Tuesday, October 16, 2012

मैं तुम सब हूँ.....

न हिन्दू हूँ,
न मुसलमां,
हर मज़हब जिया हूँ
कहकशां हू .....

मेरी पहचान पे,
सवाल उठाने वालो,
गौर से देखो,
सिर्फ तुम्हारा ही .....
नाम-ओ-निशां  हूँ .......

खुद से मुझे जुदा करने की,
कर  लो हज़ार कोशिशें,
आखिर न कर पाओगे,
अक्स हूँ तुम्हारा ........
बस तुम सा हूँ ......

मेरे तुम्हारे वजूद में,
दरअसल,
फर्क ही कहाँ कोई,
जो तुम न हो,
तो फिर मैं कहाँ हूँ ..........

मासूमियत हूँ,
बुज़ुर्गी हूँ,
और मैं ही तो,
अल्हड जवां  हूँ ....

बेशक तुमने मुझे लुटाया,
नादानी  के तहत,
पर अब तो सम्हालो,
मैं ही तो बचा,
तुम्हारा कुल जमा हूँ ...........


कच्चे पक्के रिश्तों पे ही सही,
पर खड़ा हूँ, शान से,

मैं तुम  सब हूँ,
मैं हिन्दोस्तां हूँ ......

Sunday, September 30, 2012

शहर ओ बशर ........

आफत तमाम आ पडीं,
रास्ता कोई नज़र आता नही ......

उम्र बीती जो  तन्हाइयों में,
मज़ा-ओ-हम्नफ्सी में अब,
गुज़र आता नहीं ..........

वीरानियों में,
शब् अँधेरी ही आती है इधर .......

चराग-ए-उम्मीद लिए,
कोई बशर आता नहीं ........

मेरा साया दगाबाज़ निकला,
अब तो आस पास भी,
नज़र आता नहीं ............

फ़क़त एक ख़ुशी को तरसता,
मेरे आँगन का शज़र .......

उफ़ दौर-ए- गम,
क्यों, ये गुज़र जाता नहीं .......

छोटी छोटी तंजिया मुस्कुराहटों का,
कुछ तो राज़ है जरूर,

इस शहर में तफसील से,
कोई मुस्कुराता नहीं .........

Wednesday, August 29, 2012

और तुम......!

कभी थकान भरी निराशा को,
साथ लेकर,
हदों के पार जाने की कोशिश ......!

ये जो तुम मिलती हो मुझसे,
शाम की उदास लहरों की तरह ......!
 जैसे सहला रहे हो,
ज़ख्मो को आहिस्ता ....!

कभी जहां भर की ख़ुशी को,
खुद में समेटे,
जोश से लबरेज़,
लिपट जाती हो मुझसे ........!

मुझे झरने पे उछलती,
पानी की बूंदे याद आती हैं,

जब भी कभी तुम आती हो,
सर्द एहसास बन कर ...........!

बैठ जाती हो कभी यूं चुप हो कर,
कि समेट लेती हो शाम की,
सारी लाली  अपने आँचल में ..........!
और मेरा अस्तित्व,
रंगहीन लगता है मुझे ........!

देखो तुम ही तो,
सारा संसार हो ..........!

मेरे तुम्हारे रिश्ते जैसा..............!

,
देखो तुम फिर याद आ रहे हो,
मुझसे मत कहना,
कि लिखा मत करो .......!

खुद ब खुद छलकती है, स्याही,
भीगते हैं, कागज़ .......!

मुझे वैसे भी,
रंगीन कागजों को,
सिरहाने रख सोने की,
आदत ही कहाँ है .......?

जला ही देता था,
पर तुम .........!
संजो संजो रखते रहे ......!

ये  पेन तुमने ही पिरोया है,
उँगलियों में मेरी,
अब जुदा करते बनता नहीं ........!

यूं तो अरसा गुज़र गया,
पर जब तब,
बरबस खींच देता है, अक्स,
ये नामुराद न जाने कैसे कैसे,
सादगी से लिपटे सफ़ेद पन्नो पे ......!


तुम जब भी,
मुझे झूठा कहतीं,
मैं मन ही मन सोचता ....!

यार तुम से तो कभी नहीं कहता ...........!

ये कमबख्त पेन,
पुरानी सब सच्चाईयाँ खोल रहा है,

इस नज़्म में भी ढीला है कुछ,
अब ..........!
मेरे तुम्हारे रिश्ते जैसा ............!

बस ये सवाल रह गया है.....

तुम्हारे पीछे यादो ने,
मुझे तंग कर रखा हैं........

तुम जाओ,
ये खुद खुद चली जायंगी.....


बेतरतीब कमरा,
रोज़ पूछता हैं,
तुम कब रही हो.....


दूध अब भी गरम कर देता हूँ,
हर शाम, ये सोचते हुए,
सुबह तुम्हे चाय पीनी होगी.......


तुम उस दिन झगड़ते हुए,
कमीज़ के सब बटन तोड़ गई थी.....

हर रोज़ लगाने बैठता हूँ,
फिर बैठा ही रह जाता हूँ.......
एक जंग मेरे भीतर शुरू हो जाती है.....


रात अचानक नींद से जाग,
तुम्हारा नंबर मिला दिया..........
पहुच से बाहर था......

कौन कहता है,
फ़ोन ने दूरी मिटा दी है.............

क्यों चले गए हो,
सब यही पूछ रहे हैं.....
तुम्हारे बाद, बस ये सवाल रह गया है.....

पहेली...........!

जब भी.......
यथार्थ की सीमा से परे,
ले जाते हो ........!

तुम तो निराकार हो कर,
रम जाते हो,
सृष्टि में ..........!

परन्तु मेरे भौतिक अस्तित्व पर,
लग जाता है प्रश्नचिन्ह,
 मैं अपनी संवेदना को,
कौतुहल में पिरो कर,
जपता हूँ, कुछ अनसुलझे से शब्द ........!

फिर तन्द्रा भंग होने के साथ ही,
उग्र आवेग में बह जाता है,
सारा विश्वास, और ........!

एक क्रान्ति जन्म लेती है,
जिसे तुम्हारी सृष्टि,
अवज्ञा, नास्तिकता,
और ना जाने क्या क्या कहती है,

मैं उस क्रान्ति का,
अंतरिम भाग बन कर भी,
उद्विग्न रहता हूँ ..........!

भ्रम बढ़ता जाता है,
पल प्रतिपल,

अब सुलझा दो इसे,
ये पहेली पीड़ा देने लगी है ..........!

पानी के साथ...........!

गर्मियों की उमस भरी दोपहर में,
उकताया हुआ,
खुद पे थोडा गुस्साया हुआ,

शहर की बदनाम गलियों से,
गुज़रा मजबूरन ............!

फिर एक कार को रुकते,
और एक लड़की को,
उस से उतरते देखा .......!

मैं बढ़ गया,
पान की इक दूकान की ओर,
नज़र चुरा कर ......!

और लड़की मेरी ओर ......!


पानी की एक बोतल,
बुझा रही थी प्यास, बढ़ रही थी लड़की मेरी तरफ,


खाली बोतल फेकने से पहले,
उसने टोका मुझे,
ऐ बाबू  ............!


जैसे वो कार वाला कमीना,
फेक गया है मुझे,
तुम मत फेको इसे ..........!

Thursday, May 3, 2012

शोखी और बेवफाई, हर शबाब के साथ,
कांटे तो अदा हैं......
हर गुलाब के साथ.....

नज़र उठाई,शर्मिंदा हुए ,
उन्हें देख कर.....
फिर इक  तंज़  आया,
आदाब  के साथ.....

मुलाकात  आखिरी, बात आखिरी,
हमारे इक  सवाल,
उनके इक  जवाब के साथ....

इंतजार तो था और उम्मीद भी,
घर भी बहा ले जायेगा, ये मालूम  न  था,
वो आया भी, तो इक  सैलाब के साथ......

कांटे तो अदा हैं......
हर गुलाब के साथ.....


दिल  का ताज  खंडहर है,
हर दीवार-ओ-मेहराब के साथ.....

हस्ती दफन  कूचा-ऐ -यार में,
अंतस  का अलविदा,
इस  इन्तखाब के साथ.....

Saturday, April 7, 2012

अजीब है न........?

सुबह कुछ ज्यादा ही लाल है
या तुम्हारी लिपिस्टिक कर रंग
फैला है थोडा सा...



ट्राफिक में फसा हूँ,
सोच रहा हूँ,
तुम्हारी अंगड़ाई ख़त्म हो,
तो आफिस पहुचुं......



तुम्हे याद करता हूँ,
औफ़िस की कॉफ़ी में,
चीनी की ज़रुरत नहीं लगती..........




ऑफिस की छुट्टी की,
बाय बाय में....
तुम्हारा सुबह का हेलो,
अब तक मिला-जुला है..........
तुम घर में रहती हो,
या मेरे दिमाग में...........?



थोडा रूठ कर,
झगड़ कर, मेरे सीने पे,
मुक्के नहीं मारे आज.......
शाम उदास सी है...........!



छज्जे पे खड़ी तुम,
डांटती हो,
गली के बच्चों को,

मेरे कान में,
घुंघरू क्यों बजते हैं..........?




सब मुझे समंदर कहते हैं,
यहाँ मैं तुम में डूब जाता हूँ,..........
अजीब है न........?

Monday, April 2, 2012

फर्क......


एक घनी बस्ती, इक गन्दा सा रास्ता,
एक दोयम सी दुनिया, पक्का सा वास्ता....

सुलगी सी परछाइयाँ, आगे आगे,
ठहरा ठहरा सा ये मुल्क बजाफ्ता.....

निरे ढूह बुर्ज ईमान के,
गिरी पड़ी वफादारियों की हवेलियाँ,
ज़मीर-मरीज़-ऐ-बे-दम हांफता......

रिजवान-ऐ-अवाम को,
अब कहाँ काफिरी की फ़िक्र,
पुर्जे कागज़ के महंगे, लहू सस्ता....

दरकार-ऐ-दीद और कुछ नहीं,
बस वो मख्लूकात-इंसान,
उसका छोटा ईमान का एक पुश्ता............

Tuesday, September 20, 2011

सलाम...........

दिन भर के थके,
उदास शाम की गोद में बैठ,
जुबां और हलक की प्यास,
ना जाने किस किस ज़हर से बुझाकर,
पर फिर भी प्यासे रह कर,

वो जो, 
देर रात तक अपने तकिये,
गीले करते हैं...........

जिन्हें सुबह आ कर,
थपथपाती है......

माँ का प्यार देती है........
और कहती है........
बेटा उठ आज तुझे फिर,
दिन भर की जंग लड़नी है........

तू थक भी कैसे सकता है,
MNCs के गुलामों को,
थकने की आज़ादी नहीं है..........!

Monday, August 1, 2011

ख़ुदकुशी की और बेहतर तरकीब न मिली,
 हमने तुझसे आशिकी कर ली.........





Thursday, May 5, 2011

भरोसा...... !


क्या होते हैं
सच्चे मोती....
देखे हैं पहली बार,
तुम्हे मुस्कुराते देखा आज....

मेरे हर सवाल का जवाब,
यूं ही खूबसूरत,
क्यों नहीं होता.........?
सोच ही रहा था........

और बस फिर से,
तुम्हे मुस्कुराते देखा........

भरोसा हो चला है मुझे,
मेरी भी दुआ कबूल होती है.......

कुछ दिनों से,
मेरी सुबह खास होती है.........

प्यारी सी खुशबू,
एक गुलाब की,
रोज छू लेती हैं मुझे,
किसी न किसी बहाने....

एक दुआ तम्मना बन कर,
रोज लबों पे आ जाती है............

ये मदहोशी के दिन,
बस यूं ही चलते रहें........

Pretty 1

ये फूल सा......
चेहरा देखता हूँ.......

या माजी के सर,
एक नया सेहरा देखता हूँ.........

तेरी मासूमियत देखता हूँ.......
या इसके बराबर..........
अपने लफ़्ज़ों की
अहमियत देखता हूँ...........

इतना कमसिन तो.....
गुलाब भी न देखा.......
तेरे चेहरे सा रोशन.......
कभी आफताब भी न देखा.........

देखता हूँ, जीता हूँ,
महसूस करता हूँ,
और..........

देखा इतना हुस्न की........
बता नहीं सकता......

प्यास महसूस होने लगी है,
फिर मेरी आँखों को.......
बस जता नहीं सकता.......

याद आ गए
भूले बिसरे से कुछ,
ज़ख़्मी खुशबुओं वाले दिन........

घूमता फिरता था,
तनहा..........
न जाने किस की तलाश में........
एक जिन्दा दिल लिए,
अपनी ही लाश में...........
तब भी एक चेहरा.....
मेरे रूबरू हो कर गुज़रा

मुझमे बहता रहा,
जिंदगी बन कर........

पहाड़ों की नदी सा,
उफनता गरजता.......

मेरे हर रंग को,
सजाते संवारते........
लाश को जिंदा कर,
इंसान बनाते...........

कई साल........

फिर चला गया......

जाते जाते,
मेरे ख्यालों की
नमी तक ले गया.......

क्या दिल, क्या जिगर........
अब तो सब पत्थर......

इन पत्थरों पर,
बहेगा कोई,
अब उम्मीद कम ही हैं............

हर बंजर घाटी में,
क्या सरिता बहती है भला..........?

Saturday, April 9, 2011

अंततः........

कभी तुम्हारी कुशाग्रता,
और तुम्हार वाक्चातुर्य,
मुझे हीन भाव दे देता,

कभी तुम्हारा समर्पण,
मुझमे धारण कर लेता,
रूप आत्मबल का..........

तुम मुझसे प्रगाढ़ कब थे,
कब मैं तुम्हारे लिए समर्पित.....?

यही प्रश्न, तब से अब तक,
स्थिति को मथ रहे हैं,
और अब तक,
कोई सन्दर्भ नहीं निकला.........

मुझे भे ज्ञात और तुम्हे भी,
छल के रूप और उनके प्रयोग,
तुम भी निपुण और मैं भी,
ये तो प्रतियोगिता हो चली है.........

अवसाद अधिक न टिक पायेगा,
इसका भी अंत निकट आएगा,
शीघ्र ही, सत्य.......
स्वतः विदित हो जयेगा...........

पुनः, नयी जटिलताएं,
मेरे और तुम्हारे समक्ष,
मुह बाए खड़ी होंगी..........

हम हतप्रभ कभी जटिलताओं का,
और कभी एक दूजे का,
मुह ताकते...................

एक दूजे को ही दोष देते,
आरोप प्रत्यारोपण करेंगे.........

तब अंततः...........
समर्पण कर देगा कोई एक,
और दूसरा,
विजय की झूठी गर्वित मुस्कान लिए,
आगे बढ़ जाएगा...........

इस तरह हम अपनी नियति को,
प्रवाहित कर,
अपने अपने अस्तित्व के कारण को,
सारगर्भित कर देंगे...........

मैं, मैं ही रहूँगा..........
तुम भी तुम ही रहोगे........
बस संरचना का अर्थ,
सिद्ध हो जाएगा,
और..............

अपरिमित को.............
उसकी परिभाषा का,
एक और विस्तार मिल जाएगा...........

तुम भी संतुष्ट,
और मैं अज्ञानी भी संतुष्ट..............!




रचना..........!

पिछले कुछ दिन, प्रकृति की गोद में बिताने का सौभाग्य मिला....ईश्वर-प्रकृति-स्वयं सम्बन्ध का कुछ और स्पष्ट बोध हुआ.....लगा जैसे अकथनीय से संवाद हो रहा है....और मुझे मेरे चिर-प्रतीक्षित प्रश्नों के उत्तर मिल रहे है........!

ध्वनि, ऊष्मा......
तो कभी प्रकाश बन कर....
मिलता है.....
अनादि, अनंत.........

खेल जाती है,
प्रकृति के अधरों पर,
रहस्यमयी मुस्कान,
अपनी परिभाषा का,
गठन होते देख............

तो अनादि अनंत,
अपने अपररूप,
लेखनी से कहता है.......

देख मैं तू बन कर,
खुद को रच रहा हूँ........

विचित्र है, यह भी,
की अलौकिक, पराभौतिक से,
साक्षात्कार करने के,
मिलते हैं निर्देश,
लौकिक, भौतिक रचनाओं से........

कल्पना, भय और विश्वास की,
खिचड़ी परोस देते हैं,
धार्मिक ठग.......!

मन भर छक लेता है,
अनुचर समाज........

और यहाँ, वो कहता है,
अबोध विस्तार से..........

हूँ रहस्यमय.....
और उधृत होते होते भी.........
नया रहस्य रच रहा हूँ........

प्रश्न का उत्तर गढ़ रहा हूँ,
या उत्तर का......
प्रतिप्रश्न बन रहा हूँ......!

अति साधारण हूँ,
पर असाधारण लग रहा हूँ..........!

देख मैं तू बन कर,
खुद को रच रहा हूँ...........!

मंथन.........

बड़े ही विचित्र क्षणों में......विचित्र अनुभवों की एक श्रृंखला से साक्षात्कार हुआ........भौतिक परिवर्तनों का, विचित्र  आभाषों का, सर्वशक्तिमान से इन सबका और सबसे अपने अस्तित्व के सम्बन्ध का विश्लेषण करते करते लेखनी का सहारा ले लिया तो विश्लेषण का रूप कुछ कुछ कविता जैसा दिखने लगा.......ह्रदय ने कहा पोस्ट कर देना चाहिए.


परिवर्तन.....अवश्यम्भावी.......!
फिर इतना.........
अनापेक्षित क्यों प्रतीत होता है......?

संभावित तो सदैव.......
विस्तृत या लघु रूप ले कर,
संज्ञान में रहते ही हैं......!

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आभाष,
इन संज्ञानो को.....
आकृति भी देते रहते हैं.......!

सम और विषम संभावनाओं को,
इतना परिचय तो पर्याप्त होता है,
अकस्मात् के आत्मसात के लिए.........!

गुण-दोष, राग-विराग को,
भली भाँती, समझता है 'अंतस'....!

फिर विडम्बनाओं का अस्तित्व,
मंथन प्रदेश में रहने का औचित्य क्या है.........?

अप्रतिम अतुलनीय से,
साक्षात्कार की भूमिका.........
प्रारम्भ हो चुकी संभवतः............!

फिर शंकाओं का स्रोत, कोई आधार....
अभी तक शेष क्यों.....?

त्याज्य और ग्राह्य का विभेद......
अति सरल.......!
और सम्पादन,
अत्यधिक दुष्कर...........!

कदाचित संभव.......!
परिवर्तन ही रचना है.....!
एक अन्य मूल प्रश्न की..........!

परन्तु कहीं यह भी,
बौद्धिक क्लिष्टता का,
कोई संजाल तो नहीं.........?

समानातर और संयुग्मी,
होते रहने वाले आभाष,
बढ़ा देते हैं, स्थैतिक जटिलता..........!

अधिक संज्ञान,
अधिकाधिक विभ्रम.....!

अंततः....यह भौतिक परिवर्तन,
समस्या का मूल.........
कदाचित अधिक अथवा कम...........!

Monday, March 14, 2011

जब से बिछड़े हो........

मेरे अंतस में रचे बसे....
रंग ढूंढता रहा.......
एक, बस एक ..........
अन्तरंग ढूंढता रहा..........

कभी फिरोजी कभी सुर्ख.....
तो कभी गुलाबी का अकेलापन मिटाने को........
तुम्हारा संग ढूंढता रहा...

सहर तो कब की ढल चुकी.....
तुम्हारी हर ताज़ा याद ले कर......
ख्वाहिशों पे लगी पपड़ी कुरेदता रहा.....
तुम्हारे नाम की कोई ज़ंग ढूँढता रहा.......

तुम्हे शिकायत थी.......
मुझे जीने का तरीका नहीं आता.......
तुम्हारे बाद, वो तरीका बस दो पल जीने का...........
ये बेढंग ढूंढता रहा................

सुर, लय, ताल और अंदाज़ ढूँढता रहा,
जिन्दगी गुज़र गई.............

जिन्दगी का फकत,
तंग सा रंग ढूंढता रहा...........

जब से बिछड़े हो........
बस तुम्हारा संग ढूंढता रहा...........

Wednesday, January 26, 2011

वो कमरा..........


उसी कमरे में,
जहाँ बरसात के पानी के साथ
हर रोज़ टपकती होंगी यादें मेरी......

देर शाम गए,
घुरघुराते पंखे को,

अनजाने ही घूरते हुए.........
हार कर.......
बस थोड़ी देर के लिए ही ,
भुला देना चाहते होगे.....
सारी घटनाएं, दुर्घटनाएं......
जो हो गयीं,
बस कुछ ही दिनों में...
जानता हूँ, मेरे शब्द,
बजते होंगे कानो में तुम्हारे...........
आधी रात जैसे गाड़ रहा हूँ,
कील.........
पलंग से सटी दीवार में.........
तोड़ देना चाहते होगे,
मेरे तुम्हारे बीच,
यादों की सूखी लकड़ी से बनी........
एक अद्रश्य सी 'वो' दीवार..............
मैं भी आज सोच रहा हूँ...........
वहां तो पूरा एक.....
कमरा छोड़ कर आया था......
यहाँ एक लकीर खींच पाना भी,
असंभव लगने लगा है.......

Wednesday, December 1, 2010

तू ही किनारे पे बैठ रोया होगा..............

समंदर खारा है आज,
तू ही किनारे पे बैठ रोया होगा..............

नम है सांस मेरी बेहिसाब,
तूने ही अपना दामन,
अश्कों से भिगोया होगा..........

मेरे ख़त को उठा कर,
पढता रहा होगा,
फिर कश्ती बना,
छोड़ दिया होगा लहरों पे.....

परेशां हो कर खुद ही उसे,
अपने हाथों से डुबोया होगा......

समंदर खारा है आज,
तू ही किनारे पे बैठ रोया होगा..............


दर्द रिसता होगा हर धड़कन में,
जख्म भरते नहीं इश्क के कभी....
कहाँ तू भी रात, सुकून से सोया होगा.......

मेरा तो दामन ही तार तार था,
मेरे हिस्से के ज़ख्मों को भी,
बाद मेरे तूने ही संजोया होगा...........

समंदर खारा है आज,
तू ही किनारे पे बैठ रोया होगा..............


न ही नूर-ऐ-इलाही मयस्सर,
न ही इश्क-ऐ-पाक,
कौन बदनसीब, मुझ सा गोया होगा.........

Thursday, November 11, 2010

पाप........



दीवार से गिरते पलस्तर को देख अनुराधा ने झाडू उठा ली....झाडू से गिरते पलस्तर को पूरा गिराने के बाद कमर पर हाथ रख एक लम्बी सांस लेने का मन बना ही रही थी की.......विक्रांत के कमरे से कुछ आवाज़ सुनाई दे गयी।


अनुराधा समझ गयी की विक्रांत फिर से साबुन ढूंढ रहा हैं....... वो भाग कर विकी के कमरे में पहुची तो देखा की विकी पागलों की तरह कुछ ढूंढ रहा हैं.....अनुराधा को अचानक याद आया कि साबुन तो शाम ही ख़त्म हो गया था, और आज विकी कुछ जल्दी ही जाग गया हैं....अनुराधा ये सोच कर परेशान हो रही थी कि साबुन मिला तो विकी को सम्हालना मुश्किल हो जायेगा.........विकी अब भी पागलों की तरह साबुन ढूंढ रहा था.......विकी को अपने हाथ धोने थे.........यही एक काम था जो वो माँ कि मदद के बिना भी कर पाता था.....अनु भाग कर बाहर गई, देखा तो अभी दूकान खुली नहीं थी..........अनु के माथे पे पसीने कि बूंदे छलछला आयीं........



घर के अन्दर से अब चीखने चिल्लाने की आवाज़ आनी शुरू हो गयी......अनु फिर से भागी और विकी को पकड़ कर बिस्तर कि तरफ ले जाने लगी पर जवान बेटे के जिस्म कि ताक़त के आगे हलकी पड़ रही थी......


विकी ने अनु से हाथ छुड़ा लिया और बाथरूम पहुच गया..........एक पल में ही उसने साबुन रखने कि हर संभावित जगह तलाश कर ली, अनु ने पीछे से विकी के पीठ पर हाथ रख कर कहा-बेटा रुक जा मैं तेरे हाथ धुला देती हूँ......पर विकी ने जैसे सुना ही नहीं, उसकी आँखों को सिर्फ साबुन की तलाश थी....एक छोटा सा टुकड़ा पा कर विकी ऐसे ठंडा हो गया जैसे लाल गरम कोयले पर किसी ने पानी डाल दिया हो। विकी को अभी भी हाथ धोने कि जल्दी थी...पूरे तो नहीं पर आधे हाथ पर साबुन लगाने के बाद विकी ने देखा कि टुकड़ा ख़त्म हो चला हैं.....ये देख उसे फिर दौरा पड़ने लगा..........अनु ने जैसे तैसे उसके पूरे हाथों पर साबुन लगा कर उसे दिखाते हुए हाथों पर पानी डाला.......धुले हुए हाथों को विकी ने जैसे ही सूंघना शुरू किया, अनु उसे खींच कर उसके बिस्तर तक ले गयी। विकी अभी साबुन कि महक को अपने हाथो पर परख ही रहा था कि अनु फिर दुकान देखने चली गई...........



विकी अब शांत हो रहा था......और उसके ज़ेहन में १४ साल कि उस लड़की का चेहरा फिर ताज़ा हो रहा था, जो अब विकी कि वजह से इस दुनिया में नहीं थी।



एक फिल्म सी उसके सामने शुरू हो चली थी......गर्ल्स कॉलेज से लौटते हुए कृति को उसने मंदिर के पीछे रास्ते पर रोक लिया और हाथ पकड़ का अपने प्यार का इज़हार कर दिया........कृति ने हाथ छुड़ा कर विकी को थप्पड़ मार दिया.......



दूर खड़े दोस्तों ने सब देखा और विकी को उकसा दिया, १८ साल के विकी ने मोहल्ले के गुंडे दोस्त कि कार में कृति को रास्ते से अगवा कर लिया......विकी ने ये कर तो लिया पर उस जंगल में वो कृति को उन दोस्तों का शिकार बनने से रोक नहीं पाया.......कृति कि जान वहीँ पर चली गई........सदमे की हालत में विकी कृति की लाश के पास बैठा मिला......पुलिस को गवाही में कुछ नहीं मिल पाया.......विकी को डाक्टर सही नहीं कर पाए.....लाखों रूपये खर्च करने के बाद विधवा माँ के पास बस घर बचा था और ऊपर के हिस्से में किरायेदारों से होने वाले किराए कि आमदनी.......उस घटना के बाद विकी ने सदमे कि हालत में रहते हुए लगभग दो माह बाद सिर्फ एक काम किया......उठ कर अपने हाथ साबुन से धोये....फिर उसकी महक को सूंघता रहा....जब एहसास हुआ कि महक ख़तम हो चली हैं तो फिर से हाथ धोये........



विकी का अवचेतन उस से हाथ धुलवाता रहता हैं........उसे तसल्ली दे कर कि शायद इस से पाप धुल जाए.........



विकी को साबुन कि महक आनी बंद हो गयी हैं............उसे फिर से दौरा पड़ने लगा हैं...उधर सड़क पार करते हुए अनु को एक कार ने ठोकर मार दी हैं............अनु अब नहीं हैं.......