Thursday, October 29, 2009
इक गुजारिश है.........
शोर मचाता चला जाता है,
तेज़ बहती हवा के संग.....
खुश, इठलाता..........
सोचता.........
फिर कोई नया उग ही आएगा,
ये डालियाँ, यूँ ही,
वीरान तो न रहेंगी.......
पर ये निशाँ छोड़ गया है जो,
सवाल बन माथे पे लगा है........
कल को लोगों के सवालों का,
सबब बन जाएगा......
जुदा हो के भी,
कितना जुदा हो पायेगा,
रंग बदल कर हो जाएगा पीला,
पर क्या पहचान बदल पायेगा....
उसको जिद है, तन्हा रहने की.......
कोई जा कर कह दे,
दरख्त से टूट कर पत्ते,
ज्यादा जिया नही करते..........
बाद मरने के भी दुनिया,
पहचान लिया करती है.......
एक गुजारिश है,
एक पतझड़ और साथ गुजार ले.......
मुझे फ़िक्र है तेरी बहुत.............
Thursday, September 24, 2009
प्रश्न और विडम्बनाएं..........
कोई छंद लिखूं कैसे,
कैसे एक और मुक्तक लिखूं...........
कैसे स्वयं की परिभाषा लिखू...............?
दर्पण की मुझसे विरक्ति लिखूं,
या आहत ह्रदय की कहानी लिखूं॥?
कैसे टूट गई एक आशा लिखूं.............?
स्वयं से स्वयं का विद्रोह,
और समर्थन कभी,
या ह्रदय है कितना प्यासा लिखूं..........?
उडेल कर रख दूँ ख़ुद को,
की रिसने दूँ पीड़ा थोडी थोडी,
या घाव लगा है, ज़रा सा लिखूं..........?
माना की झूठा है अंतस कभी कभी,
पर सिर्फ़ मुझसे ही न,
धूल सना या जंग लगा,
या सच्चा सोना खरा सा लिखूं..........?
विडम्बना तो ये भी एक,
की तुम लिख रहे हो मेरी कहानी,
मैं लिखूं भी तो क्या लिखूं............?
Thursday, September 17, 2009
ऐसा क्यों है.............?
एहसान कर दिया,
मेरे फलक पे आ के,
पर मेरा चाँद, आधा क्यों है.......?
कब गुरेज़ था सहने से मुझे,
पर ये तो बता,
मेरे ही हिस्से, दर्द ज्यादा क्यों है.........?
जिन्दगी किए जा रही है,
मुझसे वादे पे वादे,
फिर ये खुदकुशी का इरादा क्यों है...............?
कह दे की अब तू ही खुदा है मेरा,
या ये बता........
हंसाता है, फिर रुलाता क्यों है.............?
या तो हर दफा राह भूला हूँ,
या ये जहाँ ही तेरा हो गया,
जो भी मिला, हर मुसाफिर,
तेरे ही घर का पता बताता क्यों है..............?
मेरे जिस्म के बिखरे हिस्सों का,
बनाया जाता है ढेर, बाद-ऐ-कत्ल,
फिर हर कोई, ढेर पे एहसान जताता क्यों है............?
प्यार की शिद्दत,
नज़र आती है, जब आंखों में,
तो हर शख्स मुझे आजमाता क्यों है.............?
माना की क़यामत थे,
कुछ लम्हे हमारे,
पर तेरी याद की दाना आहट से भी,
मेरा हर रंग थरथराता क्यों है..................?
रौशनी देख खुश हो...............?
नाचो गाओ दोस्तों,
पर ये भी पूछो,
गौरव आख़िर अपना घर जलाता क्यों है............?
Wednesday, September 9, 2009
When Culture Emerged
of human origin...............
Rose somewhere,
in the middle of the world........!
When nature bet new bait,
and evolution penetrated,
the anthropoids,
Differentially.........!
Standing on the bank of Nile,
He bowed his head,
To the Sun,
and offered himself,
to the Nature,
with the intution...........!
Amused, Surprized moreover Wondered,
Gazing the animal flocks in day,
and stars at Night.............!
Just began to analyze,
Began to scale..............!
When one different,
Made others different..........!
Took them with,
To live with..............!
They learned feeding, to live........!
Stopped living to be fed only..........!
Somthing happening,
In and out of him,
it was emersion,
Different from feelings,
It was thought..........!
Something most infectious,
Ever existed...........!
When someone different,
Thought somethingdifferent,
Rose his hand,
Pointed towards the horizon,
to show the beauty,
of nature's creation,
to rest of the fellows...........!
Cultured emerged,
from very inside of first,
the first human.........!
क्या तुम न आओगे.........?
सब कहते हैं,
के अब तुम न आओगे लौट कर........
दूर चले गए हो न,
बहुत दूर.............
तुम्हारी याद क्यों नही जाती..............?
कहते हैं,
तुम्हे जन्नत नसीब हुई होगी...........
मुझे धोखा क्यों दिया.....?
क्यों छोड़ दिया अकेला.......?
वादा किया था,
जुदा न होगे.........!
सोचता हूँ, फिर सोचता रहता हूँ.....
मैं क्यों हूँ.........?
क्यों ठहर जाया करता हूँ......!
इन सूनी गलियों में,
बंद दरवाजों से,
उलझता रहता हूँ,
इनसे मेरा रिश्ता ही क्या है.........?
सब तो तुम्हारे थे........?
क्यों मैं दीवारों पे,
हाथ लगाते चलता हूँ......?
कुछ भी नही अब,
इन मुर्दा दीवारों में.........!
हाँ कहीं कहीं, कुछ धब्बे,
खून के..........
दीवारों के संग लिपट कर
सूख चुके.......
एक चिपचिपे से धब्बे पे,
ठहर गया है हाथ.......
वहीँ जहाँ तुम खड़े थे,
टिक कर, मुझे बाहों में लिए,
जूझते अपने दर्द से.......
ये धब्बा,
क्यों नम है अब तक........
बिल्कुल तुम्हारे उस रुमाल जैसा,
जिसे तुमने बाँधा था,
मेरे कंधे पे.............
तुमने देख ली थी वो छोटी से चोट,
पर मैं न देख सका वो गोली,
जो मुझे लगी थी,
पर तुमसे हो कर.......
तुम्हारी ही बाहों में,
होश खो दिया.....
फिर तुम्हे खो दिया...........
हाथ का ज़ख्म भर चला है,
दिल का हर रोज़ हरा हो जाता है..........
वो हाथ हिंदू थे के मुसलमान,
नही पता.........
पर हथियार हर हाथ में थे..........
कौंधती हैं यादें,
अब भी उस दोपहर की......
जब तुम खड़े थे,
मेरे और हर वार के बीच,
मेरे आगे, पीछे और हर तरफ़.....
उन हाथों से बचाने के लिए...............
बचा भी लिया,
पर अब कौन बचायेगा........
जल्द ही किसी रोज़,
इस शहर में, फिर दंगा हो जाएगा.................
बाद-ऐ-हयात......
ख़त्म हो गयीं,
इश्क की सब शोखियाँ,
उठ गई महफिल,
जाम क्यों छलका.......
साकी की तरफ़ से,
अब ये शरारत क्यों है............?
कत्ल कर दिए हैं,
अरमान सभी,
तो फिर किसकी है ये............
नशेमन में,
बू-ऐ-बगावत क्यों है...........?
दफ्न कर देता हूँ.........
उठ उठ के आ जाती है,
इस उम्मीद को जिन्दगी से,
इतनी सलाहत क्यों है..........?
पुरसुकून है, जेहन बाद मरने के,
पर कहीं तो खलबली मची है.........
कमबख्त इस मुर्दा जिस्म को,
इतना जीने की आदत क्यों है.............?
Sunday, September 6, 2009
ग़लतफहमी.....
ख्यालों से परे जा कर देखा,
तो दुनिया ही कुछ और थी...........
क्या कभी ये नही हो सकता कि किसी की आंखों को या किसी की आँखे हमें ग़लत पढ़ते रहें............कई दिन, महीनो, सालों या फिर सारी उमर..........
Sunday, August 30, 2009
शगल...........
ख़त खून से न लिख बैठा हो नादाँन,
हाथ कांपते हैं, खोलते हुए,
पर क्या करू,
ख़त ही मेरे नाम है........!
इस कदर नफरत हो चली,
उसे मुझसे,
की हाथ काट बैठा............
कहा करता था...........
उसके हाथों की लकीरों में,
मेरा ही नाम है...............!
मैं भी काटता रहता हूँ,
अपने हाथों अपना ही गला........
मेरा भी यही शगल,
यही अब मेरा भी काम है.............!
Friday, August 28, 2009
एक नया सुखन......
क्या बुरा था मरना जो एक बार होता...........
और एक हम........
इस कदर है पसंद मरना....
काश ये बार बार होता...........
एक तड़प तो देख ली,
तुझसे जुदा हो कर.........
वो दर्द भी देखते,
जब कोई खंज़र,
वाकई जिगर के पार होता.........
लुत्फ़ बढ़ जाता शायद,
और एहसास-ऐ-दर्द भी,
जब तेरे ही हाथ,
वो वार होता...........
दुल्हन.......
एक सुबह ऐसी ही गुजरी थी.......
पत्तों पे जमी ओस,
चमकने लगी है,
रात का स्याह घूंघट,
जो हट रहा है........
हया की लाली,
नज़र आने लगी है,
खुश हैं परिंदे...........
कि दुल्हन आने को है,
फिजा में,
फैलने लगी है खुशबू
सुबह बन के हसीना,
अलसाई सी है,
उठ रही है,
अभी अंगडाई ली है...............
Saturday, August 15, 2009
This was my turn
The moment,
When your silent smile,
Convinced me……!
Kept me alive……….!
Like I will be alive forever……
Till the day you beat inside………..!
Being the pulse…….!
Yes, I do remember
Do you do……?
Those promises, we made….!
Holding you, in my arms…….!
In those silent moments……..!
When you locked my voice,
Within your lips…….!
Do you remember……?
Those commitments……….!
You made with me……!
Aggressive, passionate, almost mad……..!
Those Promises to kill,
If being apart………..!
I remember………..!
Yes I do……..!
OK, tell me,
Though you are in my arms……..!
Why do I feel distance?
Thousand miles distance…..!
Even if you hold my hand,
Walk beside me…….!
And now what……?
If I see you going,
Away, far away……….!
Why…..?
I feel my breath stopped……….?
Feel the pulse disappeared,
It was you…..!
Are you nowhere within me…….?
Any more……….?
May be…….?
You follow those promises to kill,
So you kill me…….….?
But why so slow…….?
Why made it so painful…….?
You have been the kind most,
Just be once,
Once again………
Kill me,
Silently, fast, unfairly….!
Unfairly ??????????
Oops…………
I had to be you……..!
Yes this had to be me
Because this was my turn….?
A wish in the rain
It rained
Like never before
Just wished to walk
So was out…………
Beauty of rain,
In its sparkling drops,
Welcomed, open heartily…..
Don't know why,
But I am smiling,
Walking alone,
On the lonely road………..
Every drop
Refreshed my face….
Perhaps not my inner……..
Because……….
Felt like you touched me……..
With your wet hairs…….!
Was this you………?
Raining on me………..?
No…………!
You were so far…….
Hundreds of miles away….
How could you touch me………..?
Is it just a pain,
That made me smile………
Yes I remember,
You said that day…….
Pain makes you smile………..
Was I really smiling?
Yes I felt again,
That salty taste again,
Taste of tears………..
Raining along with……
Creeping on my cheeks,
Again.....!
Sorry....Disobeyed you,
Can't hold any more..........
That old taste,
That returns time to time….
When I miss you……..
When this distance,
Makes me mad………
It rained outside,
It's raining inside,
I am all alone…….
Just wishing…….
Come back Jaan…….
I am dying…….!
Monday, August 10, 2009
Blind nights 1
Sunday, August 9, 2009
Those blind nights 2
Those strange expression,
In you acts,
and,
When you said,
I feel sleepy.........
I felt broken,
All alone and tired.....
A question pounded inside me,
With every heartbeat,
Who was I.........?
Those sleepless nights,
When you said,
Good night,
And me too,
But half heartly........
Awakened, surprized
And waiting for your call,
In those dark nights.............
Nights, that have been,
Nightmares, time to time....
Making me realized,
That I am still.........
Five year's boy,
Scared of evermate,
Lonliness, my lonliness,
Surviving just within me.......
Though you said always,
You are mine,
But sometimes I find,
You nowhere.......
Nights when I saw my beliefs,
Dissolving, disappearing,
In my tears,
My silent moans,
Couldn't appoach you.........
I wonder,
Were you realy part of me......?
Thursday, July 23, 2009
ख़ुद को अकेला न लिखो..............
खुशबू बन,
महकने का जज्बा ढूंढते,
दीवानों का टोटा है.............
खेल के मैदान छोटे,
घर छोटे,
कमबख्त इस शहर का,
दिल भी छोटा है........
रोज़ी छीनते शिकारियों के,
हुजूम यहाँ,
कुछ रोटी भी छीन लेते.....
कुछ मासूमो के जिस्मो से,
बोटी भी छीन लेते..........
सड़कों की नालियों में,
कीडों के मानिंद.........
बजबजाते लोग........
अलसाते निकलते सुबह,
दिन भर की परेशानियों में,
लिपटे सने घर आते लोग.......
मुर्गी, चूजे जैसा इंसान यहाँ,
दडबों जैसे घर,
जिस्मो से अटी सड़कें,
गलियों में,
बाढ़ से उफनते सर.........
इतनी भीड़ है शहर में,
कि दम घुटता है..........
कमबख्त अब कोई शायर,
ख़ुद को अकेला न लिखे.............
Sunday, July 19, 2009
आख़िर मेरे आंसू जाते कहाँ हैं.....................?
बस अभी साफ़ ही तो किया था.........?
की ये एक पपडी फिर निकलने लगी,
यादों के घाव फिर रिसने लगे,
मैंने कितना ही सुखाया,
धो मांज के रखा, चेतन को,
पर कहीं अवचेतन की दरारों में........
लगी जंग अब फ़ैल कर, रिस कर,
आ रही है, बाहर...........
अशुद्ध हो जाए मन फिर से,
ऐसी आकांक्षा नही,
और ये रिस रहे ज़ख्म,
उन अधूरी इच्छाओं की जड़ें ही तो हैं,
जिन्हें उखाड़ फेकने की,
कोशिश की थी कभी.............
बिल्कुल दूब के स्वभाव वाली........
हर सावन में हरी हो जाती हैं,
और संग में हर घाव भी,
इतने आते जाते मौसम,
सुखा न सके......
कितने ही शीत और ताप
सह कर जीवित हैं,
ये इच्छाएं, नासूर बन कर.......
अब तक तो मर जाना था इन्हे.........
कदापि मैंने ही आश्रय दे रखा हो ?
कहीं सींचता तो नही रहता ?
बरसों से सोच रहा हूँ.........
आख़िर मेरे आंसू जाते कहाँ हैं.....................?
Sunday, July 5, 2009
सुई.........
मानवता की खोज में कुछ पथिक,
भूसे के ढेर में, सुई ढूंढते हैं.......
ये जिज्ञासा न जाने कहाँ से आई है,
बड़ी प्रबल है,
न जाने कहाँ ले जायेगी.......
फाउन्टेन पेन से,
मोबाइल फोन तक का विकास.......
पथिकों ने सब देखा....
सभ्यताएं भी कुछ मिटती हुई.......
आतंक और व्यवसायिकता ने,
गढ़ दी है, दोस्ती की नई परिभाषा......
पथिक फिर भी ढूंढते हैं,
इस परिभाषा में, मानवता का तार........
पूरा विश्व देखना होगा,
पूरा ढेर छानना होगा,
शायद सुई मिल सके.......
शायद सभ्यता के वस्त्र फिर सिल सकें........
मानवता की सुई खोई हुई है,
धर्म की दुकाने खोली गई,
सिर्फ़ ये सुई बेचने के लिए,
पर अब यहाँ,
भेदभाव बिकता है,
घृणा सबसे सस्ती वस्तु है,
इस दूकान में.........
पथिकों को आगे जाना है......
मनुष्य को वस्त्र देने हैं.....
सुई बिना तो सम्भव नही.......
विदेशी राजदूत और समझौते,
समझौते पे हस्ताक्षर......
उनका कलम उसी, सुई जैसा दीखता है......
बस दो पल........
पथिकों को समझौते पर सुई नही मिली......
मानव मनुष्य बन रहा है........
उसे नग्नता का आनंद अच्छा लगता है,
और नग्नता का आनंद अच्छा लगता है,
क्या मनुष्य को वस्त्र नही चाहिए.........?
तो क्या पथिक अब न चलें,
सुई की खोज का क्या होगा.......?
बुद्ध, महावीर, गांधी,
पथिक ही तो थे,
उन्हें तो सुई मिल गई थी,
मानवता के वस्त्र पहने थे,
तो चित्रों में नग्न-अर्धनग्न क्यों.......?
नेत्रों का दोष है,
सभ्यता के वस्त्र किसे दिखे अब तक ........?
पथिक बुद्ध या गाँधी नही,
पर सुई तो चाहिए.......
अपने वस्त्र सीने हैं........
उसे भी सभ्य होना है........
पथिक को प्रेम का धागा भी चाहिए......?
एक और खोज.......
सीमित जीवन, अंतहीन खोज.....
वस्त्र अधूरे रह गए,
पथिक को चिर विश्राम करना पड़ा......
सभ्यता की नग्नता,
चिरजीवी....
मनुष्य की पशुता चिरजीवी.......
कुछ और पथिकों को,
ढूंढनी होगी,
मानवता की सुई,
मनुष्य को वस्त्र देने हैं,
नग्न रह कर प्रकृति का रोष,
असहनीय, अन्त्य.......
न सह सकेगा मनुष्य
वस्त्र तो पहनने ही होंगे।
वायु से भी आवश्यक,
मानवता के वस्त्र,
और एक सुई, जो चुभती नही,
सबसे अधिक महत्वपूर्ण.............
दुर्घटना
मैं, ऑटो पे सवार,
जा रहा था, अपने अस्थाई निवास,
ब्रेक और हार्न की,
मिली जुली आवाजों ने,
भंग कर दी तंद्रा,
विचारों ने छोड़ दिया,
कुछ पल के लिए.........
एक विचार न माना,
बोल ही उठा....
क्रासिंग होगी शायद.........
रुका हुआ ऑटो थोड़ा सरका,
फिर रुक गया.......
कुछ जुबाने कह रही थीं,
एक्सीडेंट हुआ है........
मेरी उत्सुकता ने सर बाहर निकाला.....
स्वाभाविक, मानवीय......
दूर तक गाड़ियों की कतारें....
पुलिस के सायरन की आवाज़.......
एक बार फिर देर से..........
डंडा फटकारता एक सिपाही.......
भीड़ छंटी तो एक ढेर दिख गया.......
तुडे मुडे से अंग,
जैसे सिलवटी रेशम......
नए जूते से बंधा एक पैर.....
अधरंगी लाल सफ़ेद चादर से,
बाहर झांकता हुआ.........
और हर दर्शक जूते पे अफ़सोस करता हुआ....
थोडी ही दूर,
उतनी ही टूटी पड़ी,
एक मोटरबाइक.......
कुछ और अफ़सोस,
गलों से निकल, सड़क पर फैल गए.......
सुना तेज़ जा रहा था,
ट्रक से टकरा गया........
कोई बोला, ट्रैफिक भी तो हैवी है........
हाँ..........सिग्नल भी ख़राब है........
प्रशासन ही मुर्दा है साला..........
बात मुख्यमंत्री पर आ गई......
मुर्दाबाद के नारे,
न जाने कब गाड़ियों के बीच आ गए.......
फिर सब ठीक हो गया.......
पुलिस आ गई थी न.........
सुबह अखबार ने बताया.......
वो ट्रक,
वो सिग्नल,
वो ट्रैफिक,
वो प्रशासन
सब बाइज्ज़त बरी हो गए.........
पता चला शराब दोषी थी......
बाइक वाले में छुपी थी.......
फरार हो गई, बह गई,
लाइसेंसी दुकानों में छुप गई,
अंग्रेज़ी और देशी का रूप धर कर.......
मैं सोचता रह गया.....
ये दुर्घटना कल नही हुई थी.....
उस दिन हुई थी जब,
मदिरा का अविष्कार हुआ था........
Saturday, July 4, 2009
ये कैसा न्याय...............?
कुछ कड़वी यादों को स्टेशन पर छोड़ कर,
लौट रहा था,
वक्त रेंग रहा था, सांप जैसा........
सड़क किनारे, ठेले को घेरे खड़े लोग,
एक कुत्ता, और दूर एक बिल्ली भी.........
ठेले के पास कटे पंजों.....
खून सने पंखों का ढेर......
कुत्ता और बिल्ली दोनों अधीर,
कुछ टुकडों की प्रतीक्षा में,
जो बस गिरने ही वाले थे...........
मैंने ठेले को देखा,
कुछ रुई के ढेर, सिमटे, डरे सहमे.......
वही..........
ब्रीड वाली मुर्गी.........
शायद भविष्य जानते थे अपना,
तभी तो टाँगे छुपा रखी थी.......
डरे हुए बच्चे की तरह.........
एक आवाज़ सुनी.........मांस काटने जैसी...........
लगा वो हथियार मेरी गर्दन पे चला है.........
मैंने आँखें मूँद ली......नज़र चुरा ली.........
पर उस आवाज़ ने अनसुना कर दिया मेरा विरोध,
आ कर कानों से टकरा ही गई.......
एक चीख़ जो निकल ही नही पाई,
उस रुई के ढेर की तो ज़बान ही नही थी.......?
तो चीखा कौन.....?
मेरा मन...........?
ढेर ने किसी को पुकारा...........आओ बचा लो मुझे.......!
क्या मुझे...........?
शायद मैंने सुना था.......
पर वो भीड़ क्यों न सुन पाई जो घेरे खड़ी थी,
उस ठेले को.........?
मैं मुह मोड़ कर चल दिया............
ढेर बोला.........मुझे ज़बान नही मिली.....
वरना चीखता पुकारता.......
ईश्वर को.............
जो उतना ही मेरा है,
जितना मनुष्य का..........
पर ढेर पुकार न सका,
सर्वशक्तिमान को,
होता.........
तो सुनता न..............
उसकी घुटी हुई चीख़............
दोष तो रुई के ढेर का ही है,
उसने छुपा रखा है कुछ सुर्ख.....
अपने भीतर.........
गोश्त............
जो इंसान को..........
नही.....! मनुष्य को.......
कुछ ज्यादा ही पसंद है....?
या शायद शौक है..........?
बिल्ली, कुत्ते की प्रतीक्षा समाप्त.....!
कुछ फड़फड़ाया, फिर शांत.........
रुई का ढेर या मेरा अंतस..........
एक एहसास जिसे लिख नही पाया,
बस वितृष्णा के साथ सुना और महसूस किया........?
एक असफल चीख़, दो थरथराते पंजे,
एक कटा गला, और परों पे बहता सुर्ख लहू........
रुई के ढेर रंगीन होने लगे,
उनके उतारते कपड़े.....वो दो हाथ.......
लगा मेरे ही हैं...........!
कारण भी तो मैं था............?
चेहरे पे विजय भाव,
जैसे कसाई ने जीत ली जंग,
अर्थव्यवस्था के ख़िलाफ़
मुर्गियों को हलाल कर के..........!
कुछ पर और गिरे,
कुछ अतड़ियां और निकलीं........
हलाल चिकन तैयार था.........
किसी मनुष्य की जिव्हा का स्वाद बढ़ाने को,
एक जानवर दूसरे का भोजन बन जाने को........
प्राकृतिक होता तो दोष ईश्वर की ऋचा में था,
पर ये कैसा न्याय...............?
एक का पेट भरे, स्वाद आए,
दूसरे की जान जाए..................?
Tuesday, June 16, 2009
तम्मनाएं.............
यादों की सूखी लकडियाँ,
छिड़का करता हूँ.........
इस उम्मीद में,
की कोई तो लौ उठेगी.....
कुछ तो रौशनी होगी,
थोड़ा तो बदन तपेगा.........
और कोई तो एहसास बचेगा..........
कमबख्त ये सर्दी,
जिन्दगी बुझाने में लगी है.......
तुम आओ, तो बदन पे,
कुछ तम्मनाएं सेंक लूँ..........
तुम्हे जी भर,
बस एक नज़र देख लूँ........
क्या पता, जिस्म की ये अंगीठी,
दुबारा जले न जले.......
और मुझे शिकवा रह जाए..........
क्यों न मैंने आग दे दी,
अपने अरमानों को............
आग............
कुछ रेशमी सी बाहें.....
मेरा दिल जला देती हैं........
जुनूनी बना देती हैं,
मेरा चैन-ओ-सुकून छीन,
बेदर्द सज़ा देती हैं...............
सुर्ख रेशमी होठों के प्याले,
छलकते हैं, रोज़ मेरे आगे........
लुभाते हैं, बुलाते हैं.......
छलावा मान के,
बचता आया अब तक............
पर तुमसे मिलकर,
ख़ुद पे काबू नही.........
वो बे परदा रातें कुछ,
कुछ बे पैरहन दिन.......
मेरे जेहन को मथते रहते हैं,
मेरी तमन्नाओं को,
और तीखा बना कर...............
अब बदन की,
गीली सी लकड़ी से..........
धुंआ उठने लगा है,
भीतर कुछ सुलगने लगा है...........
इस से पहले,
की आग कुछ ज्यादा ही,
सुलग जाए..........
क्यों न एक और,
बेपर्दा रात हो जाए.........
Monday, June 15, 2009
कीडा..............
शराबी है ये शहर,
मैंने देखा है........
लुढ़के से कुछ जिस्म,
डगमगाते कुछ कदम.......
घर का रास्ता पूछते,
मिन्नतें करते,
गिडगिडाते, वाइज़ के आगे........
घर का रास्ता पूछते........
फिर होश में होने का दिखावा,
वो सारी कवायदें,
सारी हरकतें, बेवकूफाना.......
ख़ुद को दगा देते,
शराबियों का शहर......
कीडों का शहर,
नालियों का शहर........
दगाओं का, बेईमानियों का,
इंसानों के आसामियों का शहर.........
नफरत हो चली है,
चिकनी सड़कों से.......
जो रोज़ भुला देती हैं,
की मैं, कच्ची धूल भरी.......
पर सोंधी महक वाली......
पगडंडियों का मुसाफिर....................
यहाँ नाली का कीडा हूँ.............
दो पल सुकून के लिए..................
जेहन में रेंगते,
अतीत के कुछ पल,
कीडों की मानिंद,
बाहर निकल रहे हैं............
एक सस्ता सा कलम,
कीडों को उठा उठा कर,
रख रहा है, कागज़ पे........
सालों से ये कीडे,
मुझे कुतर रहे हैं.....
मेरे भीतर का सब कुछ.........
कुछ बासी गन्दी यादों में,
पलते रहे ये घुन....
जिन्हें बस कुछ साल लगे हैं,
मुझे खोखला करने में,
थोड़ा थोड़ा, रत्ती रत्ती.........
और हर रात मार देती है मुझे,
पड़ा रहता हूँ किसी ठंडी लाश के जैसा.......
ख्यालों के बूढे, डरावने,
गिद्ध रोज़ नोचते हैं,
मेरे जिंदा जेहन को............
कुछ काली परछाइयां,
कुतरती हैं हर रात मुझे..........
मैं हर रात के आगे,
दोजानू हो के, गिडगिडाता हूँ,
सारी रात.........
बस दो पल सुकून के लिए..................
Wednesday, June 10, 2009
खाली हाथ नही आया............
भरे समंदर को छू कर,
क्या खाली लौट रहा हूँ मैं.........
लहरों ने टकरा कर पैरों से,
सोख लिया था कुछ........
नंगे पाँव रेत पे चलते चलते,
न जाने क्या गिरा दिया था..........
शायद...........मेरे भीतर का डर.........
सीपियों की खनक ने,
कुछ इशारा तो दिया था.........
फिर भी खो जाने दिया.........
सागर किनारे मुस्कुराता हुआ,
मैं आगे बढ़ गया............
अजीब है,
खोया है.....फिर भी खुश हूँ..........
खोने पाने के एहसास से,
उबर कर मैं बस बढ़ता रहा.........
जज्ब करता रहा, समंदर को,
कभी बुलबुलों को,
कभी रेत को छू कर............
नदी बन कर,
सारी वितृष्णा बहा दी...........
सारे उद्विग्न पल दे दिए,
अथाह विस्तार को..........
विकृत प्रकृति के अंश दे दिए,
विस्तृत प्रकृति को..........
शुद्ध, स्वस्थ विचारों को,
संजो कर.......
धुली धुली स्मृतियों को समेटे,
सागर सा स्थिर हूँ.......
गहराई ले के लौट आया हूँ.........
सुकून है कि खाली हाथ नही आया...............
Saturday, June 6, 2009
'शोना' मैं हूँ न..........
और हाथ थाम लिया,
आकर तुमने................
अपने पेशानी की सलवटों को,
तुम्हारी मुस्कुराहटों में घोल कर,
हवा में उडाता रहा, बरसों बरस.........
उन मुश्किलों में भी,
मुस्कुराता रहा...................
कुछ छोटी छोटी बातों पे,
मेरा फिक्रमंद हो जाना,
और तुम्हारा मुझसे भी ज्यादा,
सिर्फ़ मेरे लिए...........
गले लगा कर,
वो कह देना.........
'शोना मैं हूँ न'........
इक इक पल में,
सौ सौ, जिंदगियां देता रहा है मुझे............
तुम्हारे काँधे सर रख के,
मैंने कितने ही दर्द बहाए हैं............
ये सारे दर्द यूँ तो,
अश्क बन कर निकले थे............
पर कभी सितारे बने तो कभी फूल,
कभी चमके तो कभी मुस्कुरा दिए.....
फोन पर मेरे,
खांसने की एक आवाज़ से,
तुम्हारा परेशां हो जाना,
सच कहूं तो जीने की,
वजह बना जाता है.........
नही जानता कि, जीना क्या है.......
पर जानता हूँ, कि सिर्फ़ तेरे लिए,
जीना क्या है............
अक्सर सोचता रह जाता हूँ,
कि कैसे जान जाते हो,
कब दिल भरा है और जेब खाली............
इन मीलों के फासले के बाद भी,
कैसे मेरी आंखों की नमी,
दिख जाती है तुम्हे............
कैसे सुन लेते हो, वो भी,
जो मैं ख़ुद से भी नही कह पाता...............
मेरी जिन्दगी को,
किनारे मिलने लगे हैं..............
सिमटने लगी है दुनिया,
सिर्फ़ तुम तक...........
तो कहो मैं क्या करू,
तुमने ही किया है ये सब......
तुम्हारे गेसुओं की खुशबू,
कहती है, हर रात मुझसे.........
'शोना' मेरे बिना मत जीना..............
तो कहो क्यों न मैं वादा कर लूँ............
और कह दूँ.........
'जानू' ये वादा कभी नही टूटेगा..................
Friday, June 5, 2009
विद्रोह.......
अब तो बस, घर से दफ्तर,
दफ्तर से घर का सफर.......
यही मेरा अपना समय है,
जब मैं ख़ुद को ढूँढा करता हूँ...............
विषय तलाशा करता हूँ,
जिसे दर्पण बना कर,
ख़ुद को देख सकूं,
देख सकूं, कि मैं अब क्या हो गया हूँ.................
कभी राह चलते हर शख्स में,
ख़ुद को देखता हूँ............
उसके अक्स में,
हैरान, परेशान, जूझते हुए.....
कभी खिलखिलाते कभी टूटते हुए.......
घरो में, आफिस में, चुन दी गयीं......
जिन्दा जिंदगियां.......
जिनमें से कुछ रजामंद,
हँसते हुए, इस सज़ा के लिए..........
वातानुकूलित दीवारों से,
सट कर जीती ये जिन्दगी......
मेरे लहू की गर्मी को सोखे लेती है,
जाने क्या बैर इन दीवारों को,
मेरी ऊष्मा से..............
अपने अंतस के मर जाने का,
विचार मारता है,
रोज थोड़ा थोड़ा....................
किसी और में सुलगे न जले,
कोई भी न चाहे जीना,
भले न कोई साथ चले.......
मुझमे विद्रोह सुलग उठा है,
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आन्दोलन को.............
बस समझाना है अपने मन को........
कुटिल अर्थव्यवस्था ,
अपनी माँ राजनीति से मिल कर,
मुझे और क्यों छले.........?
क्यों न उगे विचारों का सूरज,
क्यों न भावनाओं का कारोबार चले...............
Sunday, May 31, 2009
यकीन........
पर मैं भी तो कोई भला नही..........
गैरों के हाथ में देख,
खूबसूरत हाथ,
क्या कभी मेरा दिल जला नही...........?
मेरे पास बस इतने ही लफ्ज़,
बस इतनी ही बातें,
कुछ उजले दिन, कुछ अँधेरी रातें.......
शायद तुम मेरे साथ हो,
तो फिर तन्हाई क्यों है.........?
यूँ साथ हो के, जुदा जुदा हो........
मेरे साथ ये परछाई क्यों है.........?
क्यों रात भर नींद नही आती मुझे,
क्यों रात रात भर मैं करवटें बदलता हूँ,
कभी तकिया बदलता हूँ,
कभी उसकी सलवटें बदलता हूँ................!
जब कुछ भी पेश-ऐ-नज़र नही होता,
तब भी मेरी निगाहों ने,
तुझे देखा है............
अंधे यकीन को लिए जिए जाता हूँ,
इक बिरहमन ने कहा था,
मेरे हाथ में तेरे नाम की रेखा है................
Wednesday, May 27, 2009
युग्म...........
नज़र पड़ ही गई,
लोहे के तारों की बाड़ में घिरे,
नन्हे से पौधे को देखा
सुकुमार, कोमल, सुंदर........
और जंग लगे लोहे का संरक्षण..........
युग्म विचित्र सा लगा.......
मुझे विचारमग्न देख,
बाड़ को हँसी आ गई,
जैसे पापा हँसते थे.................
मैंने कारण पुछा तो,
एक मुस्कराहट का,
प्रत्युत्तर मिला...........
बस चल दी तो,
शरारती नन्हे पौधे ने,
शुभविदा कहा..................
पाँच साल बाद फिर बस रुकी है,
ठीक वहीँ,
पर दृश्य में सिरे से परिवर्तन है..........
बाड़ जर्जर हो चली है............
और यौवन था उस पौधे पर..........
पौधे ने अभिवादन किया,
मैंने विश्लेषण कर लिए स्थिति के........
परीक्षण किया युग्म का........
युवा पौधे की शाखों ने,
बाड़ की रिक्तियों से निकल कर,
उसे थाम रखा था.......पूरी मजबूती से......
युग्म में मुझे,
पिता पुत्र का रिश्ता दिख गया........
बस फिर चल दी है,
पौधे का शालीन सा अभिवादन आया है,
जर्जर बाड़ को,
थामे रखने का वादा किया है उसने.................
समझोगे कभी................?
तुम्हे भुलाने की कोशिशें करना,
कोहरे से ढकी सड़कों पे,
भागना बदहवास............
क्या समझोगे कभी..............?
कभी भीड़ के बीच खड़े हो कर,
कभी पानी की धार के नीचे,
कभी पी कर बेहिसाब,
कभी मन्दिर-ओ-मजार के पीछे..........
तेरी दिल तोड़ने वाली बातों को,
भुलाने की वो कोशिशें............
काश ये दर्द तुम भी जानो............?
तुम्हे क्या पता,
कितना बदला था,
मैंने ख़ुद को, बस तुम्हारे लिए.......
अब हर बात कहने से पहले,
सोचते और बस सोचते रहना........
चुप रहना भी सीख लिया मैंने............
क्या तुम्हे महसूस हुआ कभी.....................?
आईने के आगे खड़ा हो कर देखूं,
वो पुराना अक्स नही दिखता,
ये तो कोई और है,
जिसे बनाया है तुमने,
और फिर मैंने.........मिल कर..........
हैरान भी हूँ, परेशान भी,
के जीना तो है मुझे..........
पर हर रोज़ मरते हुए...................
यूँ भी हो...........
एक सफ़्हा मैं यूँ भी लिखूं.........
के दो पल को तू मैं हो जा,
और मैं तू हो सकूं...........
अलमस्त फुर्सत से,
मैं भी पहचान निकालूँ,
दिल के सारे,
दबे अरमान निकालूँ.........
हसरतों के माथे,
पसीने की बूंदे न हों.........
न पेशानी पे सलवटें.........
एक रात कोई ऐसी भी गुज़रे,
नशा हो तेरा बेहिसाब,
फिर देर-ओ-सहर तक न उतरे...............
कभी चाँद यूँ भी हो रोशन,
के भरी दोपहर तक न उतरे.............
तुमने आवाज़ दी थी.........
बूँदें दिल में आरजू जगाती न थीं,
सुबह आ के जगा जाती थी,
रात जाते जाते,
रुला जाती थी...............
कोई अपना भी है ज़माने में,
ये एहसास कहाँ था,
सुकून तो था दुनिया भर में,
पर मेरे पास कहाँ था..............
उठते गिरते कदम लिए जाते थे,
नामालूम मंजिलों की ओर,
गुमसुम तन्हाई चलती थी संग संग,
मुझे डराती थी और...............
तुम्हे देखती थी,
मेरी हसरत भरी निगाह हर रोज़,
तमन्ना तरस जाती थी,
सरे-राह हर रोज़...........
उन दिनों जब मैं ख़ुद से,
खफा खफा था,
तुमने आवाज़ दी थी,
एक रोज़ मुझे रोका था..........
पूछा था.............
क्यों ख़ुद पे सितम करते हो?...........
दोस्तों से,
राज़-ऐ-दिल कहने से डरते हो?............
बस यूँ ही देखता रह गया था,
तेरी आंखों के फरेब को,
तड़प कर पूछा था,
दिल ने उसी पल
दोस्त कहते हो..........
पर क्या आंखों की जुबां समझते हो?..............
दिल तो कह गया,
पर मैं न कह सका,
ज़माने से था,
तुम से था,
ख़ुद से भी मैं खफा खफा था...............
हाँ पर आज भी याद है मुझे,
तुमने पीछे से आवाज़ दी थी,
मुझे रोका था..........................
Monday, January 12, 2009
कहानी जैसी है,
तो सच मानेगा कौन.............
मैंने ख़ुद में फरहाद को देखा,
तुझमें मीरा का रूप,
अब जीवन की जलती धरा है पैरों तले,
सर पर विचारों की धूप..........
मैं बरसों से जैसे का तैसा,
तनिक प्रेम का प्यासा
न भाव में प्राण शेष रहे,
न ह्रदय में आशा.........
तो आज सारे भाव निष्प्राण,
पर मानस में कोलाहल,
तुमसे ही जीवन, जीवन सा जटिल,
अन्यथा मृत्यु सा सरल.........................
पर कैसे तुम्हे समझाऊँ,
तुमने सुना ही नही,
चाहा तो बहुत के तुम्हे बताऊँ..........
रोज़ मैं थोड़ा थोड़ा,
शीशा हुआ जाता हूँ,
जानता हूँ के कल गिर जाऊंगा,
बिखर जाऊँगा..........
सहमा हुआ हूँ, घबराया भी,
तुम्हारी तरफ़ देखता हूँ,
उम्मीद की नज़र से,
के आओगे और हाथ थाम लोगे,
बेचैन हूँ मैं,
तुम तो सबर से काम लोगे................
लगता है ये भी भरम था,
तेरा मुझपे इतना ही करम था,
तो अब जीने की वजह क्या बनाऊं,
क्या तेरी याद बिसरा दूँ..............?
Thursday, December 18, 2008
साठ लाख भूखे बच्चे..........
जहाँ हर रोज़ साठ लाख,
भूखे हैं बच्चे,
वहाँ टनों दूध पीते,
पत्थर के भगवान्........
इस सबके जिम्मेवार,
कुछ मुट्ठी भर इंसान......
जहाँ सरकारी दफ्तरों के आगे चढ़ती,
बेरोजगारों की बलि, और
आत्महत्या कर लेते,
हर साल बीस हज़ार नौजवान.........
इक दस्तखत के बदले, जहाँ एक बाबू...
कभी उतार लेता आबरू,
या आधी जिन्दगी की कमाई,
और उस पर भी जताता एहसान.........
नैतिकता और भ्रष्टाचार के,
इस कुरुक्षेत्र में,
पतित ही कर्ण, और अर्जुन भी वही
उन्ही के हाथों खडग, उन्ही के हाथ तीर-कमान...........
जहाँ हर मोहल्ले में, औरतों लड़कियों पे फब्तियां,
न बस ट्रेन में, बुजुर्गों को सम्मान.....
जहाँ हरिजनों को साठ साल में भी,
न मिला सबके जैसा अधिकार समान............
तो प्रश्न उठता है.......क्या सचमुच "मेरा भारत महान"?
चलो प्रश्न का उत्तर ढूंढें,
उठें, आगे बढ़ें,
अधिकार और सम्मान के लिए.......
न्याय के लिए करें प्रयोग अपने अधिकार और RTI,
जाने संविधान को,
और करें विश्वास का आह्व्हान.......
सच में बनाएं भारत महान............
एक कवि और जागरूक नागरिक होने के नाते, मैं भारतवर्ष के सामजिक उत्थान को अपना कर्तव्य और अधिकार समझता हूँ, मैं हर सम्भव प्रयास करता हूँ संविधान को समझने और अपने मौलिक अधिकारों के प्रयोग का.............क्या आप करते हैं?
मेरी पुत्रियाँ......
पुत्री कहूं तो सर्वथा उचित,
मैं जन्मदाता जो हूँ......
और वो मेरी रचना......
प्रकृति को पुत्रियों के स्वभाव में.....
उडेला करता हूँ....
कभी कभी मैं भी,
शब्दों के साथ खेला करता हूँ.........
हर एक की तरह, यह खेल भी,
रचयिता ने रचाया है,
कि मैंने भी,
रचयिता होने का सुख पाया है.........
इच्छानुसार तोडा है, मरोड़ा है,
बहुत कुछ घटाया और जोड़ा है.....
कुछ में भावों का अतिरेक है,
कुछ को पकाया है, तार्किकता कि धूप में,
कुछ वुत्पन्न हो कर निखरी हैं, नैसर्गिक रूप में.............
न जाने क्यों, मेरी स्वाभाविक जटिलता,
मेरी रचनाओं में है,
वही जो मेरे संकल्प में है,
मेरी कल्पनाओं में है...........
रचनाओं पर है एक विचित्र आवरण,
न जाने क्या है कारण,
शब्दकोष, या व्याकरण.......
मुझे यह बोध है, क्योंकि मुझे भी शुष्क लगती हैं,
शिथिल लगती हैं,
आम इंसान बन कर देखता हूँ तो,
मुझे भी जटिल लगती हैं............
भावार्थ Meaning, अस्तित्व Existance, सर्वथा Exactly, अतिरेक Extreme, व्युत्पन्न Derivative,
नैसर्गिक Natural, आवरण Envalop, Cover, Protection, शब्दकोष Dictionary, व्याकरण Grammer, बोध Realization, शुष्क Dry.
Tuesday, December 9, 2008
आज निशब्द अँधेरा है............
मेरे चेतन में, शब्दों के जुगनू चमका करते थे.......
आज निशब्द अँधेरा है,
धरातल बौधिक चिंतन का ही है,
पर भौतिकता का व्यापार फैला है...........
आवश्यकताओं ने सोख ली है,
मेरी वैचारिक ऊष्मा,
अलंकारों का गुंजन, प्रायः निष्प्राण है........
सर्वथा आवश्यक बालबोध अब भी जीवित है कहीं,
पर अब, अप्रयोज्य हो चला है.......
बस यही जान कर, रहता हूँ मौन,
के सुन तो कोई भी लेगा,
पर पीड़ा समझेगा कौन...........
मेरी यह पीड़ा और अंतस का विश्लेषण,
ले जाता है, कारण की खोज में........
पर यह मंथन अधिक समय नही लेता,
मेरी खोज को मिलता है, पूर्णविराम......
तीन शब्दों पर, "यही दुनिया है"..........
यह मेरी पीड़ा का पूर्णविराम नही बन पाता.........
बढ़ जाता है, संताप और,
होता है, पश्चाताप और.......
इस अनुत्क्रमणीय अवस्था का,
मेरे पास कोई हल नही,
आज इतना शुष्क है शब्दकोष,
की आँखें भी सजल नही.............
अस्पष्ट सी इस कविता जैसा,
अस्पष्ट सा ही एक असंतोष है।
बीते दो बरस में मुझे बस यही अवगुन लगा है,
लेखनी के चंदन में प्रश्नवाचक घुन लगा है..........
सबसे बड़ा भय.................
जीवनसाथी से बिछड़ने के बारे में पूर्वाभास होना आम बात है, मैंने एक प्रेमी के मन में उस समय उमड़ते प्रश्नों को समझने की चेष्टा की..............
बाहर भी तम्, और भीतर भी,
घना फैला अन्धकार दूर तक,
आशाओं का दीपक ले, चलता हूँ............
डगमगाता, ठोकर खाता............
तुम्हे पता है...............?
मेरे लिए सबसे बड़ा भय क्या है...............?
यही अन्धकार।
मेरा मन, मेरा बालमन, भयाक्रांत है,
इतना सहमा की रोता भी नही,
इतना भय कि,मानस सोता भी नही.............
यह भयानुभूति भौतिक ही है,
सांसारिक है,
मैं जानता हूँ, संबंधो का परिणाम है............
विश्वासघात ने उपजा है अन्धकार,
जन्मदाता हैं वो,
जो कभी थे मेरे अपने............
किया मेरे विश्वास को छिन्न-भिन्न,
पर फिर भी जीवन पुकारता है,
कहीं रौशनी दिखती है,
तुम आते दीखते हो.............
पर कुछ और भी है, तुम्हारे साथ,
मेरे भय को साथ लिए चले आते हो............
एक परछाई भी है न तुम्हारे साथ,
उसी भय का अंश,
मुझे आहात विश्वास का स्मरण हो आया है.......
क्या मेरे विश्वास और भय का,
फिर द्वंद होना है.................?
कहाँ मिलेगा शोर मुझे, कहाँ मिलेगी ये भीड़..........
चला जाता हूँ, कभी स्टेशन,
कभी चांदनी चौक, कनाट प्लेस, या इंडिया गेट.........
फिर खड़े हो कर भीड़ में,
चाहता हूँ,
की आवाजें कुछ और तेज़ हो जाएँ.............
कुछ देर ही सही,
बसों के हार्न, या ट्रेन की आवाज़,
छीन ले, सुनने की ताक़त मुझसे........
शायद तब न सुन पाऊँ,
अपने भीतर के सन्नाटे का शोर.............
शायद तब ही, मेरे भीतर की खामोशी,
चुप हो जाए, कुछ देर............
सदमा तो ये सोच कर है,
की रात बीतेगी कैसे,
जब के नींद को बैर मुझसे,
बाहर से ले कर भीतर तक,
खामोशियाँ डराएँगी मुझे..........
एक पल में सौ बार, सताएंगी मुझे...........
कहाँ मिलेगा शोर मुझे, कहाँ मिलेगी ये भीड़..........
मिलेंगे तो बस रात, बेचैनी, सन्नाटा, सूनापन, अकेलापन, तन्हाई....................
पालनहार से ये सारे प्रश्न......................
ऐसा नही की मेरी विनती न सुनते होगे,
समझते भी हो,
चाह कर भी दे नही पाते,
ज्ञात है मुझे..............
पर यह विश्वास आहत होने लगा है,
जब से मैंने जाना,
कि मानव ने सीख ली है,
पशुओं कि संस्कृति,
परभक्षी और भक्ष्य का नाता.........
हे! जगतपिता क्या संसार पर आपका,
अब कोई नियंत्रण नही,
क्या दुर्दैव दिन, और इनकी उष्णता,
यूँ ही बढती जायेगी.........
हे! परमपिता, मैं असमंजस और चिंता में घिरा हूँ,
आपकी दी हुई प्रतिभा कि बोली लगाने को,
आतुर है, आपका ये संसार............
किसी निधिवान के चरणों कि भेंट कर दूँ,
तो जीवन की काया पलट जाए.........
पर यह आकांक्षा तो आप से है,
परमपिता, कम से कम ये तो कहो,
कितना शेष है, इस भौतिक जगत में.........?
अब आपका............?
या हर लिया है मानव ने अधिकार,
वंशजों ने जैसे साम्राज्य किसी वृद्ध सम्राट का...................?
सवालों का ये सिलसिला..............
जब कभी एक ही इंसान किसी के लिए पूरी दुनिया हो जाए
और फिर वो बेवजह उस से जुदा हो जाए तो सवालों का ये सिलसिला दिल में आए...............
तुम सुनतीं तो कहता मैं,
समझती तो इशारा देता,
पर इतनी अजनबी क्यों हुई जाती हो,
मैं बिखरने लगा हूँ,
क्या तुमने दामन छुडाया है...............?
ये काली रात मुझे सोने नही देती,
क्या तुम्हे किसी और का ख्वाब आया है.............?
पिघलने लगा हूँ, जलने लगा हूँ,
क्या शीशा-ऐ-दिल की ओर,
तुमने भी पत्थर उठाया है..........?
ख़ुद को आज कारवां से,
जुदा पाता हूँ मैं,
क्या किसी और को तुमने हमसफ़र बनाया है............?
बस उस इल्म की तस्दीक़ कर दो,
जिस से ख़ुद को मेरे प्यार से महरूम किया,
ये तो कहो दिल से मुझे भुलाने का,
कौन सा तरीका आजमाया है..............?
हाल-ऐ-दिल बताऊँ किसे, यार ने घर ही बदल डाला,
एक ज़रूरी ख़त उस के पते से लौट कर आया है...............
कोई फाँस चुभी हैं, मन में.................
मेरी यह कविता उसी आवेग का विश्लेषण हैं..........
शब्दों का एक अविरल प्रवाह,
अवचेतन में,
एक फाँस चुभी है, तर्जनी में,
और एक मन में..................
विचित्र हैं पर सत्य यही,
कल सुख देती थी, आज पीड़ा......
कदापि यही भाग्य,
यही प्रारब्ध की क्रीडा.........
समय बीता तो बन गई,
अंश अस्तित्व का........
आधा भाग जीवन का,
आधा व्यक्तित्व का..........
साथी बनी थी, आकुलता बन कर,
आज शत्रु सद्रश, व्याकुलता बन कर..........
प्रेम, ईर्ष्या, मोह के आवेगों में बहता,
नवरूप को खोजता.......
वर्षों की पीड़ा मन में,
और मन की पीड़ा वर्तनी में.......
एक फाँस चुभी हैं, तर्जनी में........
शीश अब भी झुके, समक्ष ईश के,
थोडी वितृष्णा ह्रदय में,
पूरी श्रृद्धा नमन में,
पर कोई फाँस चुभी हैं, मन में.................
Wednesday, November 26, 2008
तेरी खातिर...........
तो मसखरा बना रहता हूँ,
उसकी हँसी के बदले,
रोज़ ख़ुद को ज़ख्म लगा लेता हूँ मैं.............
उसे सुकून मिलता है, दर्द से मेरे,
तो ख़ुद को यूँ ही सज़ा देता हूँ मैं...........
इतने रूप हैं मेरे, माना मैंने,
पर ख्वाहिश नही मेरी, मर्ज़ी है उसकी............
जैसा वो चाहे रूप बना लेता हूँ मैं..............
वो ही करे के मैं करुँ,
पर ख़ुद को मुजरिम बना लेता हूँ मैं.......
उसे सुकून मिलता है,
तो ख़ुद को सज़ा देता हूँ मैं.............
उसकी चाहत हैं, रोशन शामें,
तो बार बार हर शाम, दिल जला लेता हूँ मैं...........
आज यूँ है, कि मुझ से हो कर जानी है,
उसकी खुशियों कि डगर,
तो चलो अपनी कब्र ख़ुद बना लेता हूँ मैं.....................
मैं रहूँ न रहूँ...........
ख्वाब कहता है, कैसे मैं रहूँ, जब न तू रहे.........
मै रहूँ, न रहूँ, बस तू रहे......
हमेशा खुश रहे, दिल में बस यही जुस्तजू रहे...........
कुछ होने को मेरी हर तमन्ना कहे,
फिर मैं कुछ न रहूँ,
कभी तेरी महफिल में ये भी मौजू रहे..............
मुझे किनारा बन कर यूँ ही फ़ना हो जाने दे..........
तू मौज की रवानी ले आगे चल,
तुझपे किस का काबू रहे..............
ख़ाक कर लूँ मैं ख़ुद को, तेरी छोटी से ख्वाहिश पे,
की मेरी बदन की रेत पे तेरा निशान-ऐ- आरजू रहे...............
खुशबू बन कर जो बसा है, मेरे जेहन में,
तो मुझे अपने गुल होने का एहसास होता है,
मुझे कोई कुचल भी दे तो क्या,
बाद उसके तू ही तो हर सू रहे.....................
Sunday, October 12, 2008
ये अजनबी शहर

कोशिश भी न कर सके,
दर्द कम न हो सका.............
दूसरी ओर उदासी छुपी है,
इस शहर को दोहरी जिन्दगी जीने की,
आदत सी पड़ी है.............
Monday, October 6, 2008
शायद यही मेरे होने की वज़ह हो.........
फिर आज मेरे रूबरू हैं,मुझे डराने आए हैं, वो सवाल.......
पूछा करता था, मेरा दिल जो मुझसे.........
उसका अक्स ही समझा होगा,
आइना होता तो, मेरा भी अक्स होता,
किसी ने समझा होता..........
सर्द है, अँधेरी है, अकेली, और मैं भी,
जैसे हर पल मरना,
जब तब, जहाँ तहां..........
Saturday, October 4, 2008
मुत्फर्रिक आशार..........
जैसे राह का काँटा हूँ,
याद रहा जो चुभ गया.......
निकला, तो दो पल में ज़माना (वो) भूल गया...........
एक बार फिर सूरज सर पे आने लगा है,
फिर तपती धूप की आहट आई है,
फिर सुलगती ज़मी पे नंगे पाँव चलने का वक्त आया है.............
आधी सी है, अधूरी है,
ये आस भी जैसे झूठी है,
तोडे मुझे रोज़, पर ख़ुद कब टूटी है................
तेरी याद से कुछ यूं लरजती है रात,
करवटें बदलते गुज़रती है रात....!
थरथराते होठो पे रखू निगाह,
की मह्बेखाब आँखे देखू,
रात तमाम तेरे गेसुओं से,
मेरा मशविरा चलता रहा......!
शिद्दत-ओ-दर्द-ए-हिज्र मरने नही देता,
इंतज़ार वस्ल की रात का भी कुछ कम नही,
पथराई नज़र में चुभते हैं, अधूरे ख्वाब,
सिवा इसके बड़ा कोई ग़म नही....!
तेरी आवाज़ भी सुन सकू,
तो रोशन हो दीदए उम्मीद,
और इस से भला मरहम नही...!
आ.........और यूं आ,
की वफ़ा का भरम न टूटे,
मैंने ज़माने को एक दौर तलक,
तेरे नाम की दुहाई दी है,
बेपरवाह सही मेरा पत्थर का सनम नहीं...!
Thursday, September 25, 2008
क्या कहूं?
परिंदों को आसमा नसीब हुआ,मुझे दो गज ज़मीन भी न मिली,
पैरों तले ज़मीन नही,
रोशन राह करने को,
हरक़तों में क़यामत की बानगी देखता हूँ,
जूनून देखता हूँ,
दर्द लायी,
क्या अजीब सी बात है..............
रिसते हैं यूँ ज़ख्म,
सर्द हुआ बदन,
कभी इन्तहा तक चला,
Wednesday, September 24, 2008
दौर गुज़र ही गया......

सबब-ए-ख्वाहिश, कि समंदर फिर से खामोश हो..........
थमे ये दौर-ऐ-तूफां.......
एक बार फिर तू मुझे सीने से लगा ले..........
पर न बुझा सका मेरी प्यास,
कोई भी पानी, तो ज़हर पीने लगा.......
रोज़ मरने के जैसे,
मैं फिर से जीने लगा.........
आखिरकार.......
बिखर गई जिन्दगी, आरजुएं और ख्वाब,
और मौत के पहलू मैं भी करीने लगा..........
अधूरा वादा, आधा इरादा.........
एक ख़याल यूं भी आया.......

बस चटका सा है,
शीशा-ए-दिल............
एक उसके चले जाने से,
सूनी है मेरी महफिल.........
लाखों हैं पर,
कोई तेरा जवाब नहीं बन सकता.......
सितारे मिल भी जाएँ.......
तो आफताब नहीं बन सकता.........
सोचता हूँ,
वक़्त का भी, ये क्या असर है.......
मुझे तो है, पर क्या तुझे भी..........
मुझे खोने का डर है.......
Thursday, August 21, 2008
निर्झर

पर अनुभव नया.....
समय फिर समय पथ पर गुज़र गया.........
ये निर्झर यूँ ही बहता रहेगा...........
प्रारब्ध की अप्रतिम कहानी,
कहता रहेगा.........
समय की कोख से,
कुछ और पल उतरेंगे.......
जीवन का थोड़ा सा जीवन,
और कुतरेंगे...........
इस सम्यक धरा - धारा में,
बस स्मृति शेष रहती है........
अस्पष्ट अकथ्य के,
कुछ भ्रंश भी मिल जाया करेंगे...........
जब भी गहरी पैठ लूँगा.........
प्रलय हो जब भी ये लय टूटे,
प्रश्नचिन्ह लगे हर रचना पर,
जब भी ये वलय टूटे..........
मैं चिंतन वन में
सुप्त, संज्ञा विहीन.........
चेतना हीन............
स्वयं में स्वयं को खोजता...........
मैं दिग्भ्रमित, मैं पथिक........
Saturday, August 16, 2008
मैं जिन्दगी का आइना हूँ.............

खुश्बू देखी, खूबसूरती भी..........
मासूमियत की महक देखी,
नन्हीं सी सितारा आँखें,
साँसों में मोहब्बत की नमी..........
तोतली, पर बेपनाह प्यारी बातें...........
ऊँगली पकड़, डगमगाती.......
चलने की कोशिश करती......
इठलाती, खिलखिलाती.........
और मुझमें उमंगों का समंदर भरती.......
मैं जिन्दगी का आइना हूँ, बिखरने न देना........
कहती रही..............
एक नन्ही बच्ची, मेरी गोद में खेलती रही.........
मैंने नाक से ऊँगली छू ली, तो हंस दी...........
यूँ तो शाम हो चली है पर,
मैं अब भी खोया हूँ, उलझा हूँ,
उसकी मासूमियत में,
अपनी जिन्दगी की तमाम सख्तियाँ भूल कर..................
Friday, August 8, 2008
गले मत लगना............
Saturday, August 2, 2008
इस से पहले कि.........
थकता हूँ, झुकता हूँ, दो पल रुकता हूँ,
तो जेहन में उभर आते हो,
हाथों में ले कर हाथ, कहते हो........
बस कुछ कदम और,
जैसे जिन्दगी फ़िर से देती है,
कुछ साँसे उधार..............
चला आता हूँ तुम्हारी ओर,
पर छलावा बन कर,
फिर से क्यों दूर हो जाते हो................
जीवन के किसी अगले मोड़ पर खड़े मुस्कुराते हो,
तो रुक जाओ न,
बस दो पल
छू लेने दो, वो नाज़ुक होंठ,
इस से पहले, कि प्यास हद से गुज़र जाए,
और जाम-ऐ-जिंदगी, छलक जाए..............
Wednesday, July 30, 2008
और अधूरी है एक कविता..........

तुम्हे शब्दों की सीमा में बाँध पाना,
कभी कभी प्रयास करता रहता हूँ...........
निरर्थक रहते हैं,
कदाचित सम्भव होता..............
विश्व भी तुमसे परिचित होता।
मेरा विश्व.........
आज फिर कविता को उकसाया.......
आगे बढे, बाँध ले तुम्हे,
पर इसके शब्दों का बाहुपाश छोटा है.............
फिर से आज.......
फिर न बाँध सकी, आज........
और अधूरी है, एक कविता...................
निरर्थक = meaning less, कदाचित = perheps, gosh, उकसाया = encouraged, बाहुपाश = arm grip
Monday, July 14, 2008
कोई नही..................
कहने को तो सब हैं,सुनने को कोई नही......
धागे बिखरे हैं दोस्ती के,
रिश्ते बुनने को कोई नही............
सब आते हैं, शब्दों के मोती बिखेर चले जाते हैं,
पर बीनने को कोई नही...........
इस आसमान पे चाँद बन, चमकना हैं सब ने,
पर सितारे भी गिनने को कोई नही.................
सुनो तो मिल लो मुझसे, वरना करना क्या,
बस यूँ ही मिलने को कोई नही................
कांटे बन चुभ कर एहसास दिलाएं दर्द का सब,
बिखरने को फूल बन महकने को कोई नही.................
कहने को तो सब हैं पर सच में अपना कोई नही……….
Saturday, July 12, 2008
विजयश्री कामना............
सांसारिक परिचालन का आवश्यक निमित्त............
यही मेरी भी प्रेरणा, यही पीड़ा भी,
कभी गतिरोध बन जाती,
कभी मनोरंजक क्रीडा भी................
"विजयश्री कामना" भी,
बड़ा अप्रत्याशित व्यवहार करती है,
कभी हृदयशूल बन जाती,
कभी औषधि बन उपचार करती है.....................
थक जाऊं तो उत्साह देती,
विचारों, योजनाओं का प्रवाह देती,
प्रतिज्ञा बन जाती, अनुरोध बन जाती है,
कभी संबंधों का गतिरोध हो जाती है............
विजय कामना के, और जीव कामना के वश,
युगों से रची बसी, जीव के अंतस
यह "कामना विजयश्री"...............
Friday, July 11, 2008
वो तीन साल की बच्ची........
सब बच्चों के संग, पर थोडी से अलग,वो फूल सी बच्ची, कुम्हलाई सी..............
गंदे कपडों में लिपटी,
एक फटा बैग कंधे पे टांग,
सड़क किनारे खड़ी रहती है,
और मैं बालकनी में उसी वक़्त.............
सिलसिला हफ्तों चलता रहा,
मैं उस से यूँ ही रोज़ मिलता रहा............
बस आती, बच्चे चले जाते,
पर उसे अकेला छोड़ कर.......................
न जाने बच्चों को या बस को,
देर तक हाथ हिला, विदा करती रहती..........
फिर थके से कदम उसे घर खींच ले जाते.............
बस जाने के बाद, उसके मुड़ने से पहले,
एक रोज़ मैं उसके पीछे खड़ा था.......
घूमी तो गाल थपथपाए, शरारती आँखे मुस्कुरा दीं............
बोली गुड मार्निंग अंकल,
मैंने नाम पुछा, बोली 'शबनम'.....
स्कूल नही गई, मैंने पुछा, तो सर झुका लिया उसने,
एक राज़ दिल में और एक आंसू आँख में छुपा लिया उसने........
फिर हौले से सर उठाया, बोली लड़की हूँ न.........
लड़की स्कूल नही जाती.......
और पापा, जूते सिलते हैं, तो पढने को पैसे नही हैं.....
कुम्हलाई सी वो तीन साल की बच्ची,
अब सिर्फ़ मुस्कुराती है,
रोज़ मेरे पास पढने आती है............

