको'
पहचानते हो तुम?

बेबसी

हर शख्स मुझे ताश के पत्तों सा
खेलता रहा

जीतने वाले ने भी फेका
हारने वाला भी फेकता रहा

मुश्किलों से जब भी बनाये
मैंने रेत के घरौंदे

कभी हवाओं ने तोड़े
कभी लहरें ने
मैं साहिल पे खड़ा देखता रहा

कोई ख्वाब था गोया

कोई अश्क छुपा के रोया
कोई खुल के रोया
कोई पा के रोया
कोई खो के रोया

किसी के अरमां बिखरे
टूटे किसी के ख्वाब
जिसने जितना खोया
वो उतना रोया

बता शिद्दत ऐ मुहब्बत
ही क्या थी दरम्यां
के फुरकतों में
न तू रोया न मैं रोया

एक नींद से जागे लगते हैं
और आशियाँ उजड़ा सा
तेरा होना मेरे लिए
कोई ख्वाब था गोया

जमाने के बाद

आँसुओं की कीमत जानोगे
कितनो को रुलाने के बाद
मुझे भी याद करोगे
पर मेरे जाने के बाद

मेरी हमनफसी पे
आज शुबहा है तुम्हे
होगा भरोसा
पर वक़्त
गुज़र जाने के बाद

मेरे अशआरों पे रोओगे
तुम भी
गुनगुनाने के बाद

एक दफा लगाओ पैमाना तो लब से
मंदिरो मसाजिद का पता
भूल जाओगे अंतस
मयखाने के बाद

आरज़ू ऐ एहतियात न रहेगी
पाक दिल हो जाओगे
हमारी मुहब्बत
आज़माने के बाद

जिंदगी का असल मतलब
समझ जाओगे
जाम टकराने के बाद

रूह में लौट आयेगा
पुरकशिश जेहन
दिल के टुकड़ों से
टकराने के बाद

हमने सीख लिया बहोत
बहतों को
सिखाने के बाद......

अश्क ढलके है
दिल ओ चश्म नम
तेरी याद फिर आई
जमाने के बाद....!

राब्ता

मुझमे बसी अपनी ही धड़कनो को
जानता नहीं
इतना बदल गया है आज
की अपने ही अक्स को आईने में
पहचानता नहीं

अब भी कर रखा है मुब्तिला साँसों में
बस एहसास नहीं
भरम होता भी है कभी
तो मानता नहीं

मैंने ऊँगली से इक दफा
जुल्फें सहेज दी थी
नफ़रतन वो आज भी
खुली लटें संवारता नहीं

दिल में उठती तो होगी हूक सी
पर पत्थर रख लेता है
जुबा से कभी पुकारता नहीं

मरता है तिल तिल मुझ को सहेजे
दिल के इबदतखाने में
पर मेरी आखिरी याद को
मारता नहीं

यार ये राब्ता भी क्या राब्ता है
मैं भी भूला नहीं
और तू है की मानता नहीं...!

Sunday, June 28, 2015

शर्त

वक्त का मारा हुआ
तू इश्क का मारा हुआ
कभी अपनों से कभी
खुद से हारा हुआ...

तेरी बेचैनी न कम होगी
किसी शै किसी मरहम से
परीशां भी आज तू
दूजों की ज़िद, गैरों के गम से

है जैसी भी कहानी,सच्ची झूठी
लिखी है अब तक इरादों से
है जो अदना सी पहचान
तेरे अपने ही करम से...

है कसम की न गिरने देना
इक भी और अश्क चश्मे नम से
कह
की तेरा साथ ही एक आरज़ू
अपने सनम से

और हाँ

तू कहे तो अभी मिट जाऊं मैं
कहे तू जैसे तुझपे क़ुर्बान
शर्त इतनी सी
की सिर्फ तेरा हो जाऊँ मैं..!

बकाया

मुश्किलें सब हल्की
तेरा प्यार भारी सब पे
तेरी चाहत का सरमाया बहुत है
एक दिल को खो कर
तेरे इश्क में
मैंने पाया बहुत है

मेरे नाम को तरन्नुम कर
तेरे नाम को आयत बना
कभी मुस्कुराते कभी रोते
तूने भी मैंने भी
गाया बहुत है

इबादत तेरे दर के सिवा
रास न आई किसी चौखट
मंदिर-ओ-मसजिद ने
यूं तो बुलाया बहुत है

मुश्किलों से खीच निकाला
और थाम के हाथ
चला तू हमकदम
उन अश्क से भारी दिनों में भी
तूने हंसाया बहुत है

ज़ख्म भी खुश हो गए
तेरी छुअन पा के
हाथ रख दिया, सहलाया,
......बहुत है

जान दे के भी क़र्ज़ न चुकेगा
तेरा मुझ पे बकाया बहुत है...!

Saturday, March 7, 2015

बाशिंदा शहरी, किसान और खुदा

आँखों में लाल डोरों संग,
नमी है बहुत,
गोया रोया बहुत है....

रात ओले पड़े थे,
अब की फसल में
रामू ने खोया बहुत है...

इधर माहौल ही जुदा है,
बहते रहे जाम पे जाम,
इसकी आँखों में भी लाल डोरे
गोया बाशिंदा शहरी
सोया बहुत है...।

इधर खुलीं बियर की बोतलें
उधर टूटे आँखों के बाँध
ऐ खुदा जाती सर्दी में
तूने जमी को
भिगोया बहुत है

Monday, February 23, 2015

जब भी मिल जाता है तू....

भला हंसिये न
तो क्या कीजे
मेरी मुश्किलों की फिसलन पे
जानबूझ कर फिसल जाता है तू

मैं भी रंगीन होता हूँ
जब भी मिल जाता है तू

नहीं कहता,
कि तेरे मिलने से
हालात बदल जाते हैं

पर बेशक कोई दिन
कोई शाम बदल जाता है तू

जिंदगी में दम आ जाता है
जरा ही सही
जब भी मेरे साथ
पीने निकल जाता है तू

यूं तो मुझे लौटना ही होता है
मेरी खिजाओं में
पर मैं भी रंगीन होता हूँ
जब मिल जाता है तू

उतने दुखड़े नहीं बिखरते
उतने शिकवे नहीं रिसते
एहसास पे हर दफा
रेशमी पैबंद सिल जाता है तू

मैं और शाम दोनों....रंगीन
जब भी मिल जाता है तू......।

Sunday, February 22, 2015

किताबें, रंगमंच और चक्र

जैसे कण कण में भगवन है वैसे ही सब जगह कहानियां और कवितायेँ बिखरी पड़ी हैं। जब भी मैं लोगों को कोई किताब पढ़ते या फ़ोन पर ई-बुक पढ़ते देखता हूं तो सोचता हूँ की क्या वाकई इतना ध्यान लगा कर पढ़ने की आवश्यकता है?

बस इतना ही तो करना है कि अपनी नज़र उठा कर देखना है, अपनी पसंद के विषय तक अपनी नज़र ले जानी है फिर कहानी ही नही नाटक, एक फ़िल्म, जीवन वृत्तांत, कविता और न जाने किस किस विधा का समन्वय आँखों से होते दिल में उतरने लगता है।

दुनिया अपने आप में संभवतः सबसे अधिक सक्रिय रंगमंच है जिस पर अनगिनत विधाओं का प्रदर्शन सतत चलता रहता है। इसी बीच हम भी किसी न किसी विधा का भाग बन चुके होते हैं। किसी न किसी कविता नाटक या वृत्तांत में हमारी भी भूमिका तय हो चुकी होती है।

अपने वृत्तांत में बेशुमार खोये लोग किताबों में कहानियां पढ़ते हुए स्वयं एक नयी कहानी बनते हैं। बहुत रोचक होता है किसी पाठक के चेहरे पर उतरते चढ़ते भावों को देखना। यह भी एक कहानी पढ़ने जैसा ही है। भावों के उस ज्वर भाटे को देख यह अनुमान लगाना कि किताब की कहानी क्या मोड़ ले रही है, बड़ा मज़ेदार होता है।

कहानियां, किताबों में गुमशुदा लोगों को किसी न किसी घटना से जोड़ रही होती हैं, कभी उनके ख्यालों को गुदगुदाती हैं, कभी अश्रु ग्रंथियों को उत्तेजित कर, पन्नों की स्याही को फैलाने में सक्षम, अश्रु बिंदुओं को पन्नों तक उतार लाती हैं।

नयी पीढ़ी कहानियां ज्यादा नहीं पढ़ती। उनको एंड्रॉयड फोन और गेम ज्यादा पसंद हैं या फिर यूट्यूब। माध्यम भले ही बदल रहे हैं पर लोग अब भी कहानियां हैं।

पात्रों की वेषभूषा बदली है पर उनका कथानक अब भी वही है। जिंदगी की भागदौड़, नौकरी की चिंता बीवी से लड़ाई, माता पिता से मोह भंग। इन कथानकों पर नज़र पड़ते ही अचानक सक्रिय जगत के रंगमंच से मेरा भी मोहभंग होने लगता है। मुझे हर कहानी घिसीपिटी और खुद को दोहराती हुई नज़र आने लगती है। सबसे बड़े रंगमंच के निर्देशक की क्षमता पर संदेह होने लगता है। क्या कथानकों का बस इतना ही विस्तार है उसके पास? क्या कहानियों में विविधता लाने की उसकी क्षमता को चरम प्राप्त हो चुका?

अचानक ही बोध होता है की नयी कहानी का जन्म हो रहा है। एक नए कथानक का जन्म हो रहा है। स्वयं मुझे उस कथानक का मुख्य पात्र बना दिया गया है।

यह घटना झुंझलाने वाली है। उद्वेलित करती है और स्वतंत्रता संग्राम के पुरोधाओं के दमन की गतिविधि के समजात घटना का चित्रण कर देती है। अचानक ही मुझे स्वयं में स्वतंत्रता के लिए जूझते चे गुवेरा का अक्स नज़र आने लगता है। मेरे ह्रदय और मस्तिष्क में मची इस उथल पुथल के चलते मेरे चेहरे पर भावों और अभिव्यक्तियों का मेला लग जाता है। रोष, प्रसन्नता, क्रोध, वितृष्णा सब मेरे गालों और आँखों पर झूला झूलने लगते हैं।

अचानक मैं देखता हूँ कोई मुझे किताब समझ कर पढ़ रहा है। सक्रिय रंगमंच का पात्र बन चुका मैं और मेरा कोई दर्शक है।

चक्र निरंतर चल रहा है।