परिंदों को आसमा नसीब हुआ,मुझे दो गज ज़मीन भी न मिली,
पैरों तले ज़मीन नही,
रोशन राह करने को,
हरक़तों में क़यामत की बानगी देखता हूँ,
जूनून देखता हूँ,
दर्द लायी,
क्या अजीब सी बात है..............
रिसते हैं यूँ ज़ख्म,
सर्द हुआ बदन,
कभी इन्तहा तक चला,
परिंदों को आसमा नसीब हुआ,
सबब-ए-ख्वाहिश, कि समंदर फिर से खामोश हो..........
थमे ये दौर-ऐ-तूफां.......
एक बार फिर तू मुझे सीने से लगा ले..........
पर न बुझा सका मेरी प्यास,
कोई भी पानी, तो ज़हर पीने लगा.......
रोज़ मरने के जैसे,
मैं फिर से जीने लगा.........
आखिरकार.......
बिखर गई जिन्दगी, आरजुएं और ख्वाब,
और मौत के पहलू मैं भी करीने लगा..........



थकता हूँ, झुकता हूँ, दो पल रुकता हूँ,
तो जेहन में उभर आते हो,
हाथों में ले कर हाथ, कहते हो........
बस कुछ कदम और,
जैसे जिन्दगी फ़िर से देती है,
कुछ साँसे उधार..............
चला आता हूँ तुम्हारी ओर,
पर छलावा बन कर,
फिर से क्यों दूर हो जाते हो................
जीवन के किसी अगले मोड़ पर खड़े मुस्कुराते हो,
तो रुक जाओ न,
बस दो पल
छू लेने दो, वो नाज़ुक होंठ,
इस से पहले, कि प्यास हद से गुज़र जाए,
और जाम-ऐ-जिंदगी, छलक जाए..............

कहने को तो सब हैं,
सब बच्चों के संग, पर थोडी से अलग,वो फूल सी बच्ची, कुम्हलाई सी..............
गंदे कपडों में लिपटी,
एक फटा बैग कंधे पे टांग,
सड़क किनारे खड़ी रहती है,
और मैं बालकनी में उसी वक़्त.............
सिलसिला हफ्तों चलता रहा,
मैं उस से यूँ ही रोज़ मिलता रहा............
बस आती, बच्चे चले जाते,
पर उसे अकेला छोड़ कर.......................
न जाने बच्चों को या बस को,
देर तक हाथ हिला, विदा करती रहती..........
फिर थके से कदम उसे घर खींच ले जाते.............
बस जाने के बाद, उसके मुड़ने से पहले,
एक रोज़ मैं उसके पीछे खड़ा था.......
घूमी तो गाल थपथपाए, शरारती आँखे मुस्कुरा दीं............
बोली गुड मार्निंग अंकल,
मैंने नाम पुछा, बोली 'शबनम'.....
स्कूल नही गई, मैंने पुछा, तो सर झुका लिया उसने,
एक राज़ दिल में और एक आंसू आँख में छुपा लिया उसने........
फिर हौले से सर उठाया, बोली लड़की हूँ न.........
लड़की स्कूल नही जाती.......
और पापा, जूते सिलते हैं, तो पढने को पैसे नही हैं.....
कुम्हलाई सी वो तीन साल की बच्ची,
अब सिर्फ़ मुस्कुराती है,
रोज़ मेरे पास पढने आती है............
हाथ छू कर कैसे खुश हो जाना,ये मैंने उसी से जाना........
सीढियों पे घंटों मेरी प्रतीक्षा,
दूर से देख कर बुलाने की कोशिश,
वो बोल नही सकता,
पर आँखें सब कहती हैं,
जी भर बातें करना चाहता है,
सीधा नही उठा सकता पर,
हाथ मिलाना चाहता है,
अपनी पतली कमजोर टांगों को,
इरादे की ताकत दे कर,
ख़ुद को खड़ा कर लेता है ख़ुद ही,
दीवार से ज्यादा उसकी हिम्मत है सख्त,
तो सहारा देती है.........
मेरे हाथ को पकड़, अस्पष्ट शब्दों में,
सारी खुशी, स्पष्ट कर देता है..........
प्यार के सिवा कुछ और न दे सका मैं उसे,
मेरी कालोनी में एक "विशिष्ट बच्चा" रहता है...........
बस अभी अभी तो,
वो बहला कर गए हैं,
और फिर मन उदास हो चला,
दिन भर उनकी प्रीत संग रही,
फिर उनके बिन दिन ढला............
ओ बदलियों, न छेडो अभी,
अभी भरा भरा है मन,
अभी न सुलगा आग ह्रदय की,
ठहर जा ऐ पगली पवन.........
सपनो का घर मुझे बनाने दे,
साहिल तू ही रोक ले लहरें, दो पल
बस उन को आ जाने दे...........
एक और मिलन हो जाने दो, ऐ सूनी वादियों,
मैं सौंप दूँगा ख़ुद ही, तुम्हे ख़ुद को,
फिर मिल जाऊँगा मैं, ज़र्रे ज़र्रे में,
बेहिचक समंदर की बाहों में उतर जाऊंगा............

संगिनी कहूं, या संग नही कहूं,
उचित है कुछ भी न कहूं............
अपेक्षा ही तो है, हम दोनों के मध्य,
सारी समस्या का मूल, बस यही एक तथ्य...........
फिर सत्यवदन का पुरूस्कार मिला,
संसार भर से तिरस्कार मिला,
अब बोलने से पहले, सौ बार सोचता हूँ मैं,
स्वयं को, स्वयं से भी सत्य कहने से रोकता हूँ मैं.............
जब से मन के संबंधों पे धूल जमी है,
हम दोनों की आंखों में नमी है.........
न मैं कहता हूँ, कुछ, न ही वो.......
पर दोनों की आंखों में प्रश्न होते हैं,
फिर यूँ समझाते हैं एक दूजे को,
की साथ बैठ कर रोते हैं,
सारा जहाँ जब एक तरफ़
हो कर मुझे परखता है,
बस ह्रदय ही मेरा,
मुझे समझता है...................
खोने की फ़िक्र न थी, न पाने की......
बस कर दिया जो दिल ने कहा।
शीशे सा साफ़ जेहन,
माया से अछूता एक मन।
पर दुनिया विपरीत खड़ी थी,
मेरे समक्ष हमेशा समस्यायें बड़ी थीं।
कुछ यूँ था के....................
जो दिल में था, वो होठों पे था।
और उन दिनों मैं मुश्किलों में था।
फिर दुनिया बदली,
और मैंने अपने तरीके................
आँखें मूँद लीं,
होठ सी लिए,
अव्यवस्था पर आपत्ति न की...............
कड़वे घूँट पी लिए.........
अब दिल में हजारों राज़ छुपा रखे हैं,
अपने कई रूप बना रखे हैं।
हर इंसान से मिलता हूँ, जैसे "वो" चाहे............
बोलता हूँ, "वो" जो दुनिया सुनना चाहे...........
दुनियादारी आ गई मुझे भी।
तो सपनो सा सजा रखा है।
अब उसी दुनिया ने पलकों पे बिठा रखा है.....................

ये काले सफ़ेद शीशों के कैदी ही
दिल तोड़ने का हुनर जानते हैं
शीशे के घर बनाता तो परीशां रहता,
कब संग आ लगे दीवार से,
फिर लोगों का खैरख्वाह कोई तो हो....
वक्त गुजरता जाए है,
तू मुझसे रफ्ता रफ्ता जुदा होती जाए,
मुश्किलों की बारिश में रोज़ भीगता मैं,
कुछ कोशिशें करता हूँ,
ख़ुद को धोखा देने की, सुखाने की,
कहीं किसी दरख्त की तलाशता हूँ टहनी,
की मुश्किल शायद गुजर ही जाए,
पर वो तो चली ही आती है,
मेरी तन्हाई, तेरी फुरकत का एहसास दिलाने,
नीम के पेड़ पे बैठे,
भीगे परिंदे की याद दिलाने।
मौसम ने महीने भर बाद होली खेली,
बारिश को न्योता मिला तो खुशी खुशी चली आई,
ठंडी हवा ने भंग घोल दी साँसों में,
बादलों ने ऊंची छत पे चढ़ के सबको सराबोर किया,
पेड़ों पे न जाने किसने हरा गुलाल डाला,
सूरज शाम को टेसू के फूल छिड़क के भागा,
सालों बाद आज एक कोने में
मैंने शहर में इन्द्रधनुष देखा है...................
ये धागा...........
मुझे मुश्किलों में लिए जाता है
साँसों में कोई डोर है
तो टूटती क्योँ नही....................?
लफ्ज़ डूबते उतराते यादों के समंदर में,
जैसे कश्ती कोई टूटी लहरों से चोट खा के,
सोचता हूँ, क्या चुन लूँ, क्या लिख दूँ,
दर्द हल्का हो जाए,
लिख दूँ तो शायद हो ही जाए...........
पर साफ साफ लिखने से कलम कतराए...........






मन का दर्पण टूटा,
उनकी बसें भी हैं,