Thursday, July 23, 2009

ख़ुद को अकेला न लिखो..............

मेरे कुछ संवेदनशील यार दोस्त अपना अकेलापन मेरे साथ बाँट लिया करते हैं और कभी कभी इसी बात पर मैं उनकी चुटकी भी ले लिया करता हूँ...........ऐसे ही एक मौके पर एक कविता भी अस्तित्व में आ गई.........


खुशबू बन,
महकने का जज्बा ढूंढते,
दीवानों का टोटा है.............

खेल के मैदान छोटे,
घर छोटे,
कमबख्त इस शहर का,
दिल भी छोटा है........

रोज़ी छीनते शिकारियों के,
हुजूम यहाँ,
कुछ रोटी भी छीन लेते.....
कुछ मासूमो के जिस्मो से,
बोटी भी छीन लेते..........

सड़कों की नालियों में,
कीडों के मानिंद.........
बजबजाते लोग........

अलसाते निकलते सुबह,
दिन भर की परेशानियों में,
लिपटे सने घर आते लोग.......

मुर्गी, चूजे जैसा इंसान यहाँ,
दडबों जैसे घर,
जिस्मो से अटी सड़कें,
गलियों में,
बाढ़ से उफनते सर.........

इतनी भीड़ है शहर में,
कि दम घुटता है..........

कमबख्त अब कोई शायर,
ख़ुद को अकेला न लिखे.............

Sunday, July 19, 2009

आख़िर मेरे आंसू जाते कहाँ हैं.....................?

अपनी दबी ढकी उम्मीदों, तम्मनाओं को हम अकेले में उलट पुलट कर देखते रहते हैं, कुछ खुशी दे जाती हैं और कुछ दर्द। कभी कभी कोई ऐसी तम्मना भी टकरा जाती है दुबारा हमसे, जो रुला जाया करती है...............और एहसास भी दिला जाती, कि दिल से इन्हे हम कभी नही निकाल पाते हैं ...............

बस अभी साफ़ ही तो किया था.........?
की ये एक पपडी फिर निकलने लगी,

यादों के घाव फिर रिसने लगे,
मैंने कितना ही सुखाया,

धो मांज के रखा, चेतन को,
पर कहीं अवचेतन की दरारों में........

लगी जंग अब फ़ैल कर, रिस कर,
आ रही है, बाहर...........

अशुद्ध हो जाए मन फिर से,
ऐसी आकांक्षा नही,

और ये रिस रहे ज़ख्म,
उन अधूरी इच्छाओं की जड़ें ही तो हैं,

जिन्हें उखाड़ फेकने की,
कोशिश की थी कभी.............
बिल्कुल दूब के स्वभाव वाली........

हर सावन में हरी हो जाती हैं,
और संग में हर घाव भी,

इतने आते जाते मौसम,
सुखा न सके......

कितने ही शीत और ताप
सह कर जीवित हैं,
ये इच्छाएं, नासूर बन कर.......

अब तक तो मर जाना था इन्हे.........

कदापि मैंने ही आश्रय दे रखा हो ?
कहीं सींचता तो नही रहता ?

बरसों से सोच रहा हूँ.........
आख़िर मेरे आंसू जाते कहाँ हैं.....................?

Sunday, July 5, 2009

सुई.........

वर्तमान में मानव की सबसे बड़ी आवश्यकता, मेरे अंतस में खलबली मचाये रहती है.......मैं सोचता रहता हूँ की क्या खो गया है............शायद एक सुई की आवश्यकता है जो मानवता के वस्त्र दे कर सभ्य पशु मनुष्य को मानव बना सके...........


मानवता की खोज में कुछ पथिक,
भूसे के ढेर में, सुई ढूंढते हैं.......

ये जिज्ञासा न जाने कहाँ से आई है,
बड़ी प्रबल है,
न जाने कहाँ ले जायेगी.......

फाउन्टेन पेन से,
मोबाइल फोन तक का विकास.......
पथिकों ने सब देखा....

सभ्यताएं भी कुछ मिटती हुई.......

आतंक और व्यवसायिकता ने,
गढ़ दी है, दोस्ती की नई परिभाषा......

पथिक फिर भी ढूंढते हैं,
इस परिभाषा में, मानवता का तार........

पूरा विश्व देखना होगा,
पूरा ढेर छानना होगा,
शायद सुई मिल सके.......
शायद सभ्यता के वस्त्र फिर सिल सकें........

मानवता की सुई खोई हुई है,

धर्म की दुकाने खोली गई,
सिर्फ़ ये सुई बेचने के लिए,
पर अब यहाँ,
भेदभाव बिकता है,
घृणा सबसे सस्ती वस्तु है,
इस दूकान में.........

पथिकों को आगे जाना है......
मनुष्य को वस्त्र देने हैं.....
सुई बिना तो सम्भव नही.......

विदेशी राजदूत और समझौते,
समझौते पे हस्ताक्षर......
उनका कलम उसी, सुई जैसा दीखता है......

बस दो पल........

पथिकों को समझौते पर सुई नही मिली......

मानव मनुष्य बन रहा है........
उसे नग्नता का आनंद अच्छा लगता है,
और नग्नता का आनंद अच्छा लगता है,
क्या मनुष्य को वस्त्र नही चाहिए.........?

तो क्या पथिक अब न चलें,
सुई की खोज का क्या होगा.......?

बुद्ध, महावीर, गांधी,
पथिक ही तो थे,
उन्हें तो सुई मिल गई थी,
मानवता के वस्त्र पहने थे,
तो चित्रों में नग्न-अर्धनग्न क्यों.......?

नेत्रों का दोष है,
सभ्यता के वस्त्र किसे दिखे अब तक ........?

पथिक बुद्ध या गाँधी नही,
पर सुई तो चाहिए.......
अपने वस्त्र सीने हैं........
उसे भी सभ्य होना है........

पथिक को प्रेम का धागा भी चाहिए......?

एक और खोज.......
सीमित जीवन, अंतहीन खोज.....

वस्त्र अधूरे रह गए,
पथिक को चिर विश्राम करना पड़ा......

सभ्यता की नग्नता,
चिरजीवी....
मनुष्य की पशुता चिरजीवी.......

कुछ और पथिकों को,
ढूंढनी होगी,
मानवता की सुई,
मनुष्य को वस्त्र देने हैं,

नग्न रह कर प्रकृति का रोष,
असहनीय, अन्त्य.......
न सह सकेगा मनुष्य
वस्त्र तो पहनने ही होंगे।

वायु से भी आवश्यक,
मानवता के वस्त्र,
और एक सुई, जो चुभती नही,
सबसे अधिक महत्वपूर्ण.............

दुर्घटना

किसी घटना के लिए क्या कारण उत्तरदायी है......कभी कभी पता नही चलता पर बाद में हम सोचने को मजबूर हो जाते हैं........वो एक घटना ही हमें अपना और समाज का पूरा प्रतिबिम्ब दिखा देती है........



मैं, ऑटो पे सवार,
जा रहा था, अपने अस्थाई निवास,
ब्रेक और हार्न की,
मिली जुली आवाजों ने,
भंग कर दी तंद्रा,
विचारों ने छोड़ दिया,
कुछ पल के लिए.........

एक विचार न माना,
बोल ही उठा....
क्रासिंग होगी शायद.........

रुका हुआ ऑटो थोड़ा सरका,
फिर रुक गया.......

कुछ जुबाने कह रही थीं,
एक्सीडेंट हुआ है........

मेरी उत्सुकता ने सर बाहर निकाला.....
स्वाभाविक, मानवीय......

दूर तक गाड़ियों की कतारें....
पुलिस के सायरन की आवाज़.......

एक बार फिर देर से..........

डंडा फटकारता एक सिपाही.......

भीड़ छंटी तो एक ढेर दिख गया.......

तुडे मुडे से अंग,
जैसे सिलवटी रेशम......

नए जूते से बंधा एक पैर.....

अधरंगी लाल सफ़ेद चादर से,
बाहर झांकता हुआ.........

और हर दर्शक जूते पे अफ़सोस करता हुआ....

थोडी ही दूर,
उतनी ही टूटी पड़ी,
एक मोटरबाइक.......

कुछ और अफ़सोस,
गलों से निकल, सड़क पर फैल गए.......

सुना तेज़ जा रहा था,
ट्रक से टकरा गया........

कोई बोला, ट्रैफिक भी तो हैवी है........
हाँ..........सिग्नल भी ख़राब है........
प्रशासन ही मुर्दा है साला..........

बात मुख्यमंत्री पर आ गई......
मुर्दाबाद के नारे,
न जाने कब गाड़ियों के बीच आ गए.......

फिर सब ठीक हो गया.......
पुलिस आ गई थी न.........

सुबह अखबार ने बताया.......
वो ट्रक,
वो सिग्नल,
वो ट्रैफिक,
वो प्रशासन
सब बाइज्ज़त बरी हो गए.........
पता चला शराब दोषी थी......
बाइक वाले में छुपी थी.......

फरार हो गई, बह गई,
लाइसेंसी दुकानों में छुप गई,
अंग्रेज़ी और देशी का रूप धर कर.......

मैं सोचता रह गया.....
ये दुर्घटना कल नही हुई थी.....
उस दिन हुई थी जब,
मदिरा का अविष्कार हुआ था........

Saturday, July 4, 2009

ये कैसा न्याय...............?

कई पाठक सामिष भोजन करते होंगे, यह कविता कोई उपदेश नही क्योंकि हो सकता है विचार न ज़मे, कभी मैं भी सामिष का शौकीन था पर अब शाकाहारी हूँ, इस घटना के बाद से ही एक जीव की जान न लेने का प्रण कर लिया..............


कुछ कड़वी यादों को स्टेशन पर छोड़ कर,
लौट रहा था,
वक्त रेंग रहा था, सांप जैसा........

सड़क किनारे, ठेले को घेरे खड़े लोग,
एक कुत्ता, और दूर एक बिल्ली भी.........

ठेले के पास कटे पंजों.....
खून सने पंखों का ढेर......

कुत्ता और बिल्ली दोनों अधीर,
कुछ टुकडों की प्रतीक्षा में,
जो बस गिरने ही वाले थे...........

मैंने ठेले को देखा,
कुछ रुई के ढेर, सिमटे, डरे सहमे.......

वही..........

ब्रीड वाली मुर्गी.........

शायद भविष्य जानते थे अपना,
तभी तो टाँगे छुपा रखी थी.......

डरे हुए बच्चे की तरह.........

एक आवाज़ सुनी.........मांस काटने जैसी...........
लगा वो हथियार मेरी गर्दन पे चला है.........
मैंने आँखें मूँद ली......नज़र चुरा ली.........

पर उस आवाज़ ने अनसुना कर दिया मेरा विरोध,
आ कर कानों से टकरा ही गई.......

एक चीख़ जो निकल ही नही पाई,
उस रुई के ढेर की तो ज़बान ही नही थी.......?
तो चीखा कौन.....?

मेरा मन...........?

ढेर ने किसी को पुकारा...........आओ बचा लो मुझे.......!
क्या मुझे...........?

शायद मैंने सुना था.......
पर वो भीड़ क्यों न सुन पाई जो घेरे खड़ी थी,
उस ठेले को.........?

मैं मुह मोड़ कर चल दिया............
ढेर बोला.........मुझे ज़बान नही मिली.....
वरना चीखता पुकारता.......

ईश्वर को.............

जो उतना ही मेरा है,
जितना मनुष्य का..........

पर ढेर पुकार न सका,
सर्वशक्तिमान को,

होता.........

तो सुनता न..............

उसकी घुटी हुई चीख़............

दोष तो रुई के ढेर का ही है,
उसने छुपा रखा है कुछ सुर्ख.....
अपने भीतर.........

गोश्त............

जो इंसान को..........

नही.....! मनुष्य को.......

कुछ ज्यादा ही पसंद है....?
या शायद शौक है..........?

बिल्ली, कुत्ते की प्रतीक्षा समाप्त.....!
कुछ फड़फड़ाया, फिर शांत.........

रुई का ढेर या मेरा अंतस..........
एक एहसास जिसे लिख नही पाया,
बस वितृष्णा के साथ सुना और महसूस किया........?

एक असफल चीख़, दो थरथराते पंजे,
एक कटा गला, और परों पे बहता सुर्ख लहू........

रुई के ढेर रंगीन होने लगे,
उनके उतारते कपड़े.....वो दो हाथ.......

लगा मेरे ही हैं...........!
कारण भी तो मैं था............?

चेहरे पे विजय भाव,
जैसे कसाई ने जीत ली जंग,
अर्थव्यवस्था के ख़िलाफ़
मुर्गियों को हलाल कर के..........!

कुछ पर और गिरे,
कुछ अतड़ियां और निकलीं........

हलाल चिकन तैयार था.........

किसी मनुष्य की जिव्हा का स्वाद बढ़ाने को,
एक जानवर दूसरे का भोजन बन जाने को........

प्राकृतिक होता तो दोष ईश्वर की ऋचा में था,
पर ये कैसा न्याय...............?

एक का पेट भरे, स्वाद आए,
दूसरे की जान जाए..................?

Tuesday, June 16, 2009

तम्मनाएं.............

बुझी बुझी सी शाम में,
यादों की सूखी लकडियाँ,
छिड़का करता हूँ.........

इस उम्मीद में,
की कोई तो लौ उठेगी.....

कुछ तो रौशनी होगी,
थोड़ा तो बदन तपेगा.........
और कोई तो एहसास बचेगा..........

कमबख्त ये सर्दी,
जिन्दगी बुझाने में लगी है.......

तुम आओ, तो बदन पे,
कुछ तम्मनाएं सेंक लूँ..........

तुम्हे जी भर,
बस एक नज़र देख लूँ........

क्या पता, जिस्म की ये अंगीठी,
दुबारा जले न जले.......

और मुझे शिकवा रह जाए..........

क्यों न मैंने आग दे दी,
अपने अरमानों को............

आग............

कुछ चमकीले से बदन,
कुछ रेशमी सी बाहें.....
मेरा दिल जला देती हैं........

जुनूनी बना देती हैं,
मेरा चैन-ओ-सुकून छीन,
बेदर्द सज़ा देती हैं...............

सुर्ख रेशमी होठों के प्याले,
छलकते हैं, रोज़ मेरे आगे........
लुभाते हैं, बुलाते हैं.......

छलावा मान के,
बचता आया अब तक............

पर तुमसे मिलकर,
ख़ुद पे काबू नही.........

वो बे परदा रातें कुछ,
कुछ बे पैरहन दिन.......


मेरे जेहन को मथते रहते हैं,
मेरी तमन्नाओं को,
और तीखा बना कर...............

अब बदन की,
गीली सी लकड़ी से..........

धुंआ उठने लगा है,
भीतर कुछ सुलगने लगा है...........

इस से पहले,
की आग कुछ ज्यादा ही,
सुलग जाए..........

क्यों न एक और,
बेपर्दा रात हो जाए.........

Monday, June 15, 2009

कीडा..............

नफरतों की नई शक्ल, नया ज़ज्बा है, पर दुश्मन वही पुराना शहर है.........


शराबी है ये शहर,
मैंने देखा है........

लुढ़के से कुछ जिस्म,
डगमगाते कुछ कदम.......

घर का रास्ता पूछते,
मिन्नतें करते,
गिडगिडाते, वाइज़ के आगे........

घर का रास्ता पूछते........

फिर होश में होने का दिखावा,
वो सारी कवायदें,
सारी हरकतें, बेवकूफाना.......

ख़ुद को दगा देते,
शराबियों का शहर......

कीडों का शहर,
नालियों का शहर........

दगाओं का, बेईमानियों का,
इंसानों के आसामियों का शहर.........

नफरत हो चली है,
चिकनी सड़कों से.......

जो रोज़ भुला देती हैं,
की मैं, कच्ची धूल भरी.......

पर सोंधी महक वाली......
पगडंडियों का मुसाफिर....................

यहाँ नाली का कीडा हूँ.............

दो पल सुकून के लिए..................

दिल की खलिश जब पूरे शबाब पे निकलती है तो लफ्जों का तरन्नुम बदल जाया करता है तल्खी में, दौर-ऐ-तन्हाई का बयान-ऐ-दर्द-ऐ-दिल यूँ हुआ.........


जेहन में रेंगते,
अतीत के कुछ पल,
कीडों की मानिंद,
बाहर निकल रहे हैं............

एक सस्ता सा कलम,
कीडों को उठा उठा कर,
रख रहा है, कागज़ पे........

सालों से ये कीडे,
मुझे कुतर रहे हैं.....

मेरे भीतर का सब कुछ.........

कुछ बासी गन्दी यादों में,
पलते रहे ये घुन....

जिन्हें बस कुछ साल लगे हैं,
मुझे खोखला करने में,
थोड़ा थोड़ा, रत्ती रत्ती.........

और हर रात मार देती है मुझे,
पड़ा रहता हूँ किसी ठंडी लाश के जैसा.......

ख्यालों के बूढे, डरावने,
गिद्ध रोज़ नोचते हैं,
मेरे जिंदा जेहन को............

कुछ काली परछाइयां,
कुतरती हैं हर रात मुझे..........

मैं हर रात के आगे,
दोजानू हो के, गिडगिडाता हूँ,
सारी रात.........

बस दो पल सुकून के लिए..................

Wednesday, June 10, 2009

खाली हाथ नही आया............

मैंने तीन महीने समंदर किनारे गुजारे, अब जब वापस लौट आया हूँ तो सोचता हूँ क्या खोया क्या पाया.......इस उधेड़बुन ने कब कविता का रूप ले लिया पता ही नही चला.........



भरे समंदर को छू कर,
क्या खाली लौट रहा हूँ मैं.........

लहरों ने टकरा कर पैरों से,
सोख लिया था कुछ........

नंगे पाँव रेत पे चलते चलते,
न जाने क्या गिरा दिया था..........

शायद...........मेरे भीतर का डर.........

सीपियों की खनक ने,
कुछ इशारा तो दिया था.........

फिर भी खो जाने दिया.........
सागर किनारे मुस्कुराता हुआ,
मैं आगे बढ़ गया............

अजीब है,
खोया है.....फिर भी खुश हूँ..........

खोने पाने के एहसास से,
उबर कर मैं बस बढ़ता रहा.........

जज्ब करता रहा, समंदर को,
कभी बुलबुलों को,
कभी रेत को छू कर............

नदी बन कर,
सारी वितृष्णा बहा दी...........

सारे उद्विग्न पल दे दिए,
अथाह विस्तार को..........

विकृत प्रकृति के अंश दे दिए,
विस्तृत प्रकृति को..........

शुद्ध, स्वस्थ विचारों को,
संजो कर.......

धुली धुली स्मृतियों को समेटे,
सागर सा स्थिर हूँ.......

गहराई ले के लौट आया हूँ.........
सुकून है कि खाली हाथ नही आया...............

Saturday, June 6, 2009

'शोना' मैं हूँ न..........

मेरा दौर-ऐ-गर्दिश,
और हाथ थाम लिया,
आकर तुमने................

अपने पेशानी की सलवटों को,
तुम्हारी मुस्कुराहटों में घोल कर,
हवा में उडाता रहा, बरसों बरस.........
उन मुश्किलों में भी,
मुस्कुराता रहा...................

कुछ छोटी छोटी बातों पे,
मेरा फिक्रमंद हो जाना,
और तुम्हारा मुझसे भी ज्यादा,
सिर्फ़ मेरे लिए...........

गले लगा कर,
वो कह देना.........
'शोना मैं हूँ न'........
इक इक पल में,
सौ सौ, जिंदगियां देता रहा है मुझे............

तुम्हारे काँधे सर रख के,
मैंने कितने ही दर्द बहाए हैं............
ये सारे दर्द यूँ तो,
अश्क बन कर निकले थे............
पर कभी सितारे बने तो कभी फूल,
कभी चमके तो कभी मुस्कुरा दिए.....

फोन पर मेरे,
खांसने की एक आवाज़ से,
तुम्हारा परेशां हो जाना,
सच कहूं तो जीने की,
वजह बना जाता है.........

नही जानता कि, जीना क्या है.......
पर जानता हूँ, कि सिर्फ़ तेरे लिए,
जीना क्या है............

अक्सर सोचता रह जाता हूँ,
कि कैसे जान जाते हो,
कब दिल भरा है और जेब खाली............

इन मीलों के फासले के बाद भी,
कैसे मेरी आंखों की नमी,
दिख जाती है तुम्हे............

कैसे सुन लेते हो, वो भी,
जो मैं ख़ुद से भी नही कह पाता...............

मेरी जिन्दगी को,
किनारे मिलने लगे हैं..............
सिमटने लगी है दुनिया,
सिर्फ़ तुम तक...........
तो कहो मैं क्या करू,
तुमने ही किया है ये सब......

तुम्हारे गेसुओं की खुशबू,
कहती है, हर रात मुझसे.........
'शोना' मेरे बिना मत जीना..............

तो कहो क्यों न मैं वादा कर लूँ............

और कह दूँ.........
'जानू' ये वादा कभी नही टूटेगा..................

Friday, June 5, 2009

विद्रोह.......

आक्रोश, (वो भी निजी दिनचर्या और व्यवसाय के मध्य हुए द्वंद से उत्पन्न) मुझे रोज़ खिन्न कर देता है..............परिणिति तो प्रारब्ध की व्यवस्था है..............मैं माध्यम ही हूँ.....पर बोध है मुझे हर स्थिति के परिवर्तन का...............यह सारा विश्लेषण कविता का रूप ले कर चला आया.............



अब तो बस, घर से दफ्तर,
दफ्तर से घर का सफर.......
यही मेरा अपना समय है,
जब मैं ख़ुद को ढूँढा करता हूँ...............

विषय तलाशा करता हूँ,
जिसे दर्पण बना कर,
ख़ुद को देख सकूं,
देख सकूं, कि मैं अब क्या हो गया हूँ.................

कभी राह चलते हर शख्स में,
ख़ुद को देखता हूँ............
उसके अक्स में,
हैरान, परेशान, जूझते हुए.....
कभी खिलखिलाते कभी टूटते हुए.......

घरो में, आफिस में, चुन दी गयीं......
जिन्दा जिंदगियां.......
जिनमें से कुछ रजामंद,
हँसते हुए, इस सज़ा के लिए..........

वातानुकूलित दीवारों से,
सट कर जीती ये जिन्दगी......
मेरे लहू की गर्मी को सोखे लेती है,
जाने क्या बैर इन दीवारों को,
मेरी ऊष्मा से..............

अपने अंतस के मर जाने का,
विचार मारता है,
रोज थोड़ा थोड़ा....................

किसी और में सुलगे न जले,
कोई भी न चाहे जीना,
भले न कोई साथ चले.......

मुझमे विद्रोह सुलग उठा है,
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आन्दोलन को.............
बस समझाना है अपने मन को........

कुटिल अर्थव्यवस्था ,
अपनी माँ राजनीति से मिल कर,
मुझे और क्यों छले.........?

क्यों न उगे विचारों का सूरज,
क्यों न भावनाओं का कारोबार चले...............

Sunday, May 31, 2009

यकीन........

दूसरों की राह पे चला नही,
पर मैं भी तो कोई भला नही..........

गैरों के हाथ में देख,
खूबसूरत हाथ,
क्या कभी मेरा दिल जला नही...........?

मेरे पास बस इतने ही लफ्ज़,
बस इतनी ही बातें,
कुछ उजले दिन, कुछ अँधेरी रातें.......

शायद तुम मेरे साथ हो,
तो फिर तन्हाई क्यों है.........?
यूँ साथ हो के, जुदा जुदा हो........
मेरे साथ ये परछाई क्यों है.........?

क्यों रात भर नींद नही आती मुझे,
क्यों रात रात भर मैं करवटें बदलता हूँ,
कभी तकिया बदलता हूँ,
कभी उसकी सलवटें बदलता हूँ................!

जब कुछ भी पेश-ऐ-नज़र नही होता,
तब भी मेरी निगाहों ने,
तुझे देखा है............
अंधे यकीन को लिए जिए जाता हूँ,
इक बिरहमन ने कहा था,
मेरे हाथ में तेरे नाम की रेखा है................

Wednesday, May 27, 2009

युग्म...........

बस रुकी तो....डिवाइडर पर लगे पेड़ों पे,
नज़र पड़ ही गई,
लोहे के तारों की बाड़ में घिरे,
नन्हे से पौधे को देखा
सुकुमार, कोमल, सुंदर........
और जंग लगे लोहे का संरक्षण..........
युग्म विचित्र सा लगा.......

मुझे विचारमग्न देख,
बाड़ को हँसी आ गई,
जैसे पापा हँसते थे.................
मैंने कारण पुछा तो,
एक मुस्कराहट का,
प्रत्युत्तर मिला...........

बस चल दी तो,
शरारती नन्हे पौधे ने,
शुभविदा कहा..................

पाँच साल बाद फिर बस रुकी है,
ठीक वहीँ,
पर दृश्य में सिरे से परिवर्तन है..........
बाड़ जर्जर हो चली है............
और यौवन था उस पौधे पर..........

पौधे ने अभिवादन किया,
मैंने विश्लेषण कर लिए स्थिति के........

परीक्षण किया युग्म का........
युवा पौधे की शाखों ने,
बाड़ की रिक्तियों से निकल कर,
उसे थाम रखा था.......पूरी मजबूती से......

युग्म में मुझे,
पिता पुत्र का रिश्ता दिख गया........

बस फिर चल दी है,
पौधे का शालीन सा अभिवादन आया है,
जर्जर बाड़ को,
थामे रखने का वादा किया है उसने.................

समझोगे कभी................?

यूँ आधी रातों को उठ जाना,
तुम्हे भुलाने की कोशिशें करना,
कोहरे से ढकी सड़कों पे,
भागना बदहवास............
क्या समझोगे कभी..............?

कभी भीड़ के बीच खड़े हो कर,
कभी पानी की धार के नीचे,
कभी पी कर बेहिसाब,
कभी मन्दिर-ओ-मजार के पीछे..........
तेरी दिल तोड़ने वाली बातों को,
भुलाने की वो कोशिशें............
काश ये दर्द तुम भी जानो............?

तुम्हे क्या पता,
कितना बदला था,
मैंने ख़ुद को, बस तुम्हारे लिए.......

अब हर बात कहने से पहले,
सोचते और बस सोचते रहना........
चुप रहना भी सीख लिया मैंने............
क्या तुम्हे महसूस हुआ कभी.....................?

आईने के आगे खड़ा हो कर देखूं,
वो पुराना अक्स नही दिखता,
ये तो कोई और है,
जिसे बनाया है तुमने,
और फिर मैंने.........मिल कर..........

हैरान भी हूँ, परेशान भी,
के जीना तो है मुझे..........
पर हर रोज़ मरते हुए...................

यूँ भी हो...........

ख्यालों में अपने,
एक सफ़्हा मैं यूँ भी लिखूं.........
के दो पल को तू मैं हो जा,
और मैं तू हो सकूं...........

अलमस्त फुर्सत से,
मैं भी पहचान निकालूँ,
दिल के सारे,
दबे अरमान निकालूँ.........

हसरतों के माथे,
पसीने की बूंदे न हों.........
न पेशानी पे सलवटें.........

एक रात कोई ऐसी भी गुज़रे,
नशा हो तेरा बेहिसाब,
फिर देर-ओ-सहर तक न उतरे...............

कभी चाँद यूँ भी हो रोशन,
के भरी दोपहर तक न उतरे.............

तुमने आवाज़ दी थी.........

बारिशें भाती न थीं,
बूँदें दिल में आरजू जगाती न थीं,
सुबह आ के जगा जाती थी,
रात जाते जाते,
रुला जाती थी...............

कोई अपना भी है ज़माने में,
ये एहसास कहाँ था,
सुकून तो था दुनिया भर में,
पर मेरे पास कहाँ था..............

उठते गिरते कदम लिए जाते थे,
नामालूम मंजिलों की ओर,
गुमसुम तन्हाई चलती थी संग संग,
मुझे डराती थी और...............

तुम्हे देखती थी,
मेरी हसरत भरी निगाह हर रोज़,
तमन्ना तरस जाती थी,
सरे-राह हर रोज़...........

उन दिनों जब मैं ख़ुद से,
खफा खफा था,
तुमने आवाज़ दी थी,
एक रोज़ मुझे रोका था..........

पूछा था.............
क्यों ख़ुद पे सितम करते हो?...........
दोस्तों से,
राज़-ऐ-दिल कहने से डरते हो?............

बस यूँ ही देखता रह गया था,
तेरी आंखों के फरेब को,
तड़प कर पूछा था,
दिल ने उसी पल

दोस्त कहते हो..........
पर क्या आंखों की जुबां समझते हो?..............

दिल तो कह गया,
पर मैं न कह सका,
ज़माने से था,
तुम से था,
ख़ुद से भी मैं खफा खफा था...............

हाँ पर आज भी याद है मुझे,
तुमने पीछे से आवाज़ दी थी,
मुझे रोका था..........................

Monday, January 12, 2009

मेरे अंतस की पीड़ा को जानेगा कौन,
कहानी जैसी है,
तो सच मानेगा कौन.............

मैंने ख़ुद में फरहाद को देखा,
तुझमें मीरा का रूप,
अब जीवन की जलती धरा है पैरों तले,
सर पर विचारों की धूप..........

मैं बरसों से जैसे का तैसा,
तनिक प्रेम का प्यासा
न भाव में प्राण शेष रहे,
न ह्रदय में आशा.........

तो आज सारे भाव निष्प्राण,
पर मानस में कोलाहल,
तुमसे ही जीवन, जीवन सा जटिल,
अन्यथा मृत्यु सा सरल.........................
मैंने गैरों से लड़ना सीखा है,
पर कैसे तुम्हे समझाऊँ,
तुमने सुना ही नही,
चाहा तो बहुत के तुम्हे बताऊँ..........

रोज़ मैं थोड़ा थोड़ा,
शीशा हुआ जाता हूँ,
जानता हूँ के कल गिर जाऊंगा,
बिखर जाऊँगा..........

सहमा हुआ हूँ, घबराया भी,
तुम्हारी तरफ़ देखता हूँ,
उम्मीद की नज़र से,
के आओगे और हाथ थाम लोगे,
बेचैन हूँ मैं,
तुम तो सबर से काम लोगे................

लगता है ये भी भरम था,
तेरा मुझपे इतना ही करम था,
तो अब जीने की वजह क्या बनाऊं,
क्या तेरी याद बिसरा दूँ..............?

Thursday, December 18, 2008

साठ लाख भूखे बच्चे..........

मैंने जिन्दगी को करीब से देखने की कोशिश की, आम इंसान की नज़र से अपने वतन 'हिन्दुस्तान' को देखा, परेशानियां देखीं, बुराइयां देखीं, अव्यवस्था देखी और फिर इनका हल जानने की कोशिश की....

जहाँ हर रोज़ साठ लाख,
भूखे हैं बच्चे,
वहाँ टनों दूध पीते,
पत्थर के भगवान्........

इस सबके जिम्मेवार,
कुछ मुट्ठी भर इंसान......

जहाँ सरकारी दफ्तरों के आगे चढ़ती,
बेरोजगारों की बलि, और
आत्महत्या कर लेते,
हर साल बीस हज़ार नौजवान.........

इक दस्तखत के बदले, जहाँ एक बाबू...
कभी उतार लेता आबरू,
या आधी जिन्दगी की कमाई,
और उस पर भी जताता एहसान.........

नैतिकता और भ्रष्टाचार के,
इस कुरुक्षेत्र में,
पतित ही कर्ण, और अर्जुन भी वही
उन्ही के हाथों खडग, उन्ही के हाथ तीर-कमान...........

जहाँ हर मोहल्ले में, औरतों लड़कियों पे फब्तियां,
न बस ट्रेन में, बुजुर्गों को सम्मान.....
जहाँ हरिजनों को साठ साल में भी,
न मिला सबके जैसा अधिकार समान............

तो प्रश्न उठता है.......क्या सचमुच "मेरा भारत महान"?

चलो प्रश्न का उत्तर ढूंढें,
उठें, आगे बढ़ें,
अधिकार और सम्मान के लिए.......

न्याय के लिए करें प्रयोग अपने अधिकार और RTI,
जाने संविधान को,
और करें विश्वास का आह्व्हान.......
सच में बनाएं भारत महान............


एक कवि और जागरूक नागरिक होने के नाते, मैं भारतवर्ष के सामजिक उत्थान को अपना कर्तव्य और अधिकार समझता हूँ, मैं हर सम्भव प्रयास करता हूँ संविधान को समझने और अपने मौलिक अधिकारों के प्रयोग का.............क्या आप करते हैं?

मेरी पुत्रियाँ......

मेरे कुछ शुभचिंतक मुझसे कहा करते हैं कि मेरी कविता का भावार्थ जटिल है, मैं लंबे समय तक इस बारे में विचार करता रहा, इसी दौरान कुछ पंक्तियाँ भी अस्तित्व में आ गयीं और इन्होने भी एक जटिल (या सरल मैं नही जानता) कविता का रूप ले लिया, साथ ही मुझे कविता से अपने सम्बन्ध का पता भी चला, मैं पिता हूँ, अपनी रचनाओं का........

पुत्री कहूं तो सर्वथा उचित,
मैं जन्मदाता जो हूँ......
और वो मेरी रचना......

प्रकृति को पुत्रियों के स्वभाव में.....
उडेला करता हूँ....
कभी कभी मैं भी,
शब्दों के साथ खेला करता हूँ.........

हर एक की तरह, यह खेल भी,
रचयिता ने रचाया है,
कि मैंने भी,
रचयिता होने का सुख पाया है.........

इच्छानुसार तोडा है, मरोड़ा है,
बहुत कुछ घटाया और जोड़ा है.....

कुछ में भावों का अतिरेक है,
कुछ को पकाया है, तार्किकता कि धूप में,
कुछ वुत्पन्न हो कर निखरी हैं, नैसर्गिक रूप में.............

न जाने क्यों, मेरी स्वाभाविक जटिलता,
मेरी रचनाओं में है,
वही जो मेरे संकल्प में है,
मेरी कल्पनाओं में है...........

रचनाओं पर है एक विचित्र आवरण,
न जाने क्या है कारण,
शब्दकोष, या व्याकरण.......

मुझे यह बोध है, क्योंकि मुझे भी शुष्क लगती हैं,
शिथिल लगती हैं,
आम इंसान बन कर देखता हूँ तो,
मुझे भी जटिल लगती हैं............


भावार्थ Meaning, अस्तित्व Existance, सर्वथा Exactly, अतिरेक Extreme, व्युत्पन्न Derivative,
नैसर्गिक Natural, आवरण Envalop, Cover, Protection, शब्दकोष Dictionary, व्याकरण Grammer, बोध Realization, शुष्क Dry.

Tuesday, December 9, 2008

आज निशब्द अँधेरा है............

रूचि के विपरीत जाना पड़ता है, व्यवसाय को अपनाते हुए जब कविता से सम्बन्ध क्षीण होने लगा तो इस भाव ने भी कविता का रूप ले लिया, आप के समक्ष प्रस्तुत है..........

मेरे चेतन में, शब्दों के जुगनू चमका करते थे.......
आज निशब्द अँधेरा है,
धरातल बौधिक चिंतन का ही है,
पर भौतिकता का व्यापार फैला है...........

आवश्यकताओं ने सोख ली है,
मेरी वैचारिक ऊष्मा,
अलंकारों का गुंजन, प्रायः निष्प्राण है........

सर्वथा आवश्यक बालबोध अब भी जीवित है कहीं,
पर अब, अप्रयोज्य हो चला है.......

बस यही जान कर, रहता हूँ मौन,
के सुन तो कोई भी लेगा,
पर पीड़ा समझेगा कौन...........

मेरी यह पीड़ा और अंतस का विश्लेषण,
ले जाता है, कारण की खोज में........

पर यह मंथन अधिक समय नही लेता,
मेरी खोज को मिलता है, पूर्णविराम......
तीन शब्दों पर, "यही दुनिया है"..........

यह मेरी पीड़ा का पूर्णविराम नही बन पाता.........

बढ़ जाता है, संताप और,
होता है, पश्चाताप और.......

इस अनुत्क्रमणीय अवस्था का,
मेरे पास कोई हल नही,
आज इतना शुष्क है शब्दकोष,
की आँखें भी सजल नही.............

अस्पष्ट सी इस कविता जैसा,
अस्पष्ट सा ही एक असंतोष है।

बीते दो बरस में मुझे बस यही अवगुन लगा है,
लेखनी के चंदन में प्रश्नवाचक घुन लगा है..........

सबसे बड़ा भय.................

जीवनसाथी से बिछड़ने के बारे में पूर्वाभास होना आम बात है, मैंने एक प्रेमी के मन में उस समय उमड़ते प्रश्नों को समझने की चेष्टा की..............

बाहर भी तम्, और भीतर भी,

घना फैला अन्धकार दूर तक,

आशाओं का दीपक ले, चलता हूँ............

डगमगाता, ठोकर खाता............

तुम्हे पता है...............?

मेरे लिए सबसे बड़ा भय क्या है...............?

यही अन्धकार।

मेरा मन, मेरा बालमन, भयाक्रांत है,

इतना सहमा की रोता भी नही,

इतना भय कि,मानस सोता भी नही.............

यह भयानुभूति भौतिक ही है,

सांसारिक है,

मैं जानता हूँ, संबंधो का परिणाम है............

विश्वासघात ने उपजा है अन्धकार,

जन्मदाता हैं वो,

जो कभी थे मेरे अपने............

किया मेरे विश्वास को छिन्न-भिन्न,

पर फिर भी जीवन पुकारता है,

कहीं रौशनी दिखती है,

तुम आते दीखते हो.............

पर कुछ और भी है, तुम्हारे साथ,

मेरे भय को साथ लिए चले आते हो............

एक परछाई भी है न तुम्हारे साथ,

उसी भय का अंश,

मुझे आहात विश्वास का स्मरण हो आया है.......

क्या मेरे विश्वास और भय का,

फिर द्वंद होना है.................?

कहाँ मिलेगा शोर मुझे, कहाँ मिलेगी ये भीड़..........

कभी कभी सिर्फ़ एक इंसान पूरे जीवन का उद्देश्य बन जाता है, उसके न मिल पाने पर शायद यही हश्र होता है.........

चला जाता हूँ, कभी स्टेशन,
कभी चांदनी चौक, कनाट प्लेस, या इंडिया गेट.........
फिर खड़े हो कर भीड़ में,
चाहता हूँ,
की आवाजें कुछ और तेज़ हो जाएँ.............

कुछ देर ही सही,
बसों के हार्न, या ट्रेन की आवाज़,
छीन ले, सुनने की ताक़त मुझसे........

शायद तब न सुन पाऊँ,
अपने भीतर के सन्नाटे का शोर.............
शायद तब ही, मेरे भीतर की खामोशी,
चुप हो जाए, कुछ देर............

सदमा तो ये सोच कर है,
की रात बीतेगी कैसे,
जब के नींद को बैर मुझसे,
बाहर से ले कर भीतर तक,
खामोशियाँ डराएँगी मुझे..........
एक पल में सौ बार, सताएंगी मुझे...........

कहाँ मिलेगा शोर मुझे, कहाँ मिलेगी ये भीड़..........

मिलेंगे तो बस रात, बेचैनी, सन्नाटा, सूनापन, अकेलापन, तन्हाई....................

पालनहार से ये सारे प्रश्न......................

संसार की दुर्दशा और मानव कि स्वार्थपरता देख कर एक दिन मेरा ह्रदय पालनहार से ये सारे प्रश्न कर बैठा..............


ऐसा नही की मेरी विनती न सुनते होगे,
समझते भी हो,
चाह कर भी दे नही पाते,
ज्ञात है मुझे..............

पर यह विश्वास आहत होने लगा है,
जब से मैंने जाना,
कि मानव ने सीख ली है,
पशुओं कि संस्कृति,
परभक्षी और भक्ष्य का नाता.........

हे! जगतपिता क्या संसार पर आपका,
अब कोई नियंत्रण नही,
क्या दुर्दैव दिन, और इनकी उष्णता,
यूँ ही बढती जायेगी.........

हे! परमपिता, मैं असमंजस और चिंता में घिरा हूँ,
आपकी दी हुई प्रतिभा कि बोली लगाने को,
आतुर है, आपका ये संसार............

किसी निधिवान के चरणों कि भेंट कर दूँ,
तो जीवन की काया पलट जाए.........

पर यह आकांक्षा तो आप से है,
परमपिता, कम से कम ये तो कहो,
कितना शेष है, इस भौतिक जगत में.........?
अब आपका............?

या हर लिया है मानव ने अधिकार,
वंशजों ने जैसे साम्राज्य किसी वृद्ध सम्राट का...................?

सवालों का ये सिलसिला..............

जब कभी एक ही इंसान किसी के लिए पूरी दुनिया हो जाए

और फिर वो बेवजह उस से जुदा हो जाए तो सवालों का ये सिलसिला दिल में आए...............

तुम सुनतीं तो कहता मैं,

समझती तो इशारा देता,

पर इतनी अजनबी क्यों हुई जाती हो,

मैं बिखरने लगा हूँ,

क्या तुमने दामन छुडाया है...............?

ये काली रात मुझे सोने नही देती,

क्या तुम्हे किसी और का ख्वाब आया है.............?

पिघलने लगा हूँ, जलने लगा हूँ,

क्या शीशा-ऐ-दिल की ओर,

तुमने भी पत्थर उठाया है..........?

ख़ुद को आज कारवां से,

जुदा पाता हूँ मैं,

क्या किसी और को तुमने हमसफ़र बनाया है............?

बस उस इल्म की तस्दीक़ कर दो,

जिस से ख़ुद को मेरे प्यार से महरूम किया,

ये तो कहो दिल से मुझे भुलाने का,

कौन सा तरीका आजमाया है..............?

हाल-ऐ-दिल बताऊँ किसे, यार ने घर ही बदल डाला,

एक ज़रूरी ख़त उस के पते से लौट कर आया है...............

कोई फाँस चुभी हैं, मन में.................

मनुष्य सभी से अपेक्षाएं रखता हैं, जिनके पूरे न होने पर उसे संताप होता हैं, यह उसकी अपनी उत्पन्न की हुई समस्या होती हैं, कभी कभी इसके लिए वह ईश्वर तक कोई दोषी ठहरा देता हैं।

मेरी यह कविता उसी आवेग का विश्लेषण हैं..........

शब्दों का एक अविरल प्रवाह,
अवचेतन में,
एक फाँस चुभी है, तर्जनी में,
और एक मन में..................

विचित्र हैं पर सत्य यही,
कल सुख देती थी, आज पीड़ा......
कदापि यही भाग्य,
यही प्रारब्ध की क्रीडा.........

समय बीता तो बन गई,
अंश अस्तित्व का........
आधा भाग जीवन का,
आधा व्यक्तित्व का..........

साथी बनी थी, आकुलता बन कर,
आज शत्रु सद्रश, व्याकुलता बन कर..........

प्रेम, ईर्ष्या, मोह के आवेगों में बहता,
नवरूप को खोजता.......

वर्षों की पीड़ा मन में,
और मन की पीड़ा वर्तनी में.......
एक फाँस चुभी हैं, तर्जनी में........

शीश अब भी झुके, समक्ष ईश के,
थोडी वितृष्णा ह्रदय में,
पूरी श्रृद्धा नमन में,
पर कोई फाँस चुभी हैं, मन में.................

Wednesday, November 26, 2008

तेरी खातिर...........

मुस्कुराता है वो,
तो मसखरा बना रहता हूँ,
उसकी हँसी के बदले,
रोज़ ख़ुद को ज़ख्म लगा लेता हूँ मैं.............

उसे सुकून मिलता है, दर्द से मेरे,
तो ख़ुद को यूँ ही सज़ा देता हूँ मैं...........

इतने रूप हैं मेरे, माना मैंने,
पर ख्वाहिश नही मेरी, मर्ज़ी है उसकी............
जैसा वो चाहे रूप बना लेता हूँ मैं..............

वो ही करे के मैं करुँ,
पर ख़ुद को मुजरिम बना लेता हूँ मैं.......
उसे सुकून मिलता है,
तो ख़ुद को सज़ा देता हूँ मैं.............

उसकी चाहत हैं, रोशन शामें,
तो बार बार हर शाम, दिल जला लेता हूँ मैं...........

आज यूँ है, कि मुझ से हो कर जानी है,
उसकी खुशियों कि डगर,
तो चलो अपनी कब्र ख़ुद बना लेता हूँ मैं.....................

मैं रहूँ न रहूँ...........

रात जाने को है,
ख्वाब कहता है, कैसे मैं रहूँ, जब न तू रहे.........

मै रहूँ, न रहूँ, बस तू रहे......
हमेशा खुश रहे, दिल में बस यही जुस्तजू रहे...........

कुछ होने को मेरी हर तमन्ना कहे,
फिर मैं कुछ न रहूँ,
कभी तेरी महफिल में ये भी मौजू रहे..............

मुझे किनारा बन कर यूँ ही फ़ना हो जाने दे..........
तू मौज की रवानी ले आगे चल,
तुझपे किस का काबू रहे..............

ख़ाक कर लूँ मैं ख़ुद को, तेरी छोटी से ख्वाहिश पे,
की मेरी बदन की रेत पे तेरा निशान-ऐ- आरजू रहे...............

खुशबू बन कर जो बसा है, मेरे जेहन में,
तो मुझे अपने गुल होने का एहसास होता है,
मुझे कोई कुचल भी दे तो क्या,
बाद उसके तू ही तो हर सू रहे.....................

Sunday, October 12, 2008

ये अजनबी शहर


दिल्ली शहर मुझे कभी ज्यादा
पसंद नही आया, पर इतना वक्त
गुजार लेने के बाद कुछ बातें तो
समझ आने लगी हैं, फिर भी मेरे
जेहन में बसा गाँव मुझे लगातार
याद आता रहता है, कुछ महसूस
किया मैंने इस शहर में और लफ्जों
की शकल दे दी..........


हमसफ़र है पर हमदम न हो सका,
कोशिश भी न कर सके,
दर्द कम न हो सका.............

सुख बांटने का दिखावा करते रहे,
दर्द को छुपाये रखा,
अनजाने ही ख़ुद को अपनों से,
अजनबी बनाये रखा...............

अक्स को खो कर भीड़ में,
घर के आईने में ढूँढ़ते रहे,
जुबां सिल कर बैठे हैं,
कोई कहे भी तो कैसे कहे...............

अब जिन्दगी सवाल पूछती है,
जवाब सूझते नही,
सब को एहसास है, सबके दर्द का,
पर एक दूजे से पूछते नही..........

एक ओर मुस्कुराता चेहरा है,
दूसरी ओर उदासी छुपी है,
इस शहर को दोहरी जिन्दगी जीने की,
आदत सी पड़ी है.............

अब तो मेरी भी यही रहगुज़र,
मेरा भी यही घर,
पहले ज्यादा लगता था,
अब कुछ कम ये अजनबी शहर..............

हमदम= soulmate, हमसफ़र= fellow, अक्स= image, reflection,
आइने= mirrors, एहसास= feeling, realization, रहगुज़र= pathway

Monday, October 6, 2008

शायद यही मेरे होने की वज़ह हो.........

फिर आज मेरे रूबरू हैं,
मुझे डराने आए हैं, वो सवाल.......
पूछा करता था, मेरा दिल जो मुझसे.........

अब तो न टूटने दोगे कभी........?

एक बिखरते शीशे का दर्द,
उसका अक्स ही समझा होगा,
आइना होता तो, मेरा भी अक्स होता,
किसी ने समझा होता..........

फिर से आज कोई पुरानी रात लौट कर आई है..............
सर्द है, अँधेरी है, अकेली, और मैं भी,

बस कुछ गुज़रे लम्हे याद आते हैं,

कुछ टूट रहा है, पर धीरे धीरे..........


यूँ बिखरना............
जैसे हर पल मरना,
साँस में भरा है ज़हर जैसे.........

नज़र टिक जाया करती है,
जब तब, जहाँ तहां..........
फिर याद करता रहता हूँ, एक चेहरा.........
खूबसूरत..............
प्यार से लबरेज़ आँखें..........

एक और जिंदगी मिली थी जिनसे, मुझे........

क्या हुआ है, पूछे वो,
मुझसे ही हर दफा.........
कैसे कह दूँ, मर्ज़ है कि ज़फा..........

कैसे रुसवा कर दूँ तुझे,
खुश रखने की कसम उठा रखी है, मैंने........

सौंप दिया जो ख़ुद को......
तो जैसे चाहे, तोड़ मुझे,
शायद यही मेरे होने की वज़ह हो.........

Saturday, October 4, 2008

मुत्फर्रिक आशार..........

जैसे राह का काँटा हूँ,

याद रहा जो चुभ गया.......

निकला, तो दो पल में ज़माना (वो) भूल गया...........



एक बार फिर सूरज सर पे आने लगा है,

फिर तपती धूप की आहट आई है,

फिर सुलगती ज़मी पे नंगे पाँव चलने का वक्त आया है.............



आधी सी है, अधूरी है,

ये आस भी जैसे झूठी है,

तोडे मुझे रोज़, पर ख़ुद कब टूटी है................


तेरी याद से कुछ यूं लरजती है रात,

करवटें बदलते गुज़रती है रात....!



थरथराते होठो पे रखू निगाह,

की मह्बेखाब आँखे देखू,

रात तमाम तेरे गेसुओं से,

मेरा मशविरा चलता रहा......!


शिद्दत-ओ-दर्द-ए-हिज्र मरने नही देता,

इंतज़ार वस्ल की रात का भी कुछ कम नही,

पथराई नज़र में चुभते हैं, अधूरे ख्वाब,

सिवा इसके बड़ा कोई ग़म नही....!

तेरी आवाज़ भी सुन सकू,

तो रोशन हो दीदए उम्मीद,

और इस से भला मरहम नही...!

आ.........और यूं आ,

की वफ़ा का भरम न टूटे,

मैंने ज़माने को एक दौर तलक,

तेरे नाम की दुहाई दी है,

बेपरवाह सही मेरा पत्थर का सनम नहीं...!

Thursday, September 25, 2008

क्या कहूं?

परिंदों को आसमा नसीब हुआ,
हर शै को नवाजिश-ऐ-कायनात,
मुझे दो गज ज़मीन भी न मिली,

कसकती है दिल में बात....................

पैरों तले ज़मीन नही,
पर फख्र से ऊंचा है सर,
रोशन राह करने को,
ख़ुद अपने ही हाथों जलाया है घर...............

हरक़तों में क़यामत की बानगी देखता हूँ,
जूनून देखता हूँ,
अपनी ही आंखों में दीवानगी देखता हूँ...............
नाखून देखता हूँ,
अपने ही जिस्म पे निशाँ देखता हूँ,

फुरकत की घड़ी है,
और ये क्या रंग ले के आई,
दर्द लायी,
बारिश-ऐ-संग ले के आई...........

ये हवा का रुख ना जाने किधर को है,
क्या अजीब सी बात है..............
रिसते हैं यूँ ज़ख्म,
के जैसे लहू की बरसात है..............

मिटने लगी हैं नेजों की लकीरें,
पर दर्द अभी बाकी है,
सर्द हुआ बदन,
पर शायद दिल में गर्म लहू अभी बाकी है........

सुबह का भटका,
मैं भटकता शाम तक चला...............
कभी इन्तहा तक चला,
लो आख़िर, आज मैं अंजाम तक चला...............


परिंदा- Birds, नवाजिश- gift, कायनात- nature, कसकती- feeling, realization
फख्र- proud, क़यामत- end of the world, बानगी- glimpse, sample
जूनून- madness, temptation, passion
दीवानगी- passion, madness, फुरकत- lonliness, isolation, संग- stone, रुख- direction
नेजे- scalpel, knife, इन्तहा- extreme, अंजाम- final condition

Wednesday, September 24, 2008

दौर गुज़र ही गया......


सबब-ए-ख्वाहिश, कि समंदर फिर से खामोश हो..........
थमे ये दौर-ऐ-तूफां.......
एक बार फिर तू मुझे सीने से लगा ले..........

पर न बुझा सका मेरी प्यास,
कोई भी पानी, तो ज़हर पीने लगा.......
रोज़ मरने के जैसे,
मैं फिर से जीने लगा.........


आखिरकार.......

बिखर गई जिन्दगी, आरजुएं और ख्वाब,
और मौत के पहलू मैं भी करीने लगा..........

अधूरा वादा, आधा इरादा.........

एक टूटा बिखरा सा,
वादा याद आता है.........
उसकी कुछ हसरतें,
वो अधूरा इक वादा याद आता है............

लरजते होंठ, मदहोश साँसें, खुशबू बदन की.......
रूप वो सादा याद आता है............

उस घर में, उसके आते ही होती थी ईद.......
आज सामने से गुज़रता वो बेजार जाता है.........

एक ख़याल यूं भी आया.......


टूटा भी नहीं बिखरा भी नहीं,
बस चटका सा है,
शीशा-ए-दिल............

एक उसके चले जाने से,
सूनी है मेरी महफिल.........

लाखों हैं पर,
कोई तेरा जवाब नहीं बन सकता.......
सितारे मिल भी जाएँ.......
तो आफताब नहीं बन सकता.........

सोचता हूँ,
वक़्त का भी, ये क्या असर है.......
मुझे तो है, पर क्या तुझे भी..........
मुझे खोने का डर है.......

Thursday, August 21, 2008

निर्झर


घटना वही पुरानी है,
पर अनुभव नया.....
समय फिर समय पथ पर गुज़र गया.........

ये निर्झर यूँ ही बहता रहेगा...........
प्रारब्ध की अप्रतिम कहानी,
कहता रहेगा.........

समय की कोख से,
कुछ और पल उतरेंगे.......
जीवन का थोड़ा सा जीवन,
और कुतरेंगे...........

इस सम्यक धरा - धारा में,
बस स्मृति शेष रहती है........

अस्पष्ट अकथ्य के,
कुछ भ्रंश भी मिल जाया करेंगे...........
जब भी गहरी पैठ लूँगा.........

प्रलय हो जब भी ये लय टूटे,
प्रश्नचिन्ह लगे हर रचना पर,
जब भी ये वलय टूटे..........

मैं चिंतन वन में
सुप्त, संज्ञा विहीन.........
चेतना हीन............
स्वयं में स्वयं को खोजता...........
मैं दिग्भ्रमित, मैं पथिक........

Saturday, August 16, 2008

मैं जिन्दगी का आइना हूँ.............


जिन्दगी की चमक देखी,
खुश्बू देखी, खूबसूरती भी..........

मासूमियत की महक देखी,
नन्हीं सी सितारा आँखें,
साँसों में मोहब्बत की नमी..........
तोतली, पर बेपनाह प्यारी बातें...........

ऊँगली पकड़, डगमगाती.......
चलने की कोशिश करती......
इठलाती, खिलखिलाती.........
और मुझमें उमंगों का समंदर भरती.......

मैं जिन्दगी का आइना हूँ, बिखरने न देना........
कहती रही..............
एक नन्ही बच्ची, मेरी गोद में खेलती रही.........

मैंने नाक से ऊँगली छू ली, तो हंस दी...........
यूँ तो शाम हो चली है पर,
मैं अब भी खोया हूँ, उलझा हूँ,

उसकी मासूमियत में,
अपनी जिन्दगी की तमाम सख्तियाँ भूल कर..................

Friday, August 8, 2008

गले मत लगना............

हाथ खीच के पियोगे,
तो मज़ा देगी।
कनीज़ है, गले मत लगना.............

काफिर तो बना चुकी,

मुफलिस भी बना देगी,
गले मत लगना..............

Saturday, August 2, 2008

इस से पहले कि.........

थकता हूँ, झुकता हूँ,

दो पल रुकता हूँ,

तो जेहन में उभर आते हो,

हाथों में ले कर हाथ, कहते हो........


बस कुछ कदम और,


जैसे जिन्दगी फ़िर से देती है,

कुछ साँसे उधार..............

चला आता हूँ तुम्हारी ओर,

पर छलावा बन कर,

फिर से क्यों दूर हो जाते हो................

जीवन के किसी अगले मोड़ पर खड़े मुस्कुराते हो,


तो रुक जाओ न,

बस दो पल

छू लेने दो, वो नाज़ुक होंठ,


इस से पहले, कि प्यास हद से गुज़र जाए,

और जाम-ऐ-जिंदगी, छलक जाए..............

Wednesday, July 30, 2008

और अधूरी है एक कविता..........


कठिन है, आज भी.............
तुम्हे शब्दों की सीमा में बाँध पाना,

कभी कभी प्रयास करता रहता हूँ...........
निरर्थक रहते हैं,
कदाचित सम्भव होता..............
विश्व भी तुमसे परिचित होता।
मेरा विश्व.........

आज फिर कविता को उकसाया.......
आगे बढे, बाँध ले तुम्हे,
पर इसके शब्दों का बाहुपाश छोटा है.............
फिर से आज.......
फिर न बाँध सकी, आज........
और अधूरी है, एक कविता...................


निरर्थक = meaning less, कदाचित = perheps, gosh, उकसाया = encouraged, बाहुपाश = arm grip

Monday, July 14, 2008

कोई नही..................

कहने को तो सब हैं,
सुनने को कोई नही......

धागे बिखरे हैं दोस्ती के,
रिश्ते बुनने को कोई नही............

सब आते हैं, शब्दों के मोती बिखेर चले जाते हैं,
पर बीनने को कोई नही...........

इस आसमान पे चाँद बन, चमकना हैं सब ने,
पर सितारे भी गिनने को कोई नही.................

सुनो तो मिल लो मुझसे, वरना करना क्या,
बस यूँ ही मिलने को कोई नही................

कांटे बन चुभ कर एहसास दिलाएं दर्द का सब,
बिखरने को फूल बन महकने को कोई नही.................

कहने को तो सब हैं पर सच में अपना कोई नही……….

Saturday, July 12, 2008

विजयश्री कामना............

विजय कामना तो आदि विचार, जीवन परिवृत्त,
सांसारिक परिचालन का आवश्यक निमित्त............

यही मेरी भी प्रेरणा, यही पीड़ा भी,
कभी गतिरोध बन जाती,
कभी मनोरंजक क्रीडा भी................

"विजयश्री कामना" भी,
बड़ा अप्रत्याशित व्यवहार करती है,
कभी हृदयशूल बन जाती,
कभी औषधि बन उपचार करती है.....................

थक जाऊं तो उत्साह देती,
विचारों, योजनाओं का प्रवाह देती,
प्रतिज्ञा बन जाती, अनुरोध बन जाती है,
कभी संबंधों का गतिरोध हो जाती है............

विजय कामना के, और जीव कामना के वश,
युगों से रची बसी, जीव के अंतस
यह "कामना विजयश्री"...............

Friday, July 11, 2008

वो तीन साल की बच्ची........

सब बच्चों के संग, पर थोडी से अलग,

वो फूल सी बच्ची, कुम्हलाई सी..............
गंदे कपडों में लिपटी,

एक फटा बैग कंधे पे टांग,
सड़क किनारे खड़ी रहती है,

और मैं बालकनी में उसी वक़्त.............


सिलसिला हफ्तों चलता रहा,

मैं उस से यूँ ही रोज़ मिलता रहा............


बस आती, बच्चे चले जाते,

पर उसे अकेला छोड़ कर.......................

न जाने बच्चों को या बस को,
देर तक हाथ हिला, विदा करती रहती..........
फिर थके से कदम उसे घर खींच ले जाते.............


बस जाने के बाद, उसके मुड़ने से पहले,

एक रोज़ मैं उसके पीछे खड़ा था.......

घूमी तो गाल थपथपाए, शरारती आँखे मुस्कुरा दीं............

बोली गुड मार्निंग अंकल,
मैंने नाम पुछा, बोली 'शबनम'.....

स्कूल नही गई, मैंने पुछा, तो सर झुका लिया उसने,

एक राज़ दिल में और एक आंसू आँख में छुपा लिया उसने........

फिर हौले से सर उठाया, बोली लड़की हूँ न.........

लड़की स्कूल नही जाती.......


और पापा, जूते सिलते हैं, तो पढने को पैसे नही हैं.....

कुम्हलाई सी वो तीन साल की बच्ची,

अब सिर्फ़ मुस्कुराती है,

रोज़ मेरे पास पढने आती है............

Thursday, July 10, 2008

विशिष्ट बच्चा

हाथ छू कर कैसे खुश हो जाना,

ये मैंने उसी से जाना........
सीढियों पे घंटों मेरी प्रतीक्षा,
दूर से देख कर बुलाने की कोशिश,
वो बोल नही सकता,
पर आँखें सब कहती हैं,

जी भर बातें करना चाहता है,
सीधा नही उठा सकता पर,

हाथ मिलाना चाहता है,

अपनी पतली कमजोर टांगों को,
इरादे की ताकत दे कर,
ख़ुद को खड़ा कर लेता है ख़ुद ही,
दीवार से ज्यादा उसकी हिम्मत है सख्त,
तो सहारा देती है.........

मेरे हाथ को पकड़, अस्पष्ट शब्दों में,
सारी खुशी, स्पष्ट कर देता है..........
प्यार के सिवा कुछ और न दे सका मैं उसे,

मेरी कालोनी में एक "विशिष्ट बच्चा" रहता है...........

वह हिन्दी है...............

संग संग चली जाती थी,
बरसों का मेरा साथ,
कुछ दिनों से उसे उदास देखा करता हूँ.......

कहती है, सब को बड़ा अभिमान था,
मैं न निभा सकी, न चल सकी,
समय के साथ..........
मेरा भी यौवन जाता सा लगता है........!

ये परिवर्तन तो सार्वभौम है,
बस इतना ही कह सका, उस दिन.......

प्रकृति अनुरूप सरल शब्द कह
धीरे धीरे चली गई.........
फिर मिली एक दिन,
बोली.......
मेरी सौतने आधुनिक हैं,
और मेरी भावना शायद थोडी जटिल.......

तो क्या समाज और मेरा प्रेम
कम होने का यह कारण उचित है........

प्रत्युत्तर में शब्दों का अभाव था,
मैं मौन रह गया, फिर से एक दिन...........

मेरी अधर-प्रिया थी,
अब भी कभी कभी, मिलती है अधरों पर.........
पर अधरों का साथ छोड़,
मेरी लेखनी की सहभागिनी है...........
वह हिन्दी है...............

प्रकृतिपालक/प्रक्रतिहंता

न ताप आतप ही रोक सका,
न वृष्टि से विनाश,
न सार्थक हो सके
न सफल मानव प्रयास.......

प्रकृति तो अप्रतिम, अतुलनीय,
मानव काया कोमल, कमनीय.......

मूढ़ है मानव, युगों से मदांध,
न समझा प्रकृति से,
ईश्वर का अप्रत्यक्ष सम्बन्ध.......

धर्म रटा तो सही, पर समझा नही,
समझता तो वट अब भी पूजे जाते...
तुलसी, कुलमाता......
पीपल, कुलदेव कहलाते.........

प्रकृतिपालक ने रची प्रकृति,
उत्तरदायित्व मिला मानव को.........
भाव मिले, विशेष अंग मिले,
जीवन के विशिष्ट रंग मिले,
पर न समझ सका उदारता, परमपिता की........

प्रकृतिहन्ता बन होड़ लेने चला,
सर्वशक्तिमान से,
दृष्टिविहीन मूढ़ खड़ा है तन कर,
बड़े अभिमान से..........

प्रकृति का दोष क्या, जो नष्ट हो,
मानव की यह इच्छा है,
प्रलय, परमात्मा की सेविका को,
आदेश मात्र की प्रतीक्षा है..............

समय है अभी भी,
मानव भूल सुधार ले........
घर-बाहर, मन-मस्तिष्क बुहार ले.........

Friday, July 4, 2008

एक तमन्ना ऐसी भी.................!

बस अभी अभी तो,

वो बहला कर गए हैं,

और फिर मन उदास हो चला,

दिन भर उनकी प्रीत संग रही,

फिर उनके बिन दिन ढला............

ओ बदलियों, न छेडो अभी,

अभी भरा भरा है मन,

अभी न सुलगा आग ह्रदय की,

ठहर जा ऐ पगली पवन.........

सपनो का घर मुझे बनाने दे,

साहिल तू ही रोक ले लहरें, दो पल

बस उन को आ जाने दे...........

एक और मिलन हो जाने दो, ऐ सूनी वादियों,

मैं सौंप दूँगा ख़ुद ही, तुम्हे ख़ुद को,

फिर मिल जाऊँगा मैं, ज़र्रे ज़र्रे में,

बेहिचक समंदर की बाहों में उतर जाऊंगा............

बस ह्रदय ही मेरा..............!


संगिनी कहूं, या संग नही कहूं,

उचित है कुछ भी न कहूं............


अपेक्षा ही तो है, हम दोनों के मध्य,


सारी समस्या का मूल, बस यही एक तथ्य...........

फिर सत्यवदन का पुरूस्कार मिला,

संसार भर से तिरस्कार मिला,

अब बोलने से पहले, सौ बार सोचता हूँ मैं,

स्वयं को, स्वयं से भी सत्य कहने से रोकता हूँ मैं.............

जब से मन के संबंधों पे धूल जमी है,

हम दोनों की आंखों में नमी है.........

न मैं कहता हूँ, कुछ, न ही वो.......

पर दोनों की आंखों में प्रश्न होते हैं,

फिर यूँ समझाते हैं एक दूजे को,

की साथ बैठ कर रोते हैं,

सारा जहाँ जब एक तरफ़

हो कर मुझे परखता है,

बस ह्रदय ही मेरा,

मुझे समझता है...................

Wednesday, July 2, 2008

न जाने कौन बदला..............?

खोने की फ़िक्र न थी, न पाने की......

बस कर दिया जो दिल ने कहा।

शीशे सा साफ़ जेहन,

माया से अछूता एक मन।

पर दुनिया विपरीत खड़ी थी,

मेरे समक्ष हमेशा समस्यायें बड़ी थीं।

कुछ यूँ था के....................

जो दिल में था, वो होठों पे था।

और उन दिनों मैं मुश्किलों में था।

फिर दुनिया बदली,

और मैंने अपने तरीके................

आँखें मूँद लीं,

होठ सी लिए,

अव्यवस्था पर आपत्ति न की...............

कड़वे घूँट पी लिए.........

अब दिल में हजारों राज़ छुपा रखे हैं,

अपने कई रूप बना रखे हैं।

हर इंसान से मिलता हूँ, जैसे "वो" चाहे............

बोलता हूँ, "वो" जो दुनिया सुनना चाहे...........

दुनियादारी आ गई मुझे भी।

तो सपनो सा सजा रखा है।

अब उसी दुनिया ने पलकों पे बिठा रखा है.....................

Thursday, June 19, 2008

न करूंगा अन्याय कविता से

मुझ पर भी कोई कहे कविता,
चाहा था मैंने भी।
पर योग्य न समझा लोगो ने,
मुझ में भी तो धड़कन है,
और तड़पता प्रेम,
फिर क्यों मुझसे ही रूठे सब कवि,
बस यही सोच उद्विग्न बहुत था,
ह्रदय कह उठा भीतर से,
बस बहुत हुआ, अब कलम उठा लो..............

पंक्ति-पंक्ति पर मैंने अपना रोष निकाला
दिल में भरा गुबार था, सब कह डाला,
फिर मुझको ये बोध हुआ,
मुझसे भी अपराध हुआ।

"कुछ" कहने के प्रयास में,
जाने क्या क्या कह डाला।

अनगढ़ हूँ पर फिर भी,
मैं रहा निरंतर जूझ,
शायद बड़ी यही थी चूक,

कुछ "अनमोल रतन" काव्य के
मेरे मार्ग-दीप,
बने प्रेरणा स्रोत,
पर ना मिल पायी वो प्रतिभा मुझको,
न ही शब्दकोष।

अपने काव्य का स्तर जान,
जब हुआ सत्य से परिचय
अब और न करूंगा अन्याय कविता से,
लिया है अन्तिम निर्णय।

इस बाज़ार में शोर बहुत है......

भीड़ ज्यादा हो तो बेचारे बछडे,
मेढ़े के भाव भी नही चढ़ पाते,

सोचता हूँ मैं भी दूकान समेट लूँ...........
इस बाज़ार में शोर बहुत है।

Saturday, June 14, 2008

साढे पाँच फुट की दीमक

दीमक, पीली, रत्ती भर की भी नही,
लकड़ी चुगते देखता था,
बच्चा हुआ करता था..........

कुछ वैसा ही अब देखा,
जब संवेदनशील आँखें खुली हैं,
साढे पाँच फुट की दीमक.......

सफ़ेद खद्दरधारी दीमकों की,
इम्पोर्टेड कारें,
इन्ही आंखो के आगे से गुज़रती हैं....

काले जेहन वाले सफेदपोश,
भ्रष्ट सोच और धूर्त आँखें,
दिन भर उद्घाटन यहाँ वहाँ,
फिर इन्तिहाई काली रातें......

हर कोने में मेरे देश को खोखला करतीं,
इन दीमकों के आका,
पार्लिआमेंट में मिलते हैं सिलसिलेवार,

तय करते हैं, की कैसे देश को, मिल बाँट कर खाना है और,
पेंशन, सरकारी भत्ता बढाना है और...........

इनकी नई पौध गरीबों की कमाई पर,
विदेश जाया करती है,
नई तरकीबें सीख कर,
पुश्तैनी धंधे में में लग जाया करती है.............

इन दीमकों ने,
हिन्दुस्तान के दिल में,
जमा रखा है अड्डा.......
और एक फिक्र नें मेरे दिल में...........

ना जाने कल,
मेरे भूखे हिन्दुस्तान का,
ये क्या हाल करेंगे,
बेच कर अपनी ही माँ,
माइक्रोसाफ्ट को मालामाल करेंगे..........

काश मैं हर बेईमान नेता की,
मौत की वज़ह बन सकता,

भले ही आप मुझे आतंकवादी ठहरा देते,
आजाद देश का गुलाम क्रांतिकारी,
होने की सज़ा देते.....

Friday, June 13, 2008

किसने की ?...........

घर तो सबने सजाया,
जेहन को प्यार के
एहसास से सजाने की कोशिश किसने की?.........

बात चुभती थी दिल में,
मैं चुभ जाने दी............
कि अपनी राह का पत्थर
तो सभी हटाते हैं,
सड़क का पत्थर........
हटाने कि कोशिश किसने की?.............

ईश्वर की रचना में भी निकाल दे कमी,
वो फितरत इंसान की,
उसी नज़र की कसौटी पर,
ख़ुद को आजमाने की कोशिश किसने की?................

मेरी हर बात पे बजती है ताली,
हर लाइन पे वाह वाह,
मेरी खता बताने कि कोशिश किसने की?..........

यूँ ही ढकी रहने दो........

कालोनी के बगल में, कूड़े का ढेर...
जिस पर उगा था कोई पेड़,
एक दिन नज़र पड़ी,
करीब जा कर देखा, गुलाब था............

चीथडों, प्लास्टिक और,
सब्जी के छिलकों से ढका...
ना जाने क्या दिल में आया........
तो एक प्लास्टिक को,
हटाने की कोशिश की....

उसने हलके से हिल कर॥
एक काँटा चुभा दिया, शिकायत की, शायद..........
जैसे कह रहा था.........

मैं गरीब, बेसहारा, "माँ" हूँ।
यूँ ही ढकी रहने दो,
दामन में कुछ कुछ गुल छुपा रखे हैं,
दुनिया की नज़र में उजागर ना हो,
तो बेहतर......

वरना ये मेरी बेटियाँ, मेरे बेटे,
किसी शाह के हरम की क़नीज़,
या शहजादी का खिलौना बन जायेंगे....
कहीं क़दमों तले बिछ जायेंगे......

अपनी ऊँगली सहलाता मैं,
कमरे पे चला आया,
कल गुज़रा था उधर से,
तो उस माँ की लाश पड़ी देखि.........

उसके बेटे, बेटियों को लूट ले गए थे,
जो ख़ुद को कहते हैं,

इंसान,

मैं कहूं तो सभ्य "पशु"................

यूँ समझते हैं....

दोआबा की सर्दियां,
नवम्बर की वो धुंद,
जिन्होंने नही देखी,
वो यहाँ, गर्द-ओ-गुबार को,
सुहाना मौसम कहते हैं.....

पैसा मेरी खातिर यहाँ...
मसाइल-ओ-ज़द्दोज़हद है,
वो मरहम समझते हैं......

रात पार्टी थी, लोधी गार्डन में,
बीयर जमी है, घास पर,
शबनम समझते हैं..............

यहाँ अंग्रेज़ी, फ्रेंच,
बोलते हैं फर्राटेदार,
इंसानियत की बोली,
कुछ कम समझते हैं.....

चीजों से दिल लगा बैठे हैं,
पर क्या हमसफ़र को भी,
कभी हमदम समझते हैं............

पहाड़ सा शहर

कंक्रीट के पहाड़ सा शहर,
जिसमे धँसे हैं, कुछ गिने चुने दरख्त....
इसी पहाड़ पर रेंगते हैं,
कुछ मशीने, कुछ इंसान
जहाँ इंसानों के दिल........
पत्थर से भी सख्त

रईसों की कोठिआं,
उनकी तस्वीर-ऐ-रुतबा हैं,
गरीब फुटपाथ पे सोता है,
गरीबी को ले कर ख़ुद से खफा है....

क्या रईस क्या मुफलिस,
सब की पेशानी पे लकीरें हैं,
कुछ की एक नंबर की कमाई,
कुछ की दो नंबर की तदबीरें हैं.....

ये होटल ताज जो बना है..
ज़र्रा ज़र्रा जुड़कर,
मुझे ठिगना कहता है,
पैसा है अब दूसरा खुदा,
एहसास दिलाता है.....

कंक्रीट के इसी जंगल में अपने जैसी...
बस एक और जिन्दगी तलाशता हूँ शाम-ओ-सहर...
दो साल से प्यासा रखे है,
ये मुर्दा शहर,
कंक्रीट के पहाड़ सा शहर...........

Wednesday, June 11, 2008

बेघरों की रात

अपना घर छोड़ कर गावं से शहर आए दो मजदूर दोस्तों
की एक रात तिरपाल की छत तले कुछ यूँ गुज़रती है................

चूर चूर हुआ जाता है बदन
गारा चूना ढो ढो कर गुज़रे हैं
जो सहर-ओ-दिन

दिहाड़ी है हाथ में
तो ख़ुद खाएं या
बीमार बच्चे के लिए बचाएँ
चल आज फिर आटा घोल ले यार
पेट भर जाए
नींद तो आ ही जाए

फटी तिरपाल की छत को
शब ढले आशिकी सूझी है
हवा संग अठखेलियाँ करे तो करे
क्यों हम मजदूरों की नींद हराम करती है

फटी कमीज़ की जेब में एक फोटो पड़ा है
निकाल दे यार
कभी मेले गया था, बा-कुनबा

याद कर लूँ अपनी जवानी
और आज फिर से एक बार दिल जला ले यार
मैं देख लूँ बेटे को..........यहाँ अँधेरा बहुत है.................

Tuesday, June 10, 2008

हालात यूँ ही बदलते रहे........
तो किस्मत एक रोज़ उलझ ही पड़ेगी,
पिघलता रहेगा दिल बर्फ बन बन कर,
और इस गुज़रते वक्त को.......
पल पल अपनी जवानी देता हूँ मैं...

घुटनों पे झुकती हैं, आरजुएँ
दो पल और जिंदगी मांगती हैं...
अपने अश्क पिला देता हूँ....
फिर टूटे हुए ख़्वाबों की,
ख़ुद को निशानी देता हूँ मैं.....

जानता हूँ कि कट ही जायेंगे कल....
फिर भी दरख्तों को पानी देता हूँ मैं,
जिंदगी मांगती है मुझसे तो.....
हर रोज़ नई कहानी देता हूँ मैं............

Friday, May 16, 2008

कारण ये प्रश्न.......

क्यों रचा विधि ने मुझे
क्यों इतनी सम्वेदना मुझमे ही.......
क्यों भोर के पहले पहर
भीनी हलकी सी सुगंध भी...
जगा देती है मुझे............

क्योँ भावनाओं का अतिरेक
मादकता की अतिशयोक्ति है।
प्रेम का चरम...
क्यों मुझ में....

अलौकिक से आभाष
या ये प्रकृति के परिहास,
ये अकथ्य का बोध....
व्यक्तित्व का मूल्यांकन...
मेरे लिए बस खेल।
क्यों ये प्रतिभा...
मूल्यांकन की...
पर या स्वः...
कठिन क्यों नही...

पर-विचार, सिद्धांत, या स्वाव्धारना...
क्यों इनमे परिमार्जन की रिक्ति मिलती सदैव...

क्यों ये समंजन की क्षमता
ये रचनात्मकता।
क्यों ये भाव, ये उद्विग्नता...
त्रुटी परिशोधन की अति।
और विश्लेषण भाव अन्तर्निहित

क्यों ये पीड़ा वैशेश्य की...
क्यों कारण ये प्रश्न सभी ?

Sunday, May 11, 2008

एक टुकडा फिर सुनहरा हो जाए


रोज़ एक दिन गुज़रता है, मेरे सामने से,
शीशे के टुकड़े के मानिंद,
सालों मैंने कोशिशे की हैं,
इनको खुरचने की,
निशानियाँ दी हैं, अपने ज़ख्मों की...

लहू-लुहान करते रहे हैं, जब तब मुझे....

एक टुकडा सुनहरा गुज़रा था,
जब तुम मिले थे,
फिर हर टुकडा चांदी हो गया था,
मुझे निखारा था, संवारा था, उन दिनों
दिल के आईने में ख़ुद को,
देखना सिखाया था, तुमने....
दुनियादारी की राह पे,
चलना सिखाया था, "तुमने"

मैंने अपने मरतबे तराशे थे,
"तुम्हारा" हाथ थाम कर,
शीशे की इन कतारों के पार जा कर,
जीना सिखाया मुझे..................

सपनो की दुनिया बनाते हैं कैसे,
बताया था मुझे,
फिर कैसे करना है, सच उन्हें....
बताते थे मुझे छू कर..........

जब पहली बार किया कोई सपना सच,
मैंने अपना...........
ख़ुद को पाया था सातवें आसमान पे,
ढूँढा तुम्हे फलक से जमी तलक,
क्योँ नही मिले तब से अब तक......
मैं अब भी बैठ जाता हूँ,
उस सच हुए ख्वाब के पास...........

दोनों झुकते हैं सज़दे में एक साथ...

दोनों की दुआ वही एक...
काश एक टुकडा फिर सुनहरा हो जाए......................

दिल्ली की उदास सी शाम को...........

ये आलम के साँस लेने की फुरसत नही किसी को,
सब अपने बन कर पराये होते,
और फिर से कोई अपना तलाशते.......
जिनकी हथेलियों में लकीरें न रहीं,
बस चंद टुकड़े हरे कागज़ के,
और थोड़े से सिक्के,
यूँ भागते के ज़लज़ला आया,
यूँ चीखते के गर्दन पे नेजे की धार हो,
बस यही तमाशा देखता हूँ दिल्ली की हर उदास शाम को.........

सड़कों पे मासूमों को देखा है,
मोल भाव करते, पाँच बरस की उमर में,
पेन बेचते, या नई पुरानी किताबें..............

सडको पे न जाने कब इनका बचपन छीन ले गया कोई,
एक लड़की को देखता हूँ,
तार तार कपडों में छुपाती हैं ख़ुद को, एक पेड़ की आड़ में,
रात रोज़ लूट लेती है, उसे कई बार.......
हर मर्द अब एक जानवर है बस, उसके लिए...........
मैं नज़रें चुराता हूँ उस से, और ख़ुद से भी......
आगे बढ़ जाता हूँ ख़ुद को कोसता,
दिल्ली की एक उदास सी शाम को........................

कुछ बड़ी अकड़ वाले सर कारों में धसे देखे,
इतराना और ये अकड़ ना जाने पैसे की है,
या काम के बोझ की, मैं सोचता हूँ....
आंखों पे काला चश्मा, बदन पे महंगे कपड़े,
अपना लहू दे कर खरीदे, जो इन्होने,
लहू देने गुडगाँव जाते हैं,
बस "कैब" के "कैदी" हो कर हर रोज़.......
BPO लहू मांगते हैं, ये देते हैं....
वो और मांगते हैं ये और देते हैं...........
आज शाम की अकेली खुशी, मैं इस भीड़ में शामिल नही...........
मैं खुश होता हूँ दिल्ली की उदास शाम को........

मैंने सुना था दिल्ली की शाम सुहानी होती थी,
रही होगी, जब गालिब रहा होगा.......
हर मौसम इंसान के मुताबिक रहा होगा,
अब ना तो पीने को पानी हैं,
न जीने को हवा,
मैली हो चुकी यमुना के किनारे,
मैं खड़ा सोचता हूँ यही,
दिल्ली की एक उदास सी शाम को.................

Friday, April 11, 2008

खोई खोई सहमी सहमी, तन्हा सी ये जिन्दगी,
ख़ुद से जुदा मुझसे खफा, थोडी सी ये जिन्दगी,
शाम के पहलू में रोता हूँ सर को ढाल के,
एक टुकडा कब से मैंने, रखा बहुत सम्हाल के,
बस उसी टुकड़े को फिर से ढूँढती ये जिन्दगी,
ख़ुद से जुदा मुझसे खफा, थोडी सी ये जिंदगी,
हर गज़र मुझको सुनाये, शब-ऐ-आख़री की आहटें,
अपने ही तय अंजाम से भागती ये जिन्दगी..................